तीसमार खां - श्रीकान्त व्यास Teesmaar Khan - Hindi book by - Srikant Vyas
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तीसमार खां

श्रीकान्त व्यास

प्रकाशक : शिक्षा भारती प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5006
आईएसबीएन :9788174830340

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माइगेल द सरवांते के प्रसिद्ध उपन्यास डान क्विग्जोट का सरल रूपान्तर....

Tismar Khan

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

1

वह हमेशा पढ़ता ही रहता था। जब देखो तब किताब हाथ में और नज़र अक्षरों पर। दिन-रात वह पढ़ता रहता था। पढ़ने के सिवा उसे किसी बात की खबर नहीं रहती थी। खाने-पीने तक का ख्याल नहीं रहता था, न किसी से बोलना, न किसी से बात करना। बस किताब और वह।
तरह-तरह की किताबें पढ़ता था वह। वीरों की कहानियाँ, युद्धों के किस्से, साहस और पराक्रम की गाथाएँ दूर देशों की यात्रा और साहसपूर्ण खोजों की कथाएँ।
दिन-रात वह इन कहानियों में डूबा रहता था। किसी से बातें करता था तो इसी विषय पर। सपने देखता था तो इन्हीं कहानियों के। इस तरह की किताबों का उसे इतना शौक था कि वह इन्हें खरीदने के लिए अपने घर की चीजें बेच देता था। चीज के न रहने पर वह अपनी जमीन-जायदाद बेचकर किताबों के लिए पैसे जमा किया करता था। यहाँ तक कि वह खाना न खरीदकर किताबें खरीदना पसन्द करता था।

और वह इन कहानियों की किताबों में जो कुछ पढ़ता था, उस सब पर पूरा विश्वास भी करता था। वह परियों और जादू के देश को भी सच मानता था। भूत-प्रेतों और दैत्यों के किस्सों पर उसे कभी शक नहीं होता था।
उसके घर का सारा काम-काज उसकी एक भतीजी करती थी। उसे तो अपनी किताबों के अलावा और किसी चीज की सुध नहीं रहती थी। यहाँ तक कि नौकर को भी किताब पढ़कर सुनाया करता था और उसे काम से रोकता था।
इस तरह बहुत पढ़ने के कारण थोड़े ही दिनों में उसका दिमाग फिर गया। न ठीक से खाना, न सोना। दिमाग खराब न हो तो क्या हो ! अब वह दिन-रात कल्पना की दुनिया में ही मगन रहने लगा। उसने अपने-आपको भी एक बड़ा भारी वीर मान लिया। वह सोचने लगा कि वह खुद भी एक बड़ा पराक्रमी योद्धा है और लोगों को अन्याय से बचाना और उनकी रक्षा करना उसका काम है। वह कई बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ चुका है और बड़े-बड़े वीरों को मार चुका है। उसने मान लिया कि उसने अपनी तलवार के जोर से एक बड़ा भारी साम्राज्य कायम किया है और अनेक देशों को जीता है। उसने अरब और ईरान को हाल में ही जीतकर अपने राज्य में मिलाया था। अब वह शहंशाह था। दुनिया जहान का मालिक था !
एक बार उसे ख्याल आया कि मैंने इतना बड़ा राज तो कायम कर लिया है, लेकिन अपने राज के लोगों को सुख से रखना भी मेरा ही काम है। अपने राज के लोगों का नहीं बल्कि दुनिया-भर के लोगों का दु:ख दूर करने का उसने बीड़ा उठाया। उसने तय किया कि लोगों का दु:ख दूर करने के मार्ग में जो भी कठिनाइयाँ आएँगी, उन्हें वह खुशी के साथ सहेगा और हर तरह का कष्ट उठाकर लोगों का दु:ख दूर करेगा।

और जब एक विचार आ गया तो उसे पूरा भी करना चाहिए। उसने संसार-भर के अन्यायियों से लड़ने की तैयारी शुरू कर दी। एक योद्धा खाली हाथ तो लड़ने जा नहीं सकता। उसे जिरह बख्तर और हरबे-हथियार की जरूरत होती है। बहुत खोजने पर उसे घर में अपने पुरखों के जमाने का एक पुराना बख्तर मिल गया। उसे मांज-घिसकर उसने चमका लिया और फिर इधर-उधर खोजने पर उसे एक पुरानी ढाल और जंग लगी तलवार भी मिल गई। कुछ और खोजने पर उसे एक भाला भी मिल गया।
अब बरसों बाद उसे अपने पुराने घोड़े की याद आई। उसने नौकर से घोड़ा निकलवाया। घोड़े को बहुत दिनों से ठीक से दाना-पानी नहीं मिला था। वह बहुत कमजोर हो गया था। बिलकुल हड्डी-हड्डी रह गया था। पेट चिपक गया था और टाँगें सूख गई थीं। लेकिन वह अपने घोड़े को सिकन्दर से कम नहीं मानता था। इस हालत में भी वह उसे संसार का सबसे तगड़ा और सबसे सुन्दर घोड़ा मानता था।

अब घोड़े का नाम रखना था। प्रत्येक वीर योद्धा अपने घोड़े का कुछ न कुछ नाम रखता है। चार दिन तक वह घोड़े का नाम सोचता रहा। कई नाम याद आए लेकिन उसे एक भी पसन्द न था। बहुत सोच-विचार के बाद उसने एक नाम खोजा-टोजीनाण्ट। स्पेन की भाषा में इसका अर्थ होता है-वह जिसकी हालत कभी खराब थी।
घोड़े का नाम रखने के बाद अब अपना नाम भी उसे खोजना था। यह कोई आसान काम नहीं था। नाम ऐसा हो जो अपना पूरा परिचय दे सके। नाम सुनकर लोग समझ लें कि कोई बहुत बड़ा योद्धा है। आठ दिन तक लगातार वह अपना नाम खोजता रहा। बहुत सोच-विचार किया, लेकिन कोई नाम उसे पसन्द नहीं आया। अन्त में आठवें दिन उसे एक नाम सूझा-‘क्विक्जोट’। अब वह डान क्विक्जोट था। स्पेनी भाषा में क्विक्जोट का अर्थ होता है बख्तर का एक भाग। इसके बाद उसने, जिस प्रदेश में उसका जन्म हुआ था उसके आधार पर एक नाम और जोड़ लिया। इस प्रकार अब उसका नाम था-डान क्विक्जोट डीला माशा। लेकिन अभी एक चीज और बाकी रह गई थी। भविष्य में उसे एक राजकुमारी से विवाह करना था। अपनी कल्पना में उसने एक राजकुमारी का नक्शा बनाया और उसका नाम रखा-डेलसीनिया डेल टोबोसो। टोबोसो एक नगर का नाम था।

2

 


अब बिना ज़रा-सा भी समय बरबाद किए उसे अपने काम पर निकल जाना था। एक दिन बहुत जल्दी सवेरे उठकर वह चुपचाप बिना किसी से कुछ कहे घर के पिछले दरवाजे से निकल पड़ा। अपने प्रिय घोड़े टोजीनाण्ट पर वह सवार था। जिरह-बख्तर से लैस, हाथ में भाला, सिर पर टोप। आज उसकी खुशी की सीमा नहीं थी। आज वह संसार का दु:ख दूर करने के लिए निकला था। लेकिन अभी वह कुछ ही दूर पहुँचा था कि उसे एक बात याद आ गई। एक सरदार के रूप में वह दुनिया फतह करने निकला था। लेकिन सरदार क्या योंही बन जाते हैं ! उसने किताबों में पढ़ा था कि किसी को सरदार बनाते समय बाकायदा कुछ रस्म वगैरह करनी पड़ती है। इसलिए उसने यह सोचा कि पहले चलकर किसी कायदे के मुताबिक सरदार का खिताब लिया जाए। उसने अपने घोड़े की लगाम ढीली की और यह तय किया कि घोड़ा उसे जिधर ले जाएगा उसी दिशा में आगे जाकर वह किसी से अपने को सरदार घोषित करा लेगा।
सारे दिन वह चलता रहा लेकिन उसे रास्ते में कोई मिला ही नहीं। तेज धूप में उसे दिन-रात चलना पड़ा था। वह थककर चूर हो चुका था। भूख भी बहुत जोरों की लगी थी। उसे आराम की जरूरत महसूस हुई। कुछ दूरी पर उसे एक सराय दिखाई दी। वह सराय के सामने पहुँचा। सराय के दरवाजे पर दो लड़कियाँ खड़ी हुई थीं।

लेकिन बात यही थी कि डान क्विक्जोट हमेशा कल्पना की दुनिया में रहता था, इसलिए उसने इस सराय को एक किला समझ लिया था। इस किले के चारों ओर चहारदीवारी थी। उसके आस पास खाई थी। खाई को पार करने के लिए एक पुल था, जिसे जरूरत के अनुसार उठाया-गिराया जा सकता था। वे दोनों लड़कियाँ उस किले में रहने वाले सरदार की लड़कियाँ थी। जब उन्होंने एक हथियारबन्द सवार को अपनी ओर आते देखा तो वे डरकर अन्दर भाग गईं।
उन्हें भागते देखकर क्विक्जोट ने कहा, ‘‘बहनो, मुझसे मत डरो, मैं तो अरब का बादशाह हूँ और दूसरों का दुख दूर करने को निकला हूँ। मैं एक बहादुर आदमी हूँ। मैं औरतों को चोट नहीं पहुँचाता, बल्कि उनका सम्मान करता हूँ।’’
दोनों लड़कियाँ रुक गईं और क्विक्जोट की ओर देखकर हँस पड़ीं। हँसते देखकर क्विक्जोट को गुस्सा आ गया। वह बोला, ‘‘इतने बड़े सरदार की लड़कियाँ होकर तुम लोगों को इस तरह हँसना शोभा नहीं देता।’’

इस पर वे लड़कियाँ और जोर से हँसने लगीं। क्विक्जोट का गुस्सा बढ़ता ही गया। अन्दर बैठा सराय वाला उसकी बातों को सुन रहा था। वह जरा मजाक-पसन्द आदमी था। उसने दुनिया को फतह करने वाले बहादुर से कुछ बात करने का निश्चय किया। वह बाहर आया। हँसी दबाकर वह बोला, ‘‘हुजूर, मैं आपकी क्या खिदमत कर सकता हूँ। आइए, अन्दर आइए !’’
सराय वाले को उसने किले का सरदार समझा। इतने बड़े किले का सरदार और इतने अदब से बात करे ! क्विक्जोट खुश हो गया। वह बोला, ‘‘सरदार, मेरे लिए कोई खास तकलीफ करने की जरूरत नहीं है। मुझे बस थोड़ा-सा वक्त काटना है।’’
यह कह कर वह घोड़े से उतरा और घोड़े पर नज़र रखने के लिए कहकर बड़ी शान के साथ सराय में घुसा। अब तक लड़कियों ने हँसना बन्द कर दिया था। उन्होंने जिरह बख्तर उतारने में उसकी मदद करनी शुरू की। बख्तर तो उतरा लेकिन सिर का टोप उतरना ही नहीं था। वह इस तरह रस्सी से बँधा था कि बिना रस्सी को काटे वह सिर से अलग नहीं हो सकता था। क्विक्जोट ने रस्सी काटने का घोर विरोध किया। नतीजा यह हुआ कि टोप सारी रात उसके सिर पर रहा।
सरायवाला घोड़े को तबेले में बाँधकर लौट आया। उसने क्विक्जोट को खाने के लिए एक टुकड़ा रोटी और सूखी हुई मछली दी। खाना खाने में क्विक्जोट को बड़ी तकलीफ हो रही थी, क्योंकि टोप की रस्सी गले में बँधी थी। लेकिन वह रस्सी कटवाने के लिए तैयार नहीं था। योरोप में लोग पानी की जगह ज्यादातर शराब पीते हैं, क्योंकि वहाँ ठण्ड बहुत पड़ती है। सरायवाला भी क्विक्जोट के लिए थोड़ी शराब ले आया। लेकिन अब उसे पिलाई कैसे जाए। अन्त में उसने एक नली क्विक्जोट के मुँह में डाल दी और उसमें उंडेलकर शराब उसे पिलाई। लड़कियाँ यह सब देखकर हँसते-हँसते लोट-पोट हो रही थीं।

क्विक्जोट अपने इस सम्मान से बहुत खुश था। उसने यह समझा कि उसके सम्मान में किले के सरदार ने एक बहुत बड़ी दावत दी है। वह खुश हो गया और उसे धन्यवाद देने लगा। लेकिन तभी चिन्ता से उसका चेहरा उतर गया। अभी उसे सरदार का खिताब मिला ही नहीं था। वह सराय के मालिक को तबेले में ले गया। दरवाजा अन्दर से बन्द करके वह उसके पैरों पर गिर पड़ा और बोला, ‘‘तुम्हें मुझे एक चीज देनी ही पड़ेगी। जब तक तुम दोगे नहीं, मैं तुम्हारे पैर नहीं छोड़ूँगा।’’
सरायवाला उसकी बात सुनकर घबराया। यह देखकर क्विक्जोट फौरन बोला, ‘‘भाई मैं तुमसे ऐसी वैसी चीज नहीं माँग रहा हूँ। सिर्फ मैं यही चाहता हूँ कि तुम मुझे सरदार का खिताब दे दो। ज़रा धूम-धाम के साथ तुम मुझे सरदार बना दो। इसके बाद ही मैं दुनिया फतह कर सकूँगा और दुखियों के दु:ख दूर कर सकूँगा।’’
सरायवाला उसके पागलपन को देखकर कुछ आश्चर्य में पड़ा लेकिन फिर उसे भी हँसी सूझी। वह राजी हो गया। डान क्विक्जोट ने कहा, ‘‘आज रात मैं इस किले के एक मन्दिर में अपने जिरह-बख्तर को रखकर पहरा दूँगा। अगर किसी ने हमला किया तो मैं उसे मार डालूँगा। सुबह तुम मुझे सरदार बना देना।’’
सरायवाला बोला, ‘‘लेकिन मेरे किले में कोई मन्दिर नहीं। एक पानी की टंकी है। उसी पर तुम अपना बख्तर रख देना और पहरा देना। लेकिन तुम्हारे पास पैसे-वैसे हैं ?’’
‘‘पैसे ! पैसे की क्या जरूरत है ? मैंने तो किसी किताब में यह नहीं पढ़ा कि कोई बहादुर सरदार अपने पास पैसे भी रखता है।’’

‘‘लेकिन पैसा तो जरूरी है। सीधी-सी बात है। भले ही किताबों में यह न लिखा हो, लेकिन सरदारों के पास न सिर्फ पैसों की एक थैली होनी चाहिए, बल्कि साथ में एक अपना नौकर भी होना चाहिए और वक्त जरूरत काम आने के लिए मलहम की एक-आध डिब्बी भी रख लेनी चाहिए। किसी के साथ लड़ाई हो गई और चोट आ गई, तो मलहम की जरूरत पड़ती ही है। है या नहीं ?’’
डान क्विक्जोट को उसका कहना ठीक मालूम हुआ। उसने इस राय के लिए उसे धन्यवाद दिया। शाम हो गई थी। सराय के आँगन में पानी की टंकी थी। उसी पर अपना बख्तर वगैरह रखकर क्विक्जोट पहरा देने लगा। उसके एक हाथ में एक लम्बा-सा भाला था और दूसरे में ढाल थी। बहुत चौकन्ना होकर वह पहरा दे रहा था।
रात में कुछ गाड़ीवान सराय में ठहरे। एक गाड़ीवान का बैल पानी पीने के लिए टंकी के पास पहुँचा। उसे अपनी ओर आते देखकर डान क्विक्जोट ने ललकार कर कहा, ‘‘खबरदार ! कौन है ? यहाँ मत आना, वरना अपनी जान से हाथ धो बैठोगे !’’
बैल के पीछे-पीछे उसका मालिक भी था। उसने सरायवाले से सब कुछ सुन रखा था। उसने उसकी बात की कोई परवाह नहीं की और आगे बढ़ गया। डान क्विक्जोट को गुस्सा आ गया। उसने भाले से उस पर हमला कर दिया। गाड़ीवान घायल होकर बेहोश हो गया और वहीं गिर पड़ा।

थोड़ी देर बाद दूसरा गाड़ीवान अपने बैल को पानी पिलाने आ गया। इस बार भी डान क्विक्जोट को गुस्सा आ गया। उसने उस पर भी हमला कर दिया। गाड़ीवान की चीख-चिल्लाहट सुनकर सराय में रहने वाले दूसरे लोग भी दौड़ पड़े। उन्होंने डान क्विक्जोट पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए। वह एक बहादुर की तरह अपनी ढाल पर पत्थरों की मार सहता गया। अब वह चारों तरफ से घिरा हुआ था। उसने कल्पना की कि मैं एक बहुत बड़े युद्ध में भाग ले रहा हूँ। उसे सराय के मालिक पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। उसने मन में सोचा कि यह किसी नीच कुल का सरदार है। इतने बड़े किले का मालिक होकर भी वह एक बहादुर का सम्मान नहीं कर पाता।
इतने में सराय वाले ने लोगों को समझाया कि यह तो पागल है, इसकी परवाह न करके घायल आदमी को अन्दर ले जाया जाना चाहिए और उसकी देखभाल करनी चाहिए। लोग घायल के अन्दर ले जाने लगे। तब सराय वाला डान क्विक्जोट के पास आया और बोल, ‘‘हुजूर, आप इन लोगों की परवाह न करें। ये तो बेवकूफ हैं। मैं इनकी ओर से माफी मांगता हूँ। लेकिन अब सारी रात अपने बख्तर का पहरा देने की जरूरत नहीं है। इतना ही काफी है। चलिए मैं आपको सरदार बना देता हूँ।’’
यह सुनकर डान क्विक्जोट बहुत खुश हुआ। सराय का मालिक अपने हिसाब की किताब ले आया और उससे देखकर कुछ इस तरह गुनगुनाने लगा जैसे कोई मंत्र पढ़ रहा हो। डान क्विक्जोट घुटने टेककर आगे बैठ गया। फिर सराय के मालिक ने एक पुरानी जंग लगी तलवार उसके सिर पर तीन बार घुमाई और उसके हाथ पर रख दी, और आशीर्वाद दिया, ‘‘भगवान आपको सदा विजयी बनाएँ।’’
अब क्विक्जोट को सरदार का खिताब मिल चुका था। अब किस बात की देर थी ! उसने फौरन अपना घोड़ा निकलवाया। सराय वाले और उसकी लड़कियों को शाही ढंग से आशीर्वाद दिया। फिर घोड़े को इतनी जोर से दौड़ाया कि कुछ ही दूर आगे चलने पर घोड़ा हाँफने लगा। क्विक्जोट को याद आया कि सराय वाले ने एक नौकर साथ लेने के लिए कहा था। उसने फौरन अपना घोड़ा फिर से गाँव की ओर मोड़ लिया।

3

 


कुछ दूर चलने पर डान क्विक्जोट को किसी के रोने-चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। उसने घोड़े को उसी ओर मोड़ दिया। कुछ दूर चलने पर उसने देखा कि एक पेड़ के साथ एक लड़का बँधा हुआ है और उसे एक आदमी छड़ी से पीट रहा है। लड़का जोरों से चीख रहा था। डान क्विक्जोट अपनी ही तरह सबको वीर योद्धा मानता था और उसी तरह लोगों से बात करता था। वह उस आदमी से बोला, ‘‘तुम्हारे जैसा बहादुर आदमी एक लड़के को इस तरह पीटे, यह कुछ शोभा नहीं देता ! इसको क्यों बाँधा है तुमने ?’’
वह आदमी इस हथियारबन्द सवार को देखकर डर गया और बोला, ‘‘सरदार ! यह मेरा नौकर है ! मेरी भेड़ चराता है। यह इतना लापरवाह है कि हमेशा किसी न किसी भेड़ को खो आता है, इसलिए मैं इसकी तनख्वाह काट लेता हूं। लेकिन फिर भी इसकी आदत नहीं सुधरती।’’
डान क्विक्जोट ने हुक्म दिया, ‘‘इस लड़के को फौरन छोड़ दो और इसके सारे पैसे लौटा दो। बता लड़के, इस पर तेरे कितने पैसे बाकी हैं !’’

लड़के ने कहा, ‘‘हुजूर, हर महीने सात रुपये के हिसाब से नौ महीने के मेरे तिरसठ रुपये होते हैं !’’
वह आदमी मारे डर के काँपने लगा। उसने लड़को को छोड़ दिया और कहा, ‘‘नहीं सरकार, यह झूठ बोलता है। मैंने इसे अब तक तीन जोड़ी जूते दिए हैं। एक बार यह बीमार पड़ गया था, तो मैंने इसके लिए वैद्य बुलवाया था। वह सारा खर्चा इसकी तनख्वाह से कटेगा।’’
डान क्विक्जोट ने उसे डाँटकर कहा, ‘‘चुप रहो ! इसे पूरे के पूरे पैसे लौटा दो। तुमने मार-मार के इसे अधमरा कर दिया है।’’
‘‘लेकिन सरदार, मेरे पास यहाँ पैसे कहाँ हैं ? मैं इसे घर ले जाकर सब पैसे दे दूँगा।’’
डान क्विक्जोट ने खुश होकर कहा, ‘‘ठीक है। लेकिन याद रखना, अगर तुमने इसके पैसे नहीं लौटाए तो बहुत बुरा होगा। मेरा गुस्सा बड़ा तेज है।’’
उस आदमी ने डान क्विक्जोट को सलाम किया और क्विक्जोट आगे बढ़ा। यह सोचकर उसे बड़ी खुशी हो रही थी कि लोग अब उसका आदर ही नहीं करते थे, बल्कि उससे डरने भी लगे थे। लोगों ने उसे भी सरदार मान लिया। आज उसने एक दुखी आदमी की मदद की थी और इस तरह एक बहुत बड़ी जीत हासिल की थी। चलते-चलते वह एक चौराहे पर पहुँचा। वहाँ से चार रास्ते जाते थे। वह रुककर सोचने लगा कि किताबों में लिखा है कि बहादुर लोग ऐसे मौके पर खुद अपना रास्ता तय नहीं करते, बल्कि घोड़ा अपने आप चला जाता है उधर ही चल पड़ते हैं। यह सोचकर उसने घोड़े की लगाम ढीली कर दी। घोड़े ने उसके गाँव का ही रास्ता लिया।

कुछ दूर चलने पर उसे कुछ लोग मिले। वो लोग व्यापारी थे और रेशम खरीदने के लिए शहर जा रहे थे। उसके साथ चार नौकर थे और तीन बैल वाले थे, जो सामान लादने के लिए उनके साथ चल रहे थे। डान क्विक्जोट ने सोचा कि ये लोग मुझसे युद्ध करने आ रहे हैं। उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि आज उसे अपनी बहादुरी दिखाने का मौका मिला। उसने अपना भाला संभाला और ढाल सामने करके लड़ाई के लिए तैयार हो गया।
जब वे लोग कुछ पास आए तो डान क्विक्जोट ने अपने भाले से उनका रास्ता रोकते हुए कहा, ‘‘इस दुनिया में डेलसीनिया डेल टोबोसो सबसे ज्यादा सुन्दर लड़की है, इस बात को तुम लोग कबूल करते हो कि नहीं ?’’
वे लोग इस अजीब-से आदमी को देखकर हैरत में रह गए। उन्हें विश्वास हो गया कि यह कोई पागल है। लेकिन उनमें से एक सौदागर को मजाक सूझा। बोला, ‘‘सरदार, हम लोग तो इस नाम की किसी लड़की को जानते ही नहीं, और न हमने यही सुना है कि वह बहुत सुन्दर है। एक बार उसे दिखा दीजिए, तब हम यह कबूल करेंगे कि वह सबसे सुन्दर है।’’
‘‘चुप रहो !’’ डान क्विक्जोट ने उसे डाँटते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी यह हिम्मत ! उसे दिखा दूँ तब तुम कबूल करोगे कि वह सुन्दर है ! इसमें नई बात क्या हुई ? बिना देखे ही कबूल करना पड़ेगा ! अगर नहीं करते हो, तो आओ, मुझसे लड़ लो ! चाहो तो एक-एक करके आओ और चाहो तो सब मिलकर लड़ लो !’’

यह कहकर उसने अपना भाला संभाला और घोड़े को एड़ लगाई। लेकिन उसका घोड़ा वैसे ही बहुत मरियल था और इतनी दूर चलते-चलते थक चुका था। वह लड़खड़ाकर गिर पड़ा। डान क्विक्जोट अपना भाला और ढाल लिए हुए मुँह के बल जमीन पर आ गिरा। उसने अपने ऊपर इतना जिरह-बख्तर लाद रखा था कि उसके वजन कारण उससे जल्दी उठते ही नहीं बना। वह जमीन पर पड़ा-पड़ा ही उन्हें ललकारता रहा, ‘‘ठहरो-ठहरो, डरपोकों ? भागो मत ! मैं गिर पड़ा हूँ, इसमे मेरा दोष नहीं, इस घोड़े का दोष है। लेकिन मुझे उठ जाने दो। मैं तुम्हें अभी मजा चखाता हूँ।’’
उसकी यह हालत देखकर सौदागर को हँसी आ गई। वे उसका मजाक बनाते हुए आगे बढ़ गए। लेकिन उनके एक नौकर को डान क्विक्जोट पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। वह उसके पास आया और उसके हाथ से भाला छीनकर तोड़ डाला। भाले के टुकड़े से उसने डान क्विक्जोट को खूब पीटा। फिर वह भी अपने मालिक के साथ लौट गया। मार खाकर डान क्विक्जोट अधमरा हो गया, लेकिन फिर भी एक बहादुर की तरह उन्हें ललकारता रहा और हाथ-पैर पटकता रहा। फिर उसने उठने की कोशिश की, लेकिन मार के कारण उसका बुरा हाल था। उससे उठते नहीं बन रहा था।

इतने में उसके गाँव का एक आदमी एक गधा लेकर उधर आ निकला। उसने डान क्विक्जोट को जमीन पर पड़े देखा। वह फौरन उसके पास गया और उसके मुँह की धूल झाड़ने लगा। उसने किसी तरह उसका जिरह-बख्तर निकालकर एक तरफ फेंका, फिर उसने डान क्विक्जोट को उठाकर गधे पर बैठाया। उसके टूटे हुए भाले और दूसरे हरबे-हथियार को उसने उसके घोड़े पर बांधा। फिर वह उसे गाँव की ओर ले चला।
शाम होते-होते वह डान क्विक्जोट के घर पहुँचा। उस गाँव का पादरी डान क्विक्जोट के घर आया था और घर के लोगों से उसके अचानक गायब हो जाने के बारे में बातचीत कर रहा था।
कुछ देर बाद गांव का हज्जाम भी वहां आ पहुंचा। डान क्विक्जोट की नौकरानी कह रही थी कि, ‘‘आज छः दिन हो गए, मेरे मालिक का कोई पता नहीं। उनकी ढाल-तलवार, उनका भाला और उनके जिरह बख्तर भी गायब हैं। मुझे लगता है कि किताबें पढ़कर उनका दिमाग खराब हो गया है।’’
‘‘हाँ, कुछ यही बात है। मुझे भी यही लगता है,’’ डान क्विक्जोट की भतीजी ने कहा। ‘‘मेरा चाचा दिन-रात साहस और पराक्रम की कहानियाँ और बहादुरों के किस्से पढ़ा करते थे। बस हमेशा पढ़ते ही रहते थे। अक्सर मैंने उन्हें हवा में तलवार चलाते हुए देखा था। कभी-कभी वे कहा करते थे कि आज लड़ाई में मैंने चार राक्षसों को मार गिराया है। मुझे तब उनकी बात पर हँसी आती थी लेकिन हाय, मुझे क्या मालूम था कि ये किताबें कभी उनका दिमाग ही खराब कर देंगी ! मैं इन सारी किताबों को जला डालूँगी !’’

पादरी बोला, ‘‘हाँ, तुम ठीक कहती हो, यही करना चाहिए। कल हम लोग उसकी सब किताबों को ढूँढ़ निकालेंगे और उन्हें नष्ट कर डालेंगे।’’
इतने में वह आदमी डान क्विक्जोट को लेकर वहाँ आ पहुँचा। उसने दरवाजा खटखटाया। सब लोग दौड़ते हुए आए। डान क्विक्जोट को गधे पर औंधा पड़ा देखकर सब बुरी तरह घबरा गए। सबने पूछना शुरू किया, लेकिन वहाँ जवाब कौन देता; डान क्विक्जोट बेहोश पड़ा था।
नौकरानी ने दौड़कर बिस्तर लगाया। फिर सब लोगों ने मिलकर डान क्विक्जोट को उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। उसे होश आ गया। वह बोला, ‘‘अरे भाई, कोई खास बात नहीं है। मैंने एक बहुत बड़ी लड़ाई में हिस्सा लिया है। उसी में कुछ घायल हो गया हूँ। लेकिन मैंने अपने दुश्मनों को वह सबक सिखाया है कि वे मुझे कभी नहीं भूलेंगे !
आह, मेरी कमर में बहुत दर्द है !’’
सब लोग उसे घेरकर बैठ गए। थोड़ी देर में वह बोला, ‘‘लाओ, मुझे कुछ खाने को दो। फिर मुझे ज़रा आराम से सोने दो।’’

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