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पौराणिक >> अभिज्ञान अभिज्ञाननरेन्द्र कोहली
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कृष्ण-सुदामा की मनोहारी कथा...
अपने श्रम के अनुपात से अधिक ग्रहण करने के प्रलोभन में कितना पतन होगा सुदामा का...सुदामा का शरीर कांप गया...किस दुश्चक्र में फंस गये हैं सुदामा...इससे तो कहीं सुखद है कि वे अपने श्रम के अनुपात में ही पारिश्रमिक ग्रहण करें। जो पारिश्रमिक नहीं है, बिना परिश्रम के मिल रहा है, वह प्रलोभन है, पतन का मार्ग है, दुख का आगार है...नहीं! सुदामा को यह सब नहीं चाहिए...संचय के आधार में टिका पाप उन्हें स्पष्ट दिख रहा था।
व्यापारी अब भी अपनी बातों में लगे थे। पर सदामा को लगा. अब और अधिक सुनने की उन्हें कोई आवश्यकता नहीं रह गयी है। उन्होंने पर्याप्त सुन और समझ लिया है। वैसे भी दिन-भर के थके थे. उन्हें नींद भी बहत आ रही थी..
प्रातः सुदामा उन व्यापारियों से पहले उठकर तैयार हो चल पड़े। रात जाने व्यापारी लोग कब सोये थे। देर से ही सोये होंगे, इसलिए उठने में विलम्ब भी आवश्यक था। वैसे भी सुदामा नहीं चाहते थे कि उनसे उनका आमना-सामना हो। यदि कोई बातचीत हो ही गयी और उन लोगों ने सुदामा का परिचय पूछ ही लिया, तो सुदामा झूठ नहीं बोल पायेंगे। उनका परिचय पाकर व्यापारियों का व्यवहार कैसा होगा, इसका कुछ-कुछ अनुमान वे कर सकते थे। ऐसी किसी स्थिति से दो-चार होने की उनकी कोई इच्छा नहीं थी।
मार्ग पर चलते हुए सुदामा देख रहे थे : सब कुछ वैसा ही था, जैसा वे द्वारका की ओर जाते हुए देख गये थे। वही पथ थे, वही ग्राम, वही वृक्ष, वही खेत । वैसे ही पशु चर रहे थे, वैसे ही कृषक, स्त्री-पुरुष अपने खेतों में काम कर रहे थे; और छोटे-बड़े व्यापारी अपने सामान के साथ यात्राएं कर रहे थे।...पर सुदामा के लिए संसार बदल गया था। उनके लिए चारों और सब कुछ सुनहला हो गया था। यह सुनहला-स्वर्णिम संसार उन्हें कृष्ण ने दिया था। पहले वे स्वयं बताना चाहते थे कि वे सुदामा हैं, तो कोई उन्हें पहचानता नहीं था; और अब लोग उन्हें खोजते-फिरते हैं। वे जिसे बता देंगे कि वे सुदामा हैं. उसी का व्यवहार कुछ और हो जायेगा।
सुदामा की एक क्षण की चिन्ता दूसरे ही क्षण चुहल में बदल जाती। एक क्षण उन्हें लगता कि अपने प्रति लोगों का कृत्रिम व्यवहार, उनके लिए असहनीय होगा; और दूसरे ही क्षण लोगों का यह परिवर्तित व्यवहार देखने का कौतुक उनके मन को चंचल कर देता। अब जब वे ग्राम-प्रमुख से मिलेंगे तो क्या ग्राम-प्रमुख उनसे उसी प्रकार कहेगा कि ग्राम में गुरुकुल की आवश्यकता नहीं है; सुदामा का ज्ञान ग्राम के लोगों के लिए आवश्यक नहीं है; और यदि गुरुकुल स्थापित होगा तो उसके लिए कुलपति, आचार्य तथा उपाध्याय राजधानी से आयेंगे?...क्या श्रेष्ठि धनदत्त पहले के ही समान चाहेंगे कि ग्राम के हाट में फेरी गयी डोंडी को सुनकर सुदामा उनके पुत्रों और पौत्रों को आशीर्वाद देने के लिए याचक बनकर उनके द्वार पर उपस्थित हों और उनसे दान-दक्षिणा पाकर कृतकृत्य हो जायें।...नहीं, जब अन्य लोगों का व्यवहार सुदामा के प्रति बदला है तो ग्राम-प्रमुख और श्रेष्ठि धनदत्त भी बदलेंगे...बदलेंगे! पर क्या परिवर्तन होगा?
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- अभिज्ञान










