आध्यात्मिक कथाएं - स्वामी अवधेशानन्द गिरि Adhyatmik Kathayein - Hindi book by - Swami Avdheshanand Giri
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आध्यात्मिक कथाएं

स्वामी अवधेशानन्द गिरि

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4386
आईएसबीएन :9788131002896

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भारतीय संस्कृति के नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की सजीव प्रस्तुति

Aadhyatmik Kathayan

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

दो शब्द

पुस्तक आरंभ करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि आध्यात्म आखिर है क्या ? अध्यात्म क्षमा और शांति की ऐसी कुंजी है जिसके माध्यम से व्यक्ति को यह ज्ञान होता है कि वह स्वयं क्या है ? अध्यात्म हमें बताता है कि हमारा असली ‘आपा’ हमारी आत्मा है। यह इस बात का अनुभव कराता है कि हम मात्र शरीर या मन नहीं, बल्कि वह आत्मा हैं जो हमारे इस शरीर में बस रही है। हम अपने आपको सिर्फ एक शरीर समझते हैं जिसका कि एक नाम है। इस तरह हम अपने आपको भारत, फ्रांस, अमेरिका अथवा किसी भी देश का नागरिक समझते हैं या फिर किसी एक अथवा दूसरे धर्म से जुड़ा हुआ मानते हैं, पर, अध्यात्म के द्वारा हम यह जान जाते हैं कि इन सभी भिन्न-भिन्न बाहरी नामों और ठप्पों के पीछे, मूलतः हम सभी आत्मा हैं और एक ही परमपिता के अंश हैं।
प्रश्न उठता है कि हम आध्यात्मिक क्यों बनें ? क्या फायदा है आध्यात्मिक बनने का। उत्तर स्पष्ट है। अध्यात्म के द्वारा हम सहानुभूति, परस्पर मैत्री की भावना, क्षमा और शांति की भावना को जाग्रत करते हैं। जब हमारा दृष्टिकोण आध्यात्मिक बन जाता है, तब हम किसी को भी पक्षपात या भेदभाव की दृष्टि से नहीं देखते। हम उन दीवारों को हटाने लग जाते हैं जो मानव-मात्र को एक-दूसरे से अलग करती हैं। हम यह अनुभव पाने लगते हैं कि आत्मिक स्तर पर हम सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब हम अपनी एकता और अपने आपसी संबंधों की पहचान कर लेते हैं तो फिर हम एक-दूसरे की सहायता करने लगते हैं। तब हमारे सोचने की विचारधारा में अंतर आ जाता है। पड़ोस में भूख से रोते बच्चे की आवाज से हमें उतनी ही तकलीफ होती है जितनी कि अपने बच्चे के रोने से। हम सड़क पर बेसहारा घूमते बूढ़े इंसान में अपने बेसहारा दादा को देखते हैं और उसकी मदद को प्रेरित होते हैं। हमारा दृष्टिकोण विशाल हो जाता है।
हम सभी यदि संकल्प करें, इरादा करें तो अपना आध्यात्मिक पक्ष मजबूत कर सकते हैं। सदियों से इसके लिए एक समाधान उपलब्ध है। ध्यान-साधना की विधि को सीखकर हम प्रतिदिन कुछ समय अपने अंतर में प्रभु के साथ गुजार सकते हैं। जैसे-जैसे प्रभु हमें प्रेम और आनंद से सराबोर करेगा, वैसे-वैसे हमारी वे पुरानी आदतें धुलती चली जाएंगी जिनके कारण हम नफरत और पक्षपात से भरे रहते हैं। हममें प्रेम, क्षमा और दया के गुण भर देता है।
हममें से बहुत सारे लोग प्रभु को पाने या देखने की तीव्र अभिलाषा रखते हैं। प्रभु को पाना ही हम सबका एकमात्र सपना होता है। इसके लिए प्रायः लोग एक टेक्नीक का इस्तेमाल करते हैं, जिसे हम अंतर्मुख होना, एकाग्र होना, ध्यान टिकाना या ‘मेड़ीटेशन कहते हैं। जब वे शांत चित्त होकर बैठते हैं और अपने ध्यान को अंतर में टिकाते है तो उन्हें आत्मा का साक्षात्कार होता है, जो वास्तव में परमात्मा का ही एक अंश है। जब हम ऐसा करते हैं तो हम भी वही अवस्था पाते हैं जो हमारे महान संतः महात्माओं ने पाई थी। इसी दिव्य अनुभूति को लोग प्रभु-दर्शन मानते हैं। सदियों से प्रभु-मिलन की जो बातें हमें सुनने को मिलती हैं वह इसी अवस्था में अभेद हो जाने की स्थिति है।

अध्यात्म का गरीबी या अमीरी से कोई रिश्ता नहीं होता। यदि कोई रिश्ता होता तो श्रीकृष्ण सोने की द्वारका क्यों बसाते ? कभी श्रीकृष्ण को सादे वस्त्रों में देखा है आपने ? जब देखिए सजे-धजे आभूषण-अलंकारों से सुसज्जित रहते हैं। इसका अर्थ यह न समझें कि उन्होंने कभी गरीबों से प्रेम किया ही नहीं। भगवान कृष्ण ने सदैव ही गरीबों से प्रेम किया है और यही शिक्षा सारे संसार को दी है। कौन भूल सकता है कृष्ण-सुदामा की मैत्री को। सुदामा जैसे दरिद्र ब्राह्मण का उद्धार क्या कृष्ण के बिना कोई और कर सकता था। भगवान तो घट-घट में निवास करते हैं। वे सबके मन को जानते हैं। हां, यह बात अलग है कि वे सबको अपने-अपने कर्मों के अनुसार उसका प्रतिफल देते हैं-
‘राम झरोखा बैठ के सबका मुजरा लेय
जैसी जाकी चाकरी, प्रभु तैसा वाको देय’
अंत में यही कहना चाहूंगा कि आध्यात्मिक बनिए। अध्यात्म की दृष्टि से देखिए, फिर आपको जो आत्मिक सुख मिलेगा वह संसार के भौतिक पदार्थों से बिलकुल ही अलग होगा।
गंगाप्रसाद शर्मा

कथा की कथा

 


घटनाओं और चरित्र की शब्दमयी प्रस्तुति होती है कथा। घटनाएं जहां कथा को रोचकता प्रदान करती हैं वहीं ये कसौटी हुआ करती हैं चरित्र की भी। चरित्र का निर्माण ही वह केन्द्र बिन्दु होता है जिसके लिए कथाओं का भारतीय संस्कृति में प्रचार-प्रसार हुआ है। क्योंकि इसमें प्रयुक्त भाषा सरल-सुगम होती है इसलिए एक साधारण व्यक्ति इन्हें पढ़ता-सुनता है। और पढ़ने सुनने की यह प्रक्रिया इतनी सूक्ष्म व अलौकिक होती है कि पाठक-श्रोता को इस बात का अहसास ही नहीं हो पाता कि कब कथा का कथ्य उसके अचेतन की गहराइयों में उतर जाता है तथा साधारण-सी लगनेवाली कथा उसके जीवन में ऐसी दिव्य क्रांति कर देती है कि उसका सर्वस्व परिवर्तित हो जाता है। इसलिए अनुपमेय है कथा की कथा।

1
साग विदुर घर खाए

 

हृदय में प्रभु से मिलन का भाव हो, मन में श्रद्धा और भक्ति हो, मन हर पल परमात्मा का चिंतन करता रहे, परमात्मा आसपास भासता रहे, तो हर उस वस्तु में परमात्मा है, जिसमें जिज्ञासु परमात्मा के दर्शन करना चाहता है, ऐसा भाव रखने वाले को परमात्मा के दर्शन भी हो जाते हैं।
विदुर आकंठ श्रीकृष्ण से जुड़े रहे। इसलिए वह श्रीकृष्ण से अलग नहीं थे। इसीलिए हस्तिनापुर आने पर श्रीकृष्ण ने उनके घर में साग-भाजी खाई थी, छप्पन प्रकार के राजसी भोजों को त्यागकर..उन्हें विदुर ने कोई निमंत्रण नहीं दिया था, लेकिन श्रीकृष्ण तो उनके मन का भाव जानते थे इसलिए उनके घर चले गए थे।
धृतराष्ट्र ने जब पांडवों को लाक्षागृह में जलाकर मार डालने का कुचक्र रचा था तो विदुर ने तत्काल कपट प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के साथ न रहने का संकल्प लिया था और वह अपनी पत्नी सुलभा के साथ, वन में चले गए थे। जब हर जगह, हर पल कपटता हो, वहां ‘चेतन’ स्वरूप से जुड़े व्यक्ति का दम घुटता है, विदुर का भी दम घुटने लगा था।
विदुर ने सुना कि श्रीकृष्ण संधि प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आ रहे हैं। वह गंगा स्नान करने गए थे। रथ यात्रा भी निकलेगी, यह निश्चिय था। घर लौटकर सुलभा को बताया। दोनों के मन में श्रीकृष्ण दर्शन की ललक पैदा हुई। बारह वर्ष हो गए थे, तपस्या साधना करते हुए और जो बारह वर्ष तक तपस्या करता है, उसे प्रभु दर्शन अवश्य देते हैं और यही बात पति-पत्नी के मन में यह आस बंधाए थी कि श्रीकृष्ण उन्हें दर्शन अवश्य देंगे, उनके घर जरूर आएंगे। लेकिन कैसे आएंगे हमारे पास, इस पर्णकुटी में, जहां न उनके योग्य बैठने का स्थान है और न ही उनके पास छप्पन प्रकार के भोग हैं ? सुलभा ने कहा, ‘‘आपने कभी श्रीकृष्ण को देखा है ? कोई परिचित है ?’’ विदुर ने कहा, ‘‘जब मैं कृष्ण की वंदना करता हूं तो वह मुझे चाचा कहकर बुलाते हैं, लेकिन मैं कहता हूं, मैं तो अधम हूं, आपका दास हूं, मुझे ऐसा न कहा करें।’’ लेकिन जब जीव नम्र होता है, अपने आपको समाप्त करता है, अपने आपको प्रभु के चरणों में सौंप देता है, तो वह अधम कैसे रह जाता है ? श्रीकृष्ण के लिए तो कोई अधम नहीं, नीच नहीं, वह तो सभी से प्रेम करते हैं, कोई उनसे प्रेम तो करे।

सुलभा कहती,‘‘ भला द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण हमारे घर आएंगे कैसे ? आपको परिचित हैं, तो उन्हें घर आने का न्योता दीजिए, मेरी इच्छा है, वह मेरे घर आएं, भोजन करें, पर कैसे आएंगे ? वह तो इतने बड़े राजा हैं, हम गरीबों के घर भोजन कैसे करेंगे ? हमारा न्योता कैसे स्वीकार करेंगे ? दुर्योधन के राजसी भोजन से वह कैसे इनकार कर सकेंगे ? आप कोई रास्ता निकालें कि श्रीकृष्ण, मेरे आराध्य हमारे घर आएं, गरीब की इस झोंपड़ी में।’’
विदुर ने कहा, ‘‘लेकिन सुलभा, यदि वह हमारे घर आ भी जाएं, तो हम उनका इस छोटी-सी झोंपड़ी में स्वागत कैसे करेंगे ? उनके आने से हमें आनंद तो मिलेगा, लेकिन उन्हें तो कष्ट होगा ? यहां उनकी शान के मुताबिक आसन भी तो नहीं ? भोजन भी हमारा सादा-सा है, साग-भाजी ? क्या हम श्रीकृष्ण को साग-भाजी ही खिलाएंगे ? क्या वह खा लेंगे ? मैं अपने सुख के लिए भगवान को कष्ट नहीं दे सकता सुलभा, हां, मेरा और तुम्हारा उनसे जो प्रेम है, वह उन्हें अवश्य खींच लाएगा।’’
‘‘लेकिन क्या उन्हें यह पता भी है कि हम उनसे प्रेम करते हैं ? यह तो हम कहते हैं, वह भी ऐसा सोचते हैं या नहीं, क्या पता, लेकिन सुना है, वह प्रेम से, निश्छल प्रेम से खिंचे चले आते हैं ? गोपियों का निश्छल प्रेम ही था उनसे, और वह उनसे दूर नहीं रह सके, हमारे पास भी वे हमारे प्रेम से खिंचे चले आएंगे। तुम चिंता न करो सुलभा, यह मेरा विश्वास है कि वह हमारे घर आएंगे जरूर। भक्त इस आशा के सहारे ही जीता है प्रभु मुझ पर कृपा करेंगे, मेरे घर आएंगे, कभी तो आएंगे, चाहे जीवन के अंतकाल में ही आएं, पर आएंगे जरूर।’’
और फिर जब दुर्योधन ने उन्हें भोजन पर निमंत्रित किया तो उन्होंने भोजन करने से विनम्रतापूर्वक इनकार कर दिया था, पापी का भोजन खाने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, मन में विकार पैदा होते हैं, आचरण बिगड़ जाता है इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘हे दुर्योधन, मैं तुम्हारे यहां भोजन नहीं कर सकता, द्रोणाचार्य ने भी जब भोजन का निमत्रण दिया तो श्रीकृष्ण ने कहा, ‘‘मैं आपका भी निमंत्रण स्वीकार नहीं कर सकता, मेरा एक भक्त मेरा इंतजार कर रहा है, गंगा किनारे अपनी कुटिया में, मैं भोजन वहीं करूंगा।’’ श्रीकृष्ण को पता था कि कोई उनके इंतजार में है, भगवान तो अपने भक्त की खोज में रहते हैं, उन्हें पता चल जाता है कि कोई उनके लिए तड़प रहा है, कोई उन्हें खोज रहा है।
और फिर अचानक श्रीकृष्ण बिन बुलाए ही, केवल प्रेम और भावना से बंधे, विदुर की कुटिया में आ पहुंचे। द्वार खटखटाया, कहा, ‘‘मैं आ गया हूं, मुझे बहुत भूख लगी है।’’ द्वार खुला, विदुर और सुलभा को ऐसा लगा जैसे उनकी पर्ण कुटिया तो एक महल से कम नहीं है, एक दिव्य प्रकाश से जगमगा उठी है। आनंद में डूब गए दोनों...आंखों से प्रेम के आंसू बहने लगे...और श्रीकृष्ण उन्हें देख-देखकर, मंद-मंद मुस्कराते रहे।
भगवान तो बिना बुलाए ही आते हैं...केवल उन्हें बुलाने का भाव और श्रद्धा चाहिए। ईश्वर कभी भूखा नहीं होता, हां, वे भूखे हैं केवल प्रेम के...कोई भी बुलाए प्रेम में डूबकर वह आएंगे, आते हैं...और आकर स्वयं ही बरतन से भाजी-साग निकालकर खाने लगते हैं, उसी प्रकार जिस प्रकार उन्होंने विदुर की झोंपड़ी में खाया था।

2
कर्म और अकर्म

 

श्रीमद्भागवत में सृष्टि की उत्पत्ति का विशद वर्णन हुआ है। तात्विक दृष्टि से जगत मिथ्या है। इसकी हर वस्तु नष्ट होनी है, होती है। इसलिए संत-महापुरुषों ने इस जगत पर अधिक ध्यान नहीं दिया, लेकिन उन्होंने सृष्टिकर्ता के बारे में अवश्य विचार किया और उसे जाना।
जब परमात्मा को माया ने स्पर्श किया तो वह संकल्प से ही एक से अनेक बना...पुरुष में से प्रकृति, प्रकृति में से महत तत्व, महत तत्व से अहंकार का जन्म हुआ...ऐसे ही पंच महाभूतों की उत्पत्ति हुई..और इस प्रकार जगत की हर वस्तु में परमात्मा का प्रवेश हुआ। चूंकि हर चीज परमात्मा से ही निकलती है, इसलिए सबमें परमात्मा मौजूद है, संतान और संपत्ति में परमात्मा की कृपा कम, प्रारब्ध का फल अधिक होता है, इसलिए जब विदुर जी मैत्रेय ऋषि से मिले, तो ऋषि ने उनसे कहा, ‘‘विदुर तुम कर्म और प्रारब्ध के कारण मनुष्य रूप में हो। वैसे मैं तो तुम्हें अच्छी तरह जानता हूं, तुम तो यम का अवतार हो...स्वयं यमराज हो...इसलिए तुम पर श्रीकृष्ण की कृपा हुई।’’
सुनकर विदुर हैरान हुए...पूछा, ‘‘ऋषिवर, मैं यमराज का अवतार कैसे हूं ? किस कारण मुझे मनुष्य योनि में आना पड़ा ? मैंने क्या अकर्म किया था ?’’
आदमी को कर्म और अकर्म में भेद अवश्य समझना चाहिए। जो जैसा कर्म करेगा, उसे वैसा फल अवश्य मिलेगा, इस कर्म फल से कोई नहीं बच सकता और कर्म बिना कोई रह भी नहीं सकता...कर्म का फल तो कर्म के अनुसार भोगना पड़ता है, यह सत्य है।

मैत्रेय जी ने विदुर से कहा, ‘‘मांडव्य ऋषि के शाप के कारण ही तुम यमराज से दासी पुत्र बने। एक बार कुछ चोरों ने राजकोष से चोरी की। चोरी का समाचार फैला। राज कर्मचारी चोरों की खोज में भागे। चोरों का पीछा किया। चोर घबरा गए। माल के साथ भागना मुश्किल था। मार्ग में मांडव्य ऋषि का आश्रम आया। चोर आश्रम में चले गए। चोरों ने चोरी का माल आश्रम में छिपा दिया और वहां से भाग गए। सैनिक पीछा करते हुए मांडव्य ऋषि के आश्रम में आ गए। छानबीन की। चोरी का माल बरामद कर दिया। मांडव्य ऋषि ध्यान में थे। राज कर्मचारियों की भाग-दौड़ की आवाज से उनका ध्यान भंग हुआ। उन्होंने मांडव्य ऋषि को ही चोर समझा। उन्हें पकड़ लिया और राजा के पास ले गए। राजा ने फांसी की सजा सुना दी।
मांडव्य ऋषि को वध स्थल पर लाया गया। वह वहीं गायत्री मंत्र का जाप करने लगे। राज कर्मचारी, उन्हें फांसी देते, लेकिन मांडव्य ऋषि को फांसी न लगती कर्मचारी और स्वयं राजा भी हैरान हुआ। ऐसा क्यों ? फांसी से तो कोई बचा नहीं, लेकिन इस ऋषि को फांसी क्यों नहीं लग रही...क्या कारण है ? यह निश्चित ही कोई तपस्वी है..राजा को पश्चाताप हुआ। ऋषि से क्षमा मांगी। ऋषि ने कहा, ‘‘राजन, मैं तुम्हें तो क्षमा कर दूंगा, लेकिन यमराज को क्षमा नहीं करूंगा, पूछूंगा, मुझे मृत्युदंड क्यों दिया गया ? जब मैंने कोई पाप नहीं किया था, अकर्म नहीं किया था...मैं न्यायाधीश यमराज को दंड दूंगा ?’’
अपने तपोबल से मांडव्य ऋषि यमराज की सभा में गए। यमराज से पूछा, ‘‘यमराज ! जब मैंने कोई पाप नहीं किया था, अकर्म नहीं किया था, तो मुझे मृत्युदंड क्यों दिया गया ? मेरे किस पाप का दंड आपने दिया ?’’ ऋषि के पूछने पर यमराज भी हिल गए। यमराज ऋषि से नहीं डरे, ऋषि की तप साधना से डरे। तप से ऋषियों की देह और वचन पवित्र हो जाते हैं। इसीलिए, जो कह देते हैं, हो जाता है...तप ही व्यक्ति को पवित्र करता है..भक्ति ही आदमी को पवित्र करती है। ऋषि का प्रश्न सुन यमराज कांप गए...कहा, ‘‘ऋषिवर, जब आप तीन वर्ष के थे, तो आपने एक तितली को कांटा चुभोया था...उसी पाप के कारण ही आपको यह दंड मिला।’’

जाने-अनजाने में जो, भी पाप किया जाए, अकर्म किया जाए, उसका दंड भी भुगतना ही पड़ता है। परमात्मा को पुण्य तो अर्पण किए जा सकते हैं, पाप नहीं।’’ मांडव्य ऋषि ने कहा, ‘‘शास्त्र के अनुसार यदि अज्ञानवश कोई मनुष्य पाप करता है, तो उसका दंड उसे स्वप्न में दिया जाना चाहिए। लेकिन आपने शास्त्र के विरुद्ध निर्णय किया...अज्ञानावस्था में किए गए कर्म का फल आपने मुझे मृत्युदंड के रूप में दिया। आपको मेरे उस पाप का दंड मुझे स्वप्न में ही देना चाहिए था, यमराज, तुमने मुझे गलत ढंग से शास्त्र के विरुद्ध दंड दिया है, यह तुम्हारी अज्ञानता है...इसी अज्ञान के कारण ही, मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम दासी पुत्र के रूप में जन्म लो, मनुष्य योनि में जाओ।’’
मैत्रेय ऋषि कहते हैं, ‘‘बस विदुर, इसी कारण तुम्हें मनुष्य योनि में, दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ा। तुम कोई साधारण मनुष्य नहीं हो, तुम तो यमराज का अवतार हो कोई किसी की उंगली काटेगा तो उसकी ऊंगली भी एक दिन कटेगी, कोई किसी की हत्या करेगा, तो उसकी भी एक दिन हत्या होगी। बचपन में ऋषि मांडव्य ने तितली को कांटा चुभोया था इसलिए सूली पर चढ़ना पड़ा और यदि तितली मर जाती तो ऋषि को भी मरना पड़ता, अर्थात् जैसा कर्म वैसा फल।’’
देव से भूल होने पर उसे भी मनुष्य बनना ही पड़ता है और यदि मनुष्य भूल करे तो उसे चार पैर वाला पशु बनना पड़ता है और फिर न जाने चौरासी लाख योनियों में से क्या-क्या बनना पड़े।
इसलिए संत कहते हैं-कर्म अच्छा करें, दूसरे की सहायता करें, भूखे की भूख मिटाएं...गिरे हुए को उठाएं...ऐसे कर्म करने वाले चौरासी के चक्कर में नहीं पड़ते...अच्छा कर्म, अच्छा फल, बुरा कर्म बुरा फल...प्रार्थना करें, परमात्मा से कि ऐसी कृपा करें कि भूल से भी, कोई बुरा कर्म न हो, अकर्म न हो।’’

3
कन्हैया झूलें पलना

 

श्रीकृष्ण पालने में लेटे हैं। मां यशोदा उन्हें देख-देखकर आनंदित हो रही हैं। बालक तो और भी हैं, उन्हें भी मां देखा करती, लेकिन जो आकर्षण उसे बाल कृष्ण के चेहरे में नजर आता, वह किसी अन्य बालक में नजर नहीं आता। कृष्ण की बड़ी-बड़ी आंखों और होंठों का तो कोई बालक मुकाबला ही नहीं कर सकता...कभी मैया सोचती..मेरा कान्हा कहीं परमात्मा का अवतार तो नहीं ? क्योंकि उसने बालपन में ही, छोटी-सी आयु में ही, पूतना और शकटासुर जैसे असुरों का यों वध कर डाला है, जैसे वह बड़ा बलवान है, बालक नहीं है।
इसीलिए यशोदा जब भी अपने सो रहे कान्हा की ओर वात्सल्यमयी नजरों से निहारती, तो निहारती ही रहती। उसकी नजरें श्रीकृष्ण के सुंदर चेहरे से हटती नहीं थीं।
इसलिए जब कान्हा सो रहा था पालने में, तो मां उन्हें बार-बार देखती और मन ही मन खुश हो रही थी कि ऐसा बालक तो दुनिया भर में नहीं है...वह भाग्यशाली है कि उसे ‘कान्हा’ जैसा बालक मिला है, जिसे अपनी गोद में बैठाकर सभी अपने-आपको धन्य मानते हैं।
यशोदा सोचती, कब कान्हा उठे और वह उसे स्तनपान कराए..कोई भी मां अपने बेटे को स्तनपान कराना अपना सौभाग्य मानती है। यशोदा भी तो मां थी और मजेदार बात यह थी कि कृष्ण सो तो रहे थे, लेकिन मां की बातें सुन भी रहे थे और भीतर ही भीतर मुस्कराने भी लगते...सोचते..मां, ऐसा सुख कहां मिलेगा तुम्हें...इसलिए इस आनंद को और बढ़ाने के लिए वह यों भाव बनाते जैसे वह गहरी नींद में हैं...मां बार-बार सोचती...बालक कृष्ण ने ही तो पूतना का वध किया था। कहीं पूतना ने तो कुछ ‘कर’ नहीं दिया कि मेरा लल्ला उठ ही नहीं रहा...दूध पीने का समय भी हो गया है।
 

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