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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
धोखे से आना तो दूर यदि कह कर भी आये तब भी मृत्यु उन कर्मवीरों को भयभीत नहीं कर सकती जिनका अणु-अणु अपने पावन कर्तव्यों में आत्मविभोर होकर निमग्न रहता है। उन्हें जब अपने काम के सम्मुख दीन-दुनियाँ की खबर ही नहीं रहती तब भला मृत्यु जैसे निरर्थक विषय पर विचार करने के लिये न तो उसके पास फालतू समय ही होता है और न मस्तिष्क क्रिया करता है, मृत्यु की सुनसान दरीचियों की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता। कर्तव्यवान व्यक्ति दिन रात जिन्दगी के मुखर मार्गों में ही विचरण करता है। अकर्मण्यता, निष्क्रियता एवं अकर्तव्यशीलता मृत्यु की सबसे बड़ी स्मारिकायें हैं। उनको समीप न आने देने वाला कर्मवीर मृत्यु से डरना तो दूर उसकी याद तक नहीं करता।
धर्मवीर तो मृत्यु के नाम से पुलकित हो उठता है। जिसने सत्कर्मों द्वारा सुकृत की पूँजी जमा कर रक्खी है, धर्म धन का सम्बल संचय कर लिया है उसके लिये मृत्यु तो परलोक का निमन्त्रण होता है जहाँ उसके सत्कर्मों के पुरस्कार मिला करते हैं। जिसने अपने जीवन में परमार्थ पुण्य का पथ प्रशस्त किया है, अध्यात्म का चिन्तन एवं परमात्मा का स्मरण किया है उसकी आत्मा तो स्वयं ही शरीर बन्धन से मुक्त होने के लिये व्यग्र रहती है। वह सोचती है कि कब उसकी शरीर यात्रा समाप्त हो और कब वह पिंजड़े से दूटे पक्षी की तरह मोक्ष की ओर उड़ान भरे।
अडिग, अनिवार्य एवं आवश्यक सत्य मृत्यु से डरना क्या। बल्कि उसकी कल्पना से तो मनुष्य को अधिकाधिक सक्रिय होकर अपने लोक-परलोक को बनाने के लिये तीव्र से तत्पर हो जाना चाहिये। उसे अपने सुकृत कार्यों को यह सोच कर बढ़ा देना चाहिये कि न जाने अतिथि, अनाहूत एवं अपूर्वज्ञात मृत्यु किस समय आ जाये। उसके आने से पूर्व वह सब कुछ कर ही डालना चाहिये जो कि हमें करना है और हमारे करने योग्य है।
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