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पौराणिक >> अभिज्ञान अभिज्ञाननरेन्द्र कोहली
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कृष्ण-सुदामा की मनोहारी कथा...
सुदामा अपनी चिन्ताएं भूल गये। उन्हें एक उन्माद-सा हो गया था। जाने कहां से ऊर्जा का एक स्रोत-सा उठा और उन्हें एक चंचल सक्रियता से भर गया। वे स्वयं नहीं जानते थे कि वे क्या करने जा रहे हैं।...पर उनके पग जल्दी-जल्दी उठने लगे थे और उनकी आँखें अनवरत उस धर्मशाला को खोज रही थीं...कुछ ही क्षणों में वे उस धर्मशाला के सामने खड़े थे।...हां! यह वही धर्मशाला थी...और आज तो प्रबन्धक भी चारपाई डाले बाहर ही बैठा था।
सुदामा का संकोची स्वभाव सहसा तिरोहित हो गया। वे निःसंकोच जाकर प्रबन्धक के सामने खड़े हो गये।
प्रबन्धक ने उनकी ओर देखा; किन्तु उसके चेहरे पर कोई पहचान नहीं उभरी।
"क्या बात है भाई! धर्मशाला में टिकना है क्या?" उसने पूछा।
सुदामा को आश्चर्य हुआ. : यह वही व्यक्ति था, जिसने उनकी प्रार्थना पर भी कोई ध्यान न देकर उन्हें वहां से चले जाने पर बाध्य किया था; और आज स्वयं ही उनसे निमन्त्रण भरे स्वर में पूछ रहा है।
"दिन के समय धर्मशाला में टिकने का क्या अर्थ?" सुदामा बोले, "रात होगी, यात्रा स्थगित होगी तो कोई धर्मशाला में टिकेगा।"
"अरे भैया! कुछ लोग दिन में भी टिक जाते हैं।" वह बोला, "अपना सामान रख जाते हैं और स्वयं आसपास घूम-फिर आते हैं।"
सुदामा चुपचाप खड़े उसे देखते रहे।
"द्वार खोलूं क्या?" वह तालियों का गुच्छा लिये उठा।
सुदामा हंस पड़े, "तुम धर्मशाला में ठहराने के लिए इतने उत्सुक क्यों हो भाई? पहले तो तुम ऐसे न थे।"
लगा, उसे अपनी कोई पीड़ा याद आ गयी और उसका पका हुआ फोड़ा जैसे रिसने लगा, "पहले ऐसा नहीं था, तभी तो भुगत रहा हूं। पहले मैं बाहर चारपाई डाल आने-जाने वालों को निहारता कब था। आने-जाने वालों से धर्मशाला में ठहर जाने के लिए अनुनय-विनय कहां करता था। भीतर कमरे में रहता था। कोई आता तो उसे दुत्कार देता। किसी को ठहरने ही नहीं देता था कि उसकी देखभाल करनी होगी।"
"तो क्या हो गया?" सुदामा ने उसे टोका।
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- अभिज्ञान










