शिक्षाप्रद कहानियाँ - रबीन्द्रनाथ टैगोर Shikshaprad Kahaniyan - Hindi book by - Rabindranath Tagore
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शिक्षाप्रद कहानियाँ

रबीन्द्रनाथ टैगोर

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4002
आईएसबीएन :81-8133-320-9

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नोबल पुरस्कार से सम्मानित रचनाकार की ह्रदयस्पर्शी कहानियों का अनूठा संकलन...

Shikshaprid kahaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


रवीन्द्रनाथ टैगोर मूलतः एक कवि थे। 13 नवंबर, 1913 में उन्हें उनकी कृति "गीतांजलि" पर विश्व के सर्वोच्च सम्मान "नोबेल पुरस्कार" से सम्मानित किया गया। इनसे पहले बंगला साहित्य में दो-चार कहानियां ही लिखी गई थीं। टैगोर ने बंगला साहित्य को अपनी उत्कृष्ट कहानियों से समृद्ध किया। इन कहानियों में कवि द्वारा जहां भाव-जगत में प्रवेश तथा उसे महसूस कर सरल जनभाषा में प्रस्तुत करने की क्षमता का परिचय मिलता है, वहीं एक विचारक द्वारा कही जाने वाली सटीक भाषा की भी अभिव्यक्ति होती है। टैगोर की इन कहानियों में मानवीय रिश्तों के विभिन्न पहलुओं की मार्मिक प्रस्तुति है, जो प्रकृति के सौंदर्य की छटा भी बिखरेती हैं। उन्हीं की एक कविता के अनुसार-

छोट प्राण, छोट व्यथा, छोट-छोट दुःख कथा
नितांतई सरस सरल, सहस्त्र विस्मृति राशि
प्रत्यह येतेछे भासि तारि दुचारिटि अश्रुजल

बस यूं समझ लीजिए,यही सब कुछ है उनकी कहानियों में।
रवीन्द्रनाथ टैगौर शिक्षाप्रद कहानियाँ
ऐसी कहानियों का संकलन जिसमें है मानवीय रिश्तों की खट्टी-मीठी अनुभूतियां
बंगला साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में भी रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियों को विशेष स्थान प्राप्त है। बांग्ला में गुरुदेव से पहले इस तरह की कहानियों का प्रचलन न था। ऐसी मात्र दो-चार कहानियां ही थीं। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहानी-विधा को नई दिशा दी, इसे समृद्ध किया।

गुरुदेव मूलतः कवि थे, इसलिए उनकी कहानियों में भावपक्ष निखरा है। मानवीय संबंधों को बड़ी बारीकी से अपने शब्द दिए हैं उन्होंने। कहानियों को कल्पना की उड़ान जहां आदर्शरूप देती है, वहीं विचारों का पुट जमीन से जोड़ देता है। सटीक भाषा, भावों की सुगम अभिव्यक्ति, आसमान और जमीन के बीच तीनों-बानों में बुनी गई ये कहानियां पाठकों के दिलो-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ती है।

काफी प्रतीक्षा करनी पड़ी कि रवीन्द्र-रवीन्द्र का साहित्य सर्वसुलभ हो। और आखिर में वह समय आ ही गया, जब रवीन्द्र सबके हो गए। ‘गीतांजलि’ के नए कलेवर को हिंदी पाठकों ने सराहा। उसी से उत्साहित होकर गुरुदेव रवीन्द्र कहानियों का यह संकलन आप तक पहुंचा रहे हैं। आपको हमारा प्रयास कैसा लगा, यह हम अवश्य जानना चाहेंगे।
सुझावों का हार्दिक स्वागत है।

-प्रकाशक

मन के गहरे ताल में जब भी डुबकी लगाई
कोई नई वस्तु ही हाथ आई।
कभी विकसित होते कमल की सुकुमार पंखुड़ियां
तो कभी हलाहल विष
खुश हुआ, मुरझाया,
पर असल में कुछ न टिक पाया।
घुटने लगा मन, रुकने लगे प्राण
वेग से ऊपर आया,
प्राण फूके, संभाला
लहरों का खेल नजर आया।
उगते-ढलते सूरज की किरणों को
लहरों से खेलते पाया,
अब सारा खेल समझ में आया,
यहां कुछ भी तो शाश्वत नहीं,
बस खेल ही खेल है !!
वेदांत तीर्थ
छोटे प्राण, छोट व्यथा
छोट-छोट दुःख कथा
नितांतई सरस सरल
सहस्र विस्मृति राशि
प्रत्यह यतेछे भासि
तारि दुचारिटि अश्रुजल

यही सब कुछ है इन कहानियों में

1


पोस्टमास्टर


पोस्टमास्टर की पहली पोस्टिंग उलापुर गांव में हुई थी। उलापुर बड़ा ही छोटा सा गांव था। पोस्टमास्टर कलकत्ता का रहने वाला था। गांव के किनारे पर खपरैल की छत वाले छोटे से अंधेरे कमरे में उसका दफ्तर था। वैसे ही एक अलग कमरे में मुंशी व अन्य कर्मचारी बैठते थे। उस जगह के सामने ही एक छोटा सा तालाब था और उसके बाद जंगल या खेत। आस-पास ऊंचे-ऊंचे वृक्ष खड़े थे। ऐसे में भला कलकत्ता से आए उस पोस्टमास्टर का मन भला क्या लगना था। उसकी हालत तो नदी से निकलकर किनारे पर डाली गयी मछली जैसी हो रही थी। कैसी जगह है। फिर, उसका मिजाज कुछ अलग ही था। लोगों से अधिक मिलना-जुलना उसे पसंद नहीं था।

कार्यालय में काम भी कुछ अधिक नहीं था। छोटा सा गांव, कम काम। आखिर खाली समय कैसे गुजरे ? इसका उपाय उसने यह किया कि खाली समय में कविताएं लिखने की चेष्टा करता या फिर कल्पना करता कि यहां के वृक्षादि रेतकर यहां तक पक्की इमारत बनी होती जिसमें कार्यालय जैसी सभी सुख-सुविधाएं होती। वह अपनी कल्पना का पोस्ट ऑफिस बनाता रहता।

उसकी तनख्वाह बहुत कम थी। स्वयं ही खाना बनाना पड़ता था। यूं घर के ऊपर काम-काज के लिए गांव की ही एक अनाथ बालिका को रखा हुआ था। उसे थोड़ा-बहुत खर्चा खाना मिल जाता था। उसका नाम रतन था। उम्र यही कोई बारह-तेरह की होगी।
शाम के वक्त जब सूरज ढलता और गांवों के घरों से धुआं उठने लगता, वृक्ष दैत्य सरीखे दिखने लगते, इधर-उधर की पहाड़ियों में छिपे झींगुर गुनगुनाने लगते, तब वह भी कमरे के कोने की दीवार में बने आले में मरियल सी लौ वाला दीया जला देता।
फिर उस बालिका को पुकारता—‘रतन !’
रतन बुलावे की प्रतीक्षा में दरवाजे पर ही बैठी रहती थी। वहीं से पूछती—‘‘बाबूजी ! बुला रहे हैं क्या ?’’
‘‘क्या कर रही है ?’’

‘‘सोचती हूं, अंगीठी जला दूं। आपने रसोई...!’’‘
पोस्टमास्टर की बात पूरी नहीं होने देते, बीच में काटकर हुक्म सुना देते—‘‘रसोई का काम बाद में...पहले हुक्का ले आ’’
वह मुंह बिचकाकर चली जाती और कुछ देर बाद ही हुक्के की चिलम को फूंक मारती ले आती। उस दिन हुक्का लेकर उसने हठात् ही पूछ लिया—‘‘अच्छा रतन। तुझे मां की याद आती है ?’’
‘‘साहब, वह तो बहुत लंबी कहानी है—कुछ याद है, कुछ याद नहीं है। मां से बाप मुझे ज्यादा प्यार करता था। बाप की कुछ-कुछ याद है। रोजाना काफी मेहनत करने के बाद शाम को वह घर लौट आता था’’, इतनी बातें कहते-कहते वह पोस्टमास्टर के पैर के पास फर्श पर बैठ गयी। फिर उसे याद आने लगा, उसका एक छोटा भाई था, बरसात के दिनों में दोनों पेड़ की टूटी डाल को ‘छिप’ बनाकर मछली पकड़ने का खेल खेलते थे। बातें तो बहुत हैं, मगर यही घटना न जाने क्यों मुझे बार-बार परेशान करती है।

इस प्रकार की बातें जब होती तो बातों में ही रात हो जाती। जब रात ढल जाती तो पोस्टमास्टर का खाना बनाने की इच्छा नहीं होती थी। सुबह की बनी सब्जी रहती थी, रतन जल्दी अंगीठी जलाकर दो-चार रोटियां पका लाती और उसी में दोनों के रात का खाना हो जाता था।

किसी-किसी दिन शाम को चबूतरे के कोने में बनी चौकी पर बैठे पोस्टमास्टर भी अपने घर की बातें सुनाते थे—छोटा भाई, मां बहन की बातें। यहां अकेले बैठे जिनकी सोच में परेशान होता था, उनकी बातें। यह बातें प्रायः मन को पीड़ा ही देती थीं। वह वे बातें एक अनपढ़ छोटी-सी बालिका से कहा करते थे। कोई अस्वाभाविक नहीं अनुभव होता।
आखिर ऐसा हुआ कि बातचीत के समय बालिका उनके घर के लोगों को मां, जीजी, भइया कहकर पुकारती थी मानो वह शुरू से ही जानती हो। यहां तक कि उसके छोटे-से हृदय पर भी उसकी काल्पनिक तश्वीरें अंकित हो गई थीं।
एक दिन पोस्टमास्टर के पास कोई काम नहीं था। बारिश होने के बाद मौसम बेहद सुहावना हो गया था। पोस्टमास्टर उस सुहावने दृश्य को देख रहे थे और सोच रहे थे कि काश ! इस वक्त कोई अपना विशेष जन पास में रहता। पोस्टमास्टर ने लंबी सांस लेकर पुकारा—‘‘अरी रतन ?’’

उस वक्त रतन अमरूद के पेड़ के नीचे पैर फैलाकर अमरूद खाने में व्यस्त थी। मालिक की आवाज सुनते ही दौड़कर आई और हांफते हुए बोली—‘‘बाबू जी, बुला रहे हो ?’’
तुझे मैं थोड़ा बहुत पढ़ना-लिखना सिखाऊंगा।’’ कहकर उसे तमाम दोपहर कच्चा कायदा पढ़ना सिखाते रहे। कुछ ही दिनों में रतन उसे पढ़ने में निपुड़ हो गई।
सावन के महीने में बरसात का क्रम जारी रहा। नदी-नाले, पोखर, नहर लबालब भर गए। रात-दिन मेढकों की टर्र-टर्र और पानी गिरने की आवाजें सुनाई देतीं। कीचड़-पानी भरे गांव के रास्तों पर आना-जाना लगभग बंद हो गया था। गांव में हाट-बाजार जाना पड़ता था।

एक दिन सवेरे से ही घटाएं छाई हुई थीं। रतन काफी देर से द्वार पर बैठी बुलावे की प्रतीक्षा कर रही थी, परंतु रोज की तरह बुलावा न पाकर वह कॉपी- किताब लिए धीरे-धीरे कमरे में जा घुसी। देखा-पोस्टमास्टर चुपचाप चारपाई पर लेटे हुए हैं, शायद आराम कर रहे हैं। यही सोचकर बिना कोई आवाज किए कमरे में से बाहर जाने को हुई तो अचानक पोस्टमास्टर की आवाज सुनाई दी— ‘‘रतन !’’
वह फौरन पलटकर उसके नजदीक पहुंची और तनिक चिंतित स्वर में पूछा—‘‘क्यों भाईसाहब सो गए थे क्या ?’’
पोस्टमास्टर ने दबी आवाज में कहा—‘‘ऐसा मालूम होता है कि तबीयत कुछ ठीक नहीं है, जरा मेरे बदन को हाथ से छूकर देख तो।’’

ऐसे नीरस वातावरण में उसका मन हो रहा था कि कोई उसकी सेवा-टहल करे। कोई प्यार से, स्नेह और अपनेपन से उसके माथे पर हाथ रखे। उसने यह सोचकर एक गहरी सांस ली कि काश ! ऐसे कठिन समय में उसकी मां या बहन उसके पास होतीं। अब वह मासूम बालिका रतन बालिका न रही। उसमें मां के स्वाभाविक गुण उत्पन्न हो गए। वह फौरन गांव में जाकर हकीम को बुला लाई। फिर सारी रात सेवा में लगी रही। नियत समय पर दवा देती। सारी रात उसके सिरहाने बैठी रही और खुद की पथ्य की तैयारी की। रात भर मैं सैकड़ों बार पूछती रही—‘‘भाई साहब, कुछ अच्छा महसूस कर रहे हैं न ?’’ पोस्टमास्टर को बिस्तर से उठकर बैठने में काफी दिन लग गए। जब बिस्तर से उठे तो शरीर बिलकुल बेजान सा था। मगर इस बीमारी ने उन्हें यह फैसला लेने पर विवश कर दिया कि किसी प्रकार यहां से तबादला करवाना ही होगा।
और उसी दिन अपनी बीमारी का उल्लेख करते हुए पोस्टमास्टर ने कलकत्ते में अफसर के पास तबादले की प्रार्थना की दरख्वास्त दी।

रोगी की सेवा पूरी करके रतन फिर कमरे के बाहर अपनी जगह पर रहने लगी। परंतु पहले की तरह अब उसके पास बुलावा नहीं आता था। बीच-बीच में वह झांकते हुए भीतर देख लेती थी। तब पोस्टमास्टर बहुत ही उदासीन होकर कभी चारपाई पर लेटे दिखाई देते, कभी बैठे।

 

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