सिन्दबाद की सात यात्राएं - श्रीकान्त व्यास Sindbad Ki Saat Yatrayein - Hindi book by - Srikant Vyas
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सिन्दबाद की सात यात्राएं

श्रीकान्त व्यास

प्रकाशक : शिक्षा भारती प्रकाशित वर्ष : 2019
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5016
आईएसबीएन :9788174830012

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लोकप्रिय पुस्तक सेवेन वॉयेजिज आफ सिंदबाद की सरल हिन्दी रूपान्तर....

Sindbad Ki Saat Yatrayen

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सिन्दबाद की कहानी

बगदाद में खलीफा हारूं अल् रशीद के राज में एक गरीब कुली रहता था। उसका नाम था हिन्दबाद। गर्मी के दिन थे। एक दिन हिन्दबाद बहुत भारी बोझ उठाकर कहीं जा रहा था। रास्ते में थककर वह एक जगह आराम करने लगा। अचानक वह यह देखकर चौंका कि कहीं से गुलाबजल की भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। जिस जगह पर वह बैठा था। वहाँ एक बड़े मकान की ठण्डी छाया थी। हिन्दबाद को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि बगदाद में इतना बड़ा मकान और किसी का नहीं था। मकान के खुले दरवाजे से उसने देखा कि अन्दर एक बहुत बड़ा बाग था। बाग में तरह-तरह के पेड़ लगे हुए थे।

वह यह पता लगाने के लिए कि यह मकान किसका है, दीवार के साथ-साथ थोड़ी दूर आगे बढ़ा और एक खिड़की के पास जा पहुँचा। उस खिड़की में से ठण्डी-ठण्डी हवा आ रही थी और उसमें गुलाबजल की खुशबू मिली हुई थी। खिड़की पर खस की पट्टी पड़ी हुई थी। हिन्दबाद को लगा भीतर कोई दावत चल रही है। रह-रहकर अन्दर के लोगों के ठहाके मारकर हंसने की आवाज़ें आ रही थीं।

हिन्दबाद ने अचानक मुड़कर देखा तो एक चौकीदार उनकी तरफ चला आ रहा था। हिन्दबाद बहुत घबराया। उसने डरते-डरते चौकीदार से पूछा क्यों भैया यह आलीसान महल किसका है ‍?’’

चौकीदार ने कहा, ‘‘क्यों’ तुम्हें पता नहीं है ? क्या तुम बगदाद के रहने वाले नहीं हो यह मशहूर जहाज़ी सिन्दबाद का मकान है। वही सिन्दबाद जो सारी दुनियाँ की सैर कर आया है और बगदाद का सबसे अमीर आदमी माना जाता है !’’

हिन्दबाद ने कहा, ‘‘अच्छा, अच्छा, यह उसी अमीर आदमी सिन्दबाद का मकान है। मैंने पहले कभी इसे नहीं देखा था। क्या शानदार मकान है ! दुनिया की हर तरह की आरामदेह चीज़ें उसने यहाँ इकट्ठी कर रखी हैं। सब तकदीर की बात है। एक यह सिन्दबाद है और एक मैं हूँ। हम दोनों के नामों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है, फिर भी दोनों की ज़िन्दगी में कैसे ज़मीन आसमान का फर्क है। मैं दिनभर कमरतोड़ मेहनत करता हूँ। भारी बोझ उठाता हूं और फिर भी अपने बच्चों के लिए सूखी रोटी नहीं कमा पाता।’’

दोनों इस तरह बात कर रहे थे इतने में कोठी के भीतर से एक नौकर बाहर आया और हिन्दबाद के पास आकर बोला, ‘‘आओ, तुम ज़रा अन्दर चले चलो। मेरा मालिक तुमसे बात करना चाहता है।’’

हिन्दबाद की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। वह वहाँ से भागना चाहता था। उसने सोचा कि शायद अन्दर सिन्दबाद ने उसकी बातें सुन ली हैं। अब वह उसको दण्ड देने के लिए अन्दर बुला रहा है। लेकिन अब वह वहाँ से भाग नहीं सकता था क्योंकि चौकीदार और नौकर दोंनो उससे बहुत ज़्यादा तगड़े थे। उसने डरते-डरते नौकर से कहा, ‘‘भाई, मुझे, माफ करो। मुझसे गलती हो गई। मैं तो थककर थोड़ी देर आराम करना चाहता था। अब मैं चलता हूँ।’’

इस पर नौकर ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘डरो मत डरने की कोई बात नहीं। मेरे साथ अन्दर चले चलो।
सिन्दबाद से बिना मिले तुम्हें जाना नहीं चाहिए।’’

हिन्दबाद चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलने लगा। अन्दर पहुँचने पर उस आलीशान महल की शान-शौकत देखकर हिन्दबाद की आंखें फटी की फटी रह गई। चारों तरफ सुन्दर फूल खिले हुए थे और हौजों में फव्वारे चल रहे थे। संगमरमर की सीढ़ियाँ पार करके वे लोग अन्दर पहुँचे। बड़े-बड़े झाड़-फानूस और रंग-बिरंगे शीशों से सजे हुए कमरों और गलियारों में होते हुए भी एक बहुत बड़े कमरे के दरवाजे़ में वे लोग पहुँचे।

नौकर ने हरे रंग का भारी परदा उठाकर बड़े अदब के साथ हिन्दबाद को कमरे में जाने का इशारा किया। हिन्दबाद डरते-डरते उस कमरे में घुसा। पूरे कमरे में खूबसूरत कालीन बिछे हुए थे। बीच में मखमल के मोटे-मोटे गद्दों पर कुछ लोग आराम से बैठे थे। उनके बीच में कीमती तख्त पर सिन्दबाद बैठा था। आस-पास तरह-तरह के फलों और मेवों की तश्तरियाँ रखी हुई थीं। बड़े-बड़े थालों में मिठाइयाँ और तरह-तरह की खाने-पीने की चीजें सजी थीं। सब लोग बैठकर आराम से खा रहे थे और बात कर रहे थे।

जब हिन्दबाद कमरे में पहुँचा तो सिन्दबाद ने लोगों से बात करना बन्द करके उसे अपने पास आने का इशारा किया। हिन्दबाद डरते-डरते उनके पास पहुँचा और सिर झुकाकर खड़ा हो गया।
सिन्दबाद ने उससे कहा, ‘‘आओ बिरादर ! यहां मेरे पास आराम से बैठो और बताओ कि तुम कौन हो और क्या काम करते हो।’’
हिन्दबाद को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। इतना अमीर आदमी उससे इतने मीठे ढंग से बात कर रहा था ! आसपास जो लोग बैठे थे, वे भी हिन्दबाद को अपने दुश्मन जैसे नहीं लगे।

सब लोग बड़े आदर से उसकी ओर देख रहे थे।
हिन्दबाद डरते-डरते गद्दे के एक कोने पर बैठ गया और बोला ‘‘हुजूर, मैं गरीब कुली हूँ। खता माफ करो। मैंने बाहर आपकी शान में कुछ गलत बातें कह दी थीं। मैं उसके लिए माफी माँगता हूँ।’’

यह सुनकर सिन्दबाद खिलखिलाकर हंस पड़ा और हिन्दबाद की पीठ थपथपाते हुए बोला, ‘‘नहीं-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। तुमने कोई गलत बात नहीं कही। मैंने तुम्हारी सारी बातें सुन ली हैं। जब तुम बाहर बात कर रहे थे तब मैं खिड़की में ही खड़ा था। मुझे तुमसे पूरी हमदर्दी है। लेकिन एक बात मैं तुमसे कहना चाहता हूँ। तुम यह मत समझो कि यह दौलत और शान-शौकत मुझे बिना मेहनत किए ही बिना कुछ तकलीफ उठाए ही मिल गई है। इसके लिए मुझे बड़ी जोखिम झेलनी पड़ी है। मैं कई बार अपनी जान की बाज़ी लगा चुका हूँ कई साल तक मैं दुनिया की खाक छानता रहा हूँ। मैंने तूफानी समुद्रों में यात्रा की है, बियाबान जंगलों और भयानक पशु-पक्षियों से भरी हुई घाटियों में भटकता फिरा हूँ। तब कहीं जाकर आज मैं इतने आराम से दिन बिता रहा हूँ जब तुम मेरी कहानी सुनोगे और तकलीफों के बारे में जानोगे, तब तुम्हें मुझसे भी हमदर्दी होगी। मैंने अब तक सात बड़ी-बड़ी यात्राएं की हैं। मैं अभी अपने दोस्तों को अपनी पहली यात्रा की कहानी सुनाने ही जा रहा था। तुम भी आराम से बैठो। ये जो सामने खाने-पीने की चीज़े रखी हैं इनमें से जो मन आए, खाओ और मेरी कहानी सुनो-

 

सिन्दबाद की पहली यात्रा

 

 

मेरे अज़ीज दोस्तों और मेरे प्यारे मेहमानों ! आप लोगों को मालूम ही होगा कि मेरे पिता एक बहुत बड़े व्यापारी थे। उनके पास धन-दोलत की कमी नहीं थी। लेकिन जिस तरह वे कमाते थे, उसी तरह खूब खुलकर खर्च भी करते थे। दीन-दुखियों और गरीबों को दान देने का उन्हें बड़ा शौक था। इसीलिए जब वे मरे तो बहुत दिनों तक लोग याद करते रहे और आँसू बहाते रहे। बाद में उनके सारे कारोबार की देख-रेख मैं करने लगा लेकिन वे मेरी जवानी के दिन थे। मैं खूब खर्च करने लगा और ऐशोआराम की ज़िन्दगी बिताने लगा।

मैं मेहनत से घबराता था और अपने कारोबार में बहुत कम ध्यान लगा पाता था। धीरे-धीरे मेरा कारोबार चौपट हो गया। घर में जो कुछ जमा-पूँजी थी, वह भी थोड़ी-बहुत रह गई। अचानक एक दिन मुझे समझ आई कि इस तरह तो थोड़े ही दिनों में मैं रास्ते का भिखारी हो जाऊँगा। मुझे भी कुछ कमाना-धमाना चाहिए। मैंने जल्दी-जल्दी जो कुछ बचा-खुचा रुपया था, उसे बटोरा और तिजारत करने की सोची।

मैंने घर का कुछ सामान और गहने वगैरह बेचकर कुछ रुपया इकट्ठा किया। फिर मंड़ी में जाकर ऐसा सामान खरीदा जिसे मैं दूसरे शहर में बेंच सकता था। कुछ सामान मैंने व्यापारियों से उधार भी लिया।

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