Gyan Sootra - Hindi book by - Swami Avdheshanand Giri - ज्ञान सूत्र - स्वामी अवधेशानन्द गिरि
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ज्ञान सूत्र

स्वामी अवधेशानन्द गिरि

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4392
आईएसबीएन :9788131004388

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धर्म, साधना एवं अध्यात्म के रहस्यों की सूत्र रूप में प्रस्तुति

Gyan Sootra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इस पुस्तक में धर्म, संस्कृति और अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों की सूत्र रूप में सरल प्रस्तुति की गई है।

 

यह पुस्तक समर्पित है उन मनीषियों के श्री चरणों में जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया और प्रयास किया अशब्द को शब्द रूप देने का ताकि सभी सत्य भी अनुभूति से सदा सुखी हों कोई दुखी न रहे !

 

अपनी बात

 

वैदिक परंपरा में ‘श्रवण’ का अत्यधिक महत्व है। वेदों का जो स्वरूप आज हमें उपलब्ध है, उसमें उन वेदपाठी ब्राह्मण परिवारों की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिन्होंने अपने पूर्वजों से अर्जित ज्ञान को जस का तस अपनी अगली पीढ़ी को दिया। यदि ज्ञान की यह श्रुति परंपरा न होती तो विदेशी आक्रमणकारियों ने वेद-ज्ञान को कब तक खाक में मिला दिया होता। यह श्रुति परंपरा पोथी ज्ञान पर विश्वास नहीं करती, क्योंकि लिखित में होने वाली त्रुटियों की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता।

वेदान्त ग्रन्थों में श्रवण को साधना का प्रारम्भिक आधार मानने के साथ ही उत्कर्ष की स्थिति के रूप में स्वीकार किया गया है। गुरु चरणों में जाकर जिज्ञासु अपनी शंकाओं का समाधान श्रवण साधन (साधना) से ही प्राप्त करता है, और अपनी योग्यता के अनुसार अनुभूति के विभिन्न स्तरों को पार करता हुआ परम सत्य की अनुभूति करता है।
कुछ आचार्यों का मानना है कि योग्य शिष्य को ‘तत्वमसि’ आदि महावाक्यों का श्रवण करने मात्र से आत्मतत्व (अहं ब्रह्माऽस्मि-मैं ब्रह्म हूं) की अनुभूति हो जाती है। इसके अनुसार, मन और निदिध्यासन की आवश्यकता तो उन्हें होती है जिनका अंत:करण शुद्ध नहीं होता। जबकि अन्य इसे स्वीकार हुए कहते है कि ऐसे योग्य शिष्य के लिए नहीं, एक सामान्य जिज्ञासु साधक के लिए मन और निदिध्यासन के रूप में साधनों का व्याख्यान किया है।

ज्ञान को गुह्य रखने के लिए आचार्यों ने उसे सूत्र रूप में प्रस्तुत किया, ऐसा भी कुछ विचारकों का आक्षेप है। लेकिन ऐसा सत्य नहीं लगता। वास्तविकता तो यह है कि शब्दों का प्रयोग जितनी अधिक मात्रा में होता है, अनुभूति का मूल स्वरूप उतना ही बिखर जाता है, वह संकेतार्थ से दूर हो जाता है। शब्द सीधे संकेतार्थ का अनुभव करा दें, इसीलिए सूत्ररूप में आचार्यों ने सत्य को व्यक्त करने का प्रयास किया।

लेकिन जैसे-जैसे परंपरागत जीवन में भौतिकता का पुट बढ़ने के परिणामस्वरूप एकाग्रता में कमी आई, लिखित का प्रचार-प्रसार हुआ वैसे-वैसे सूत्रों में छिपे गूढ़ और गुप्त को स्पष्ट करने के लिए आचार्यों ने भाष्य लिखे, उन पर अलग-अलग संप्रदाय के विद्वानों ने टीकाएं लिखीं। इन सभी का उद्देश्य सत्य का ग्रहण करना था। यह कार्य स्वयं में एक कठोर साधना और विलक्षण प्रतिभा का परिचायक था। लेकिन ऐसे में अलग-अलग पक्षों के समर्थन में से निष्पक्ष को जान-समझ पाना और दुरुह हो गया। इससे जिज्ञासु साधकों में एक नए भ्रम की स्थिति बनी। उनके लिए यह समझ पाना मुश्किल हो गया कि सत्यानुभूति के लिए कौन-सा मार्ग सही है। इसीलिए कुछ विचारकों ने विभिन्न भाष्यों-टीकाओं में छिपी भिन्नता से समन्वय के सूत्रों को ढूंढ़ने का प्रयास किया। इनका मानना था कि भाषा की भिन्नता के कारण ही एक सत्य की अभिव्यक्ति विभिन्न रूपों में होती है। एक तरह से भाषा की सार्थकता को इन्होंने मात्र उस सीमा तक स्वीकारा जितना मूल्य उस पत्थर का होता है जिस पर लक्ष्य की ओर जाने का तीर-निशान बना होता है, साथ ही यह संकोच भी होता है कि लक्ष्य कितनी दूर है। इस एकत्व की अनुभूति के लिए ऐसे मनीषियों ने जीवन की साधना पर ज्यादा जोर दिया और साधक द्वारा स्वाध्याय तथा अध्ययन के विस्तृत आकाश में प्रवेश का पक्ष लिया।

आचार्य महामण्डलेश्वर श्री स्वामी अवधेशानंद जी महाराज भिन्नता में एकत्व का प्रतिपादन करने वाले एक ऐसे ही युवा संन्यासी हैं। इन्होंने श्रुति-स्मृति, पुराणेतिहास आदि परम्परागत ज्ञान का अर्जन कर उस पर चिंतन-मनन तो किया ही है, आधुनिक विज्ञान के कारण हुई प्रगति और विश्व के व्यक्ति समाज को भी अपनी खुली आँखों से देखा है। इसकी झलक उनके व्याख्यानों में, बातचीत में स्पष्ट रूप से मिलती है। उनकी भाषा में जहां सागर की गहराई सरीखी गम्भीरता है, वहीं स्वच्छ गंगा का कलकल नाद भी है।

महाराजश्री के मनोज पब्लिकेशन से पूर्व प्रकाशित यह पुस्तक पाठकों की अध्यात्म सराहनीय है। उसी श्रृंखला में यह पुस्तक पाठकों की अध्यात्म जिज्ञासुओं को शांत करती हुई उनके मार्ग को प्रशस्त करेगी, हमारा विश्वास है। सब सुखी हों, इसी कामना के साथ-  

 

-गंगा प्रसाद शर्मा

 

सत्य का व्याख्यान करने के बाद श्रुति भगवती कहती है-‘नेति-नेति’-अर्थात् जैसा शब्दों से कहा गया उसे सिर्फ वैसा ही समझने की भूल न कर लेना। वह ऐसा भी है और इससे परे भी है। जो साधक इस सूत्र को धारण कर लेता है।
उपनिषद् साहित्य में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें शिष्य के समक्ष गुरु ने अपनी ज्ञान-सीमा को स्वीकारते हुए कहा, ‘‘मैं इतना ही जानता हूं। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए तुम अमुक के पास जाओ।’’ यह सद्गुरु की महानता है। वह अपने कर्तव्य को भलीभांति जानता है।

स्वामी रामतीर्थ ने इसीलिए तो कहा था- ‘राम राम बनाता है, शिष्य नहीं।’ शिष्य जिस दिन अपने भीतर के गुरु को जान जाता है, उसी दिन गुरु कृतकृत्य हो जाता है। यही तो सच्ची मुक्ति और स्वतंत्रता की अनुभूति है।

 

1

हर प्राणी में अद्भुत शक्ति है

 

यदि परमात्मा अपनी सृष्टि की प्रत्येक वस्तु को एक समान बनाता तो उसमें सौंदर्य न होता। विभिन्नता के रूप में परमात्मा ने अपनी समूची सृष्टि पर विशेष कृपा की है। किसी व्यक्ति ने मजाक में कहा है- ‘‘दुनिया को बनाते समय भगवान का हाल कुछ ऐसा हुआ होगा, जैसे रोटी बनाते हुए महिलाओं का होता है। जब भगवान ने पहली रोटी बनाई तो थोड़ी कच्ची रह गई। कच्ची रोटी बनने का मतलब यह है कि यूरोप के रहने वाले लोग हैं। भगवान इसमें थोड़ा अच्छा रंग नहीं दे पाए। जब वे दोबारा रोटी बनाने लगे तो वह जल गई और अफ्रीका के लोग बन गए। इस पर भगवान ने सोचा कि अब रोटी बिलकुल सही बननी चाहिए। ऐसे में वह सही रोटी बनी। इस बार हिन्दुस्तान के लोग बने-न ज्यादा काले, न ज्यादा सफेद, न बहुत छोटे और न बहुत लंबे।’’

हम लोग व्यंग्य-विनोद करते हुए इस तरह की बातें कह देते हैं लेकिन परमात्मा ने कहीं भेद नहीं किया। जिसे भी जहां आप देखें, परमात्मा ने सब पर अपनी कृपा की है। परमात्मा ने हर व्यक्ति को एक अलग की तरह आवाज और शरीर में एक खास तरह की गंध दी है। इसके साथ ही प्रत्येक मनुष्य के हाथों की उंगलियों के निशान भी अलग-अलग हैं। यहां इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि ईश्वर ने इंसान को अत्यन्त विविधता से बनाया है। उसने कितना अनुपम रूप दिया, कितना अनोखा ढंग लिया दिया और बिलकुल अलग बनाया।

हर आदमी को सोचना चाहिए कि वह दुनिया में साधारण नहीं है। आपको परमात्मा ने अद्भुत शक्तियां दी हैं। एक दायरे में घूमते-घूमते अपनी जिन्दगी खत्म कर देना समझदारी नहीं है। अपनी पहचान कायम करनी है। इसके लिए जरूरी है कि अपने को जानने का प्रयास करो। शरीर आपकी पहचान जरूर है। आपका एक नाम है। परन्तु सबसे अलग-अलग रिश्ते से नाम दिए गए हैं। कोई पिता कह रहा है, कोई भाई चाह रहा है, कोई चाचा तो कोई मामा कह रहा है लेकिन यह भी आपकी पहचान नहीं है। हम सब चेतन स्वरूप है, एक आत्मा के रूप में हैं और अपनी चेतना से हमें इस संसार के मायाजाल से ऊपर उठने का प्रयास करना है।

 

2

 

आनंद का स्रोत्र है आत्मचिंतन

 

संसार की संपूर्ण चिंताओं के मूल में वासना है। उन्हें रोकने का एक मात्र उपाय उनके यथार्थ स्वरूप का चिंतन है। वासनाजन्य चिंताएं हमारी अशांति का कारण हैं। इसकी एकमात्र औषधि है-आत्मचिंतन। आत्मचिंतन सभी शक्तियों का मूल है, आनंद का स्रोत्र है तथा संयम का एकमात्र साधन है। मानव संयम के बिना मानव कहलाने का अधिकार नहीं है। इसलिए मनुष्य को प्रत्येक परिस्थिति में संयम बनाए रखकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

मानव-शरीर बड़ी साधना और तपस्या के पश्चात मिलता है। यह ईश्वरीय प्रसाद भी है। भवसागर को पार करने के लिए यह शरीर एक दृढ़ नौका के समान है। जो मनुष्य इस साधन का उपयोग करके भवसागर से पार नहीं उतरता, वह आत्मघाती है। आज धन-संपत्ति को सबसे अधिक महत्व दिया जा रहा है। सारी राजनीतिक व्यवस्था के मूल में अर्थव्यवस्था ही है। मानव के लिए अर्थोपासना ही आज सर्वस्व है। अर्थप्राप्ति और विनाश में ही सुख-दु:ख की कल्पना निहित है। परन्तु अर्थ की प्राप्ति से अर्थाभाव जन्य कष्टों का निवारण नहीं हो सकता क्योंकि अर्थप्राप्ति आवश्यकताओं को जन्म देती है।

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