संत मीराबाई और उनकी पदावली - सं. बलदेव वंशी Sant Meerabai Aur Unki Padavali - Hindi book by - S. Baldev Vanshi
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संत मीराबाई और उनकी पदावली

सं. बलदेव वंशी

प्रकाशक : परमेश्वरी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :148
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4448
आईएसबीएन :81-88121-75-4

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संत मीराबाई का जीवन और उनकी पदावली....

Sant Meera Bai Aur Unki Padavali

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मीराँबाई की गति अपने मूल की ओर है। बीज-भाव की ओर है। भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों पर मीराँ ने अपने अस्तिस्व को, मूल को अर्जित किया है। आत्मिक, परम आत्मिक उत्स (कृष्ण) से जुड़कर जीवन को उत्सव बनाने में वह धन्य हुई। अस्तित्व की गति, लय, छंद को उसने निर्बंध के मंच पर गाया है। जीया है।


मीराँ उफनती आवेगी बरसाती नदी की भाँति वर्जनाओं की चट्टानें तोड़ती, राह बनाती अपने गंतव्य की ओर बे रोक बढ़ती चली गयी। वर्जनाओं के टूटने के झंकार से मीराँ की कविता अपना श्रृंगार करती है। मीराँ हर स्तर पर लगातार वर्जनाओं का क्रम-क्रम तोड़ती चली गई। राजदरबार की, रनिवास की, सामंती मूल्यों की, पुरुष-प्रधान समाज द्वारा थोपे गए नियमों की कितनी ही वर्जनाओं की श्रृंखलाएँ मीराँ ने तोड़ फेंकी और मुक्त हो गई। इतना ही नहीं, तत्कालीन धर्म-संप्रदाय की वर्जनाओं को भी अस्वीकार कर दिया। तभी मीराँ,  मीराँ बनी।

संत मीराबाई की पदावली


मनुष्य का हृदय-स्थल, उसका अंतःकरण ही आत्मा का निवास-स्थान है। यही मनुष्यता की और आत्मा की पहचान का आधार भी है। हृदय-स्थल में ही भावों का सारा-व्यापार भी निहित है। आत्मा और परमात्मा की प्रतीति यहीं होती है तथा दर्शन और भावन भी यहीं होता है। सभी संतों, भक्तों, आस्थावान महापुरुषों, ऋषि-मुनियों ने इसी का अवलंब लिया और इसी को गाया है; इसी को ध्याया है। आत्मा के इसी आधार-स्तर से देशकाल का अतिक्रम करने की सामार्थ्य अर्जित होती है। मनुष्य बड़े व्यापक आयामों में विचरण करता है भगवत्ता को प्राप्त होता है।

संत कवयित्री मीराँबाई ने इसी हृदय-स्थल, हृदय-मन्दिर में अपने इष्ट गोपालकृष्ण की मूरत स्थापित कर बचपन से ही उनकी पूजा-अराधना-अर्चना आरंभ कर दी थी। यहीं से उसके भाव-विह्वल, अजस्त्र-प्रवाही भक्ति के गीत फूटे-बहे, जिसमें युग-युग की मानवता अपनी आत्मिक प्यास बुझा रही है। कृष्ण के प्रति प्रेमा-भक्ति उसके नारी-सुलभ स्वभाव एवं वृत्तियों के अति अनुकूल भी थी और दैव-योग से मीराँ इसी दिशा में प्रवृत्त होती गई। तीव्रता से बढ़ती गई। भौतिक जीवन, घटनाक्रमों ने इस वेग को बढ़ाया, दिशा को साधा। वह पारिवारिक संबन्धों से मुक्त हो उन्मुक्त हुई महाभाव-हिलोरों पर उनमत्त हो झूलती रही।

मीराबाँई ने स्वयं मुक्त होकर अपने समय और युग की नारी को भी और देश-समाज के मानव एवं मानवता को भी मुक्त किया। मध्ययुग में ही आधुनिक मानव की मुक्ति का बिगुल बजाने वाली स्त्री संत, आधुनिकता के नारी-विमर्श का बीज-वपन करने वाली मीराँ अपने जीवन में तथा मृत्यु में भी मुक्त रही। उसने भौतिक भय मत्यु दमन के विरुद्ध प्रत्येक मानव को स्त्री हो या पुरुष-कृष्ण थमा दिया है, मोक्ष-मंत्र दे दिया है। वास्तव में मीराँ, वर्तामान भौतिक अंधकार के विरुद्ध भारतीय महाभाव-प्रेम एवं अध्यात्म का दीप, स्तंभ है। भौतिक वैश्वीकरण एवं बाजारीकरण के विपरीत मानव की मुक्ति, समानता, गरिमा के आग्रहों को भावनात्मक सार्वभौमिकता देने वाली किंवा आध्यात्मिक वैश्वीकरण एवं विश्वमानवता का अलख जगाने वाली महान् मानवी है।

प्रकृति शक्ति-स्वरूप है। इसमें ईश्वर के सात्विक गुण-तत्त्व समाहित हैं। प्रकृति जगत की जननी है। वह लोक में व्याप्त है, लोकचेतना की वाहिका है। ‘लोक’ समूचा चैतन्य है, इसलिए मीराँ बाहरी आडंबरों के, कृतिमता के भौतिक-मृत्तिक, ऊँचे प्रासादों को त्यागकर बाहर लोक में आ जाती है। पुनः आत्म-तत्त्व, ईश्वरत्व को उद्बुद्ध और निर्भर होकर अलख जगाती है-


जागो मोरे, जागों बंसी वाले ललना
जागो मेरे प्यार !

क्या किसी बाहरी भौतिक, सोए प्रियतम को या बंसी वाले ललना (बालक) को मीराँ सोए से जगाने का प्रयत्न कर रही है ? या अपने भीतर के परम-आत्म को, पूर्ण-पुरुष को, अपने अभिन्न स्व को (पुरुष-प्रकृति) ही माया-निद्रा से जागृति के लिए आह्वान कर रही है। और अपने बहाने से सर्वआत्म को आत्म-सम्बोधन दे रही है, मीराँ ! उसी का अवतारी रूप है बंसी वाला ललना। वह ललना। वह मीराँ का प्यारा है, जिसे मीराँ अपनी बेसुध सुधी में टेर रही है। वैसे कलयुग का अर्थ है सोए होना। जग जाना द्वापर है। उठकर खड़े हो जाना त्रेता का अर्थ है और चल देना सतयुग (कलयुग) है। अतः सदैव चलते रहना चाहिए-


कलि शयनो भवति संजिहानस्तु द्वापरः।
उतिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं संपद्यते चरना।।
चरैवेति। चरैवेति।

ऐतरेय ब्राह्मण


सृष्टि के साथ मनुष्य का सरोकार-संबंध बड़े सटीक अर्थों में समझाया गया है। साथ ही, भारतीय दर्शन में चार युगों की अवधारणा को कालांतराल के साथ बोध-स्तरों पर रूपायित किया गया है। जिसमें परिवेश-समाज का उद्धार भी सम्भव है। आत्मिक जागरण से जगत का उत्थान भी लक्ष्य है।

हमने ‘डाकोर की प्रति’ के पदों के साथ अन्य स्रोतों को भी आधार माना है। इन पदों में मीराँ के विचार और भाव उसे भक्त भी और अन्तिम रूप में संत भी सिद्ध करते हैं। हमने उसके प्रौढ़ भाव-विचार के संत-रूप को वरीयता दी है। भक्त, जहाँ गुरु से और संप्रदाय से प्रतिबद्ध रहता है, वहाँ संत प्रायः इन दोनों से मुक्त रहता है। कहना होगा कि मीराँ अन्य संतों की इस उन्मुक्त परंपरा की कड़ी है, न कि भक्तों की तत्कालीन परंपरा की। आज भी समूचे विश्व को भारतीय संत इसी संप्रदायमुक्त विचार, भ्रातृभाव, समता, अस्मिता, सार्वभौम एकात्मता, हिंसा-हत्या विरोध, जगत को एक समग्र इकाई मानने के तर्काधार पर स्वीकार्य हो सकते हैं और मनुष्य के भावी विनाश से उसे बचा सकते हैं, यहाँ समूचा मानवीय पर्यावरण समग्र एक संवेद्य ब्रह्म के स्वरूप में लक्षित होता है, और जीवंत स्पंदन का अक्षय विश्वास है। मीराँ-वाणी का यह मुख्य दाय है। यहीं मीराँ द्वारा प्रयुक्त पदों का वैशिष्ट्य एवं-रूप अधिक पुष्ट भी होता है, जहाँ वह ‘निरंजन’ ‘सुरति’ ‘निरति’ ‘सहज’ ‘साहब’ आदि का प्रयोग करती है। इन पदों का प्रयोग संतों द्वारा प्रचुरता से किया गया है। इन पदों के पीछे दार्शनिक अवधारणओं का समूचा-संसार भी विद्यमान है, जो संतवाणी को सुनिश्चित परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।

यहाँ मीराँ के व्यक्तिगत संबंधों, भौतिक अस्तित्व संबंधी शंकाओं आदि को उठाना हमारा आशय नहीं। इसी प्रकार मीराँ द्वारा प्रयुक्त ‘जोगी’ शब्द के विभिन्न विद्वानों द्वारा लगाए गए अनुमानों के विवादों में पड़ना भी हमारा अभिप्रेत नहीं है।

भाषा को लेकर भी विभिन्न विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। मारवाड़ी भाषा में स्थान की अन्य भाषा-छवियाँ भी विद्यामान हैं। फिर मीराँ की भाषा में गुजरती, ब्रज और पंजाबी भाषा के प्रयोग भी मिलते भी हैं। मीराँ अन्य संतों नामदेव कबीर, रैदास आदि की भाँति मिली-जुली भाषा में अपने भावों को व्यक्त करती है उसके पदों की संख्या भी अभी तक सुनिश्चित नहीं की जा सकी। खोज एवं शोध अभी तक जारी है, इधर ‘लूर’1 का मीराँ विशेषांक प्रकाशित हुआ है। इसमें मीराँ द्वारा गाए गए 41 पद दिए गए हैं। इन्हें ‘हरजस’ नाम दिया गया है,’ जिन्हें लोक द्वारा विभिन्न अवसरों पर गाया जाता है। कुछ शब्दों के अर्थ भी स्पष्ट किए गए हैं। अतः कहना होगा कि इस दिशा में शोधकार्य अभी जारी है। कोई सर्वमान्य, स्वीकार्य निर्णय अभी शेष है।

हमने जिन ग्रंथों से सहयोग लिया है, उनके प्रति आभार ! विशेष रूप से सर्वश्री परशुराम चतुर्वेदी, स्व० पुरोहित हरिनारायण जी, डॉ० प्रभात, डॉ० नंदकिशोर आचार्य, डॉ० शुंभसिंह मनोहर इत्यादि का। सुझावों की प्रतीक्षा में


डॉ० बलदेव वंशी

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1 सं० डॉ० जयपाल सिंह राठौर, मीराँ विशेषांकः वर्ष 1, अंक 2, जुलाई-दिसम्बर 2003, संपादकीय पताः गोपालबाड़ी, चौपासनी, जोधपुर (राजस्थान) 342009



प्रेम-दीवानी मीराँबाई का जीवन




भारतीय संत-परंपरा में मीराँ का नाम बड़े आदर-भाव से लिया जाता है। महिला संत होने के कारण जहाँ संतों-भक्तों में वह अत्यधिक आदर और मान प्राप्त कर पाई वहीं उसके समकालीन समाज में उसके व्यक्तित्व और चरित्र को लेकर उतना प्रभाव नहीं देखा जा सकता है। इसका एक कारण तो उसका राजघराने से संबंधित होना और राजघराने द्वारा उसके विरक्त-रूप का विरोध था तो दूसरा कारण तत्कालीन सामंती समाज-व्यवस्था एवं मूल्यों के कारण एक नारी का उन्मुक्त रूप से संतों की संगति में उठना-बैठना-घूमना पसंद न किया जाना था।

मीराँ का जन्म संवत् 1555 (सन् 1498 ई०) में हुआ माना जाता है। कुड़की नामक ग्राम में जन्मी मीराँ की माता का देहान्त तब हो गया, जब वह केवल दो वर्ष की बालिका थी। मीराँ के दादा राव दूदा मेड़ता के नरेश थे। उनके छोटे बेटे रतन सिंह की पुत्री थी मीराँ। रतनसिंह बाहर छोटे शहरों और ग्रामों के सरदार थे। मीराँ की माता के देहांत के उपरान्त मीराँ के दादा राव दूदा उसे मेड़ता में अपने पास ले आए और उसका पालन-पोषण इन्हीं की देखरेख में होने लगा। उसके दादा राव दूदा बड़े धार्मिक स्वभाव के व्यक्ति थे। वह भगवान् चर्तुर्भुज के उपासक थे। उन्होंने चतुर्यभुज भगवान् का भव्य मंदिर भी बनवाया था। अतः स्वाभाविक ही परिवार का झुकाव धर्म-भावनाओं की ओर था। फिर उसके घर साधु-संतों  का आना भी लगा रहता। कहते हैं, एक बार एक साधु उनके घर आया। उनके पास गोपाल कृष्ण की एक अति सुंदर, आकर्षक मूर्ति देख मीराँ उसे लेने के लिए मचल उठी साधु सहज ही सुन्दर मूर्ति को देना नहीं चाहते थे। इधर मीराँ की हठ कि वह खाना-पीना ही छोड़ बैठी। साधु वहाँ से चला तो गया किंतु मीराँ की बाल हठ के देखकर पुनः लौटकर आना पड़ा। उसने वह मूर्ति मीराँ को दे दी। यही कृष्ण-प्रेमका बीज बाद में पल्लवित-पुष्पित हुआ और मीराँ, मीराँ कहलाई। बालपन की ही एक अन्य घटना के अनुसार एक बारात देख मीराँ भी पूछ बैठी, मेरा वर कौन है ? माँ ने कृष्ण मूर्ति की ओर संकेत कर दिया। तब से मीरा कृष्ण-प्रेम की दीवानी हो गई। मीराँ को सपने में भी कृष्ण के दर्शन होने लगे, जिसका उल्लेख मीराँ के पदों में भी मिलता है-


माइ री म्हाँने सुपने में परण गयो गोपाल।
राती पीरी चूनर पहरी, महँदी पान रसाल।
काँइ कराँ और संग भँवर, म्हाँने जग जंजाल।
मीराँ प्रभु गिरधरन लालसूँ, करी सगाई हाल

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