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आकाश के तारे धरती के फूल

कन्हैयालाल मिश्र

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :104
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 418
आईएसबीएन :81-263-0717-x

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हिन्दी के यशस्वी गद्यलेखक, शैलीकार एवं पत्रकार कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर के कुछ प्रेरक लघुकथा-प्रसंग

Aakash ke Tare Dharti ke Phool - A Hindi Book by - Kanhaiyalal Mishra आकाश के तारे धरती के फूल - कन्हैयालाल मिश्र

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘सम्पूर्ण जीवन का चित्र उपन्यास है और एक घटना का सम्पूर्ण चित्र कहानी’-यह शायद कार्लाइल की राय थी।...लेकिन जीवन यह घटना तो छोटी-सी-छोटी भी हो सकती है ! प्रस्तुत पुस्तक में ऐसी ही बेहतर कहानियाँ हैं। आप चाहे तो हिंदी कहानी के इतिहास में इसे नयी देन मान सकते हैं, या फिर स्केच लिखने की कला में एक नया प्रयोग।
सन् 1935 में कथा-सम्राट् प्रेमचन्द ने ‘प्रभाकर’ जी की प्रस्तुत पुस्तक के ऐसे ही कुछेक प्रयोगों को देखकर लिखा था-‘‘शाबाश, यह एक नयी पौध, जिसमें गद्यकाव्य का चित्र और कहानी का चरित्र है।’’...
हिन्दी के यशस्वी गद्यलेखक, शैलीकार एवं पत्रकार कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर के इन प्रेरक लघुकथा-प्रसंगों को हज़ारों पाठकों ने बार-बार पढ़ा है, सराहा है।

और किसे ?

स्वर्ग में, सुना है, देवता रहते हैं, और जन्नत में फ़रिश्ते, पर मैं तो मनुष्य को ही देवता और फ़रिश्ता मानकर जीता रहा।
मनुष्य की सेवा मेरा धर्म, मनुष्य का प्यार मेरी खुशी, मनुष्य में देवत्व की दीप्ति का दर्शन मेरा साहित्य और संक्षेप में मनुष्यता ही मेरा मिशन रहा।  मेरे साधन हीन जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा मनुष्य के प्रति मेरी अखण्ड निष्ठा रही है और यही मेरी शक्ति भी !
 मनुष्य का चोग़ा पहने दोज़ख़ के कीड़े भी मुझे मिले और मरघटों के भूत भी। शिकायत की कोई बात नहीं कि उन्होंने मुझे नोचा-खसोटा भी और कभी-कभी तो ऐसा भी हुआ है कि यह नोच-खसोट इस सीमा तक गयी कि मनुष्य के प्रति मेरी निष्ठा की बेल मुझे सूखती दिखाई दी।
जीवन के इस ज्वालामुखी घड़ियों में, पिछले वर्षों में मेरे सहृदय और निष्काम बन्धु श्री शाहू शान्तिप्रसाद जैन और श्रीमती रमा जैन स्मरण-सम्पर्क ने सदा ही वह मधुर सरसता दी कि निष्ठा की वह सूखती बेल लहलहा उठी।
इस स्थिति में मैं अपने ये तारे और फूल और किसे समर्पित करूँ, क्योंकि इनमें मेरी मानव-निष्ठा के उच्छ्वास और निःश्वास ही तो हैं ?

प्रभाकर

कहानियों की कहानी

भूमिका

ये छोटी कहानियाँ हैं और इनकी भी एक कहानी है, जो आज पहले-पहल आपसे कह रहा हूँ।
1928 में किसी मासिक पत्रिका में छपा एक लेख पढ़ रहा था कि एक उद्धरण आया—‘‘सम्पूर्ण जीवन का सम्पूर्ण चित्र उपन्यास है और एक घटना का सम्पूर्ण चित्र कहानी।’’ यह शायद कार्लाइल की राय भी थी। पढ़ना बन्द कर मैं सोचने लगा, तो एक प्रश्न मुझमें भर गया : ‘जीवन की यह एक घटना तो छोटी-से-छोटी भी हो सकती है, तो फिर कहानी के विस्तार की छोटी-से-छोटी सीमा क्या है ?’
यह प्रश्न मुझमें भर गया तो भरा ही रहा और 1929 का वह समय आया, जब महाप्राण बाबू देश के दौरे को निकले और मैं चन्दे को चला अपनी जन्मभूमि में। एक दिन एक धनपति से इस बारे में बातचीत हुई, तो मैं प्रेरणा पा गया और मैंने अपने भीतर भरे उस प्रश्न के समाधान में छोटी-से-छोटी कहानी का यह पहला प्रयोग किया—


सेठजी



‘‘महात्मा गाँधी आ रहे हैं,  उनकी ‘पर्स’ के लिए कुछ आप भी दीजिए सेठजी !’’
‘‘बाबूजी, आपके पीछे हर समय खूफिया लगी रहती है, कोई हमारी रिपोर्ट कर देगा, इसलिए हम इस झगड़े में नहीं पड़ते !’’
‘‘मैं रात-दिन चन्दा माँग रहा हूँ, जब मुझे ही पुलिस न पी गयी, तो रिपोर्ट आपका क्या कर लेगी ?’’
ज़रा सोचकर हाथ जोड़ते हुए से बोले—‘‘अजी, आपकी बात और है। हम कलक्टर साहब से डरते हैं। आपकी बात और है। आपसे तो उल्टा कलक्टर ही डरता है।’’
प्रसन्नता से मैंने कहा—‘‘तो आप ही डरनेवालों में क्यों रहते हैं ? काँग्रेस में नाम लिखा लीजिए, फिर कलक्टर आप से भी डरने लगेगा।’’

सेठ जी ने दांत निकालकर जो मुद्रा बनायी, उसकी ध्वनि थी—‘हें, हें, हें !’’
इसे लिख कर मुझे लगा कि कुछ मेरे हाथ लग गया है और इसी उत्साह में मैंने इस तरह की दस-पन्द्रह चीजें लिखीं। इसमें ‘सलाम’ का खूब प्रचार हुआ; जो इस प्रकार है—


सलाम


सर विलियम पहली बार हिन्दुस्तान आये। एक दिन क़ुली ने गाड़ी से उतारकर उनका सामान वेटिंग रूम में रख दिया। अब उसकी हथेली पर एक रुपया था।
उसने कहा—‘‘हुज़ूर’ कम हैं !’’
सर विलियम कुछ नहीं समझे। उन्होंने अपनी भाषा में कहा—‘‘क्या कहते हो ?’’ क़ुली कुछ नहीं समझा। फिर भी उसने दोहराया—‘‘हुज़ूर, कम है !’’
पास ही एक काला ईसाई बैठा था। उसने क़ुली के हाथ से वह रुपया उठा लिया और चवन्नी उसके सामने फेंककर कहा—‘‘सूअर !’’

क़ुली ने चवन्नी उठायी और माथे पर हाथ लगाया—‘सलाम हुज़ूर !’’
सर विलियम सब कुछ समझ कर बोले—‘‘ओह, इण्डिया द स्लेव कण्ट्री !’’ (हिन्दुस्तान एक ग़ुलाम मुल्क !)
काला साहब रुपया लौटाते हुए बोला—‘‘यस सर, यस सर !’’
सलाम की सलामती का नतीजा यह हुआ कि अब इनकी संख्या बीस के लगभग हो गयी।
साहित्यिक मित्रों में सबसे पहले अज्ञेयजी ने इन्हें सराहा। कहा कि यह हिन्दी की छोटी कहानी है और कहानी के इतिहास में इसे आपकी नयी देन माना जायेगा। कुछ और सम्मतियों ने भी मुझे प्रभावित एवं प्रोत्साहित किया। पर प्रेमचन्दजी को 1934-35 में मैंने ये कहानियाँ सुनायीं, ये सम्मतियाँ बतायीं तो बोले—‘‘शाबाश, यह एक नयी क़लम है, गद्यकाव्य और कहानी के बीच एक नयी पौध, जिसमें गद्यकाव्य का चित्र और कहानी का चरित्र है। खूब लिखो। जब इनका संग्रह छपे तो याद दिलाना, मैं भूमिका लिख दूँगा !’’

अब मैं निश्चिन्त हो गया और जब-तब लिखता रहा। इस सम्बन्ध में इतनी स्पष्टता मुझमें है कि यह जो कुछ भी हो, मैं इस स्थिति मैं नहीं हूँ कि गर्व कर सकूँ; क्योंकि मैंने इनके लिए, कहूँ, इस विद्या की खोज के लिए कोई काम नहीं किया, प्रसव-पीड़ा नहीं सही। किसी को राह चलते कुछ मिल जाये, तो यह एक संयोग ही तो हुआ !
बस इन कहानियों की यही कहानी है, जो ‘आकाश के तारे : धरती के फूल’ के प्रथम संस्करण में मैंने अपने पाठकों को पहले-पहल सुनायी थी। इसका उद्देश्य इतना ही था कि मेरी सर्जना में इस विधा का विकास बिना किसी बाहरी प्रभाव के अनायास इस प्रकार हुआ। यह स्पष्ट ही है कि उस समय तक कोई सूचना प्रेमचन्द जी के पास भी नहीं पहुँची थी, ‘पर आकाश के तारे : धरती के फूल’ के कई संस्करण होने के बाद इस कहानी में एक नयी कहानी जुड़ गयी कि अमुक ‘महान्’ इस विद्या के प्रवर्तक हैं। कहानी में नयी कहानी का जुड़ना विकास-क्रम की श्रृंखला है, पर यह नयी कहानी कोई कहानी नहीं, नकली महानता की उद्दाम पिपासा का अर्थहीन फूत्कार ही था।
यह फूत्कार दादा माखनलालजी चतुर्वेदी तक भी पहुँचा। एक बार बातचीत में दादा ने मुझसे कहा—‘‘मैंने आरम्भ में बहुत लघुकथाएँ लिखी थीं, 1915-18 में।’’

कानपुर में भाई बलराम ने जब लघुकथा पर खोज आरम्भ की और स्वभावतः सबसे पहली लघुकथा पत्रिका के प्रकाशन का प्रयत्न किया, तो मेरा-उनका पत्र-संपर्क हुआ। मैंने उन्हें दादा माखनलालजी की बात लिखी। उन्होंने मासिक ‘प्रभा’ की फाइल देखी उसमें दादा की सबसे पहली एक लघुकथा ही थी। ‘कहानीकार’ के मार्च-अप्रैल 1976 के संयुक्तांक में छपे अपने विस्तृत लेख ‘हिन्दी लघु कहानी पुनर्मूल्यांकन’ में आपने कहा—‘‘हम हिन्दी की आधुनिक ‘लघु कहानी’ माखनलाल चतुर्वेदी की ‘बिल्ली’ और ‘बुखार’ को मानते हैं। इसके बाद नाम आता है कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की कहानी ‘सेठजी’ का, जो उन्होंने 1929 में लिखी।’’
बस दादा माखनलाल चतुर्वेदी की पुण्य स्मृति में वह मस्तक-प्रणति ही मेरी इन कहानियों का उपसंहार है।

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’



नन्दन



नन्दन अपने गांव का एक मात्र धनी था। सारे गांव में उसका ऊँची हवेली दूर से दिखाई देती थी। आस-पास चारों ओर उनका नाम फैला हुआ था।
उस दिन ख़बर उड़ी कि आज संध्या के समय गांव में डाका पड़ेगा और ख़बर क्या उड़ी, गर्वोन्मुत डाकू-सरदार ने ख़ुद ही यह ख़बर भेजी थी। गाँव में और तो सब गरीब थे; डाकू भला उनका क्या लेते—क्या बिगाड़ते ! उनके लिए ग़रीबी आज कवच थी। वे पूरी तरह विश्वस्त थे कि डाके का नोटिस नन्दन के ही नाम ही है।
नन्दन भी यह जानता था। वह उस दिन, दिन-भर अपना हवेली के किवाड़ बन्द कर भीतर घुसा रहा। कैसे वह डाकुओं से अपने माल, मान और प्राण की रक्षा करे, यही उसकी चिन्ता थी।
उसने ज़ेवर और धन अपनी हवेली के पीछेवाले उपवन में जगह-जगह बिखेर दिया। मोतियों का हार नेवले के बिल में रखा, तो सोने की बोरी कुएँ में डाल दी। गिन्नियाँ ख़ाद के गड्ढे में दबायीं।, तो रुपयों की थैली बूढ़े बड़ की खोखर में भर दीं। यही उसने दूसरे क़ीमती सामान का किया।

उसकी हवेली के पिछले हिस्से में एक बड़ा-सा गड्ढा था। उसमें वह स्वयं बैठा और अपने ऊपर उसने एक टूटा-सा टोकरा ढाँक लिया। सन्ध्या होते ही हवेली का द्वार उसने खुलवा दिया और एक भी कमरा ऐसा न छोड़ा जिसका द्वार बन्द हो या जिसमें कुछ भी व्यवस्थित हो। उसे उस गड्ढे में बैठे, टोकरी की झिरखियों से सारी हवेली दिखाई दे रही थी।
दलबल सहित रात में डाकू आये, तो वे सीधे नन्दन की हवेली पर पहुँचे। उन्हें विश्वास था कि वहाँ पर पूरे युद्ध की तैयारी होगी, पर यहाँ तो द्वार खुले हुए थे। चौंकते-सँभलते वे भीतर घुसे, पर हवेली तो बिखरी-सी पड़ी थी।
‘भाग गया शैतान और सारी दौलत भी साथ ले गया।’ डाकुओं के सरदार ने कहा और सब हाथ मलते लौट गये। नन्दन का दिल पहले तो धड़कता रहा, पर अब मुस्करा रहा था।


दो



दूसरे दिन गाँव के बड़े-बूढ़ों ने नन्दन के धैर्य और बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की पर कई दिन बाद भी उन्होंने नन्दन को उसी गड्ढे में अपने को ढँके बैठा देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ।
उन्होंने उसे समझाया कि अब कोई ख़तरा नहीं है। अपने घर को फिर से व्यवस्थित करो, अपनी सम्पदा को सुन्दर अलमारियों में सजाओ और स्वयं भी अपने सुखद पर्यंक पर सोना आरम्भ करो।
नन्दन सबकी सुनता है, सिर हिलाता रहा, पर मानता नहीं। कहता है—जिस पद्धति ने मेरे प्राण बचाये, धन-सम्पदा की रक्षा की, उसका त्याग भला मैं कैसे कर सकता हूँ ?

सब उसे समझाते हैं कि वह संकट-काल की नीति थी। उस समय उसका व्यवहार करने के लिए हम तुम्हारी प्रशंसा करते हैं पर आज तो उसका पालन एक विडम्बना है। कल जो सुरूप था, आज वह कुरूप है। जब वह परिस्थिति ही नहीं, तो वह नीति-पद्धिति कैसे ठीक रहेगी ? उसे छोड़ो और अपना स्थान रूप ग्रहण करो।
नन्दन बहसें करता है और एक-से-एक बढ़कर तर्क खड़ा करके उस पद्धति का समर्थन करता है।
सब देखते हैं कि उसकी सुन्दर हवेली सूनी और उजड़ी पड़ी है और उसकी धन-सम्पदा भी खोखरों और गड्ढों में बिखरी है। बातचीत से अनुमान होता है कि अब वह यह भी भूलने लगा है कि कौन-सी चीज़ किस खोखर या गड्ढे में है, पर वह सन्तुष्ट है और स्वयं उस टोकरे में ढँके गड्ढे को ही अपना शयनकक्ष बनाये हुए है।

श्रद्धा में डूबकर वह उन खोखरों-गड्ढों को पुकारता है—रीति-प्रति और उस बड़े गड्ढे को कहता है—जन्म-कूप !
सब देखते हैं कि उसकी सुन्दर हवेली सूनी-उजड़ी पड़ी है, उसकी धन-सम्पदा उन गड्ढों-खड्ढों में बिखरी है और वह स्वयं भी उस टोकरे से ढँके गड्ढे को ही अपना शयनकक्ष बनाये हुए है।


मृत्यु की चिन्ता में



अंगरेज़ी क़ब्रिस्तान में एक बूढ़ी माँ हर शुक्रवार को आती है और अपने जवान बेटे की क़ब्र पर फूलों का एक सुन्दर गुलदस्ता चढ़ा जाती है।
उसका यह बेटा छह साल हुए अपनी भरी जवानी में स्वर्ग सिधारा था। उसकी इच्छा है कि वह अपने पुत्र के पास ही दफनायी जाये। उसने अभी से अपने पुत्र की क़ब्र के बग़ल में अपनी भावी क़ब्र के लिए स्थान सुरक्षित करा लिया है।
जब शुक्रवार को वह गुलदस्ता चढ़ाने आती है, तो हसरत भरी निगाहों से उस ज़मीन को देख जाती है। कभी-कभी उसके मुँह से निकल जाता है—‘‘ओह, मेरे ईश्वर ! जाने मैं कब यहाँ सोऊँगी !’’
बुढ़िया जीती है, पर मृत्यु की चिन्ता ही उसके जीवन का सुख है।


कवि की पत्नी


कवि कुसुम का अभी हाल में ही विवाह हुआ था। पत्नी गांव की थी और अनपढ़, पर रूप उस पर बरस पड़ा था। कवि उसमें लीन था—उसकी ग्रामीणता और अनपढ़ता की ओर ध्यान देने का समय अभी उसे न था। आज रूप की लहरों में तैरकर उसने एक मद-भरा गीत लिखा था और वही नगर के दीपोत्सव में पढ़ा था। निर्णायकों ने उसे सर्वश्रेष्ठ ठहराया और प्रतिस्पर्धा का विशाल कप उसे भेंट किया।
उत्साह में भरा कवि घर आया और चमत्कार-सा वह कप पत्नी के सामने रख दिया। पत्नी खिल उठी। उसका अन्तर उसके प्रश्न में मुखरित हो उठा—‘‘कहां से लाये हो यह ? बड़ा सुन्दर है।’’
कवि का मुख दीप्त हो उठा—‘‘जीत कर लाया हूँ इसे !’’

पत्नी-शोक सागर में डूब गयी। उसके मन की व्यथा उसकी वाणी में फूट पड़ी—‘‘तब तो किसी दिन तुम मेरा ज़ेवर भी डुबा दोगे !’’
‘‘क्यों ?’’ कवि ने विस्मय से पूछा। ‘‘और क्या ? आज जीतकर यह खेल लाये हो, कल मेरा ज़ेवर दाँव पर रखोगे। आज जीत है तो कल हार है।’’
उनकी भृकुटियों में क्रोध और आँखों में आसू भर आये।
‘‘मैं जुएँ में जीतकर यह नहीं लाया पगली !’’
उत्सुक हो, वह पूछ बैठी—‘‘फिर और कहाँ से जीतकर लाये हो ?’’
(कविता का अर्थ पत्नी समझ नहीं सकती)

‘‘कुश्ती में जीतकर लाया हूँ,’’ कवि ने कहा।
‘‘ऐं ! कुश्ती में !! उसने पति के सूखे हाथ और पतले पैर देखे और पूछा—‘‘अच्छा तुम कुश्ती भी लड़ते हो ?’’
‘‘हाँ, ख़ास तरह की कुश्ती लड़ता हूँ।’’
पत्नी फिर विषाद की मुद्रा में स्थिर हो गयी।
कवि ने कहा—क्यों अब क्या हुआ ?’’
‘‘हुआ क्या; तुम मुझे खोओगे किसी दिन।’’
‘‘क्यों’’ कुश्ती में तो ज़ेवर नहीं जाते !’’

‘‘ज़ेवर नहीं जाते, तो क्या, हाथ-पैर तो टूटते हैं।’’
‘‘न मैं जुआँ खेलता हूँ, न कुश्ती लड़ता हूँ। यह सब तो मैं तुमसे हँसी में कह रहा था रानी !’’
‘‘फिर कहाँ से जीतकर लाये हो ?’’
(कविता का अर्थ पत्नी समझ नहीं सकती)
‘‘मैं गाने लिखता हूँ और लोगों को गाकर सुनाता हूँ। खुश होकर वे मुझे इस तरह के इनाम देते हैं।’’
‘‘ख़ैर, गाने में तो कोई हर्ज़ नहीं। हमारे गाँव में भी बंसी झीवर चौबोले जोड़ता है। होलियों में लोग उसे सिर पर उठाये फिरते हैं। तुम भी चौबोले जोड़ते होंगे ?’’
‘‘हूँ !!’’ एक मरी-सी ध्वनि में कवि ने कहा और पत्नी की ओर देखा। पत्नी की आँखों में गर्व की प्रसन्नता फूट रही थी। पति की आँखों में आँखें डालकर उसने कहा—‘अब की होलियों में तुम्हारे गाँव में चलना है। रात को चौपाल पर एक चौबोला तुम कहना, एक बंसी कहेगा। सच कहती हूँ बड़ा मज़ा रहेगा।’’


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