भूतनाथ - भाग 6 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Part 6 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - भाग 6

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : शारदा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1995
पृष्ठ :293
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4854
आईएसबीएन :81-85023-56-5

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भूतनाथ - भाग 6

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Bhootnath - Part 6 - A hindi book by Devkinandan Khatri


भूतनाथ-इक्कीस भाग, सात खण्डों में, ‘चन्द्रकान्ता’ वे ‘चन्द्रकान्ता-सन्तति’ की ही परम्परा और श्रृंखला का बाबू देवकीनन्दन खत्री विरचित एक अत्यन्त लोकप्रिय और बहुचर्चित प्रसिद्ध उपन्यास है। ‘चन्द्रकान्ता-सन्तति’ में ही बाबू देवकीनन्दन खत्री के अद्भुत पात्र भूतनाथ (गदाधर सिंह) ने अपनी जीवनी (जीवन-कथा) प्रस्तुत करने का संकल्प किया था। यह संकल्प वस्तुतः लेखक का ही एक संकेत था कि इसके बाद ‘भूतनाथ’ नामक बृहत् उपन्यास की रचना होगी। देवकीनन्दन खत्री की अद्भुत कल्पना-शक्ति को शत-शत नमन है। लाखों करोड़ों पाठकों का यह उपन्यास कंठहार बना हुआ है। जब यह कहा जाता है कि ‘चन्द्रकान्ता’ और ‘चन्द्रकान्ता-सन्तति’ उपन्यासों को पढ़ने के लिए लाखों लोगों ने हिन्दी भाषा सीखी तो इस कथन में ‘भूतनाथ’ भी स्वतः सम्मिलित हो जाता है क्योंकि ‘भूतनाथ’ उसी तिलिस्मी और ऐयारी उपन्यास परम्परा ही नहीं, उसी श्रृंखला का प्रतिनिधि उपन्यास है। कल्पना की अद्भुत उड़ान और कथारस की मार्मिकता इसे हिन्दी साहित्य की विशिष्ट रचना सिद्ध करती है। मनोरंजन का मुख्य उद्देश्य होते हुए भी इसमें बुराई और असत् पर अच्छाई और सत् की विजय का शाश्वत विधान ऐसा है जो इसे एपिक नॉवल (Epic Novel) यानी महाकाव्यात्मक उपन्यासों की कोटि में लाता है। ‘भूतनाथ’ का यह शुद्ध पाठ-सम्पादन और भव्य नवप्रकाशन, आशा है, पाठकों को विशेष रुचिकर प्रतीत होगा।

खण्ड-छः

सोलहवाँ भाग

 

चुनारगढ़ से लगभग चार कोस हट कर जंगल के किनारे पर बने हुए एक बड़े और पक्के कूएँ पर हम पाठकों को ले चलते हैं.
सुबह का समय है, सूरज अभी नहीं निकला है फिर भी उसकी आवाई जान रँग-बिरँगी चिड़ियें जाग उठी हैं और टहनियों पर बैठ कर अपनी मनोहर बोलियों से जंगल को गुँजा रही हैं.
इस कूएँ पर जिसका जिक्र हमने ऊपर किया है, इस समय पाँच-छः आदमियों की एक छोटी मंडली दिखाई पड़ रही है जो अभी यहाँ पहुँची है और अपना बोझ उतार हलकी हो रही है. इनमें से एक आदमी सरदारी के तौर पर एक हलके बिछावन पर जा बैठा है जो इसके लिए इसके साथियों ने आते ही बिछा दिया है और बाकी के इधर-उधर बैठे हुए सुस्ताते तथा साथ-साथ बातें भी करते जाते हैं. पाठकों को तरद्दुद में न डाल हम बताये देते हैं कि ये लोग वे ही हैं जिनका हाल हम पन्द्रहवें भाग के उन्नीसवें बयान में लिख आए हैं अथवा जो उस गुफा में से गौहर और मुन्दर को ले भागे थे. हमारे पाठक यह भी जानते हैं कि जब तक उस आदमी के असली नाम का पता न लग जाए जो इन लोगों की सरदारी कर रहा है तब तक के लिए हमने उसका नाम घनश्याम रख दिया है. अस्तु इस समय हम तब तक उसे इस बनावटी नाम से ही पुकारते जाँयगे जब तक कि उसके असली नाम का पता नहीं लग जाता.

घनश्याम के सामने कपड़े में बँधी दो बड़ी गठरियाँ पड़ी हुई हैं जिनमें बेहोश गौहर और मुन्दर बँधी हुई हैं. इस समय घनश्याम की आँखें उन्हीं गठरियों पर पड़ रही हैं और वह उनकी तरफ गौर से देखता हुआ कुछ सोच रहा है.
कुछ देर बाद घनश्याम ने एक आदमी की तरफ देख कर कहा, ‘‘रामू, अगर तुम सुस्ता चुके हो तो जरा इधर आओ और इन गठरियों को खोल कर दोनों बेहोशों को बाहर निकालो ताकि उनके बदन में भी इस वक्त की ताजी हवा लग जाय.’’
यह सुनते ही वह आदमी अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और पास पहुँचकर उन गठरियों को खोलने की फिक्र में लगा. बात की बात में दोनों बेहोश औरतें गठरी से खोल कर जमीन पर लेटा दी गईं और घनश्याम ने पारी-पारी से दोनों की नब्ज देखते हुए कहा, ‘‘इनकी बेहोशी दूर हो रही है, हवा लगने से दोनों जल्दी होश में आ जाँयगी.’’
रामू यह सुन बोला, ‘‘कहिए तो इन्हें पुनः बेहोशी की दवा सुँघा कर कुछ घण्टों के लिए मुर्दा कर दूँ.’’ घनश्याम ने जवाब दिया, ‘‘कोई जरूरत नहीं, मैं चाहता हूँ कि ये होश में आ जाँय और इनसे बातचीत करके कुछ पता लगाऊँ कि ये कौन हैं. (दोनों की सूरतें गौर से देखता हुआ) जरूर इनकी सूरतें बनावटी हैं.’’
रामू: हुक्म हो तो कूएँ के पानी से इनका चेहरा धोकर साफ कर डालूँ ?

घनश्याम: ऐसा ही करो. (गौहर की तरफ बता कर) इसकी सूरत तो मुझे कुछ-कुछ पहिचानी सी लगती है, जरूर इसे मैंने पहिले कहीं देखा है, मगर इस दूसरी के बारे में कुछ कह नहीं सकता.
रामू: देखिए अभी सब मालूम हुआ जाता है.
अपने सामान में से रामू ने कपड़े का डोल और पतली डोरी निकाली और बात की बात में कूएँ से पानी खींच कर बेहोशों के पास जा पहुँचा. घनश्याम की आज्ञानुसार दोनों का चेहरा धो कर साफ किया गया.
रंग दूर होते ही और चेहरा साफ होने के साथ ही घनश्याम चौंक पड़ा और बोला, ‘‘हैं, यह तो गौहर है ! तब तो बड़ा गजब हुआ !’’
रामू: क्यों क्या हुआ !
घनश्याम: (घबराहट के साथ जेब से कुछ निकाल कर रामू को देता हुआ) यह होश में आना ही चाहती है, पहिले यह चीज सुँघा कर इसे बेहोश करो तब कुछ पूछना.
बेहोशी की दवा सुँघा कर गौहर पुनः गहरी बेहोशी में डाल दी गई और तब रामू ने घनश्याम की चीज उसे लौटाते हुए कहा, ‘‘क्या यह वही गौहर है जिस पर हमारे महाराज लट्टू हो रहे हैं ?’’
घनश्याम: हाँ.
रामू: तो इन्हें देख कर आप घबरा क्यों गए ? यह तो हम लोगों के मेल ही की निकलीं, इनको तो बल्कि होश में लाकर पूछना चाहिए कि इनकी साथिन कौन है, उस गुफा में ये कैसे पहुँची और वह भयानक शैतान जिसे हम लोगों ने देखा (काँप कर) और जिसकी याद से अब भी कँपकँपी आती है, कौन था ?

घनश्याम: तुम तो गधे हो ! महाराज से जरा-सी यह शिकायत कर देंगी तो हम सब मारे जाँयगे !!
रामू: शिकायत ! क्यों और किस बात की ?
घनश्याम: यही कि हम लोगों ने इन्हें बेहोश किया और बेइज्जती के साथ इस तरह गठरी में बाँध कर लाए.
रामू: वाह यह भी कोई बात है, हम लोगों ने कुछ जानबूझ कर ऐसा थोड़े ही किया. अँधेरी रात, मुसीबत की घड़ी, अनजानी जगह, तिस पर सूरत बदली हुई ! भला हम लोग कोई देवता थे कि वैसी हालत में भी इन्हें पहिचान लेते !
घनश्याम: तुम्हें अभी इनके मिजाज का पता नहीं तभी ऐसा कह रहे हो, वह आनन्दसिंह वाली बात भूल गए ?
रामू: कौन सी ?
घनश्याम: ठीक है, तुम उन दिनों थे नहीं, अगर होते तो ऐसा न कहते.
रामू: कौन सी बात ! क्या हुआ था ?
घनश्याम: तुमने सुना तो होगा ही, वही जब महाराज ने राजा बीरेन्द्रसिंह के लड़कों को पकड़ने का जिक्र किया था और इसी गौहर ने इस काम का बीड़ा उठाया था.
रामू: मैंने कुछ उड़ती खबर सुनी थी परन्तु ठीक-ठीक हाल नहीं मालूम हुआ, बल्कि मैं पूछने वाला था कि क्या हुआ था !
घनश्याम: खैर पूरा हाल तो फिर बताऊँगा, मुख्तसर यह है कि गौहर ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को गिरफ्तार करके हमारे महाराज के पास ले आने का वादा किया, हम कई ऐयार लोग इनकी मदद पर दिए गए, हम लोगों ने अपना जाल रचा जिसमें आनन्दसिंह तो फँस गए मगर इन्द्रजीतसिंह को रानी माधवी फँसा ले गई इससे वे हमारे हाथ न लगे. आनन्दसिंह को गिरफ्तार करके शिवदत्तगढ़ ले जाने की मैंने सलाह दी पर इन हजरत को न जाने क्या सूझी कि एक मकान में उन्हें बन्द कर रक्खा जहाँ से बीरेन्द्रसिंह के ऐयार उन्हें छुड़ा ले गए. मगर इसका इलजाम हम लोगों के सिर थोपा गया. न जाने महाराज को क्या समझा दिया कि वे मुझे ही दोषी समझ बैठे और मुझे उनकी बहुत कड़ी डाँट सुननी पड़ी. तब से मैं इससे बहुत डरता हूँ. इस समय मैंने इसके काम में दस्तन्दाजी की है, अगर फिर इसने कोई शिकायत महाराज से कर दी तो मैं कहीं का न रहूँगा.

रामू इसके जवाब में कुछ कहा ही चाहता था कि यकायक इसके साथियों में से एक जो जरूरी कामों के लिए गया हुआ था दौड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा और कुछ घबराहट के साथ बोला, ‘‘महाराज आ रहे हैं !’’
घनश्याम ने यह सुनते ही चौंक कर कहा, ‘‘कौन ! महाराज आ रहे हैं ?’’
उसने जवाब दिया, ‘‘हाँ, शिकार के लिए आज वे बहुत सवेरे ही सिर्फ दो आदमियों को लेकर निकले और इसी तरफ आ रहे थे जब रास्ते में मुझे देख कर अचानक रुक गए और सब हाल पूछ कर इधर ही को बढ़े आ रहे हैं. मैं दौड़ कर खबर देने आ गया !’’
घनश्याम के मुँह से यह सुनते ही ‘‘बुरा हुआ !’’ निकल गया और उसने हाथ गौहर की तरफ बढ़ा कर कहा, ‘‘जल्दी से इसकी सूरत बदल दो !’’ मगर इस बात का कोई भी मौका न मिला क्योंकि उसी समय पास के जंगल से निकल कर आते हुए तीन घुड़सवारों पर नजर पड़ी. उसके मुँह से निकल पड़ा, ‘‘आ पहुँचे !’’ और वह कुछ बेचैनी के साथ उठ खड़ा हुआ. उसके बाकी साथी भी खड़े हो गए बल्कि सब लोग अगवानी के लिए कूएँ से उतर कर उस तरफ बढ़े जिधर से महाराज शिवदत्त सवारों के साथ आ रहे थे.
अपने आदमियों को सामने देख शिवदत्त ने घोड़ा रोका और उनके सलामों का जवाब देते हुए घनश्याम की तरफ देख कर कहा, ‘‘क्यों जी खुदाबख्श, तुमने आने में इतनी देर क्यों कर दी ? मैं आज कई दिनों से तुम लोगों की राह बेचैनी से देख रहा हूँ.’’

उसकी बात के जवाब में खुदाबख्श (जिसे अब तक घनश्याम के नाम से पुकारते आए हैं) अदब के साथ बोला, ‘‘हुजूर का हुक्म पाते ही हम लोग इधर के लिए रवाना हो गए मगर रास्ते में दो दिन की देर इसलिए हो गई कि मुझे पता चला कि गौहरजी किसी मुसीबत में पड़ गई हैं. इसी बात का पता लगाने और उनकी मदद करना जरूरी समझने से मुझे रुक जाना पड़ा.’’
शिवदत्त: (चौंककर) गौहर, मुसीबत में ! सो क्या, वह इस वक्त कहाँ है ?
खुदाबख्श: बड़ी मुश्किल से मैंने उन्हें और उनकी एक साथिन को कई बदमाशों के हाथ से छुड़ाया है, (हाथ से बताकर) उस जगह कुएं पर हैं. वे अभी तक बेहोश हैं, अभी हम लोग उन्हें होश में लाकर पूरा हाल-चाल पूछने ही वाले थे कि महाराज के आने की खबर मिली.
यह सुनते ही शिवदत्त उतावली के साथ कूएँ की तरफ बढ़ा और खुदाबख्श तथा उसके साथी तथा वे दोनों सवार भी जो शिवदत्त के साथ थे उसके पीछे हो लिए. कूएँ के पास पहुँच शिवदत्त घोड़े पर से उतर पड़ा. खुदाबख्श ने घोड़े की लगाम पकड़ कर अपने साथी रामू के हवाले कर दी और ऐसा करते हुए धीरे से उसके कान में कह दिया, ‘‘सभों को होशियार कर दो कि अगर महाराज पूछें तो यही कहें कि हमने इन दोनों को दुश्मनों के हाथ से छुड़ाया है.’’
तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ शिवदत्त कूएँ पर चढ़ गया और वहाँ गौहर को बेहोश पड़ा देखते ही उसके पास बैठकर गौर से उसकी नब्ज देखकर बोल पड़ा, ‘‘ओफ, इसे बहुत कड़ी बेहोशी दी गई है ! (खुदाबख्श की तरफ घूमकर) तुमने इसे कहाँ पाया ?’’

खुदा: यहाँ से आठ कोस दूर एक पहाड़ी की तलहटी में, रात के वक्त कई आदमी इन्हें और (दूसरी औरत की तरफ बताकर) इसे बेहोश लिए जा रहे थे कि हम लोगों ने पता पाकर उन्हें घेर लिया और बड़ी मुश्किल और चालाकी से उनके पंजे से छुड़ाकर सीधे इसी तरफ लिए चले आ रहे हैं.
शिवदत्त: वे लोग कौन थे जो इसे ले जा रहे थे ? उनमें से कोई गिरफ्तार हुआ ?
खुदा: अफसोस कि कोई हाथ न आय़ा जिससे पता लगता कि वे कौन थे, मगर शायद ये बता सकती हों कि वे कौन थे ? इन्हें होश में लाने से सब पता लग जाएगा.
यह कहकर खुदाबख्श ने लखलखे की डिबिया निकाली मगर उसी समय शिवदत्त ने रोककर कहा, ‘‘नहीं, मैं कुछ दूसरी ही बात सोचता हूँ ! मेरी इच्छा है कि इसे सीधा महल ले जाऊँ और तब वहीं होश में लाकर हाल-चाल दरियाफ्त करूँ। तुम लोगों के सुपुर्द मैं एक दूसरा और बहुत जरूरी काम करना चाहता हूँ जिसे मैं अकेले में तुमसे कहूँगा.’’
शिवदत्त ने चारों तरफ देखा जिसके साथ ही उसका मतलब समझ और लोग कुछ दूर हट गए और केवल खुदाबख्श वहाँ पर रह गया जिसकी तरफ झुककर कान में महाराज ने कुछ कहा. सुनते ही वह चौंक पड़ा और ताज्जुब के साथ बोला, ‘‘क्या महाराज ठीक कह रहे हैं !’’

शिवदत्त ने कहा, ‘‘मुझे बहुत ठीक खबर लगी है और इसीलिए मैं चाहता हूँ कि बिना एक सायत की भी देरी किए तुम अपने ऐयारों को साथ ले उसी तरफ रवाना हो जाओ. देर होने से बहुत नुकसान होने की सम्भावना है !’’
खुदा: बेशक, इसमें क्या शक है. मगर हम लोगों को क्या-क्या करना होगा, बता दिया जाए.
थोड़ी देर तक शिवदत्त और खुदाबख्श में धीरे-धीरे कुछ बातें होती रहीं. इसके बाद शिवदत्त उठ खड़ा हुआ और कूएँ के नीचे उतर अपने घोड़े पर सवार हुआ, उसकी आज्ञानुसार बेहोश गौहर उसके घोड़े पर बैठा दी गई और दूसरी औरत (मुन्दर) उसके साथी सवार के घोड़े पर. शिवदत्त ने ऐयारों से कुछ बातें कीं और तब घोड़े का मुँह शिवदत्तगढ़ की तरफ घुमाया. उसके साथी दोनों सवार भी पीछे हुए. इस समय हम खुदाबख्श वगैरह का साथ छोड़कर शिवदत्त के पीछे चलते और देखते हैं कि वह गौहर और मुन्दर को लेकर किधर जाता अथवा क्या करता है.
गौहर की जब बेहोशी टूटी तो उसने अपने को एक पहाड़ की कंदरा में पाया जो बहुत लम्बी-चौड़ी और कुशादा थी. वह मुलायम पत्तियों के बिछावन पर पड़ी हुई थी और उसके बगल ही में उसकी साथिन अर्थात् मुन्दर पड़ी हुई थी जो अभी तक बेहोश थी. इन दोनों से कुछ हटकर गुफा के मुहाने के पास महाराज शिवदत्त बैठे हुए कुछ कर रहे थे. गुफा के बाहर की तरफ आग जल रही थी जिसके पास बैठे दो आदमी खाने की चीज़ें तैयार कर रहे थे. एक मरा हुआ हरिण भी उसी जगह पास ही में पड़ा हुआ था.

महाराज शिवदत्त को पहिचान एक दफे तो गौहर चौंक गई और उसने पुनः अपनी आँखें बन्द कर लीं मगर कुछ देर बाद पुनः खोलीं और जमीन का सहारा लेकर उठ बैठी. उसके बदन में इस समय बेतरह दर्द हो रहा था जिसका कारण वह कुछ नहीं समझ सकती थी, साथ ही यह भी उसकी समझ में नहीं आता था कि वह जहाँ पर हैं वह कौन सी जगह है, वहाँ वह कैसे आई और राजा शिवदत्त यहाँ क्योंकर आ पहुँचे.
गौहर इन बातों को सोच ही रही थी कि शिवदत्त ने घूम कर उस तरफ देखा और उसे होश में आया देख उठ कर उसके पास आ गया. उसके हाथ में एक लोटा था जिसे उसने गौहर की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘बारे तुम होश में तो आईं ! इतनी कड़ी बेहोशी तुम्हें दी गई थी कि मैं तो सब तरह की कोशिश कर लाचार हो गया था. लो पानी से अपना मुँह धोओ ताकि दिमाग ठिकाने आवे तब बताओ कि तुम कहाँ और किस आफत में पड़ गई थीं ?’’
गौहर ने पानी ले लिया और अपनी आँखों पर कई छींटे दिए तथा मुँह अच्छी तरह धोया जिससे उसके सिर का चक्कर और माथे का दर्द कुछ कम हुआ. इसके बाद वह मुन्दर की तरफ गई और उसकी जाँच करने से उसे मालूम हुआ कि वह अभी तक बहुत गहरी बेहोशी में है. उसने अपनी कमर से लखलखा निकालना चाहा मगर देखा कि वह ऐयारी का बटुआ मौजूद नहीं है जिसे वह बराबर अपने साथ रखती थी. लाचार उधर से हटी और महाराज शिवदत्त के पास पहुँची जो उसका हाल जानने के लिए बेचैन जान पड़ते थे. हाथ पकड़ कर उसे उन्होंने अपने पास बैठा लिया और बड़ी मुहब्बत के साथ पूछा, ‘‘अब तबीयत कैसी है ?’’

गौहर: सिर्फ सर में दर्द है जो बेहोशी के कारण है—मगर मुझे इस बात का ताज्जुब है कि मैं यहां किस जगह आ पहुँची और आप यहाँ कैसे दिखाई पड़ रहे हैं ?
शिवदत्त: मैं संक्षेप में बताए देता हूँ. यह जगह शिवदत्तगढ़ के पास ही है. मैं शिकार खेलने दो रोज से इधर आया हुआ था. आज सुबह एक हिरन के पीछे घोड़ा छोड़े सरपट जा रहा था कि यकायक पाँच-छः आदमी दिखाई पड़े जो गठरियाँ उठाए चले आ रहे थे. मुझे देख वे लोग कुछ घबड़ाये और छिपने की कोशिश करने लगे जिससे मुझे शक मालूम हुआ और मैं हिरन का खयाल छोड़ उनके पास चला गया और पूछने लगा कि तुम लोग कौन हो, किधर जा रहे हो और इन गठरियों में क्या है ? मेरे सवालों का वे लोग कुछ ठीक जवाब न दे सके जिस पर मैंने डपट कर उनसे कहा कि मालूम होता है कि तुम लोग चोर हो और इन गठरियों में चोरी का माल है. गठरियाँ खोलकर मुझे दिखलाओ कि क्या है ? जब मैंने गठरी खोलने का नाम लिया तो वे सब बिगड़ खड़े हुए, गठरी खोलकर दिखाने से इनकार किया बल्कि मेरा मुकाबला करने को तैयार हो गए. नतीजा यह निकला कि मुझे अपनी तलवार से काम लेना पड़ा. दो आदमी जख्मी होकर गिर पड़े और उसी समय मेरे ये दोनों सवार (गुफा के बाहर वाले दोनों आदमियों को दिखाकर) भी आ पहुँचे जिन्हें देखकर उन लोगों की हिम्मत एक दम छूट गई और वे गठरियाँ छोड़कर भाग गए. जब मैंने गठरियाँ खोल कर देखा तो एक में तुम और एक में वह औरत (मुन्दर की तरफ इशारा करके) बंधी हुई दिखाई पड़ी जिसे देख मेरे ताज्जुब का हद्द न रहा. मैं तुम दोनों को इस गुफा में उठा लाया और होश में लाने की कोशिश करने लगा मगर जाने किस तरह की बेहोशी तुम लोगों को दी गई थी कि मेरी कोई भी कोशिश कारगर न हुई, लाचार यहाँ लेटा कर कुछ खाने की तैयारी में लगा था कि तुम होश में आ गई. अब बताओ कि वे लोग कौन थे जो तुम्हें उठाए लिए जा रहे थे और तुम उनके पंजे में क्योंकर फँस गईं ?
गौहर: मैं खुद भी कुछ नहीं बता सकती कि वे लोग कौन थे. क्या उनमें से कोई गिरफ्तार भी हुआ ?

शिवदत्त: अफसोस कि एक भी नहीं, सब भाग गए, मगर यह तुम ताज्जुब की बात कह रही हो कि जिन्होंने तुम्हें गिरफ्तार किया उनको तुम खुद भी नहीं जानतीं; आखिर कुछ अन्दाज तो कर सकती हो ?
गौहर: (कुछ सोचती हुई) सिवाय इसके और कुछ नहीं कह सकती कि सम्भव है कि वे सब भूतनाथ के साथी हों.
शिव.: (चौंक कर) भूतनाथ के साथी !
गौहर: हाँ.
शिव.: (ताज्जुब से) ऐसा शक तुम्हें क्योंकर होता है ?
गौहर: इसीलिए कि मैं भूतनाथ को सताकर लौट रही थी जब गिरफ्तार कर ली गई.
शिव: यह तो और भी ताज्जुब की बात तुमने कही ! लेकिन अब इस तरह पहेली बुझाने से कोई नतीजा न निकलेगा. साफ सब हाल कहो तो कुछ पता लगे. तुम तो प्रभाकरसिंह तथा इन्दुमति आदि को गिरफ्तार करने का बीड़ा उठा मुझसे बिदा होकर जमानिया गई थीं ! वहाँ जाकर फिर भूतनाथ के पीछे क्यों पड़ गईं !!
गौहर: (हँसकर) आप ही ने न कहा था कि अगर भूतनाथ किसी तरह आपका मददगार बन जाय तो आपका काम खूब मजे में निकल सकता है !
शिव.: हाँ कहा तो था.
गौहर: तो इसीलिए मैं भूतनाथ के पीछे पड़ी हुई थी और उसे आपकी तरफ करने का उद्योग कर रही थी.
शिव.: लेकिन देखता हूँ कि सो न करके उससे झगड़ा मोल ले बैठीं. आखिर क्या हुआ, कुछ खुलासा बताओ भी तो !
गौहर: खुलासा हाल तो बहुत लम्बा चौड़ा है जिसे पूरा-पूरा कहने में घंटों लग जायँगे. इस समय संक्षेप में मैं आपको सुनाए देती हूँ कि जिस समय मैं जमानिया में थी मुझे भूतनाथ के एक गुप्त भेद का पता लग गया और उसका पूरा हाल जानने की फिक्र में मैं पड़ गई क्योंकि मुझे खयाल हुआ कि अगर मैं उस भेद का पूरा पता लगा सकूँगी तो भूतनाथ को अपने बस में करने का एक अच्छा औजार हम लोगों के हाथ में आ जायगा.
शिव.: तब क्या हुआ ! उस भेद का कुछ पता लगा ?

गौहर: हाँ बहुत कुछ. (बेहोश मुन्दर की तरफ बताकर) भाग्यवश इनसे मेरी भेंट हो गई और मुझे उस सम्बन्ध में बहुत कुछ बातें मालूम हो गईं—यहाँ तक कि मैं भूतनाथ से मिली और उस भेद की तरफ इशारा किया जिसे सुनते ही वह इतना डरा और घबराया कि बेहोश हो गया.
शिव.: (ताज्जुब से) ऐसा ! वह भेद क्या था ?
गौहर: (मुस्करा कर) सो मैं अभी न बताऊँगी.
शिव.: ऐसा ! मगर सो क्यों ?
गौहर: अभी उसका मौका नहीं आया, वक्त आने पर सब बता दूँगी.
शिव.: खैर खुशी तुम्हारी ! मैं तुम्हारी मर्जी के खिलाफ उसे जानने पर जोर न दूँगा. खैर तब क्या हुआ—जब तुम्हारी बातें सुन वह बेहोश हो गया तब तुमने क्या किया ?
गौहर: उसी समय उसके कुछ साथी आ पहुँचे जिससे मुझे वहाँ से भागना पड़ा. लेकिन उसके बाद ही मैं दुश्मनों के हाथ पड़ गई और मुझे गुमान होता है कि वे लोग जिन्होंने मुझे और मेरी साथिन को पकड़ा अथवा जिनके हाथ से आपने हम लोगों को छुड़ाया जरूर भूतनाथ के वे आदमी ही होंगे.
शिव.: सम्भव है ऐसा ही हो. जब तक मुझे पूरा-पूरा हाल न बताओ तब तक मैं कोई गुमान करने में असमर्थ हूँ.
गौहर: मैं जरूर सब हाल पूरा-पूरा और खुलासा आपको सुनाऊँगी मगर इस समय नहीं, मौके पर, अभी तो मुझे खुद सब हाल नहीं मालूम हुआ है मगर इन (बेहोश मुन्दर की तरफ बताकर) का साथ अगर कुछ समय तक और रहा तो सब कुछ मालूम हो जायगा.
शिव.: यह कौन औरत है ?
गौहर: यह भी एक ऐयारा ही है, कुछ ही दिन से मेरा इसका साथ हुआ है. यद्यपि यह कम उम्र है मगर बड़ी होशियार और चालाक है. इसका भी पूरा हाल जब मैं बताऊँगी तो सुनकर आप ताज्जुब में पड़ जाएँगे. मगर ताज्जुब है कि यह अभी तक होश में नहीं आई !

शिव: मैंने कहा न कि तुम दोनों को न जाने किस तरह की बेहोशी दी गई थी, मैं घण्टों कोशिश करके हार गया पर किसी तरह होश में न ला सका. मालूम होता है कि किसी अनाड़ी ऐयार की तैयार की हुई थी. ऐसी बेहोशी प्रायः नुकसान पहुँचाती है और कभी-कभी तो दिमाग पर भी असर कर बैठती है, खुदा का शुक्र है कि तुम पर कोई बुरा असर न हुआ.
गौहर: सिर में तो मेरे बेहिसाब दर्द था और अभी तक भी बना हुआ है, शायद स्नान वगैरह के बाद दूर हो, मगर इसे अब होश में लाना चाहिए.
शिवदत्त: (अपनी कमर से लखलखे की डिबिया निकाल और गौहर को देकर) लो जरा इसे सुँघा कर देखो तो सही, शायद अब होश आ जाय.
गौहर ने डिबिया शिवदत्त के हाथ से ले ली और बेहोश मुन्दर के पास पहुँची. पहिले तो उसे हिला-डुला कर होश में लाना चाहा पर जब देखा कि वह अभी भी कड़ी बेहोशी में पड़ी है तो लखलखे की डिबिया उसकी नाक से लगाई मगर बहुत देर तक सुँघाने पर भी कोई असर न पड़ा. यह देख उसने शिवदत्त की तरफ देखा और कहा, यह तो अभी भी होश में नहीं आ रही है ! न जाने किस तरह की बेहोशी में पड़ी है.’’
शिवदत्त ने यह सुन जल से भरा एक लोटा उठा लिया और गौहर के पास आ उसके हाथ में देकर कहा, ‘‘इसके छींटे मुँह पर दो, मैं पंखे से हवा करता हूँ.’’

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