Madhuyamini - Hindi book by - Shivani - मधुयामिनी - शिवानी
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मधुयामिनी

शिवानी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :131
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5214
आईएसबीएन :978-81-8361-111

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शिवानी की श्रेष्ठ दस कहानियों का संग्रह.

Madhuyamini

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

तोप

तोप से मेरा परिचय आज का नहीं, उस ऐतिहासिक युग का है, जब वह सचमुच बारूद और आग के गोले उगलती तोप थी।
हमारी खिड़की के लोहे के जंगलों से हाथ डाल कर ही उसके दुमंजिले मकान की छत छुई जा सकती थी। एक कागजी फूल की वन्यलता ने जंग लगी छत को पूरा घेर लिया था। जर्जर टीन के टुकड़ों की पत्तियाँ ठोक-ठोककर बरामदे की सुरक्षा का यथाशक्ति प्रयत्न करने पर भी एक दीवार आधी टूट गयी थी। जर्जर मकान को गिरा देने का नोटिस जब तोप को मिला, वह सीना तान कर अपनी छत पर खड़ी हो गई थी और नगर पालिका के हिन्दू चेयरमैन पर उसने ऐसी भयानक गोलाबारी की थी कि उसके मकान गिराने के दुःसाहसी प्रयास को फिर कभी नहीं दुहराया गया।

द्वितीय विश्वयुद्ध से स्तब्ध अल्मोड़ा शहर की छावनी में बाहर से आस्ट्रेलियन सिपाहियों की एक बहुत बड़ी फौजी टुकड़ी आ गयी थी। शहर की बहू-बेटियों ने मंदिरों के दर्शन के लिए भी जाना छोड़ दिया था। सूप–सी तिरछी खाकी टोपियाँ लगाए, मर्कटमुखी फौजी टुकड़ी के लम्ब-तड़ंग खबीस अपने लोहे की कील जड़े बूटों से डामर लगी सड़क का कलेजा दहलाते परेड करने निकलते, तो पटापट खिड़कियाँ बन्द होने लगतीं, पर तोप की खिड़की के पट सदा खुले रहते। यही नहीं, पल्टनी बूटों की पदचाप सुनते ही वह अपना आधा धड़ खिड़की से नीचे लटका देती, साथ ही ‘हे हनी..’ ‘हैलो, स्वीट हार्ट’ के स्वरों के पत्र-पुष्प, सीटियों से संवार कर तोप को अर्पित होने लगते, उधर तोप भी बार-बार अपनी अँगुलियाँ चूम, अदृश्य चुंबनों के गुच्छे का गुच्छा हवा में फूँककर सड़क पर बिखेर देती मैं उस निडर नारी का दुस्साहस देखकर दंग रह जाती। जिन गोरो को देखकर पहाड़ के पुरुषों के छक्के छूट जाते थे, उन्हीं से तोप की मैत्री के रहस्य को मैं समझ ही नहीं पाती थी, फिर शायद समझने की मेरी उम्र भी नहीं थी। संध्या होते ही तोप का दरबार जुट जाता। नंगी छातियों पर ‘आई लव यू’ का गोदना गुदाए, आस्ट्रेलियन लम्बे भूत-से गोरे, तोप को गोद में उठाकर ऊँचे स्वर में गाने लगते। कभी उसे चूम-चूमकर हवा में गेंद की भाँति उछाल देते, बड़ी रात तक उनका हा-हा, ही-ही, चलती, सुबह रंग-उड़ी तोप अपनी खिड़की के सामने खड़ी हो जाती तो अम्मा बौखला जातीं—‘‘एक तेरा बाप था टॉमस मास्टर ..जब तक इस हिन्दुओं के मुहल्ले में रहा, एकदम हिन्दू बना रहा। दीवालियों में दीये जलाता था, और होलियों में उड़ाता था अबीर-गुलाल एक तू है, जो नंगेपन पर उतर आई है !’’

‘‘तो वह बेचारी भी तो अबीर गुलाल ही उड़ा रही है ! अम्मा जी, क्यों बेकार कोस रही हैं !’’ छोटी भाभी खिड़की पर तोप को सुना-सुनाकर कहतीं और तीनों भाभियाँ ठहाका लगाकर हँस पड़तीं। तोप भी निर्लज्जता से हँसने लगती।
मैं अचरज से कभी भाभियों को देखती, कभी उसे। कहाँ होली खेली थी तोप ने ! रंग से उसे बेहद चिढ़ थी। पिछली होली में हमने उसे रंग से भिगो दिया, तो उसने आफत ही कर दी थी। अब समझ में आया, ईश्वर के यहाँ से प्राणों में अबीर-गुलाल भर कर लायी थी वह अद्भुत नारी। दोनों हाथों से भी उलीचने पर भी उसकी रंगीन धरोहर की मंजूषा कभी रिक्त नहीं हुई।

तोप का नाम तोप नहीं था। नाम था क्रिश्चियाना वैरोनिका टॉमस। कंठ के पुरुष-स्वर, छःफुट मर्दाना शरीर और कृष्णवर्ण को देखकर किसी कलामर्मज्ञ ने तोप नाम धर दिया था। कंठ की गर्जना से उसका स्वभाव अछूता रह गया था। प्रत्येक मोटी औरत की भाँति वह सरल और निष्कपट थी। स्त्रियों में उठना-बैठना उसे पसन्द नहीं था। उसके पिता पिथौरागढ़ के किसी स्कूल में अध्यापक थे। वहीं भोटिया लड़कों के साथ उसने प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। फिर तोप को एक मिशनरी मेम मद्रास उठा ले गयी थी। मद्रास की जलवायु ने तोप के रंग को और काला कर दिया था। ‘‘तोप, तुम इतनी काली कैसे हो गयीं ? पहाड़ पर तो डोमनियाँ भी इतनी काली नहीं होतीं।’’ हमारी सुन्दरी, रूपगर्विता भाभी कभी बड़ा क्रूर मजाक कर देतीं, पर तोप कड़े से भी कड़े व्यंग्य को चुटकियों में उड़ा देती, ‘‘मद्रास में जो रही हूँ-बोज्यू ! वहाँ के तो मुए कौवे भी काले होते हैं !’’ वह हँस देती। मिशनरी मेम की मृत्यु के पश्चात तोप फिर पहाड़ पर चली आयी थी। ऊँचे साहबी रहन-सहन से उसका काला चेहरा बुद्धि प्रदीप्त हो उठा था। तेज लाल रंग की साड़ियाँ पहनकर वह घूमने निकलती, तो छोटी भाभी फिर तुरूप लगातीं-‘‘हाय-हाय, कोयले की कोठरी में फिर आग लग गयी !’’

तोप हँसती और उन्हें चिढ़ाने के लिए बालों में पीला फूल लगा लेती-‘‘क्या करें बोज्यू, दिन-रात साली खाकी वर्दी पहनते-पहनते तबीयत ऊब गयी है, इसी से आज यह साड़ी निकाल ली।’’
तोप फौज में वैकाई बन गई थी। एक दिन अपनी खाकी वर्दी में वह हमसे मिलने आई तो तीनों भाभियाँ हँसती-हँसती दुहरी हो गयीं-‘‘क्यों जी तोप, क्या काम करना होता है फ़ौज में तुम्हें ?’’

छोटी भाभी ने उसके कान में न जाने क्या कहा और तोप लाल पड़ गयी, ‘‘हमको यह सब सस्ता मजाक पसंद नहीं है यार !’’ कहकर वह भरभराकर चली गयी थी। फिर वह हमारे यहाँ सचमुच नहीं आयी। तीसरे दिन उसकी छुट्टियाँ खत्म हो गयीं। उसे सिंकन्दराबाद जाना था। मैं स्कूल जा रही थी तो देखा, खाकी वर्दी में दोय्याल के सिर पर समान लादे तोप चली जा रही थी। वर्षों तक तोप का कोई पता नहीं लगा। इस बीच भाभी के पैर में कील चुभी। गैंग्रीन ने उनके प्राण ले लिए। मँझली भाभी के खानदान का तीन पीढ़ियों का पागलपन उन्हें भी बरेली के पागलखाने में खींच ले गया। छोटी भाभी को काले साँप ने काट खाया। प्राण तो नहीं गए पर साल में छः महीने उनकी टाँग मुगदर-सी सूजी रहती और यंत्रणा से चीख-चीखकर छटपटा उठतीं। लोहे के जंगले पकड़कर खिड़की से मैं तोप के टूटे मकान को देखती। मेरी आँखें भर आतीं। न हँसने-हँसानेवाली तीन भाभियाँ ही रह गयी थीं, न बारूद के गोले उगलने वाली तोप ! मायके की देहरी से ऐसी वितृष्णा शायद ही किसी लड़की को हुई हो !

मेरे पति की नौकरी दौरे की थी। प्रायः ही वे लम्बे दौरे पर गर्भ्या और मुनश्यारी की बीहड़ घाटियों में उतर जाते और मैं अकेली रह जाती। बच्चे बोर्डिंग में थे, इसी से मैं भी इधर-उधर घूम आती। मुक्तेश्वर मुझे बेहद पसंद है। साफ-सुथरे बँगले, पहाड़ के वक्ष को चीरती-फाड़ती, नक्शे में बनी नदियों की क्षीण रेखा-सी पतली मोटर की सड़कें, पहाड़ी लोक गीतों की मिठास से मीठी बयार में मधु घोलने वाले, सड़क साफ करते पहाड़ी गैंग, कुलियों का कंठ स्वर, छोटी-छोटी दुकानों में काठ के काले ठेकों में छलकता पीला रायता और पीली में तप्त कांचन वर्णी हल्दी से पीताभ बने जम्बू छौंके आलू। मैं प्रायः ही बहन से मिलने मुक्तेश्वर चली जाती। उस दिन भी मैं मुक्तेश्वर ही जा रही थी। श्रावण का महीना था लहँगा-दुपट्टा पहने, थाल-से, चन्द्रबिम्ब को नथ से सँवार, सुन्दरी शाहनियों का झुंड-का-झुंड जल चढ़ाने महादेव की गुफा की ओर जा रहा था। कहीं से पार्थिवपूजन के रुद्रों के श्लोकों की मधुर आवृत्ति का स्वर हवा में तैरता आया, तो मेरे ही पास बैठे एक बुजुर्ग शायद उस नए जोड़े को, जो अपने निर्लज्ज प्रेम-प्रदर्शन से उनकी बूढ़ी मज्जा जलाए जा रहा था, सुना-सुनाकर कहने लगे-‘‘कुछ भी कहो भाई, मर्यादा तो अपने कुमायूं में है; बस, और कहीं नहीं ! श्रावण का पहला सोमवार और अहाहा, भोले, तेरी महिमा की हर पहाड़ से रुद्री के श्लोक गूँज रहे हैं ! पहाड़ की सड़कों पर, देखो कहीं गन्दे विज्ञापन नहीं। लिखा भी है, तो ‘चाय छोड़ो’, ‘शराब-छोड़ो’। अब बाहर देश में चले जाओ। मेरे यार, तो कहीं दीवरों पर लिखा है क्या ? गन्दी बीमारियों का इलाज ! छिः छिः ! थू !’’ बड़ी घृणा से उन्होंने बाहर थूँका। दिशाज्ञान ठीक नहीं बैठा और उनके उड़ते थूक के पवित्र छीटों ने नये जोड़े के दोनों चेहरों को रंग दिया। फिर तो वह रंग जमा कि बस  ! जोड़ा पंजाबी था, बुरी तरह पंडित जी के पीछे पड़ गया।

उधर, बाहर गरज के साथ छींटे पड़ने लगे थे। पिछली तीन रातों से पानी बरस रहा था। बस के भीतर चल रहे गृहयुद्ध के नाटक की यवनिका को प्रकृति ने अचानक गिरा दिया। एक पहाड़ का वाम अंग भरभराकर गिर गया। ड्राइवर ने हथियार डाल दिए। वह न आगे जा सकता था, न पीछे। यात्रियों के सम्मुख उसी ने प्रस्ताव रखा-‘‘मेरे भरोसे सामान छोड़ सकें, तो आप लोग आराम से भुवाली जाकर रात बिता लीजिए। कल तक शायद कोई इन्तज़ाम हो जाए।’’
सब यात्री एक-एक कर हाथ में झोला लिए उतर पड़े। पहाड़ी ड्राइवर के ईमान को प्रहरी बनाकर सामान छोड़ने में किसी को आपत्ति नहीं थी। मैं भी अपना बैग लेकर उतर गयी। पानी बरस रहा था, पर मैंने साथ में बरसाती रख ली थी, उसी को ओढ़कर मैं तेजी से भुवाली की एक परिचित पगडंडी की ओर मुड़ गई। मेरी एक विधवा भतीजी भुवाली के स्कूल की प्रधानाध्यापिका थी,। सोचा, वहीं एक-दो दिन बिताकर नैनीताल लौट जाऊँगी।

सैनोटोरियम का गेट दिखते ही पैर ठिठक गए। कितनी ही पुरातन स्मृतियों का कलश छलक उठा। गेट से लगे रेस्ट-हाउस की कुर्सी पर बैठी बालसखी कुसमी का पीला चेहरा, फिर बड़े ताऊ जी उसी कुर्सी पर बैठे डाँडी कुलियों की प्रतीक्षा में टुकर-टुकर कभी मुझे देखते, कभी दद्दा को। कानछोरी ऊन की टोपी में उनका चेहरा किसी गोरे अंग्रेज सिपाही का-सा लग रहा है आँखें बार-बार भरी आ रही हैं। जानते हैं, एक बार सैनेटोरियन की उस ऊँची चढ़ाई को चढ़कर बिरले ही रोगी उसका उतार उतरते हैं। कुसुमी भी नहीं उतरी। बड़े ताऊजी को तो गैलपिंग टी.बी था-तीसरे ही दिन वह जीवन सबसे सुखद उतर गया।

आज भी वह छोटा-सा हवादार कमरा, मोटर की सड़क से लगा वैसे ही खड़ा है। मृत्यु-पथ के न जाने कितने यात्रियों ने इसी कुरसी पर क्षण-भर को विश्राम किया है। सामने जंगलात का एक छोटा-सा नया प्रतीक्षालय बन गया है। सैनेटोरियम को जानेवाला पथ अब मरीजों के लिए मैत्री का आह्वान लिए प्रशस्त बाहें फैलाए खड़ा है। पहली सँकरी-सी पगडंडी कहीं खो गई है। उसी प्रशस्त पथ से सरसराती एक जीप तेजी से फिसलती मेरे पास आकर अचानक रुक गई। सिर पर बैंजनी चटक स्कार्फ बाँधे, लाल कसी जीन और काले कार्डिगन में दो हाथों में फलों और अंडों से लदी-फदी एक महिला उतरकर ड्राइवर को कुछ आदेश देने लगी- ‘‘साहब को हमारा सलाम बोलना.....बहुत-बहुत। कहना, तीनों मरीजों का स्प्यूटम हम कल भेजेंगे।’’ जीप दनादन वापस चली गई।

महिला ने शायद अब तक मुझे नहीं देखा था। हाथ में बैग लिए मुझे पेड़ के नीचे खड़ी देखा, तो लपक आई- ‘किसी का बंगला ढूँढ रही हैं क्या ? कैन आई हेल्प यू ?’’ वह मुस्कुराई और फिर हाँफने लगी। साँसों के उतार-चढ़ाव के साथ-साथ कभी उसकी दाहिनी छाती तराजू के पलड़ों की भाँति ऊपर उठ रही थी, कभी बाईं।
स्पष्ट था कि उसने मुझे नहीं पहचाना। पहचानती भी कैसे ? सन् 43 में फ्रॉक पहनने वाली जिस लड़की को तोप ने देखा था, अब उसकी लड़कियों ने भी फ्रॉक पहनना छोड़ दिया था; पर तोप जरा भी नहीं बदली थी। वही गोल-गोल मांस ठुड्डियाँ विभिन्न सरिताओं की जलधारा की भाँति उसके असीम वक्षोदधि में मिलाकर एकाकार हो गई थीं। सजने का शौक, शायद बढ़ती उम्र के साथ-साथ और भी बढ़ गया था। गले में नकली मोतियो: की माला थी। होठों पर गहरी लिपिस्टिक थी। छाती अब भी तोप से तीन कदम पहले चल रही थी। सेंट की तीव्र सुगंध क्षण-भर में बीहड़ पंथ को महका उठी। तभी तो छोटी भाभी कहती थीं- ‘यह तोप तो अंग्रेजी साबुन की बट्टी-सी महकती है !’’



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