किष्किंधा - नरेन्द्र कोहली Kishikindha - Hindi book by - Narendra Kohli
लोगों की राय

नाटक-एकाँकी >> किष्किंधा

किष्किंधा

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : अभिरुचि प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1998
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5211
आईएसबीएन :0000

Like this Hindi book 2 पाठकों को प्रिय

265 पाठक हैं

नरेन्द्र कोहली का श्रेष्ठतम नाटक...

Kiskindha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पात्र-परिचय

वाली : किष्किंधा का सम्राट्
सुग्रीव : युवराज, वाली के अनुज
तारा : वाली की पत्नी
रुमा : सुग्रीव की पत्नी
कटाक्ष : महामंत्री
अंगद : राजकुमार, वाली के पुत्र
जाम्बवान : सुग्रीव के सहयोगी
नील : सुग्रीव के सहयोगी
नल : सुग्रीव के सहयोगी
शिल्पी : सुग्रीव के सहयोगी
हनुमान : सुग्रीव के सहयोगी
तार : मंत्री, तारा के भाई
धूम्र : सुग्रीव के विरोधी-मंत्री
दुर्मुख : सुग्रीव के विरोधी-मंत्री
शगुन-विचारक : किष्किंधा राज्य का शगुन-विचारक
कोटपाल : नगर-कोटपाल
सेनिक : सैनिक-1
सैनिक : सैनिक-2
चंचला : प्रधान परिचारिका

दृश्य : 1


(राजसभा। तर, कटाक्ष, शगुन-विचारक अपने-अपने नियत स्थान पर बैठे हैं। सम्राट् के प्रवेश करते ही उठकर खड़े हो जाते हैं। सम्राट् सिंहासन ग्रहण कर, सबको बैठने का संकेत करते हैं। सभासद पुनः बैठ जाते हैं।)
वाली : महामंत्री !
कटाक्ष : सम्राट् !
वाली : राज्य का क्या समाचार है ?
कटाक्ष : सारी किष्किंधा सम्राट् के कल के वीर कृत्य पर उल्लसित है। एक-एक नागरिक अपने सम्राट् पर गर्व कर रहा है।
वाली : हुं।
(मौन)
तार : क्या बात है, सम्राट् कुछ स्वस्थ नहीं दीख रहे ? कहीं ऐसा तो नहीं कि कल की भाग-दौड़ से सम्राट् को क्लांति का अनुभव हो रहा हो।
वाली : क्लांति ? एक वन्य भैंसे दुंदुभि के आखेट से क्लांति हो गई ? हुं। हम सुग्रीव के समान कोमल नहीं हैं। हम वाली हैं।
कटाक्ष : निःसंदेह। सम्राट् विकट वीर हैं और सम्पूर्ण वानर राज्य में सम्राट् का शारीरिक बल और युद्ध-कौशल किंवदंतियों का रूप ले चुका है।
वाली : हुं। शगुन-विचारक !
शगुन-विचारक : सम्राट् !
वाली : अपने कल के इस वीर कृ्त्य पर हम आपकी प्रतिक्रिया जानने को उत्सुक हैं।
शगुन-विचारक : राजन् !...

वाली : हां-हां ! कहो ।
शगुन-विचारक : राजन ! कल प्रातः उपासना के लिए सागरतट पर अवश्य जाएं और कल की इस अशुभ घटना में मृत्यु टालने के लिए देवता के प्रति आभार प्रकट करें।
वाली : शगुन-विचारक ! आप कुछ चिंतित लग रहे हैं।
शगुन-विचारक : हां, सम्राट् ! मुझे चिंता है।

वाली : नगर द्वार पर खड़ा वह भैंसा दुंदुभी वाली को चुनौती दे-देकर अपनी दुंदुभी बजा रहा था। वाली ने चुनौती स्वीकार कर सम्मुख युद्ध में अपनी गदा के प्रहार से उस विराट वन्य भैंसे को, जो किसी भी वीर योद्धा के आखेट के लिए चुनौती और कसौटी था, धराशायी कर दिया। और यह अशुभ घटना हो गई ? कारण ?
शगुन-विचारक : भैंसा यम का वाहन है, सम्राट् ! उससे युद्ध उचित नहीं था। युद्ध के लिए जाने से पूर्व आपने लग्न-विचार भी नहीं करवाया। समय अच्छा नहीं था।...और प्रभु...!
वाली : कहो।
शगुन-विचारक : मतंग वन की दिशा युद्ध-अभियान के लिए सर्वथा अशुभ है। युद्ध के लिए उस दिशा में कभी न जाएं। उस दिशा में विजय नहीं पराजय है। और...।
वाली : ....और ?
शगुन-विचारक : मृत्यु की भी संभावना है।...अच्छा, राजन् ! अब अनुमति चाहूंगा।
वाली : जा सकते हैं।

(शगुन-विचारक का प्रस्थान)

वाली : अंगद और सुग्रीव कहीं दिखाई नहीं देते ?
तार : आते ही होंगे सम्राट् !
कटाक्ष : राजकुमार तो समय पर ही आते हैं; किंतु कभी-कभी युवराज सुग्रीव का साथ हो जाता है।
वाली : हुं ! सुना है आजकल भतीजे को अपने चाचा की देखा-देखी समाज-सुधार का उन्माद हो गया है !
कटाक्ष : (हंसता है।) हां, सम्राट् ! लोगों को समझाया जा रहा है कि मदिरापान से स्वास्थ्य बिगड़ता है और धन का अपव्यय भी होता है।..
वाली : हूं ! जो पान करता है, अपने धन को व्यय करता है, और अपना स्वास्थ्य नष्ट करता है; पर दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप न किया तो फिर सुग्रीव ही क्या ?

(हंसता है।)

तार : सम्राट् !
वाली : कहो, तार !
तार : अपराधियों के न्याय का समय हो गया है।
वाली : हूं ! कटाक्ष !
कटाक्ष : जी ! सम्राट् के सम्मुख पहला अपराधी प्रस्तुत किया जाए।

(सैनिकों का अपराधी को लिए हुए प्रवेश)

दोनों सैनिक : सम्राट् की जय हो !
सैनिक-1 : सम्राट् ! इस अपराधी को युवराज तथा राजकुमार ने बंदी किया है।
वाली : हुं ! तो तुम वह अपराधी हो, जिसे बंदी करने के लिए स्वयं अंगद और सुग्रीव को जाना पड़ा। तुम अपनी आकृति से विदेशी और विजातीय लगते हो। निश्चित् रूप से वानर नहीं हो। क्या नाम है तुम्हारा ?
अपराधी : मायावी।
वाली : कौन हो ?
मायावी : राक्षस।
वाली : कहां के निवासी हो ?
मायावी : लंका।
वाली : अपराध ?

मायावी : थके हुए मन को विश्राम देना।
वाली : हुं। थके हुए मन को विश्राम देना ? यह तो कोई अपराध नहीं है, विदेशी।
मायावी : मेरी भी यही विनती है सम्राट् ! किंतु युवराज नहीं चाहते हैं कि मैं किसी के थके हुए मन को विश्राम दूं। वे इसे अपराध मानते हैं।
वाली : सैनिक !
दोनों : सम्राट् !
वाली : क्या अपराध है इसका ?
सैनिक-1 : सम्राट् ! इस पर मदिरा बनाकर बेचने, वेश्यालय चलाने तथा वानर कन्याओं के अपहरण और उनके क्रय-विक्रय का अभियोग है।
(मौन)
वाली : तुम लोग जाओ।

(सैनिकों का आदरपूर्वक शीश झुकाए प्रस्थान। वाली सिंहासन से उठकर मायावी के समीप आता है।)

वाली : (स्वगत) कन्याओं के अपहरण और उनके क्रय-विक्रय का अभियोग अर्थात् थके हुए मन को विश्राम। (प्रकट) मायावी !
मायावी : सम्राट् !
वाली : यदि तुम हमारे थके हुए मन को विश्राम दे पाए तो हम समझेंगे कि तुम वैद्य का काम कर रहे हो; अन्यथा तुम अपराधी हो। जानते हो, हम अपराधी को कठोर दंड देते हैं ?
मायावी : सम्राट् एक बार सेवा का अवसर दें। यदि आपके मन को विश्राम न मिले तो मुझे मृत्युदंड दें। और यदि सम्राट् के मन को विश्राम मिले, सम्राट् स्वस्थ हों, तो सेवक को किष्किंधा में निर्बंध और उन्मुक्त रूप से अपना व्यापार करने की राजकीय अनुमति मिले।
(मौन)
वाली : स्वीकार है।

(सुग्रीव तथा अंगद का प्रवेश)

दोनों : क्षमा करें, सम्राट् !
वाली : नहीं ! नहीं ! सुग्रीव, अंगद ! आओ, आओ ! विलंब से आने पर भी सभा में तुम लोगों का स्वागत है।..तुम जा सकते हो, मायावी ! अब तुम पूर्णता स्वतंत्र हो।

(मायावी का प्रस्थान। वाली सिंहासन पर बैठता है।)

सुग्रीव : यह क्या, सम्राट् ! आपने इस अपराधी को दंड नहीं दिया ? उसे मुक्त कर दिया ?
वाली : हां, हमने उसे मुक्त कर दिया। और वह तो करना ही था। न्याय का पक्ष यही कहता था।
अंगद : किंतु, सम्राट् ! हमने तो उसे स्वयं बंदी किया था। वह सिद्ध अपराधी है।
सुग्रीव : एक नहीं, दो नहीं, उस पर अनेक गंभीर अभियोग हैं।
वाली : किंतु हमें अपराध समझ नहीं आया। वह एक व्यापारी है। व्यापारी को अपराधी तो नहीं माना जा सकता। यदि वह किसी वस्तु का उत्पादन करता है, हाट में ले जाकर उसे बेचता है, लोग अपनी इच्छा से उसे क्रय करते हैं और इस व्यापार से राज्य को कर के रूप में पर्याप्त आय होती है, तो यह अपराध कैसे है ? क्या युवराज राज्य की आय की वृद्धि से प्रसन्न नहीं हैं ? वे नहीं चाहते कि वानरों का राज्य सम्पन्न हो और प्रजा सुखी हो ? इस निर्धन समाज और राज्य की सम्पन्नता के मार्ग युवराज क्यों बंद कर देना चाहते हैं ? युवराज न केवल स्वयं राज्य-विरोधी गतिविधियों में बहुत सक्रिय हैं, वरन् राजकुमार को भी अपने प्रभाव से दिग्भ्रमित कर रहे हैं।
अंगद : क्षमा करें, सम्राट् ! युवराज मुझे दिग्भ्रमित नहीं कर रहे, वरन् राजनीति का सूक्ष्म निरीक्षण करने में मेरा मार्गदर्शन ही कर ही कर रहे हैं। अब यदि सम्राट् की अनुमति हो तो मैं अपना पक्ष प्रस्तुत करूं ?

वाली : संदर्भ ?
अंगद : अपराधी मायावी को अदंडित मुक्त किए जाने के संदर्भ में।
वाली : कहना ही चाहते हो तो कह लो, राजकुमार ! कह लो।
अंगद : वानर राज्य अत्यन्त निर्धन है। हम प्रयत्न कर रहे हैं कि हम अपने निर्लोभ परिश्रम से अपने साधनों का विकास करें। ऐसे में यदि यहां ऐसा परिवेश बना दिया जाए, जिससे परिश्रम का अवमूल्यन हो और विलास सम्मानजनक हो जाए, तो न हमारा समाज उन्नति कर पाएगा, न हमारा राज्य।
वाली : राजकुमार ! बात मायावी के अपराध की थी, राज्य की निर्धनता, उसकी उन्नति अथवा अवनति की नहीं। तुम सरल और स्पष्ट रूप से अपनी बात कह नहीं सकते और तुम्हारी इन जटिल तथा वायवीय बातों में हमारी कोई रुचि नहीं है। बैठ जाओ।
सुग्रीव : सम्राट् से नम्र विनेदन है कि मैं भी अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहता हूं।
वाली : हुं ! करो, करो।

(अंगद अपने स्थान पर बैठ जाता है।)

सुग्रीव : सम्राट् ! मधुपान का प्रचलन स्थानीय रूप से हमारे समाज में भी है, किंतु यह विशेष अवसरों पर स्वयं मधु तैयार कर, उत्सव मनाने की परिपाटी तक ही सीमित है। यदि लंका से मंगाकर, अथवा लंका की पद्धति पर तैयार करवा, सुगंधित मदिरा, सुरा और कादंब की अबाध धारा किष्किंधा के हाटों में बहाई जाएगी, तो हमारा सम्पन्न समाज उसका व्यसनी हो जाएगा। वे उसे क्रय करने के लिए अपने समाज का अधिक धन बटोरना चाहेंगे। परिणामतः अपनी अधीनस्थ प्रजा का दोहन करेंगे, उसका शोषण करेंगे। कम परिश्रम से अधिक धन कमाना चाहेंगे।...और फिर विलास तो विलास है। वह केवल मदिरा पर ही तो थम नहीं जाता। आप जानते हैं कि मायावी मदिरा के साथ-साथ वेश्या-व्यापार भी करवाता है। भोग विलास में आसक्त लोग इस राज्य की कन्याओं को वेश्या बनाने के लिए क्या नहीं करेंगे। वे ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देंगे कि एक मुट्ठी अन्न के लिए कुलांगनाओं को अपनी देह बेचनी पड़े। क्या आप चाहेंगे कि सच्चरित्र श्रमिकों का यह समाज विलास-लंपटों तथा गणिकाओं के राज्य में बदल जाए ?...सत्य है कि इस व्यवसाय से भी राज्य की आय बढ़ती है। यदि आप राजाज्ञा से, अपहृत धन का एक चौथाई अंश राज्य के कर के रूप में लेकर, दस्युवृत्ति को भी वैध व्यवसाय घोषित कर दें तो राज्य की आय अल्पकाल में ही सौ गुनी हो जाएगी।...किंतु ऐसी आय का हम क्या करेंगे ? राज्य को धन की आवश्यकता होती है प्रजा के कल्याण के लिए। प्रजा का रक्त पीकर, उसके कल्याण के लिए धन एकत्रित करना...कितना आत्म-विरोधी है ! राज्य की इस अकल्याणकारी आय के साथ-साथ समाज में निर्धनता भी बढ़ेगी, क्योंकि धन आता तो इसी समाज से है।...दिनभर के श्रम से थका-हारा श्रमिक अपने घोड़े के पारिश्रमिक से जब भोजन नहीं जुटा पाएगा तो उसी पारिश्रमिक से मदिरा के दो चार चषक पीकर अपनी चिंताओं को भूल जाने का प्रयत्न करेगा। मदिरा से प्राप्त किया हुआ कर धन नहीं, प्रजा का रक्त है।...क्या सम्राट् ऐसा धन चाहते हैं ?
(मौन)

वाली : युवराज की आशंकाएँ काल्पनिक तथा वायवीय हैं। इन से मायावी का अपराध सिद्ध नहीं होता। हाँ, युवराज के तर्क, ये राज्य-विरोधी तर्क, सम्राट् के लिए निरंतर आपत्तिजनक होते जा रहे हैं।

(वाली का द्रुत गति से प्रस्थान)

कटाक्ष : युवराज ! अन्यथा न मानें तो मैं अपनी बात कहूं।..
(सुग्रीव उसकी ओर देखता है)
कटाक्ष : स्वयं को तनिक संयत ही रखा करें। आप ज्ञानी हैं, विद्वान हैं, जागरुक हैं, तो यह भी जानते ही होंगे कि क्रोध से प्रायः बात बिगड़ जाया करती है। अपना ही पक्ष दुर्बल होता है। आप मायावी को अपराधी प्रामाणित कर दंडित करवाना चाहते थे...और आप स्वयं अपराधी, राजद्रोही और सम्राट् के शत्रु ठहराए जा रहे हैं...आप और अपराधी ?...और अपराध भी कैसा ? अपने लोगों, समाज तथा राज्य से द्रोह का....। युवराज ! यदि इन अपराधों पर तनिक गंभीरता से विचार किया जाए....
सुग्रीव : मुझे तत्काल मृत्युदंड दे दिया जाए।...य़ही न ?
कटाक्ष : नहीं ! नहीं ! मेरा अभिप्राय यह नहीं था।
सुग्रीव : तो ?
कटाक्ष : तो....। मैं चलता हूं।...

(कटाक्ष का प्रस्थान)

तार : इसका नाम कितना सटीक है—कटाक्ष। बिच्छू है एकदम, दंश का कोई अवसर नहीं चूकता। धूर्त, पापी, निर्लज्ज ! जिस राज्य में ऐसे-ऐसे सर्प कुंडली मारकर बैठे हैं, उस राज्य और प्रजा का क्या होगा ? राजा प्रत्यक्ष पाप को अनदेखा करने पर उतारू हो जाए तो राज्य को रसातल में जाने से कौन रोक सकता है ?...एक तो सम्राट् स्वयं अहंकारी हैं और अब उन्हें एक से बढ़कर एक संगी साथी मिलते जा रहे हैं।

(अनुचर का प्रवेश)

अनुचर : युवराज की जय हो !

(सुग्रीव अनुचर को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हैं।)

अनुचर: राजकुमार ! सम्राट् ने आपको तत्काल प्रासाद में स्मरण किया है।
सुग्रीव : जाओ, अंगद....।
अंगद : किंतु...।
सुग्रीव : इसे मेरा आदेश समझो।

(अंगद तथा अनुचर का प्रस्थान)

तार : क्या सोच रहे हैं, युवराज !
सुग्रीव : हां ! मायावी जैसे अपराधी का इस प्रकार अदंडित मुक्त हो जाना प्रजा के हित में तो है ही नहीं, राजकुमार और मेरे लिए अहितकर अवश्य है। यह अच्छा नहीं हुआ, तार !
तार : विलासी के लिए क्या उचित क्या अनुचित, युवराज !....मैं चर्चा से बच रहा था।...सुनकर आपको दुख होगा।
सुग्रीव : क्या ?
तार : आपके आने से पूर्व ही सम्राट् ने स्वीकार कर लिया है कि मायावी से बढ़कर उनका कोई उपकारक नहीं हो सकता। वे मायावी को अपना परम मित्र मान चुके हैं। मायावी किष्किंधा में जो चाहे कर सकता है। सम्राट् उसे कभी नहीं रोकेंगे।
सुग्रीव : कारण ?
तार : सम्राट् के अपने ही मधुपान की मात्रा कम नहीं थी; अब सुगंधित मदिरा...नव-कन्याओं द्वारा...सम्राट् के थके मन को विश्राम दिलाने का वचन दिया है मायावी ने।

सुग्रीव : ओह ! मेरे सारे स्वप्न दुःखों में परिणित होते जा रहे हैं। सण की पीठ के निकट एक-एक कर मायावी जैसे धूर्त सिमटते आ रहे हैं। सम्राट् को मित्र और शत्रु का अंतर समझाना कठिन होता जा रहा है। रावण कब से इसी प्रयत्न में है कि वानर उसके द्वारा उपलब्ध कराए गए मादक पदार्थ ग्रहण करें। उसे अनुमति दी जाए कि वह वानरों के लिए विलास के साधन जुटा सके। रावण के रथ के आगे-आगे, पहले मादक द्रव्य चलते हैं, उनके पीछे दूत, फिर गणिकाएं, अपहरण, परस्पर कलह और अंत में राक्षस सेना।...मायावी के माध्यम से सम्राट् रावण को भी अपना मित्र मानने लगेंगे। फिर रावण से विभिन्न प्रकार की विलास सामग्रियों की अपेक्षा करेंगे। उन्हें यह आभास भी नहीं है कि उन्हें रावण के राक्षसी संकेतों पर नृत्य भी करना होगा। यह किस ओर बढ़ते जा रहे हैं सम्राट् !...उन्हें कौन समझाएगा तार, कौन समझाएगा !
(अंधकार)
(प्रकाश)

दृश्य-2


(सुग्रीव का प्रासाद। सुग्रीव शैया पर लेटे हैं। रुमा का प्रवेश।)

रुमा : क्या हुआ, प्रिय ! आज तो राजसभा का समय भी निकल गया...आप इस प्रकार...। बात क्या है ?
सुग्रीव : कुछ नहीं !...बस ऐसे ही...मन कुछ भारी-सा हो रहा है...कहीं जाने की इच्छा ही नहीं हो रही।
रुमा : वैद्य को बुलाऊं ? अंगद को संदेश भेजूं ?
सुग्रीव : नहीं !.. आवश्यकता नहीं है।
रुमा : पर बात क्या है स्वामि ?...आपको भी तो जेठ जी वाला रोग तो नहीं हो गया ?
सुग्रीव : जेठ जी वाला रोग ? यह कौन-सा रोग है ?
रुमा : जैसे आपको कुछ ज्ञात ही नहीं है। राजप्रासाद में ही नहीं, सामंतों के घरों में भी चर्चा है कि जेठ जी का रोग आजकल कुछ ज्यादा ही उग्र है।
सुग्रीव : पर रोग क्या है, कुछ मालूम भी तो हो ?
रुमा : सत्य ही नहीं जानते ?
सुग्रीव : जानता हूं और नहीं भी...तुम बताओ !
रुमा : चर्चा है कि जेठ जी को नव-कन्या-रोग हुआ है, नयी कन्या न मिले तो सिर-मुंह लपेट शैया पर पड़े रहते हैं, किसी से बात नहीं करते, निकट आने वाले को काटने को दौड़ते हैं।
सुग्रीव : किसने कहा ?




प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book