चांदी का बटन - श्रीकान्त व्यास Chandi ka Batan - Hindi book by - Srikant Vyas
लोगों की राय

मनोरंजक कथाएँ >> चांदी का बटन

चांदी का बटन

श्रीकान्त व्यास

प्रकाशक : शिक्षा भारती प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5008
आईएसबीएन :9788174830449

Like this Hindi book 5 पाठकों को प्रिय

359 पाठक हैं

आर.एल.स्टीवेन्सन के प्रसिद्ध उपन्यास किडनैप्ड का सरल हिन्दी रूपान्तर...

Chadi Ka Batan A Hindi Book by Srikant Vyas

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

1

मेरी यह कहानी बड़ी साहसपूर्ण घटनाओं से भरी हुई है। इसका आरम्भ होता है सन् 1751 के जून महीने के एक सवेरे से। उस दिन सवेरे मैंने आखिरी बार अपने घर में ताला लगाया था और फिर मैं अपनी यात्रा पर निकल पड़ा।
जब मैं सड़क पर पहुंचा तो आसमान में सूरज कुछ चढ़ आया था। सवेरे से इस घाटी में चारों तरफ जो कुहरा छाया हुआ था, वह सूरज की गर्मी पाकर हटता जा रहा था। हमारे परिवार के पुराने मित्र और हमारे नगर के एक पादरी मि. कैम्पबेल मुझको कुछ दूर तक पहुँचानेवाले थे। वे बगीचे के फाटक पर मेरी राह देख रहे थे। मुझे देखकर वे बोले, ‘‘डेविड बेटे, मैं तुमको किनारे तक छोड़ने जाऊँगा। वहाँ से तुम अपने रास्ते चले जाना।’’
कुछ देर तक हम लोग बिना बोले चुपचाप चलते रहे। इतने में उन्होंने कहा, ‘‘क्यों डेविड, क्या तुम्हें अपना एसेण्डेन नगर छोड़ते हुए बहुत अफसोस हो रहा है !’’

मैंने कहा, ‘‘भला यह मैं अभी कैसे बता सकता हूँ साहब ?
अगर मुझे यह पता होता कि मैं कहाँ जा रहा हूँ और मेरे भाग्य में क्या लिखा है तो मैं आपको ठीक-ठीक बता सकता कि मुझे अपना नगर छोड़ते हुए प्रसन्न होना चाहिए या दुःखी। वैसे एसेण्डेन एक बहुत अच्छी जगह है और मैं यहाँ सुख से रहा हूँ।’’
मि. कैम्पबेल ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘‘देखो बेटे, मुझे तुम्हारा भविष्य कुछ हद तक मालूम है। यह मेरा कर्तव्य है कि मैं तुम्हें सब कुछ बता दूँ। जब तुम्हारी माता का स्वर्गवास हो गया और तुम्हारी पिती की बीमारी बढ़ने लगी तो एक दिन उन्होंने मुझको एक चिट्ठी सौंपी और कहा कि यह मेरे बेटे के लिए वसीयतनामे की तरह काम में आएगी। इसके बाद तुम्हारे पिता ने कहा था कि जैसे ही उनकी मृत्यु हो जाए, मैं यह चिट्ठी तुम्हें सौंप दूँ और क्रैमोंड गाँव में शा घराने के पुश्तैनी मकान के लिए तुमको रवाना कर दूँ। असल में तुम्हारे पिता भी वहीं के रहनेवाले हैं और वे चाहते थे कि तुम भी वहीं चले जाओ।’’

मैंने आश्चर्य से उनकी ओर देखा और पूछा, ‘‘भला मेरे पिता का शा घराने वालों से क्या सम्बन्ध हो सकता है ?’’
मि. कैम्बेल ने कहा, ‘‘हाँ, इस सम्बन्ध में ठीक-ठीक तो कोई कैसे कह सकता है, लेकिन बेटा, उस परिवार के नाम और तुम्हारे परिवार के नाम में कोई फर्क नहीं है। वे लोग बेल्फोर के शा कहलाते हैं। बड़ा पुराना और बड़ी इज़्ज़त वाला ऊँचा घराना है।’’ फिर उन्होंने मेरे हाथ में एक लिफाफा थमा दिया, जिस पर ऐबेनेज़ेर बेल्फोर का नाम लिखा हुआ था और उसके आगे लिखा था, मेरे बेटे डेवि़ड बेल्फोर के लिए।
मैंने मि. कैम्पबेल से हिचकिचाते हुए पूछा, ‘‘क्या अगर आप मेरी जगह होते तो इस तरह एक अनजान जगह में जाना पसंद करते ?’’
वे बोले, ‘‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं। तुम क्रैमोंड दो दिन बाद पहुँच जाओगे। यह गाँव एडिनबरा के पास ही बसा हुआ है। अगर कोई ऐसी बात हुई और तुम्हारा वहाँ रुकना संभव नहीं हुआ तो तुम दो दिन की यात्रा के बाद वापस यहाँ आ सकते हो। बस, पैदल ही तो चलना है तुमको। लेकिन मुझे आशा है कि उस परिवार के लोग प्रेम से तुम्हारा स्वागत करेंगे और अपने साथ रखने के लिए तैयार हो जाएँगे।’’

इस तरह पादरी साहब ने मुझको विदा किया और मैं अपनी लाठी के सिरे पर एक गठरी को कन्धे से लटकाए आगे बढ़ चला। किनारे पर पहुँचने के बाद मैं दाहिनी तरफ मुड़ गया और पहाड़ियां पार करने लगा। अभी मुझे दो दिन तक चलना था।
दूसरे दिन दोपहर को मैं एक पहाड़ी की चोटी पर पहुँचा। वहाँ से दूर-दूर तक का दृश्य दिखाई पड़ता था। कुछ दूर तक लम्बी पहाड़ी के पास एक एडिनबरा शहर बसा हुआ था और उसके पास ही समुद्र लहरा रहा था। एडिनबरा के किले पर झण्डा फहरा रहा था, जो बहुत ही छोटा-सा दिखाई देता था। बन्दरगाह में कुछ जहाज़ खड़े थे और कुछ आ-जा रहे थे।
कुछ दूर चलने पर मैं एक ग़ड़रिये के घर के पास पहुँचा।

उसने मुझको क्रैमोंड का रास्ता बता दिया। इधर-उधर भटकते हुए अन्त में मैं क्रैमोंड के पास पहुँचा। वहाँ मैंने शा घराने के लोगों का मकान पूछना शुरू किया। मैंने देखा कि मेरे इस प्रश्न पर लोग आश्चर्य से मेरी ओर देखते थे।
पहले तो मैंने सोचा कि शायद मेरा पहनावा और बोलने का ढंग देहाती है, इसलिए ये लोग कुछ अचम्भे में पड़ गए हैं और शायद सोच रहे हैं कि शा परिवार जैसे बड़े घराने का पता मैं क्यों पूछ रहा हूं। लेकिन थोड़ी ही देर बाद मुझे उन लोगों के व्यवहार से यह अन्दाज़ लग गया कि असल में मुझमें कोई विचित्रता नहीं है, बल्कि उस घराने के साथ कोई रहस्य जुड़ा हुआ है और उसका पता पूछने पर लोगों को आश्चर्य हो रहा है।

ऐली हालत में मुझको बार-बार अपने नगर एसेण्डेनकी याद आ रही थी, जहाँ का हर आदमी मुझको पहचानता था और मुझे चाहता था। अगर तुरन्त वहाँ लौटा जा सकता होता, तो मैं फौरन इस अजनबियों के शहर से भागकर एसेण्डेन लौट जाता, लेकिन अब मैं इतनी दूर आ चुका हूँ।
शाम होते-होते एक बुढ़िया से मेरी मुलाकात हुई, जो एक पहाड़ी पर से उतर रही थी। जब मैंने उससे शा परिवार के मकान का पता पूछा तो पहले तो उसने बड़े आश्चर्य से मेरी और घूरकर देखा, फिर वह मुझे पहाड़ी के सिरे पर ले गई और वहाँ से उसने उसके पास की घाटी में लम्बे-चौड़े मैदान के बीच खड़े एक बड़े भारी मकान की ओर इशारा कर दिया। वह मकान खण्डहर जैसा मालूम होता था। वहाँ तक कोई रास्ता ही नहीं जाता था। लगता था, जैसे वहाँ कोई रहता ही नहीं। उसकी चिमनियों से धुआँ भी नहीं निकल रहा था।

उस स्त्री ने घृणा से उस मकान की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘वह रहा शा खानदान वालों का मकान ! खून से यह बना है, खून ने ही इसको बनने से रोका है और खून ही इसको धूल में मिला देगा। बुरा हो इस मकान का और इसमें रहनेवालों का। अगर तुम वहाँ जाओ तो उन लोगों से कह देना कि मैं, जेनेट, उनके और उनके मकान के बारे में क्या कह रही थी सत्यानाश हो शा खानदान वालों का और उनके इस घर का !’’
इस तरह का शाप देकर वह स्त्री वहाँ से चलती बनी। मैं अकेला वहाँ खड़ा रह गया। उसकी बात सुनकर मेरा बुरा हाल था। उस ज़माने में लोग भूत-चुड़ैल में विश्वास करते थे और किसी के शाप से डरते थे। मारे घबराहट के मेरी तो हालत खराब थी। जब उसने दो-तीन बार खून का नाम लिया तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैं वहीं बैठकर उस मकान को कुछ देर तक देखता रहा। वह मकान तो सचमुच में बड़ा डरावना मालूम पड़ता था, लेकिन उसके आसपास का दृश्य बड़ा सुहावना था। सूरज डूब चुका था। आकाश में शाम का हल्का पीला प्रकाश फैला हुआ था। अचानक मैंने देखा कि उस मकान में धुएँ की हल्की-सी लकीर ऊपर उठने लगी है।

मैं किसी तरह एक धुँधली पगडण्डी पर रास्ता खोजते हुए आगे बढ़ने लगा। जब मैं उस मकान के पास पहुँचा तो मैंने देखा कि वह अधूरा ही बना था। देखने से लगता था कि वहाँ कोई शानदार इमारत बनने वाली थी। लम्बी-लम्बी, चौड़ी सीढ़ियाँ ऊपर तक चली गई थीं। ऊपर ऊँचे-ऊँचे खम्भों का लेकिन बिना छत का एक बरामदा बना हुआ था। धीरे-धीरे मैं मकान के दरवाज़े पर पहुँचा, जहाँ नक्काशी का बहुत बढ़िया काम किया हुआ था। लेकिन वह भी बरसों से अधूरा पड़ा था। अब अंधेरा कुछ घना होने लगा था। अन्दर कहीं आग जल रही थी, जिसका धुंधला प्रकाश खिड़कियों से दिखाई देता था। पास पहुँचने पर मुझे तश्तरियों की हल्की-सी खड़खड़ाहट सुनाई दी और फिर किसी बूढ़े आदमी के लगातार खाँसने की आवाज़ आई। लेकिन अन्दर कहीं किसी के बातचीत करने की आवाज़ नहीं आ रही थी।
मैंने जाकर दरवाज़े पर डरते-डरते थपकी दी। फिर मैं किसी के बाहर निकलने की प्रतीक्षा करने लगा। मकान में एकदम चुप्पी छा गई। तश्तरियों की खड़खड़ाहट बन्द हो गई। सिर्फ बरामदे के खम्भों के आसपास चमगादड़ मंडराते रहे। मैंने फिर से दरवाज़ा थपथपाया। अन्दर जो भी था, मेरी आवाज़ सुनकर बिलकुल चुप हो गया था और दम साधे सब कुछ सुन रहा था।

मेरा एक मन तो हुआ कि यहाँ से तुरन्त भाग निकलूँ। लेकिन साथ ही मुझे बड़ा गुस्सा भी आ रहा था, क्योंकि अन्दर कोई आदमी ज़रूर था। और वह बाहर नहीं आ रहा था। मैंने दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से लात मारना और मि. बेल्फोर का नाम पुकारना शुरू किया। कुछ ही देर में पहली मंज़िल की एक खिड़की खुली और उसमें से एक लम्बा टोप लगाए एक आदमी ने झाँका। वह अब भी रह-रहकर खाँस रहा था। उसने पूछा, ‘‘क्या है छोकरे ? क्या चाहता है तू ?’’
मैंने ऊपर देखते हुए कहा, ‘‘मैं एक चिट्ठी लेकर मि. एबेनेज़र बेल्फोर के पास आया हूँ। क्या वे अन्दर हैं ?’’
बुड्ढे ने जवाब दिया, ‘‘ठीक है, तुम चिट्ठी दरवाज़े के पास छोड़ दो और यहाँ से चलते बनो !’’
मैंने कहा, ‘‘नहीं, मुझे यह चिट्ठी मि. बेल्फोर के हाथ में देनी है। इसमें मेरा परिचय दिया हुआ है।’’
उसने चिढ़कर बड़ी रुखाई से कहा, ‘‘क्या मतलब ! कैसा परिचय ! तुम कौन हो ?’’
मैंने उसको अपना नाम बताया और अपने पिता का भी नाम बताया। अचानक मैंने अंधेरे में देखा कि बुड्ढा हाथ में एक पुराने ढंग की संदूक भी लिए था। मेरे पिता का नाम सुनते ही वह कुछ चौंका और बोला, ‘‘क्या तेरा बाप मर गया ?’’ और मेरे उत्तर को सुने बिना ही वह खिड़की में गायब हो गया।
थोड़ी देर बाद मैंने दरवाज़े के पास उसकी आहट सुनी। शायद उसने बन्दूक दीवार से टिकाकर रखी थी और फिर भड़-भड़ाकर दरवाज़ा खोला। मैं उसको देखता ही रह गया। वह खुद ही बोला, ‘‘ज़रूर तेरा बाप मर गया होगा और इसलिए तू यहाँ खड़ा मेरा दरवाज़ा तोड़ रहा है। अच्छा जब तू आ ही गया है, तो आ, अन्दर आ जा।’’ यह कहकर वह मुझको कन्धे से खींचता हुआ दरवाज़े के भीतर ले गया और फिर उसने तुरन्त दरवाज़ा बन्द कर दिया।

2

 

 

बुड्ढे ने दरवाज़ा बन्द करके जल्दी-जल्दी उसकी सांकलें बन्द कर दीं और एक मोटी-सी लकड़ी उसके पीछे लगा दी। फिर वह बोला, ‘‘जाओ, रसोईघर में चले जाओ। और खबरदार वहाँ किसी चीज़ को छूना मत !’’ यह कहकर वह फिर से दरवाज़े को मजबूती से बन्द करने में लग गया। मैं चुपचाप उधर ही बढ़ चला जिधर से आग की रोशनी आ रही थी। मैंने वहाँ जाकर देखा कि एक कोने में अच्छी तेज आग जल रही है। रसोईघर लगभग सूना पड़ा था। एक तरफ टेबल पर एक प्याले में कुछ खाने को रखा था और पास ही शराब का एक प्याला रखा था।
तब तक वह बूढ़ा लौट आया और मुझको ऊपर से नीचे तक घूरकर देखने लगा। उसकी दाढ़ी कुछ-कुछ बढ़ी हुई थी। उसका देखने का ढंग भी बड़ा विचित्र था। उसकी आँखें बराबर मुझ पर लगी थीं, लेकिन फिर भी वह मेरे चेहरे की ओर नहीं देख रहा था।
अन्त में उसने पूछा, ‘‘क्या खाओगे तुम ? उस प्याले में थोड़ी सी लप्सी पड़ी है, उसको खा लो !’’
मैंने कहा, ‘‘और आप क्या खाएँगे ?’’
बूढ़े ने खाँसते हुए और मेरे घुटने की ओर घूरकर देखते हुए कहा, ‘‘खा लो तुम उसको। मैं शराब पी लूंगा, इससे मेरी खाँसी भी हल्की हो जाएगी।’’ यह कहकर उसने शराब का प्याला उठा लिया। वह शराब पी रहा था, लेकिन उसकी एक आँख बराबर मुझ पर लगी हुई थी। अन्त में वह बोला, ‘‘लाओ, वह चिट्ठी कहाँ है ?’’
मैंने बूढ़े से कहा, ‘‘वह चिट्ठी मि. बेल्फोर के नाम है, तुम्हारे लिए नहीं है।’’

वह बोला, ‘‘तो तुम क्या समझते हो, मैं मूर्ख हूँ, मूर्ख लड़के, मैं ही बेल्फोर हूँ। लाओ, मुझे अलेक्ज़ेंडर की चिट्ठी दे दो !’’
मैंने आश्चर्य से पूछा, ‘‘क्या तुम मेरे पिताजी का घर का नाम जानते हो ?’’
वह बोला, ‘‘भला मैं नहीं जानूँगा तो और कौन जानेगा ! वह मेरा सगा भाई था। मैं तुम्हारा चाचा हूँ। लाओ, मुझे चिट्ठी दे दो और इस कुर्सी पर बैठ जाओ।’’
मैंने चिट्ठी अपने चाचा को दे दी और लप्सी खाना शुरू किया। चाचा ने चिट्टी को बार-बार अपने हाथ से उलटते-पलटते हुए पूछा, ‘‘क्या तुमने इस चिट्ठी को पढ़ लिया है ? ओह, इसकी मुहर तो अभी टूटी नहीं है, इसलिए इसको शायद तुमने अभी पढ़ा नहीं है। अच्छा, यह बताओ यहाँ क्या करने आए हो ?’’
मैंने डरते-डरते कहा, ‘‘मैं तो यहाँ आपको यह चिट्ठी देने आया हूँ।’’

चाचा ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा, ‘‘चिट्ठी देने आए हो ! बिलुकल झूठ बोल रहे हो। तुम यहाँ सिर्फ मुझे चिट्ठी देने नहीं आए हो, बल्कि किसी उम्मीद से आए हो। तुम्हारा मतलब कुछ और ही है। मुझको बनाने की कोशिश मत करो। तुमने सोचा होगा कि चलो, चाचा के यहाँ कुछ मिल जाएगा। क्यों, है न ! मैं सब जानता हूँ।’’
चाचा का यह व्यवहार मेरी समझ में नहीं आ रहा था। उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा बुरा लगा। फिर भी मैंने शान्ति से कह, ‘‘भला यह आप क्या कह रहे हैं ! पिताजी के स्वर्गवास् के बाद जब मुझे यह पता चला कि मेरे कुछ धनी रिश्तेदार भी हैं तो मैंने इतनी उम्मीद ज़रूर की थी कि वे लोग मुझे बिलकुल अनाथ नहीं रहने देंगे और मेरी मदद कर देंगे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं किसी तरह की भीख चाहता हूँ। मैं आपसे भी कुछ माँगने के लिए नहीं आया हूँ। बल्कि सिर्फ मदद की ज़रूरत है।’’

‘‘बस, बस ! ज़्यादा बक-बक मत करो !’’ चाचा ने कुछ चिढ़कर मुझे बीच में ही रोकते हुए कहा, ‘‘तुम्हें बहुत बोलना आता है ! अच्छा लाओ, कटोरा मुझे दे दो। तुम खा चुके, अब ज़रा मैं भी अपने पेट में कुछ डाल लूँ।’’ यह कहकर उन्होंने मेरे हाथ से लप्सी का कटोरा ले लिया। जल्दी-जल्दी चम्मच चलाते हुए उन्होंने थोड़ी ही देर में कटोरा खाली कर दिया। फिर कटोरा एक तरफ सरकाकर और एक डकार लेकर उन्होंने अपने लिए गिलास में थोड़ी-सी शराब और डाली। शराब की दो-एक चुस्कियां लेकर वे एकदम बोले, ‘‘तेरा बाप भी बड़ा अज़ीब आदमी था। दूसरे लोग भले ही उसकी तारीफ करें, लेकिन मुझे वह कभी भी पसन्द नहीं आया। उससे मेरी कभी नहीं पटी। खैर जाने दो, तुम्हारा इन बातों से कोई मतलब नहीं। लेकिन देखो न, उस बेईमान ने तुमको यह तक नहीं बताया कि तुम्हारा कोई चाचा भी है। और वह जिन्दा है ! उसको मेरे नाम से भी नफ़रत थी !’’
इतना कहते-कहते उन्हें ज़ोर की खाँसी आ गई। खाँसने के बाद एक कोने में थूककर वे फिर से शराब पीने लगे। फिर अचानक उन्होंने मझसे पूछा, ‘‘तुम्हारे बाप को मरे कितने दिन हुए ?’’
‘‘यही कोई तीन हफ्ते हुए।’’

‘‘हूँ, तीन हफ्ते हुए ?’’ मुँह बिचकाकर उन्होंने आगे कहा, ‘‘सचमुच बड़ा अज़ीब आदमी था तेरा बाप, एलेक्जेंडर। बड़ा चुप्पा आदमी था। किसी को अपने मन की थाह तक नहीं लगने देता था। वह मेरा भाई था, लेकिन जैसे दुश्मन से भी बढ़कर था।’’
इतना कहकर चाचा फिर चुप हो गए और शरीब पीने लगे। बीच-बीच में वे न जाने क्या बड़बड़ाते थे, और बार-बार एक कोने में थूकते जाते थे। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। ऐसे आदमी और ऐसी जगह की मैंने कल्पना तक नहीं की थी। इस बड़ी भारी उजाड़ इमारत में मेरे इस बूढ़े और चिड़चिड़े चाचा को छोड़कर और कोई नहीं रहता था। आस-पास काफी दूर तक कोई बस्ती नहीं थी। चाचा को देखकर मुझे बड़ा डर लग रहा था। इस सुनसान जगह में ऐसे आदमी के साथ मुझे रहना है, यह सोचकर मेरा दिल बैठा जा रहा था। मुझे रोना आ रहा था और पादरी साहब पर गुस्सा भी आ रहा था कि उन्होंने क्यों मुझे ऐसी जगह भेजा। मेरा मन होता था कि यहाँ से भाग निकलूँ और फिर कभी लौटकर नहीं आऊँ। लेकिन रात काफी बीत चुकी थी और यहां का रास्ता भी मेरा देखा हुआ नहीं था, इसके आलावा भागने का कोई भी रास्ता भी नहीं था क्योंकि चाचा ने मुझे अन्दर लेकर दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लिया था।
इतने में अचानक चाचा ने सिर उठाया और काफी देर तक मेरी सूरत घूरते रहने के बाद वे बोले, ‘‘खैर मरने वाला मर गया, उसकी बात छोड़ो। अब जब तुम आ ही गए हो, तो कोई बात नहीं है, यहीं रहो। काफी रात हो गई। चलो, तुम्हें सोने की जगह बता दूँ।’’

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वे बिना कोई दिया जलाए या हाथ में मोमबत्ती लिए अंधेरे में ही टटोल-टटोलकर आगे बढ़ने लगे। मैं भी गिरते-पड़ते उनके पीछे-पीछे चल रहा था। अंधेरे गिलयारों और बरामदे में होते हुए और दो-एक अंधेरे कमरों को पार करते हुए वे मुझे एक छोटे से कमरे के पास ले आए और फिर उसका ताला खोलकर बोले, ‘‘जाओ यहाँ एक खटिया पड़ी है, उस पर सो जाओ।’’

मैं दो-एक कमरे में जाने के बाद रुक गया और उनसे कमरे में रोशनी करने को कहने लगा तो वे बोले, ‘‘अरे यहाँ रोशनी की क्या ज़रूरत है। बाहर चाँद तो चमक ही रहा है। मुझे घर में जगह-जगह दीया जलाना पसन्द नहीं !’’ मैं कुछ कहूँ इसके पहले ही उन्होंने बाहर से कमरे का दरवाज़ा बन्द कर दिया, और फिर मैंने सुना कि वे ताला लगाकर वहाँ से चल दिए।
मेरी समझ में नहीं आया कि चाचा की इस हरकत पर रोऊँ या हँसूं। वह कमरा बहुत ठंडा था। बिस्तर भी बर्फ की तरह ठण्डा था। लेकिन सौभाग्य से मैं अपना बण्डल साथ ही उठाता लाया था। अंधेरे में मुझको कहीं खटिया नहीं दिखाई दी। मैं कम्बल ओढ़कर ज़मीन पर ही लेट गया। मैं बहुत थका हुआ था, इसलिए थोड़ी ही देर में मुझे नींद आ गई।
सवेरे जब मेरी आँख खुली तो मैंने देखा कि वह बहुत बड़ा कमरा था। तीन बड़ी-बड़ी खिड़कियों में से धूप का उजाला अन्दर आ रहा था। दस-बीस साल पहले यह कमरा ज़रूर बहुत सुन्दर रहा होगा, लेकिन अब तो धूल और मकड़ी के जालों से भरा हुआ था। चूहों ने कई जगह छेद कर रखे थे और दीवारों का पलस्तर गिर रहा था। बाहर धूप फैली हुई थी, लेकिन अन्दर कमरे में बहुत ठण्डक थी। मैंने दरवाज़ा भड़भड़ाया और चाचा को आवाज़ देना शुरू किया। अन्त में कुछ देर बाद आकर उन्होंने मुझे बाहर निकाला।

इसके बाद वे मुझे मकान के पीछे ले गए, जहाँ एक कुआँ था। कूएँ से पानी खींचकर मैंने हाथ-मुँह धोया और फिर मैं रसोई-घर में लौट आया। वहाँ चाचा ने आग जला रखी थी और लप्सी पक रही थी। इस समय टेबल पर दो प्याले और सींग के बने हुए दो बड़े चम्मच रखे हुए थे। पास ही शराब की एक बोतल और छोटा-सा एक प्याला पड़ा था। चाचा ने मुझसे पूछा कि क्या तुम भी शराब पीओगे। हमारे देश में जाड़े में सब लोग शराब पीते हैं। जैसे तुम लोग अपने देश में पानी पीते हो, वैसे ही हम लोगों को शराब पीनी पड़ती है। चाचा ने मेरे जवाब की प्रतीक्षा किये बिना ही एक दूसरा छोटा-सा गिलास निकाला और फिर अपने गिलास में से आधी शराब मेरे गिलास में डाल दी।
इसके बाद चाचा अपना पाइप निकालकर तम्बाकू पीने लगे और मुझसे बातें करने लगे। अब हम दोनों में काफी दोस्ती हो गई थी। दोपहर में भोजन की जगह हम लोगों ने ठण्डी लप्सी खाई और फिर शाम को गरम लप्सी खाई। मैंने सोचा कि शायद चाचा के पास लप्सी के सिवा और कुछ नहीं है।

रात में खाना खाने के बाद चाचा ने मुझसे कहा, ‘‘डेविड, जब तुम पैदा नहीं हुए थे तभी मैंने तुम्हारे पिता से वायदा किया था कि मैं तुमको चालीस पौंड भेंट के रूप में दूँगा, लेकिन यह रुपया मैंने आज तक तुम्हारे पास नहीं भिजवाया। आज तुम उसे ले लो। मैं अभी तुम्हें दे देता हूँ।’’ उन्होंने एक छोटी-सी अलमारी से कुछ सिक्के निकाले और मेरे हाथ में चालीस पौंड गिन दिए। फिर अचानक वे अपनी छाती पर हाथ रखकर खाँसने लगे। किसी तरह कुर्सी पर बैठते-बैठते उन्होंने कहा, ‘‘डेविड, मुझे दिल का दौरा हो आया है। तुम यह चाबी लो और ऊपर चले जाओ। सबसे आखिर वाले कमरे में दवा की एक संदूकची रखी है, उसको उठा लाओ।’’
मैंने कहा, ‘‘अभी ले आता हूँ, चाचा ! लेकिन क्या कोई दीया नहीं है तुम्हारे पास ! कमरे में बहुत अंधेरा होगा और पता नहीं सीढ़ी कैसी है।’’

उन्होंने हाँफते हुए कहा, ‘‘कैसा दीया ? मेरे घर में दीये का क्या काम ? तुम जल्दी चले जाओ, सीढ़ी वगैरह सब ठीक है।’’
किसी तरह अंधेरे में रास्ता टटोलते हुए मैं ऊपर चला गया। रास्ते में कई जगह टूटे कनस्तरों और लकड़ी के डिब्बों से मैं टकरा गया। एक-दो जगह मुझको टक्कर भी लगी। ऊपर इतना घना अंधेरा था कि रास्ता ढूँढ़ना भी मुश्किल हो रहा था। मुझे डर भी लग रहा था। किसी तरह मैं उस कमरे में पहुंचा। कमरा बहुत बड़ा था। लेकिन चाचा ने मुझे ठीक से रास्ता बताया था, इसलिए थोड़ी ही देर में दवाई की संदूकची मुझे मिल गई। मैं उसे लेकर नीचे लौट आया।
दवा खाकर चाचा की तबीयत कुछ शान्त हुई। किसी तरह मैं उनको सहारा देकर उनके सोने के कमरे में पहुँचा आया।
रात में अचानक जब मेरी नींद खुली, तो मैंने किसी आदमी का हाथ अपने गले पर पाया। मैं फौरन उछलकर खड़ा हो गया। कमरे में घना अंधेरा था, फिर भी मैं पहचान गया कि मेरे बिस्तर के सिरहाने चाचा खड़े हुए हैं। मैंने चीखकर कहा, ‘‘कौन हो तुम ? यहाँ क्या कर रहे हो ?’’

चाचा ने पीछे हटते हुए कहा, ‘‘कुछ नहीं डेविड, यह तो मैं हूँ। यह देखने आया था कि तुम सो गए हो या नहीं। अच्छा सोओ, मैं जा रहा हूँ।’’ यह कहकर वे मेरे कमरे से निकल गए। मुझको उनके इस व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हो रहा था और साथ ही डर भी लग रहा था। लेकिन मेरी समझ में नहीं आया कि आखिर वे ऐसा क्यों चाहते हैं; और हालाँकि वे मेरे सगे चाचा हैं, फिर मुझसे इस तरह अजनबी की तरह व्यवहार क्यों कर रहे हैं। इसी उधेड़बुन में मैं काफी देर तक जागता रहा और फिर मेरी आँख लग गई।

प्रथम पृष्ठ

विनामूल्य पूर्वावलोकन

Prev
Next
Prev
Next

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book