Madan Mohan Malviya - Hindi book by - M. I. Rajasvi - मदन मोहन मालवीय - एम. आई. राजस्वी
लोगों की राय

महान व्यक्तित्व >> मदन मोहन मालवीय

मदन मोहन मालवीय

एम. आई. राजस्वी

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :94
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3986
आईएसबीएन :81-8133-627-5

Like this Hindi book 6 पाठकों को प्रिय

2 पाठक हैं

रूढ़ियों,कुरीतियों और अंधविश्वासों के अंधकार में डूबे समाज को सनातन संस्कृति और शिक्षा का प्रकाश देने वाले महामना की महान गाथा.....

Madan mohan malviya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वकालत पास करने के बाद मदन मोहन मालवीय प्रयाग के उच्च न्यायालय में पहुँच गए। यहाँ पर वे मुकदमों की पैरवी बड़ी कुशलता और धैर्य के साथ करने लगे। सफल वकील होने के तीन विशेष गुण मालवीय में विद्यमान थे-मुकदमें की पक्की तैयारी, प्रभावशाली वाणी और अपने मुकदमें को ऐसे ढंग से रखने की कला कि सुनने वाला तत्काल बात मान ले। वे पुराने निर्णयों के उद्धरण और कानूनी तथा तथ्यात्मक पक्ष को ऐसे शांत और प्रामाणिक रीति से प्रस्तुत करते थे कि उनके विरोधी वकीलों को सदा ही उन तथ्यों या तर्कों का खंडन करना कठिन हो जाता था।

अखिल भारतीय संपादक सम्मेलन की स्वागत समिति की अध्यक्षता करते हुए मालवीय जी ने कहा था—‘ब्रिटिश सरकार अपनी दमनकारी नीतियों को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए ‘प्रेस एक्ट’ और ‘न्यूज पेपर एक्ट’ जैसे विधान बना रही है। इससे हमारे देश के पत्रों की स्वतंत्रता पूर्णतया समाप्त हो जाएगी।

यदि भारत के संपादक और पत्रकार वीरतापूर्वक इस घातक प्रवृत्ति का विरोध नहीं करते तो भारतीय पत्रों का भविष्य संकटग्रस्त हो जाएगा।’
मालवीय जी बड़े धर्मनिष्ठ सनातनधर्मी थे। उनका सदैव विश्व बंधुत्व में विश्वास था। उनका हिंदुत्व जातीयता की परिधि से बहुत ऊपर समता, सहृदयता और सर्वग्राही प्रकृति का था। वे धर्म को देश के लिए शांति, समृद्धि और विकास का साधन बनाना चाहते थे। वे धर्म की उन्नति में देश और समाज की उन्नति और धर्म के उद्धार में देश का उद्धार मानते थे।

मालवीयजी देश की एकता में उन्नति और विकास का प्रतिबिंब देखते थे। उनका कहना था, ‘भारतवर्ष केवल हिंदुओं का देश नहीं है। यह तो मुस्लिम, ईसाई और पारसियों का भी देश है। यह देश तभी समुन्नत और शक्तिशाली हो सकता है, जब भारतवर्ष की विभिन्न जातियाँ और यहां के विभिन्न संप्रदाय पारस्परिक सद्भावना और एकात्मकता के साथ रहें। जो भी लोग इस एकता को भंग करने का प्रयास करते हैं, वे केवल अपने देश के ही नहीं, वरन् अपनी जाति के भी शत्रु हैं।’
मालवीयजी ने जब हैदराबाद के निजाम के सामने काशी हिंदू विश्विद्यालय के लिए कुछ दान स्वरूप देने को कहा, तो निजाम ने मना कर दिया। एक शवयात्रा के पीछे फेंके जाने वाले पैसों को मालवीय जी इकट्ठा करने लगे। लोगों ने जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि निजाम और उनके लिए-अर्थात् दोनों के लिए लज्जा की बात होगी कि हैदराबाद से वे खाली हाथ वापस लौटें। यह सुनकर निजाम को कुछ देने के लिए विवश होना पड़ा।
मालवीय जी ने कहा

मर जाऊं मांगूं न अपने तन के काज।
परमारथ के कारने मोहि न आवे लाज।।


प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book