गीतांजलि - रबीन्द्रनाथ टैगोर Gitanjali - Hindi book by - Rabindranath Tagore
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गीतांजलि

रबीन्द्रनाथ टैगोर

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :172
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3987
आईएसबीएन :81-8133-321-7

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भाव-गीतों की एक ऐसी अलौकिक झंकार जिसने संगीत की अनूठी शैली को जन्म दिया..

Gitanjali

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


नोबेल पुरस्कार से सम्मानित महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की गीत-संगीतमयी अमरकृति जिसने विश्व के साहित्य जगत् को अपने अलौकिक सम्मोहन में बांध लिया।

मानव मन की सहज आध्यात्मिक गहराइयों और ऊंचाइयों की अप्रतिम अभिव्यक्ति, जिसने सभी मानवीय पुरस्कारों को अदना बना दिया।

जननी, तेरे करुण चरण


जननी, तेरे करुण चरण कल्याणी
देखे मैंने आज प्रभात-किरण में,
भर-भर उठती चुपचुप मौन गगन में।
अखिल भुवन में माथा तुझे नवाऊं
सब जीवन-कर्मों में शीष झुकाऊं
तन-मन-धन सब आज निछावर कर दूं
भक्ति-धूप पावन पूजन-अर्चन में।
जननी, तेरे करुण चरण कल्याणी
देखे मैंने आज प्रभात-किरण में।

विकसित करो हमारा अंतर


विकसित करो हमारा अंतर, अंतरतर हे !
उज्जवल करो, करो निर्मल, कर दो सुन्दर हे !

जाग्रत करो, करो उद्यत, निर्भय कर दो हे !
मंगल करो, करो निरलस, नि:संशय कर हे !
विकसित करो हमारा अंतर, अंतरतर हे !

युक्त करो हे सबसे मुझको, बाधामुक्त करो,
सकल कर्म में सौम्य शांतिमय अपने छंद भरो।
चरण-कमल में इस चित्त को दो निस्पंदित कर हे !
नंदित करो, करो प्रभु नंदित, दो नंदित करो हे !
विकसित करो हमारा अंतर, अंतरतर हे !

विपदाओं से मुझे बचाओ


विपदाओं से मुझे बचाओ, यह न प्रार्थना,
विपदाओं का मुझे न होवे भय।
दुख से दुखे हृदय को चाहे न दो सांत्वना,
दुखों जिसमें कर पाऊं जय।
जो सहाय का जुटे न संबल
टूट न जाए पर अपना बल
क्षति जो घटे जगत् में केवल मिले वंचना,
अपने मन में मानूं किंतु न क्षय।
मेरा त्राण करो तुम मेरी यह न प्रार्थना,
तरने का बल कर पाऊं संचय।
मेरा भार घटा कर चाहे न दो सांत्वना,
ढो पाऊं इतना तो हो निश्चय।
शीश झुकाए जब आए सुख
लूं मैं चीन्ह तुम्हारा ही मुख
निखिल धरा जिस दिन दुध निशि में करे वंचना,
तुम पर करूं न मैं कोई संशय।

मेरा शीश नवा दो


मेरा शीश नवा दो अपनी
चरण-धूल के तल में।
देव ! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आंसू-जल में।

अपने को गौरव देने को
अपमानित करता अपने को,
घेर स्वयं को घूम-घूम कर
मरता हूं पल-पल में।
देव ! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आंसू-जल में।

अपने कामों में न करूं मैं
आत्म-प्रचार प्रभो,
अपनी ही इच्छा मेरे
जीवन में पूर्ण करो।
मुझको अपनी चरम शांति दो
प्राणों में वह परम कांति हो।
आप खड़े हो मुझे ओट दे
हृदय-कमल के दल में।
देव ! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आंसू-जल में।

तुम्हारे लिए नैन ये जागे


नाथ, तुम्हारे लिए नैन ये जागे,
दरस न पाऊं, पलक बिछाऊं
वह भी अच्छा लागे।
ये नैना नित जागे।
बैठ धूलि धूसर नित द्वारे
भिखमंगा यह अंतर हारे
दया तु्म्हारी मांगे।

कृपा न पाऊं, आस लगाऊं
वह भी अच्छा लागे।
आज न जाने इस दुनिया में
खुशी-खुशी कितने कामों में
सब आगे बढ़ भागे।
साथ न पाऊं, तुम्हें बुलाऊं
वह भी अच्छा लागे।

चारों ओर सुधा सरसी-सी
यह जो आकुल श्यामल धरती
रुला रही अनुरागे।
दरस न पाऊं, दुख उठाऊं
वह भी अच्छा लागे।
ये नैना नित जागे।

सजल श्यामघन आओ


आओ, सजल श्यामघन आओ
रिमझिम झड़ी लगाओ।
अपना श्यामल स्नेह विपुल ले
इस जीवन में छाओ।

आओ शिखर चूम भूधर के
छाया से वन-वन को भर के
आओ गहरे गर्जन स्वर से
अंबर में छा जाओ।

व्यथित हो उठे गहन नीप-वन
पुलकाकुल फूलों से,
छलक-छलक आए कल-रोदन
सरिता के कूलों से।

आओ हे हिय भरने वाले
जलन प्यास की हरने वाले
नयन सुशीतल करने वाले
हिय में समुद समाओ।

भय से मुझे उबारो


भय से मुझे उबारो, मुझे उबारो।
वह मुख मोड़ इधर को नेक निहारो।

नहीं चीन्हता तुम्हें पास से
कहां देखता, कौन आस से
हृदय-विहारी, मन-निवास से
हंस हिय हेर दुलारो

बात करो, कुछ बोलो मुझसे
नेह परस से परसो,
अपना दायां हाथ बढ़ा कर
मुझे पकड़ लो, हरसो।

जो बूझूं सो भूल बुझाए
क्या खोजूं सो समझ न आए,
झूठी हंसी और रोना ये
आओ, भूल सुधारो।

ओट लिए यों

ओट लिए यों छिपने से तो
काम नहीं चलने का।
आन छिपो अंतर में, कोई
जानेगा, न कहेगा।

लुका-छिपी का खेल तुम्हारा
देश-विदेश जहां दूं फेरा
अब तो कहो बंधोगे मन से
और नहीं छलने का !

मेरा हृदय कठोर सही है
उन चरणों के योग्य नहीं है
बंधु, तुम्हारी सांस छुए क्या
प्राण नहीं गलने का !

माना, वैसी नहीं साधना
पर जो झरे तुम्हारी करुणा
पल में फूल न फूलेंगे, फल
तुरन्त नहीं फलने का !

ओट लिए यों छिपने से तो
काम नहीं चलने का।

गायक


गायक, कैसे जो गाते तुम गान
मैं सुनता, बस सुनता मौन निदान।

भर देती उस सुर की जोत भुवन को
भर देता उस सुर का मरुत गगन को।
प्रस्तर-कारा तोड़ कठिन उन्मन हो
बह आती सुर की गंगा अम्लान।

जी में होता गाऊं उसी लहर में
नहीं कंठ में पाता वह स्वर पर मैं।
कहा चाहते प्राण न फुरती वाणी
रोते हैं हर बार हार अभिमानी।

किस फंदे में डाला गुणी गुमानी
चहुं दिशि मेरे स्वर का जाला तान।

अहरह विरह तुम्हारा ही


अहरह विरह तुम्हारा ही
राजित है भुवन-भुवन में
रूप-रूप में शोभित है
नभ सागर गिरि कानन में।

एक-एक तारे में निशि भर
खड़ा निमेषविहीन मौन धर
विरह तुम्हारा ही पल्लव पर
बजता है सावन में।

कितनी करुणा व्यथा में घर-घर
घनीभूत यह विरह घोरतर
प्रेम-वासनाओं के ऊपर
सुख-दुख कार्य-कलन में।

कर उदास यह जीवन सारा
पिघल गान-लय की बन धारा
भर उठता है विरह तुम्हारा
मेरे अंतर्मन में।

आज झड़ी की निशि


आज झड़ी की निशि में यह अभिसार।
मन के मीत, प्राणप्रिय, मेरे प्यार।

नभ निराशा-सा रोता हरदम
नींद नहीं इन नयनों में मम
द्वार खोल झांकूं मैं प्रियतम
व्याकुल बारंबार।

देख नहीं पाता कुछ बाहर, आह,
सोचूं आखिर कहां तुम्हारी राह।

दूर कौन-सी नदी पार में,
गहन कौन-से वन-कछार में,
अगम कौन-से अंधकार में
होते हो तुम पार।

मन के मीत, प्राणप्रिय, मेरे प्यार।

घिर आई आसाढ़ी संध्या


घिर आई आसाढ़ी संध्या,
डूब गया दिन ढल कर।
बंधनहीन वृष्टि की धारा,
झर-झर झरती गल कर।

घर के कोने बैठ विजन में,
क्या जो सोचूं अपने मन में।
भीगी हवा यूथिका-वन में,
कह क्या जाती चल कर।

आज लहर लहराई हिय में,
ढूंढ़े कूल न पाता।
ओदे वन का फूल महक कर
मेरे प्राण रुलाता।

अंधियारी निशि की पहरें ये,
भर दूं किस सुर की लहरें ले।
कौन भूल, जो सब कुछ भूले,
प्राण आज आकुलतर।

बंधनहीन वृष्टि की धारा,
झर-झर झरती गल कर।

दरस तुम्हारा जो न मिले


दरस तुम्हारा जो न मिले प्रभु
अबकी इस जीवन में,
मैं न तुम्हें पा सका, बात यह
याद रहे पर मन में।
भूल न जाऊं, पीड़ा पाऊं, सपने और शयन में।

बैठ पैठ जगती के
जितनी भी दिन बीते,
ये दो मुट्ठी लिप्त रहे चाहे जितना भी धन में
फिर भी पा न सका मैं कुछ भी,
याद रहे यह मन में।
भूल न जाऊं, पीड़ा पाऊं, सपने और शयन में।

जो आलस में पड़ कर
बैठ पड़ूं मैं पथ पर,
माटी में जो सेज सजाऊं जतन किए निर्जन में।
सारी राह अभी बाकी है
याद रहे यह मन में।
भूल न जाऊं, पीड़ा पाऊं, सपने और शयन में।

निखरे हंसी सुघर जो
धर बांसुरी मुखर हो,
जितना चाहे साज सजाऊं घर को आयोजन में।
तुम्हें न उसमें बसा सका हूं
याद रहे याद मन में।
भूल न जाऊं, पीड़ा पाऊं, सपने और शयन में।

चीन्हे किए अचीन्हें कितने


चीन्हे किए अचीन्हे कितने
घर कितने ही घर को,
किया दूर को निकट, बंधु,
अपने भाई सा पर को।

छोड़ निवास पुराना जब मैं जाता
जानें क्या हो, यही सोच घबराता,
किंतु पुरातन तुम हो नित नूतन में
यही सत्य मैं जाता बिसर-बिसर जो।
किया दूर को निकट, बंधु,
अपने भाई-सा पर को।

जीवन और मरण में निखिल भुवन में   
जब भी, जहां कहीं भी अपना लोगे,
जनम-जनम के ऐ जाने-पहचाने,
तु्म्हीं मुझे सबसे परिचित कर दोगे।

तुम्हें जान लूं तो न रहे कोई पर,
मना न कोई और नहीं कोई डर-
तुम सबके सम्मिलित रूप में जागे
मुझे तुम्हारा दरस सदा प्रभुवर हो।
किया दूर को निकट, बंधु,
अपने भाई-सा पर को।

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