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आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोगश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग
देशबन्धु दास ने मृत्यु के समय एक कविता लिखी थी जिसके भाव है "मेरे ज्ञानाभिमान की गठरी मेरे सिर से उतार ले। मेरी पुस्तकों की गठरी मेरे कन्धों से नीचे उतार ले। इस बोझ को उठाते-उठाते मैं अब बहुत जीर्ण-शीर्ण हो गया हूँ। मुझमें जान नहीं है। मैं बहुत थक चुका मेरे बोझों को उतार लो, प्रभो।"
"अब वेद की आवश्यकता है न वेदान्त की। अब तो सब कुछ भूल जाने दो प्रभु । अब मुझे आपका वह राज्य दिखाई दे रहा है। प्रभो! मैं तुम्हारे कुंज के द्वार पर खड़ा हूँ। अपने निर्वाणोन्मुख दीपक को प्रज्वलित करने के लिये तेरे द्वार पर आया हूँ, भगवान।"
जो मृत्यु का मर्म जानते हैं वे इसी तरह मृत्यु को देख कर कविता रचने लगते हैं जैसे वसन्त की बहार को, बरसात की रिमझिम को, पक्षियों के कलरव को देख सुनकर। प्रिय के धाम में प्रवेश पाने का अवसर है मृत्यु। पीहर में, माँ की ममतामयी अङ्क में मोद मनाने आह्लाद प्राप्त करने की मङ्गलबेला है-मृत्यु। इसीलिए तो सुकरात मरते समय अमृतत्व का आस्वादन कर रहा था अपने शिष्यों को हँसी-खुशी में मौत का अर्थ समझा रहा था। सन्त तुकाराम कीर्तन करते-करते मौत की गोदी में सो गये। गेटे"अधिक प्रकाश! अधिक प्रकाश!!" की चकाचौंध में लीन हो गये। लोकमान्य ने "यदा यदाहि धर्मस्य" वाला थोक बोलते-बोलते आँखें मूंद लीं। दयानन्द "प्रभु-इच्छा की पूर्ति" का स्मरण करते हुये अनन्त में विलीन हो गये। महात्मा बुद्ध "आत्मदीप का अर्थ" बताते हुये चल बसे। बापू "हे राम, हे राम" कह रहे थे। स्वतन्त्रता संग्राम के असंख्यों सेनानी 'अहले वतन' की याद में मस्ती भरे तराने गाते हुए मौत की गोद में कूद पड़े। हँसी-खुशी के साथ मौत का आलिंगन करने वाले अमर लोगों की गाथाओं से इतिहास भरा पड़ा है।
मौत से डरने वाले ही जन्म-मरण को बन्धन समझते हैं उससे पीछा छुड़ाने के लिये नाना प्रयत्न करते हैं लेकिन जो मृत्यु का रहस्य जानते हैं उनके लिये जीवन-मरण एक खेल है। महात्मा बुद्ध ने कहा था "मुझे निर्वाण मोक्ष नहीं चाहिए। मैं तो बार-बार जन्म लेता रहूँ, दीन-दुःखी लोगों की सेवा के लिए।" हमारे सन्त-ऋषिमहर्षियों के लिए मृत्यु आनन्द का पर्व है। शान्ति के अपार सागर में छलाँग लगाने की शुभ बेला है। चैतन्य महाप्रभु आनन्द की मस्ती में मतवाले होकर सागर में कूद पड़े थे। स्वामी रामतीर्थ के लिये मृत्य भागीदारी की धारा में अपनी गोद फैलाये बैठी थी। माँ की सुखकर गोद को देखते ही स्वामी मचल उठे और कूद पड़े। उनके लिये दीपावली का पर्व बनकर आयी थी मृत्यु।
मृत्यु के क्षण ही जीवन की परीक्षा का समय होता है। इसी समय पर मालूम पड़ता है कि व्यक्ति ने पिछला जीवन कैसे बिताया। जो मरते समय रोयेगा, हाथ-पैर फेंकेगा, छटपटायेगा तो समझा जायेगा कि इस मनुष्य ने सारा जीवन रोते कलपते, इधर-उधर मृग मरीचिका की तरह भाग-दौड़ करते बिताया है। जो मृत्यु के समय हँसेगा जिसके चेहरे पर शान्ति प्रसन्नता आनन्द की रेखायें फूट पड़ेंगी उसका जीवन सफल माना जायेगा। महापुरुषों की मृत्यु भी अलौकिक होती है। उन क्षणों में एक अपूर्व पर्व जैसा वातावरण बन जाता है। धरती पर दो आत्मीय व्यक्तियों के मिलने का अवसर कितना सुखद बन जाता है। लेकिन मृत्यु के अवसर पर तो आत्मा परमात्मा के दरवाजे पर पैर रखती है। प्रेमी अपने प्रियतम से मिलता है। भक्त अपने भगवान से। पुत्र अपनी माता से। इसलिए मृत्यु के समय भी आनन्द का, उल्लास का वातावरण होना ही चाहिए। मृत्यु एक पर्व है, जन्म जैसा ही।
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