Paanch Jasoos - Hindi book by - Shakuntala Verma - पाँच जासूस - शकुन्तला वर्मा
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पाँच जासूस

शकुन्तला वर्मा

प्रकाशक : सी.बी.टी. प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3993
आईएसबीएन :81-7011-749-6

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सीक्रेट सोसाइटी का रोमांचक अभियान...

Paanch Jasoos

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बच्चों ने मिलकर एक सोसाइटी बनाई—सीक्रेट सोसाइटी। उसका उद्देश्य था ईर्ष्या-द्वेष से परे रहकर, बिना किसी भेदभाव के सबकी सहायता करना। इस सोसाइटी के एक सदस्य निखिल का अपहरण, बच्चे पकड़नेवाला एक गिरोह कर लेता है। क्यों ? सीक्रेट सोसाइटी के अन्य सदस्य क्या इस गिरोह के पंजे से निखिल को छुड़ा पाते हैं ? आओ, इस रोमांचक अभियान में शामिल हों।

एक


‘‘अरे यार निखिल, ये काज़िम और संजय अभी तक नहीं आए ? कल तय तो यही हुआ था कि हमारी ‘सीक्रेट सोसाइटी’ की मीटिंग तीन बजे शुरू हो जाएगी,’’ दीपक ने इधर-उधर देखते हुए कहा।
‘‘हां, तीन तो बज गए हैं। समय भी यही तय हुआ था कि स्कूल से आधे दिन की छुट्टी के बाद हम सब तुम्हारे घर पर मिनी लाइब्रेरी और मीटिंग के लिए इकट्ठे होंगे। मैं तो देखो वक्त से आ गया हूं,’’ निखिल ने अपनी घड़ी पर नज़र डालते हुए कहा।
‘‘संजय में और सब आदतें तो अच्छी हैं, मगर वह साइकिल के पीछे इतना दीवाना रहता है कि अगर साइकिल साथ हुई तो वह सब कुछ भूल, बस साइकिल चलाने में मग्न हो जाता है।’’

‘‘दीपक, यह भी तो हो सकता है कि संजय की साइकिल में पंक्चर हो गया हो और वह उसे ठीक करवाने में लगा हो। उसका स्कूल दूर है। फिर वह उसी से स्कूल भी जाता है। अरे हां ! कल इतवार है। राजू से उसने साइकिल रेस बदी है, यह क्यों भूले जा रहे हो,’’ निखिल ने याद दिलाया।
‘‘यह तो सचमुच मुझे याद ही नहीं रहा। मगर क़ाजिम को तो अब तक आ जाना चाहिए था। ये हज़रत रह कहां गए ? कुछ भी कह लो निखिल, हम लोगों में जब तक समय की पाबन्दी नहीं आएगी हम कुछ नहीं कर सकते। जब एक निश्चित समय पर इकट्ठा नहीं हो सकते तो कोई ठोस काम क्या करेंगे खाक ?’’ दीपक ने थोड़ी नाराज़गी से कहा।
निखिल बड़े आराम से बोला, ‘‘दीपक, मुझे तुम्हारी और सभी बातें पसन्द हैं इसीलिए तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो। लेकिन थोड़ा धैर्य रखना भी सीखो। संजय और काज़िम किसी जरूरी काम में फंस गए होंगे वरना अब तक वे ज़रूर आ जाते।’’

तभी दूर से आते हुए संजय और क़ाजिम पर दीपक की नज़र पड़ी।
संजय ने गेट खोलकर अपनी साइकिल स्टैंड पर खड़ी की और क्षमा मांगते हुए बोला, ‘‘पहले तुम दोनों से देर से पहुंचने की क्षमा मांग लें।’’
काज़िम झट से बोला, ‘‘यकीन मानो, हम दोनों बिल्कुल ठीक वक्त पर आने को तैयार हो गए थे। मैंने अम्मी को बता भी दिया था कि हम लोग दीपक के घर जा रहे हैं। शायद लौटने में देर हो जाए, वह परेशान न हों।’’
‘‘फिर रह कहां गए ?’’ दीपक ने थोड़े नाराज़गी भरे लहज़े में कहा।
‘‘क्या बताऊं दीपू। हमारे पड़ोस में जो साही अंकल रहते हैं न, उनका ब्रीफकेस गायब हो गया। वह बेचारे रुपयों के लिए उतने परेशान नही हैं जितने महत्वपूर्ण सरकारी कागज़ातों की फाइल खो जाने की वजह से चिन्तित हैं। फाइल नहीं मिली तो उनकी नौकरी पर बन आएगी,’’ संजय ने दुखी होकर बताया।
‘‘यह तो वास्तव में चिन्ता का विषय है। तुम दोनों ने उनसे थाने में रिपोर्ट लिखवाने को क्यों नहीं कहा,’’ निखिल बोला।
‘‘निखिल, तुम्हारे पापा पुलिस अधीक्षक हैं इसलिए तुम्हें तो बस हर वक्त सिपाही, थानेदार और कोतवाली ही दिखाई देती है। कम से कम कभी-कभी अपनी अक्ल का भी इस्तेमाल किया करो,’’ दीपक ने झुंझलाकर कहा।
‘‘लो अब इनकी बातें सुनो। मैंने कौन-सी गलत बात कह दी जो तुम तुनक गए। सामान खोया है तो पुलिस में रिपोर्ट तो लिखवानी ही पड़ेगी।’’

‘‘इतनी मामूली-सी बात क्या साही अंकल ने नहीं सोची होगी ? मेरे खयाल से तो अब तक वह एफ.आई.आर. दर्ज़ भी करा चुके होंगे। लेकिन मैं तुम सबसे पूछता हूँ कि यह सीक्रेट सोसायटी हम लोगों ने मिलकर बनाई है। क्या हम लोगों का फर्ज़ नहीं बनता कि हम लोग चलकर उनकी मदद करें,’’ दीपक बोला।
‘‘यह तो हम लोगों ने सोचा ही नहीं था,’’ संजय ने कहा।
‘‘तभी तो कहते हैं कि अक्ल बड़ी या भैंस,’’ कहकर काज़िम हंस पड़ा।
‘‘हंसी-मज़ाक छोड़कर यह सोचो कि हम लोग साही अंकल की मदद किस तरह कर सकते हैं,’’ निखिल बोला।
‘‘जब तक हमें यह नहीं मालूम होगा कि ब्रीफकेस कैसे और कहां खोया ? उसे खोजने के लिए हम लोग क्या कर सकेंगे ?’’ दीपक ने कहा।

‘‘संजय, तुम्हें तो मालूम होगा कि ब्रीफकेस कैसे खोया ?’’ निखिल ने पूछा।
‘‘नहीं। निखिल, दरअसल अंकल के घर वापस आते ही उनके वहां हंगामा मच गया। मैंने सोचा भी था कि मैं अंकल या सौरभ से पूछूंगा कि क्या हुआ ? पर उनकी आवाज सुनकर आस-पड़ोस के लोग आने लगे। मैंने वहां रुकना उचित नहीं समझा। फिर जैसे ही घड़ी पर नज़र गई तो मेरे होश उड़ गए। मीटिंग का जो समय तय हुआ था उससे कहीं अधिक देर वैसे ही हो चुकी थी। मैंने सोचा आज दीपक मुझसे बहुत ही नाराज़ बैठा होगा। बस मैं काज़िम को साइकिल पर बैठाकर सीधे चला आया। यह लो, कल तुम्हारी पसंद की किताब खरीदी थी, वह लेता आया हूं। अब तो खुश हो जाओ,’’ संजय ने अपनी सफाई देते हुए खुशामद भरे लहज़े में कहा।

दीपक बोला, ‘‘किताब लाने के लिए धन्यवाद संजय ! लेकिन मेरे ख्याल से मीटिंग करने से अब कोई फायदा नहीं। आधे से ज्यादा समय तो यों ही बर्बाद हो गया।’’ फिर ठहरकर बोला, ‘‘क्यों निखिल, क्या राय है तुम्हारी। सौरभ से मिलने के बहाने हम लोग बाहर चलें। अगर मौका मिले तो अंकल से अकेले में बैठकर विस्तार से जानकारी हासिल करें कि उनका ब्रीफकेस कैसे खोया है ?’’

‘‘ख्याल तो तुम्हारा अच्छा है,’’ निखिल ने अपनी सहमति जताते हुए कहा। फिर बोला, ‘‘लेकिन आज जब हम सब इकट्ठे हुए हैं तो अपनी सोसाइटी कोड-वर्ड तो तय कर ही लें।’’
काज़िम व्यंग्य से बोला, ‘‘यार निखिल, तुम दीपक के असिस्टेंट क्यों नहीं बन जाते दीपक को ‘फैंटम’, ‘मैड्रेक’, ‘मॉ़डेस्टी ब्लेज़’ और न जाने कौन-कौन से अखबारों के जासूसी धारावाहिक और जासूसी किताबें पढ़-पढ़कर अपने को पक्का जासूस समझने लगा है। कुछ दिन तुम भी इनके साथ रहे तो तुम्हारी ट्रेनिंग भी हो जाएगी।’’
‘‘अरे वाह ! इसमें मज़ाक करने की कौन-सी बात है ? हर इंसान के अपने-अपने शौक होते हैं। संजय जब साइकिल की रेस करता है तब तुम उसे क्यों नहीं कुछ कहते ? फिर दूर क्यों जाएं। क्रिकेट मैच चाहे स्कूल में हो, पार्क में हो या टी.वी. पर दिखाया जा रहा हो, तुम वहां से हटने का नाम क्यों नहीं लेते ?’’

‘‘निखिल, कह लेने दो काज़िम को। और कुछ नहीं तो इसके दिल की भड़ास ही निकल जाएगी।’’ दीपक ने कहा। फिर वह काज़िम से बोला, ‘‘मुझे तो सचमुच रोमांचक घटनाएं पढ़ने या फिर उन समस्याओं को कैसे हल करें, यह सब जानने और करने में हृदय से आनन्द आता है। मैं तो जब दीपांकर अंकल से मिलता हूं तो घंटों बैठा बातें करता रहता हूं कि आप लोग कैसे अपराधी पकड़ते हैं ? बड़े ही नहीं, बच्चे भी कैसे नए-नए तरह के जुर्म करते हैं ? उन्हें पकड़ने के बाद सुधारने के लिए ‘रिमांड-होम’ में उन्हें कैसे समाज के अच्छे नागरिक बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है ? क्या वे बाद में सुधर जाते हैं ? अगर इन सब बातों में तुम्हें दिलचस्पी नहीं है तो फिर क्यों हमारी सीक्रेट सोसाइटी के सदस्य बने ?’’ दीपक ने गुस्से से पूछा।

काज़िम खिसियाकर खामोशी से बैठ गया। उसे चुप देख निखिल बोला, ‘‘काज़िम, दीपक ठीक कह रहा है। कोई भी मैगज़ीन हो, दैनिक पत्र हो या किताब, पढ़ने से ज्ञान ही बढ़ता है। लेकिन मेरी मम्मी कहती हैं कि जो बच्चे साहित्य पढ़ते हैं, उनके मन में अच्छे विचार आते हैं। अपने से बड़ी उम्र वाले क्या पढ़ते हैं, उत्सुकता या जल्दबाजी में वह सब पढ़ना ठीक नहीं होता। सही समय पर सही काम करना चाहिए।’’
‘‘अबसे मैं भी तुम्हारे पापा से पूछूंगा कि हम लोग अपनी सोसाइटी को और अच्छा बनाने के लिए कैसे काम करें, ‘‘संजय बोला।

‘‘मेरे पापा को तो आजकल दम मारने की फुरसत नहीं है। वह बता रहे थे कि हमारे शहर में आजकल बच्चे पकड़ने वाला गिरोह सक्रिय है। तुम लोग होशियार रहना। अकेले इधर-उधर मत आना-जाना। वह इस गिरोह के सदस्यों को पकड़ने की कोशिश में रात-दिन लगे हैं।’’
‘‘बाप रे बाप ! अच्छा किया तुमने हम लोगों को बता दिया। वरना हमें तो पता ही नहीं चलता। दीपक, सुना तुमने निखिल क्या कह रहा है ?’’ काज़िम ने डरे स्वर में कहा।
काज़िम की बात सुनकर दीपक चौंक उठा। फिर अचकचाकर बोला, ‘‘तुम मुझसे कुछ कह रहे थे ? मैं कोड-वर्ड के बारे में सोच रहा था, क्या रखें ?’’

‘‘जी हुजूर ! आपसे से ही फ़रमा रहा था कि दीपांकर अंकल ने निखिल को बताया है कि आजकल अपने शहर में बच्चे पकड़ने वाला गिरोह आया हुआ है। मगर क्या मैं आपसे पूछ सकता हूं कि जब चार लोग यहां बैठे हैं तो आप अकेले कहां का सैर-सपाटा कर रहे हैं ? क्या हम लोग सोसाइटी के सदस्य नहीं हैं ? हर बात का ठेका आप ने ही ले रखा है ?’’
‘‘मैं बताता हूं, काज़िम। जबसे हमने साही अंकल का ब्रीफकेस खोने वाली बात बताई है, दीपक उसी के बारे में सोच रहा है। क्यों दीपक ?’’ संजय ने पूछा।

‘‘तुम ठीक कह रहे हो, संजय। बेचारे साही अंकल बड़ी भारी मुसीबत में पड़ गए हैं। मुझे तो लगता है कोई ज़रूर पहले से जानता होगा कि वह किस काम से और कहां गए हैं।’’
‘‘बस लगाने लगे तुम अपनी अटकलें। अच्छा उठो, हम चारों सौरभ के घर चलते हैं। वहां बातों-बातों में कुछ न कुछ तो पता चलेगा ही कि ब्रीफकेस कैसे खोया,’’ कहकर काज़िम उठ गया।
उसके साथ ही तीनों उठ गए। दीपक बोला, ‘‘मैं मां से कहकर आता हूं कि मुझे लौटने में अगर देर हो जाए तो वह परेशान न हों। या तो मैं सौरभ के घर मिलूंगा या निखिल के। कोड-वर्ड क्या हो यह अगली मीटिंग में तय कर लेंगे। क्यों तुम लोगों को कोई एतराज तो नहीं है ?’’

‘‘नहीं, अभी कोई जल्दी थोड़े ही है। फिर कभी तय कर लेंगे। तुम आंटी से कहकर आओ तो चलें,’’ संजय बोला।
बच्चों को जाता सुन दीपक की मां माधुरी बाहर निकलकर आई और बोली, ‘‘मैं तुम सबको ऐसे नहीं जाने दूंगी। ज़रा देर रुको, मैं अभी चाय और पकोड़े भेजती हूं। खाकर जाना।’’
‘‘आंटी, अभी हम लोग ज़रा जल्दी में हैं। फिर कभी खा लेंगे,’’ काज़िम बोला।
‘‘अरे काज़िम, लखनऊ का तकल्लुफ़ कोई तुमसे सीखे ! भई तुम लखनऊ के रहने वाले हो यह मुझे अच्छी तरह से मालूम है। मगर अपने ही घर में तकल्लुफ़ करना कब से सीख लिया ?’’ फिर हंसकर बोली, ‘‘निखिल, संजय, तुम लोग ज़रा-सा ठहरो। मैं जल्दी ही नाश्ता भिजवाती हूं। खाकर जाना, समझे।’’ कहती हुई माधुरी रसोई-घर में चली गई।
चाय-नाश्ता करके चारों बच्चे पैदल ही बातें करते हुए सौरभ के घर चले। संजय ने अपनी साइकिल हाथ में थाम ली। बातों ही बातों में रास्ता ऐसे कट गया इन लोगों को पता ही नहीं चला। देखा तो ये चारों सेक्टर ‘डी’ में पार्क के पास पहुंच गए थे। सौरभ का घर सामने ही था।

संजय ने फाटक खोलकर साइकिल एक ओर खड़ी कर दी। फिर आगे बढ़कर घंटी बजाई। साही अंकल ने आकर दरवाज़ा खोला। चारों ने आगे बढ़कर उन्हें नमस्ते की। साही अंकल बोले, ‘‘अच्छा ! तुम लोग सौरभ के दोस्त हो। उससे मिलने आए हो। अन्दर आ जाओ। मैं अभी उसे बुलाए देता हूं।’’
दीपक ने तुरन्त कहा, ‘‘अंकल, इस समय तो हम लोग आप से ही मिलने आए हैं। संजय से पता चला आपका ब्रीफकेस खो गया। सुनकर हम सबको बड़ा अफसोस हुआ। सोचा चलकर आपसे मिल आए।’’
साही अंकल के चेहरे पर एक बार फिर उदासी छा गई। बुझे स्वर में बोले, ‘‘क्या बताएं बेटे। सब किस्मत की बात है। आज तक अनगिनत बार सफर किया। निजी काम से भी और सरकारी काम से भी। मगर क्या मजाल जो छोटी से छोटी चीज़ भी खोई हो। लेकिन अबकी बार तो हद ही हो गई। कुछ सेकण्डों के भीतर ही ब्रीफकेस ऐसा गायब हुआ कि अक्ल ही कुछ काम नहीं करती कि कैसे गायब हो गया ?’’

‘‘अकल, क्या आप उसे हाथ में नहीं लिए हुए थे ?’’ निखिल ने जिज्ञासा से पूछा।
‘‘दरअसल सूटकेस और होल्डॉल भी साथ में था। रिक्शा तय किया तब तक ब्रीफकेस मेरे हाथ में था। सामान रिक्शे पर रखवाकर, ब्रीफकेस ज़मीन पर रख, पर्स में से पैसे निकालकर कुली को देने लगा। पैसे देकर जैसे ही मैंने ब्रीफकेस उठाने को झुका तो मेरे हाथ-पैर फूल गए। इस बीच किसी ने मेरा ब्रीफकेस ऐसे गायब किया जैसे कोई किसी की आंखों से काजल चुरा ले।’’
‘‘मुझे तो लगता है अंकल, कि कोई पहले से ही आपके पीछे लगा था। जिसे मालूम था कि इस ब्रीफकेस में कुछ ज़रूरी कागज़ात हैं,’’ दीपक बोला।

‘‘पर बेटे, उन कागज़ातों के बारे में या तो मुझे पता था या मेरे बॉस को। तीसरे किसी को इसकी जानकारी नहीं थी। यहां तक कि तुम्हारी आंटी या बच्चों तक को बताकर नहीं गया था कि मैं किस काम से और कहां जा रहा हूं।’’
‘‘अच्छा यह बताइए अकंल, जब आप और आपके बॉस इस बारे में बातचीत कर रहे थे तो आफिस के कमरे में उस बीच कोई आया था ?’’ दीपक ने पूछा।
‘‘बस एक बार चाय के लिए पूछने उदयराज चपरासी आया था। फिर हम लोगों के हां कहने के थोड़ी देर बाद वह चाय देने आया था। उसके बाद की तो मुझे याद नहीं कि कोई हमारे आफिस में उस बीच आया था।’’
‘‘उदयराज आदमी कैसा है, अंकल ? आप उस पर भरोसा करते हैं ?’’ काज़िम ने पूछा।
‘‘उसे तो मैंने ही चपरासी की जगह पर अपने आफिस में लगवाया है। उसका बाप रामदीन पहले ठेले पर तरकारी और फल बेचता था। ईमानदार और मेहनती आदमी है। अपनी मेहनत की कमाई से उसने अब अमीनाबाद फल मंडी में अपनी दुकान खोली है। उदयराज को उसने मैट्रिक तक पढ़ाया है। एक दिन उसने मुझसे कहा, ‘बाबूजी, मैं गरीब आदमी बेपढ़ा रह गया। मेरे लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है। अगर आप उदयराज को सरकारी नौकरी में लगवा दें तो मैं ज़िन्दगी भर आपका उपकार नहीं भूलूंगा।’

‘‘मुझे उस पर दया आ गई। सोचा किसी का भला करने में क्या जाता है। फिर उदयराज ने सेकण्ड डिवीजन में मैट्रिक पास की थी। मेरे दफ्तर में कुछ दिन बाद जगह खाली हुई तो मैंने फल वाले से कहकर अर्जी दिलवा दी और कहा कि एम्पलायमेंट एक्सचेंज में जाकर उदयराज अपना नाम दर्ज़ करवा ले। जब साक्षात्कार हुआ तो उदयराज अपनी योग्यता और मेरी सिफारिश के बल पर चपरासी बन गया।’’
‘‘आपके ब्रीफकेस का रंग कौन-सा था ?’’ संजय ने पूछा।
‘‘ब्रीफकेस तो सुरमई रंग का था पर उसका हैंडल काला था।’’
‘‘एक बात बताइए अंकल, ये लोग रहते कहां हैं ? एक बार हम लोग उदयराज से बात करके देखते हैं,’’ निखिल ने कहा।
‘‘यह तो मुझे नहीं मालूम। दफ्तर में उसका पता नोट होगा। लेकिन जहां तक मैं उसे जानता हूं, वह कोई गलत काम नहीं करेगा। रामदीन ईमानदार आदमी है। उसका बेटा हर्गिज़ कोई गलत कदम नहीं उठा सकता,’’ साही साहब ने दृढ़ता से कहा।

दीपक ने बात बदलते हुए कहा, ‘‘अंकल, निखिल अभी नासमझ है इसलिए उसने उदजराज से पूछने के लिए कहा। हम लोग तो बस यूं ही चोरी की बात सुनकर अफसोस जाहिर करने चले आए थे। हम लोग सौरभ के मित्र हैं, इसलिए आपके सुख-दुख में शामिल होना हमने अपना कर्तव्य समझा। आशा है आपने निखिल की बात का बुरा नहीं माना होगा।’’
दीपक की बात से साही साहब ऐसे प्रभावित हुए कि तुरन्त बोले, ‘‘नहीं-नहीं बच्चों, मेरे लिए तो जैसे सौरभ वैसे ही ही तुम चारों हो। आजकल दुनिया में ऐसे कितने लोग हैं जो सच्चे मन से दूसरों के सुख-दुख में शामिल होना चाहते हैं। फिर तुम लोग तो अभी छोटे हो। तुमने मेरा इतना ख्याल किया यह सोचकर ही मेरा मन थोड़ा हलका हो गया है।’’
‘‘हम तो ईश्वर से यही प्रार्थना करेंगे की आपका ब्रीफकेस मिल जाए और आपकी चिन्ता दूर हो,’’ दीपक बोला।
‘‘अंकल, अब हमें इजाजत दीजिए। फिर आएंगे। देर होने से घर में सब लोग परेशान होने लगते हैं। आदाब,’’ कहकर काज़िम ने बड़े अदब से सलाम किया।

उसके साथ ही संजय, निखिल और दीपक भी नमस्ते करके फाटक के बाहर आ गए। काज़िम बोला, ‘‘भई, मैं तो अब घर चलूंगा। मैंने अभी होमवर्क भी पूरा नहीं किया है। फिर अब्बू घर आ गए होंगे। आते ही उन्होंने अम्मी से पूछा होगा, ‘बरखुरदार कहां हैं ?’ और अम्मी रोज़ की तरह ही घिसापिटा जवाब दिया होगा, ‘जाएंगे कहां ? घूम रहे होंगे अपनी चंडाल-चौकड़ी के साथ।’’
उसके अब्बू और अम्मी की बातचीत जिस लहज़े में होती है, सुनकर सभी खिलखिलाकर हंस पड़े। निखिल अपनी हंसी दबा गुस्से से बोला, ‘‘उल्टी-सीधी हरकतें करता है और घर में घुसता है तो ऐसा भोला चेहरा बनाकर मानो तुझसे ज्यादा सीधा और शरीफ़ लड़का इस धरती पर पैदा ही न हुआ हो। और अपने साथ नाम खराब करवाता है हम तीनों का भी।’’
‘‘भई, अब चाहे तुम लोग नाराज़ हो या खुश। मैं तो चला,’’ यह काज़िम वहां से खिसक गया।
दीपक को काज़िम की इस हरकत पर बेहद गुस्सा आया। पर वह ज़ब्त करके कुछ देर चुप रहा। संजय और निखिल समझ गए कि हो न हो दीपक का पूरा ध्यान इस समय साही अंकल के खोए हुए ब्रीफकेस की तरफ है। इसलिए उन्होंने उसे छेड़ना उचित नहीं समझा।

कुछ देर तीनों चुपचाप खड़े रहे। फिर सहसा दीपक बोला, ‘‘हम तीनों का एक साथ चलना तो ठीक नहीं रहेगा। निखिल, या तो तुम मेरे साथ चलो या संजय तुम।’’
‘जिसे तुम साथ ले जाना मुनासिब समझो वह चला चलेगा। आपस में संकोच की कौन-सी बात है,’’ निखिल ने कहा।
‘‘अच्छा ऐसा है निखिल, तुम मेरे साथ अमीनाबाद चलो। संजय, तुम अपनी साइकिल थोड़ी देर के लिए हमें दे दो। जैसे ही काम हो जाएगा मैं तुम्हारे घर पहुंचा दूंगा।’’
‘‘अच्छी बात है। मैं घर चला जाता हूं। मैं वहीं पर पढ़ता मिलूंगा। अगर कोई ज़रूरत पड़ी तो कोई न कोई बहाना बनाकर तुम लोगों के साथ चला चलूंगा। लो यह साइकिल तुम लोग लेते जाओ,’’ कहकर संजय ने साइकिल दीपक के हाथ में पकड़ा दी और खुद पैदल ही अपने घर की ओर चल दिया।


दो



दीपक कुछ क्षण वहीं चुपचाप खड़ा रहा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि जो कदम वह उठाने जा रहा है, वह सही है या गलत। एक तो अमीनाबाद जैसे बड़े बाज़ार में अनगिनत फलवाले बैठते हैं। उनमें से रामदीन का पता लगाना आसान नहीं। फिर उदयराज भले भी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हो, आखिरकार है तो सरकारी कर्मचारी। यदि वास्तव में इस चोरी में उसका हाथ न हुआ और उसने साही अंकल या उसके घरवालों से शिकायत कर दी तो चाहे बाबूजी-मां उसे क्षमा कर दें। मगर मनीष भैया तो उसकी ऐसी खबर लेंगे कि वह ज़िन्दगी भर याद रखेगा।

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