लव कुश - अनिल कुमार Lav Kush - Hindi book by - Anil Kumar
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पौराणिक कथाएँ >> लव कुश

लव कुश

अनिल कुमार

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :48
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3936
आईएसबीएन :81-8133-384-5

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सीता पुत्रों के महान पराक्रम की दिव्य कथा....

Lav-kusha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

लव और कुश

(युद्धोपरान्त उपकथा)
(वाल्मीकि रामायण)

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में अन्य बातों के साथ-साथ श्रीराम द्वारा सीताजी का परित्याग, लव- कुश का जन्म एवं अश्वमेघ यज्ञ का भी वर्णन है।
श्रीराम के बहुत से अनन्य मित्र थे। उनके नाम थे-विजय, मधुमत्त, काश्यप, मंगल, कुल, सुराज, कालिय, भद्र, दन्तवक्त्र एवं सुमागध।
श्रीराम के ये सखा बहुधा उनके पास आकर एकत्रित होते थे व भांति-भांति की कथाएं कहकर प्रभु का मनोविनोद भी करते थे।
एक दिवस की बात है, श्रीराम ने अपने सखाओं के साथ परिचर्चा के समय पूछा, "भद्र ! आज कल हमारे राज्य के प्रजाजनों में वार्ता का मुख्य विषय क्या है ?"

भद्र ने कहा, ‘‘प्रभु ! आपके प्रजाजन आपकी अत्यधिक प्रशंसा करते हैं। अजेय राक्षसराज रावण पर आपकी विजय की पूर्ण सराहना हो रही है, परन्तु सीताजी के प्रति उनका उतना ही आलोचनात्मक दृष्टिकोण है। उनका कहना है कि रावण सीताजी को हर कर ले गया, उसने उन्हें दीर्घ काल तक अशोक वाटिका में रखा और इन सब के होते हुए भी उन्हें आप द्वारा स्वीकार कर लिया गया। आपके प्रजाजनों का विचार है कि उन्हें भी आप ही के समान अपनी पत्नियों का स्वागत करना होगा जब वे अपने पतियों से दूर कहीं और समय व्यतीत करके आई होंगी, क्योंकि प्रजा का कर्तव्य है कि वह राजा के आदर्शों का अनुकरण करें।"

यह सुनकर श्रीराम को भारी आघात लगा। कुछ पलों के लिए वे शारीरिक रूप से सचेत होते हुए भी मानसिक रूप से चेतना शून्य से हो गए। उन्होंने अपने निकटवर्ती द्वारपाल को बुलाकर कहा कि वह अविलम्ब लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न को बुलाकर लाए। जब तीनों अनुज आए तो श्रीराम के नेत्र अश्रुप्लावित थे। श्रीराम ने उन्हें सीताजी के प्रति प्रजाजनों के विचार से अवगत कराया, और अन्त में उन्होंने लक्ष्मण को आदेश दिया कि वह सीताजी को ले जा कर राज्य की सीमा के बाहर छोड़ आए। श्रीराम किसी भी प्रकार का अभियोग स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने कहा, "लक्ष्मण ! आप सुमन्त्र, हमारे सारथि से कहें कि वह आपको एवं सीता को गंगा नदी के उस पार ले जाए। तमसा नदी के तट पर वाल्मीकि मुनि का आश्रम है। सीताजी को आप आश्रम के पास निर्जन वन में छोड़कर चले आएं," इतना कहते-कहते प्रभु श्रीराम के नेत्रो से अश्रु-धारा बह निकली।

वास्तव में सीताजी ने एक बार श्रीराम के समक्ष लंका से वापस आने के पश्चात् ऋषि-मुनियों का आश्रम देखने की इच्छा की थी, किन्तु उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि उनकी इच्छा की पूर्ति इस रूप में होगी।
कभी-कभी कुछ बातें कहीं किसी और प्रयोजन से जाती हैं, और उनकी परिणति किसी और रूप में होती है।
दूसरे दिन सारी तैयारी कर लेने के पश्चात् लक्ष्मण सीताजी के पास आए और उन्होंने कहा, ‘‘देवि। एक बार आपने ऋषि-मुनि का आश्रम देखने की इच्छा व्यक्त की थी, और आज मुझे श्रीराम से आदेश प्राप्त हुआ है कि मैं आपको गंगाजी के पास ऋषि-मुनियों के आश्रम ले जाऊं।"

यह सुनकर वास्तविक तथ्य से अनभिज्ञ सीताजी लक्ष्मण के साथ जाने के लिए अविलम्ब तत्पर हो गईं।
सीताजी और लक्ष्मण रथारूढ़ हो गए और सारथि सुमन्त्र रथ हांकने लगा। सायंकाल होते-होते वे गोमती के तट पर पहुंचे। चूंकि रात्रि घिरने लगी थी, इसलिए वहीं पर पास के किसी आश्रम में रात्रि व्यतीत करने का निश्चय हुआ।
अगले दिन सुबह यात्रा पुनः आरम्भ हुई। रथ गंगा- तट की ओर बढ़ रहा था। दोपहर होते-होते सीताजी और लक्ष्मण गंगाजी के तट पर पहुंच गए। लक्ष्मण ने गंगाजी की जलराशि पर दृष्टि डाली और रोने लगे। सीताजी को लक्ष्मण के इस प्रकार अचानक रोने से बहुत आघात लगा। उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वे इतने दुखी क्यों थे।

इसी बीच लक्ष्मण ने एक नाव मंगाई और उस पर सीताजी के साथ सवार हो गए। नदी को पार कर लेने के पश्चात् लक्ष्मण ने भारी हृदय से कहा, देवि। अब समय आ गया है जब मुझे आपको सत्य से अवगत करा देना चाहिए। आप मेरा विश्वास करें। मैं जो कुछ आपसे कहने जा रहा हूं, उसे कहने के लिए मुझे अत्यधिक साहस जुटाना पड़ा है। और वह कड़वा सत्य यह है कि श्रीराम ने आपका परित्याग कर दिया है। वह अपने निर्णय से अत्यन्त दुखी हैं, किन्तु अयोध्या नगरी में आपके सम्बन्ध में प्रजाजनों द्वारा व्यक्त किए जा रहे विचारों से क्षुब्ध होकर श्रीराम को ऐसा क्रूर निर्णय लेना पड़ा है। मुझे आदेश हुआ कि मैं आपको यहां पर छोड़ दूं। देवि ! आप चिन्ता न करें। वाल्मीकि मुनि जो हमारे पिता, राजा दशरथ के अनन्य मित्र रह चुके हैं, का आश्रम यहीं पास में है। आप कृपया उनके आश्रम में शरण लेकर शान्तिमय जीवन व्यतीत करें।"

सीताजी को यह सुनकर भयंकर आघात लगा। वह मूर्च्छित हो गईं। कुछ समय में सचेत होने के पश्चात् उन्होंने कहा, "जाओ। जाकर श्रीराम से कह देना कि उनकी अर्धार्गिनी होने के कारण उनकी आज्ञा का पालन एवं अपमान से उनकी रक्षा करने के लिए अपना सर्वस्व राजवंश चलाने का दायित्व मुझ पर न होता तो मैं अवश्य प्राणत्याग कर देती। पर विधाता की लेखनी ने मुझे असहाय बनाकर रख दिया है। प्रभु को बतला देना कि मैं शीघ्र ही उन्हें पिता बनाने का गौरव प्रदान करने वाली हूँ।

लक्ष्मण सीताजी को नितांत निर्जन वन में पूर्णतः असुरक्षित छोड़ कर चले आए। सीताजी करुण क्रन्दन करने लगीं। पास ही के आश्रम में रह रहे कुछ मुनियों के क्रीड़ापन बालकों ने सीताजी का रुदन सुना और भागकर वाल्मीकि मुनि को इस बात की सूचना दी। मुनि उस समय ध्यानावस्थित थे। इस प्रकार की सूचना पाकर वाल्मीकि मुनि ने पुनः अपने नेत्र बन्द कर लिए व समाधिस्थ हो गए। समाधि की अवस्था में सीताजी के सम्बन्ध में उन्होंने पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ली। तत्पश्चात् बालकों के साथ वे शीघ्रता से घटनास्थल पर पहुंच गए।


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