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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4164
आईएसबीएन :0000

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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग


मृत्यु की अनिवार्यता की स्थिति में तो मदोन्मत्त व्यक्ति नित्य नये ध्वंस रचता एक दूसरे को खा जाने की कोशिश करता रहता है। सदाजीवी होने पर उसकी उद्धतता न जाने क्या कर डालती? संसार में हर ओर हर समय केवल रक्तपात ही होता दिखाई देता। न कहीं कोई मनुष्य शांतिपूर्वक सृजन करता दिखाई देता और न भजन करता।

यदि मृत्यु न होती तो पुराने स्थान छोड़ते नहीं और नये उन्हें पाना चाहते-इस स्थिति में हर समय नये पुराने का संग्राम छिड़ा रहता। पिता-पुत्र को और पुत्र अपने पुत्र को अपना स्थान अथवा उत्तराधिकार देने को तैयार न होता। लोग अपने अनन्त जीवनयापन की आवश्यक वस्तुओं में से एक कण तक अपने आश्रितों अथवा सन्तानों को देने में झिझकते। आत्मयापन की चिन्ता एवं आवश्यकता के दबाव में लोग कितने स्वार्थी एवं कितने संग्राहक और कितने कृपण हो जाते, क्या किसी प्रकार इसका अनुमान लगाया जा सकता है? चिरस्थायी जीवन पाकर मनुष्यों में एक दूसरे के प्रति त्याग, सहानुभूति, सौहार्द्र, सहयोग, सहायता, स्नेह, सौजन्य एवं आत्मीयता का कोई भाव रहता ऐसी आशा नहीं की जा सकती।

संसार में जो नवलता एवं नवीनता के दर्शन होते हैं, जिस सरसता एवं सुन्दरता की अनुभूति होती है वह सब पूर्वापूर्व के गमनागमन की प्रक्रिया के कारण ही दिखाई देती है। यदि इस पावन प्रक्रिया का प्रभाव न रहा होता तो पट परिवर्तन के अभाव में विश्व रङ्गमंच पर चलने वाला यह जीवन-नाटक एकरसता, एक-रूपता एवं एक दृश्यता के कारण कितना नीरस, कितना अरुचिकर, कितना अप्रिय, कितना बोझिल और कितना असह्य हो जाता-इसका उत्तर, मनुष्य अपनी नव-रुचि एवं परिवर्तन-प्रिय वृत्ति से पूछ सकता है।

जीवन के किंचित् समय में ही मनुष्य न जाने कितनी बार, कितनी तरह की आधि-व्याधि, ईति-भीति, दुःख-दारिद्र्य एवं शोक सन्तापों का शिकार बनता रहता है और कष्ट क्लेशों से घबरा कर मृत्यु माँगने लगता है-यदि उसे समापन शून्य निर्विराम जीवन मिल जाये तब उसकी यातनायें कितनी दीर्घ जीविनी हो सकती हैं क्या मृत्यु से द्वेष मानने वाले मनुष्य कभी इस पर विचार करते हैं? संसार में मनुष्य अपनी बारी में जो कुछ सुख-शान्ति, साधन-सुविधा अथवा रसानुभूति, पा रहे हैं, अथवा जो अपनी बारी में पा चुके हैं और जो आगे पायेंगे वह सब मृत्यु के अनिवार्य प्रतिबन्ध के कारण ही सम्भव हुआ और होगा। यदि यह प्रतिबन्ध न रहा होता या आज उठ जाये तो हमारा यह संसार रौरव नरक में भी भयानक, बन जायेइसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। मृत्यु मनुष्य के लिये एक मैत्रीपूर्ण वरदान है। इसे परमात्मा की असीम अनुकम्पा समझ कर उसे बार-बार धन्यवाद देकर कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए।

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    अनुक्रम

  1. सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और उसका सान्निध्य

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