गुप्त धन - रबीन्द्रनाथ टैगोर Gupt Dhan - Hindi book by - Rabindranath Tagore
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गुप्त धन

रबीन्द्रनाथ टैगोर

प्रकाशक : भारत पुस्तक भण्डार प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5453
आईएसबीएन :81-86304-20-7

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श्रेष्ठ कहानी-संग्रह...

Gupt Dhan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मास्टर साहब

भूमिका रात के लगभग दो बजे थे। कलक्ता के शान्त समुद्र में तरंग उठाती हुई एक बड़ी बग्घी भवानीपुर की ओर से विर्जि तालाब के मोड़ के पास आकर रुकी। भाड़े की एक गाड़ी वहां देखकर गाड़ी पर सवार बाबू ने उसे बुलवाया। उसके पास हैट, कोट पहने विदेश से लौटा एक बंगाली युवक सामने के आसन पर दोनों पैर उठाए कुछ मदहोशी में सिर झुकाए सो रहा था। यह युवक हाल ही में विदेश से आया था। इसी की अभ्यर्थना के उपलक्ष्य में मित्र-मण्डली में एक दावत हुई थी। दावत से लौटते समय रास्ते में मित्र

-मण्डली में एक दावत हुई थी। दावत से लौटते समय रास्ते में एक मित्र ने उसे कुछ दूर पहुंचाने के लिए अपनी गाड़ी में बैठा लिया था। उन्होंने उसको दो-तीन बार हिलाकर जगाते हुए कहा, ‘‘मजूमदार, गाड़ी मिल गई, घर जाओ !’’
मजूमदार चौंककर एक पक्की विलायती कसम खाकर किराए की गाड़ी पर चढ़ा गया। उसके गाड़ीवान को भलीभांति ठिकाना समझाकर ब्रूहम1 गाड़ी के आरोही अपने रास्ते चले गए।
भाड़े की गाड़ी कुछ दूर सीधी जाकर पार्क स्ट्रीट के सामने के मैदान के रास्ते की ओर मुड़ी। मजूमदार ने फिर एक बार अंग्रेजी शपथ का उच्चारण करके अपने मन में कहा, ‘यह क्या ! यह तो मेरा रास्ता नहीं है !’ उसके बाद अर्द्धनिद्रित अवस्था में सोचा, ‘क्या पता, शायद यही सीधा रास्ता हो।’

मैदान में घुसते ही मजूमदार का शरीर कांप उठा। हठात् उसे लगा-कोई आदमी नहीं है फिर भी उसकी बगल की जगह मानो भरी-भरी लग रही है; जैसे उसके आसन के खाली स्थान का आकाश ठोस होकर उसे भींच रहा हो। मजूमदार ने सोचा, ‘‘यह क्या मामला है !’
‘गाड़ी मेरे साथ यह कैसा व्यवहार कर रही है !’
‘‘ऐ, गाड़ीवान ! गाड़ीवान !’’
गाड़ीवान ने कोई उत्तर नहीं दिया। पीछे की खिड़की खोलकर उसने साईस का हाथ पकड़ लिया; कहा, ‘‘तुम भीतर आकर बैठो।’’
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1.    एक प्रकार की घोड़ा गाड़ी, जो गोल होती है।

साईस ने भयभीत स्वर से कहा, ‘‘नहीं सा’ब, भीतर नहीं जायेगा।’’
सुनकर मजूमदार का शरीर रोमांचित हो गया; उसने जोर से साईस का हाथ पकड़कर कहा, ‘‘जल्दी भीतर आओ !’’
साईस ने बलपूर्वक हाथ छुड़ाया और उतरकर छूट भागा। तब मजूमदार भय से बगल की ओर ताकने लगा,कुछ भी नहीं दिखा, तो भी ऐसा लगा, जैसे बगल में कोई अटल पदार्थ एकदम सटकर बैठा हो। किसी तरह गले में बोल भरकर मजूमदार ने कहा, ‘‘गाड़ीवान, गाड़ी रोको !’’ ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे गाड़ीवान ने खड़े होकर दोनों हाथों से लगाम खींचकर घोड़ों को रोकने काप्रयत्न किया-घोड़े किसी तरह रुके ही नहीं। रुकने की बजाय दोनों रेड रोड का रास्ता पकड़कर फिर दक्षिण की ओर मुड़ गए।

मजूमदार ने घबराकर कहा, ‘‘अरे, कहां जाता।’’ कोई उत्तर नहीं मिला। बगल की शून्यता की ओर रह-रहकर कटाक्ष करते-करते मजूमदार के सारे बदन से पसीना छूटने लगा। किसी प्रकार जड़वत् होकर अपनी देहको वह जितना समेट सकते थे, समेटा, किन्तु उसने जितनी जगह खाली की उतनी ही जगह भर उठी। मजूमदार मन-ही-मन तर्क करने लगे कि ‘किसी प्राचीन यूरोपियन ज्ञानी ने कहा है-छंजनतम इवते अंबननउ-सो तो देख रहा हूं। किन्तु यह क्या है ! यह क्या नेचर है ? यदि मुझसे कुछ न कहे तो मैं अभी इसके लिए सब जगह छोड़कर कूद पड़ूं।’ कूदने का साहस नहीं हुआ-कहीं पीछे से कोई अनहोनी घटना न घट जाय। ‘पहरेदार’ कहकर पुकारने की चेष्टा की-किन्तु बड़ी कठिनाई से एक ऐसी अद्भुत क्षीण आवाज निकली की अत्यन्त भयभीत होने पर भी उसे हंसी आ गई। अंधेरे में मैदान के वृक्ष भूतों की निस्तब्ध पार्लामेंट के समान परस्पर एक दूसरे के आमने-सामने खड़े थे, और गैस के खंभे जैसे सब कुछ जानते हों फिर भी कुछ नहीं बतायेंगे, इस प्रकार खड़े हुए टिमटिमाती आलोक-शिखा द्वारा इशारे करने लगे। मजूमदार ने सोता कि चट-से कूदकर सामने के आसन पर जा बैठें। जैसे ही उसने यह सोचा वैसे ही उसे लगा, जैसे सामने के आसन से खाली एक चितवन उसके मुंह की ओर ताक रही हो। आंखें नहीं, कुछ नहीं, फिर भी एक चितवन। वह चितवन किसकी थी यह जैसे उसे याद आ रहा हो, फिर भी जैसे किसी भी तरह स्पष्ट रूप से स्मरण नहीं कर पा रहा हो। मजूमदार ने जबर्दस्ती आंख बंद करने की चेष्टा की-किन्तु भय के कारण बन्द नहीं कर पाया-उस निरुद्देश्य चितवन की ओर आंखें इस प्रकार बलपूर्वक गड़ा रखी थीं कि पलक गिरना का भी अवसर न मिला।

इधर गाड़ी बार-बार मैदान के ही रास्ते पर उत्र से दक्षिण और दक्षिण से उत्तर चक्कर काटती हुई घूमने लगी। दोनों घोड़े जैसे उन्मत्त हो उठे हों-उनका वेग उत्तरोत्तर बढ़ चला-गाड़ी की थर-थर कांपती हुई खिड़कियों से खट-खट आवाज होने लगी।
इतने में गाड़ी जैसे किसी से टकराकर जोर से धक्का खाकर हठात् रुक गई। मजूमदार ने चौंककर देखा, उसी के रास्ते पर गाड़ी खड़ी है और गाड़ीवान उसको हिलाकर पूछ रहा है, ‘‘साहब, कहां जाना होगा, बताइए !’’
मजूमदार ने नाराज होकर पूछा, ‘‘इतनी देर मुझे मैदान में क्यों घुमाया ?’’
गाड़ीवान ने आश्चर्य से कहा,‘‘कहां मैदान में तो नहीं घुमाया।’’
मजूमदार ने विश्वास न करते हुए कहा, ‘‘तब क्या यह केवल स्वप्न था।’’
गाड़ीवान ने कुछ सोचते हुए डरकर कहा, ‘‘बाबू साहब, शायद, यह केवल स्वप्न   हो। आज तीन वर्ष हुए मेरी इसी गाड़ी में एकघटना घटी थी।’’

उस समय मजूमदार का नशा और नींद का झोंका पूरी तरह दूर हो जाने के कारण वह गाड़ीवान की कहानीसुने बिना ही भाड़ा चुकाकर चला गया।
किन्तु, रात में उसे अच्छी तरह नींद नहीं आई-बस, यही सोचता रहा, वह चितवन थी किसकी।
अधर मजूमदार के पिता साधारण शिप-सरकारी1 पद से आरम्भ करके एक बड़े फर्म के कारिन्दे के पद तक पहुंच गए थे। अधर बाबू पिता द्वारा उपार्जित नगद रुपयों को ब्याज पर लगाते थे, उनको स्वयं परिश्रम नहीं करना पड़ता था। पिता सिर पर सेद सफ़ेद साफा बांधकर पालकी में बैठकर ऑफिस जाते थे, दूसरी ओर वे क्रिया-कर्म, दान-ध्यान भी पर्याप्त करते थे। विपद्-आपद् अभाव-अकाल में सभी श्रेणी के लोग आकर उन्हें घेरते, इसे वे गर्व का विशय समझते थे।

अधर बाबू ने बड़ा घर बनवा लिया है, गाड़ी-घोड़ा ले लिया है, किन्तु लोगों के साथ उनका संपर्क नहीं है; केवल रुपया उधार देने वाला दलाल आकर उनके भरे हुए हुक्के से तम्बाकू पी जाता है और एटर्नी के ऑफिस के बाबुओं के साथ स्टाम्प लगी दलील की शर्त के विषय में बात चीत बोती रहती है। उनकी गृहस्थी के खर्ते से संबंधित हिसाब की ऐसी खींचतान है कि मुहल्ले के फुटबॉल-क्लब के पीछा न छोड़ने वाले लड़के तक बहुत प्रयत्न करने पर भी उनके खजाने से कुछ नहीं वसूल पाते।
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1.जहाजों पर आने-जाने वाले माल-असबाब के प्रबन्ध-विभाग का साधारण कर्मचारी।

ऐसी स्थिति में उनकी गृहस्थी में एक अतिथि का आगमन हुआ। लड़का नहीं हुआ, नहीं हुआ, करते करते बहुत दिन बाद उनके एक लड़का पैदा हुआ। लड़का का चेहरा मां की तरह था। बड़ी-बड़ी,आंखें नुकीली नाक, रजनीगन्धा की पंखुड़ी के समान रंग-जिसने देखा, उसी ने कहा,‘‘आहा ! लड़का क्या है, मानो कार्तिकेय हो।’’ अधर बाबू का अनुगत अनुचर रतिकान्त बोला, ‘‘बड़े घर में जैसा लड़का होना चाहिएवैसा ही हुआ है।’’

लड़के का नाम रखा गया बेणुगोपाल। इससे पहले अधर बाबू की स्त्री ननीबाला ने गृहस्थी के खर्चे के विषय केपति के विरुद्ध अपना मत इस तरह बलपूर्वक कभी प्रदर्शित नहीं किया था। अपने शौक की दो एक बातों अथवा दुनियादारी के अत्यावश्यक कार्यों को लेकर बीच बीच में बहस अवश्य हुए हैं, किन्तु अन्ततः पति की कृपणता के प्रति अवज्ञा दिखाकर चुपचाप हार मान ली है।

इस बार ननीबाला की अधरलाल नहीं दबा सके, वेणुगोपाल को लेकर उनका हिसाब कदम-कदम आगे बढ़ने लगा। उसके पैरों की पैंजनी हाथ का बाला, गले का हार सिर की टोपी, उसकी देशी-विलायती नाना प्रकार की, नाना रंग की वेशभूषा के संबंध में ननीबाला ने जो कुछ मांग की, सभी उन्होंने कभी चुपचाप आंसू बहाकर, कभी जोरकी वाक्य-वर्षा द्वारा प्राप्तकर ली। वेणुगोपाल के लिए जो जरूरी हो वह भी; और जो जरूरी न हो वह भी चाहिए ही चाहिए-वहां खाली खजाने का बहाना या भविष्य के लिए कोरा आश्वासन एक दिन भी न टिक सका।
वेणुगोपाल बड़ा होने लगा। वेणु के लिए खर्च करने का अधरलाल को अभ्यास हो चला।उनके लिए अधिक मासिक वेतन देकर खूब पढ़-लिखा एक बूढ़ा मास्टर रख लिया। इन मास्टर ने मीठी बोली और शिष्टाचार द्वारा वेणु को वश में करने की बहुत कोशिश की किन्तु वे शायद आज तक छात्रों पर बराबर कड़ा अनुशासन रखकर मास्टरी की मर्यादा को अक्षुण्य रखते आए थे, इसलिए उनकी भाषा की मिष्टता और व्यवहार की शिष्टता निरी बेसुरी ही लगती रही-यह शुष्क साधना लड़के को बहला न सकी।

ननीबाला नेअधरलाल से कहा, ‘‘यह तुम्हारा मास्टर कैसा है ? इसे देखते ही लड़का घबरा जाता है। इसे छुड़ा दो!’’
बूढ़ा मास्टर विदा हो गया।पुराने समय में लड़कियां जिस प्रकार स्वयंवरा होती थीं उसी प्रकार ननीबाला का बेटा स्वयं मास्टर बनने चतला-वह जिसे स्वीकार नहीं करेगा उस की सारी डिग्रियां और सर्टिफिकेट व्यर्थ हैं।

इसी समय देह पर एक मैली चादर डाले औरपैरों में कैनवास का फटा जूता पहने मास्टर की उम्मीदवारी के लिए हरलाल आ पहुंचा। उसकीविधवा मां ने दूसरे के घर की रसोई बनाकर और धान कूटकर उसे मुफस्सिल एंट्रेंस स्कूल से किसीप्रकार एंट्रेंस पास करा दिया था। अब हरलाल कलकत्ता के कॉलेज में पढ़ने के लिए प्राणपण से प्रतिज्ञा करके बाहर निकला था। भोजन के बिना उसके मुंह का निचला भार सूखकर भारतवर्ष की ‘कन्या कुमारी’ के समान नुकीला हो गया था, केवल चौडा माथा हिमालय की भांति प्रशस्त होकर आंखों को आकर्षित करता था।मरुभूमि की बालू से सूर्य की किरणें जिस प्रकार टकराकर लौटती हैं उसी प्रकार उसके नेत्रों से दैन्य की एक सस्वाभाविक दीप्ति निकल रही थी।
दरबान ने पूछा, ‘‘तुम क्या चाहते हो ? किसे चाहते हो ?’’

हरलाल ने डरते-डरते कहा, ‘‘घर के मालिक के साथ भेंटकरना चाहता हूं।’’
दरबान ने कहा, ‘‘भेंट नहीं होगी।’’ इसके उत्तर में हरलाल क्या कहे, यह न सोच पाने के कारण इधर-उधर कर रहा था, तभी सात वर्ष का लड़का वेणुगोपाल बाग में खेल खत्म करके ड्योढ़ी मे आ पहुंचाय़ हरलाल को द्विविधा में देखकर दरबान ने फिर कहा, ‘‘बाबू चले जाओ।’’
वेणु को अचानक जिद सवार हो गई-उसने कहा, ‘‘नहीं जायेगा।’’ यह कहते हुए उसने हरलाल का हाथ पकड़कर उसे दोतल्ले के बरामदे मे अपने पिता के पास ले जाकर हाजिर किया।
बाबू उस समय दिवा-निद्रा पूरी करके जड़ालस भाव से बरामद में बेंत की कुर्सी पर चुपचाप बैठे पैर हिला रहे थे और बूढ़ा रतिकान्त काठ की एक कुर्सी पर आसन लगाए बैठा हुआ धीरे-धीरे हुक्का पी रहा था। उस दिन के ऐसे समय ऐसी अवस्था में दैवयोग से हरलाल मास्टर पर बहाल हो गया।

रतिकान्त ने प्रश्न किया, ‘‘आप कहां तक पढ़े हैं।’’
हरलाल ने कुछ मुंह नीचा करके कहा, ‘‘एंट्रेंस पास ! मैंने तो समझा था, कॉलेज में पढ़ चुके हैं। आपकी उम्र भी तो कुछ कम नहीं दिखती।’’
हरलाल चुप रह गया। आक्षित और आश्रय-प्रत्याशियों को प्रत्येक प्रकार से पीड़ित करना ही रतिकान्त के आनन्द का प्रधान विषय था।
रतिकान्त ने प्यार से वेणु को अपनी गोद के पास खींचने का प्रयत्न करते हुए कहा, ‘‘कितने एम.ए., बी.ए आए और गए,कोई पसन्द नहीं आया-भला अन्त में क्या सोना बाबू एंट्रेंस पास मास्टर से पढ़ेंगे।’’
वेण ने रतिकान्त के स्नेहाकर्षण से अपने को जबर्दस्ती छुड़ाकर कहा, ‘‘हटो।’’ रतिकान्त को वेणु किसी तरह सहन नहीं कर पता था, किन्तु रति भी वेणु की इस अहिष्णुता को उसके बाल्य-माधुर्य का एक लक्ष्य समझकर उसमें खूब आनन्दित होने की चेष्टा करता, और उसको सोनाबाबू, चांदबाबू कह-कहकर चिढ़ाकर आग-बबूला कर देता।

हरलाल को उम्मीदवारी में सफलता पाना कठिन हो गया; वह मन-ही-मन सोच रहा था, कि बस, अब किसी सुयोग से कुर्सी से उठकर बाहर चला जाय तो जान बचे। तभी सबसा अधरलाल के मन में आया कि इस छोकरे को बिल्कुल मामूली वेतन देकर भी रखा जा सकताहै।अन्त में तय हुआ कि हरलाल घर में ही रहेगा, खायगा और पांच रुपया महीना वेतन लेगा। घर में रखने से जितनी अतिरिक्त दया प्रदर्शित करनी होगी उसके बदले मे अतिरिक्त काम करा लेने से वह दया सार्थक हो सकेगी।

इस बार मास्टर टिक गया। प्रारम्भ से ही हरलाल के साथ वेणु की ऐसी जमी जैसे दोनों भाई हों। कलकत्ता में हरलाल का आत्मीय मित्र कोई नहीं था-इस सुन्दर नन्हे लड़के ने उसके सम्पूर्ण हृदय पर अधिकार कर लिया। अभागे हरलाल को इससे पहले किसी व्यक्ति से इस प्रकार स्नेह करने का सुयोग नहीं मिला था। किसी तरह उसकी अवस्था सुधर जाय, इसी आशा में उसने बड़े कष्ट से पुस्तकें इकट्ठी करके अकेले अपने प्रयत्न से दिन-रात पढ़ाई ही की थी। मां को पराधीन बनकर रहना पड़ा। इससे लड़के की बाव्यवस्था केवल संकोच ही में बीती-रोट-टोक की सीमा लांघकर नटखटपन द्वारा अपने बाल्यप्रताप को विजयी बनाने का सुख उसे कभी नहीं मिली। वह किसी के दल में नहीं था, वह अपनी फटी किताब और टूटी स्लेट के बीच नितान्त अकेला था। जगत् में जन्म लेकर जिस लड़के को बचपन में ही गुम-सुम भला आदमी बनना पड़े, बचपन से ही माता का दुःख और अवस्था समझकर जिसे सावधानी से चलना पड़े, एकदम अविवेकी होने की स्वाधीनता जिसके भाग्य में कभी न जुटे, प्रसन्न होकर चंचलतादिखाना या दुःख पाकर रोना, इन दोनों को ही जिसे दूसरे लोगों की असुविधा और नाराजी के भय से सारी बाल्य-शक्ति का प्रयोग करके दबाकर रखना पड़े-उसके समान करुणा का पात्र फिर भी करुणा से वंचित जगत् में और कौन है !

विश्व के सब मनुष्यों के नीचे दबा पड़ा हुआ यह हरलाल स्वयं भी नहीं जानता था कि उसके मन के भीतर इतना स्नेह-रस अवसर की अपेक्षा में इस प्रकार जमा था। वेणु के साथ खेलकर,उसे पढ़ाकर, अस्वस्था के समय उसकी सेवा करके हरलाल भली भांति समझ गया कि कि अपनी स्थिति सुधारने से भी बढ़कर मनुष्य के लिए एक और चीज है-वह जब मिल जातीहै तब उसे और कुछ अच्छा नहीं लगता।

वेणु भी हरलाल को पाकर जी उठा। कारण, घर में वह अकेला लड़का था, एक बहुत ही छोटी तीन वर्ष की एक बहन थी-वेणु उसे साथदेने के योग्य ही नहीं समझता था। मुहल्ले में समवयस्क लड़कों की कमी नहीं थी, किन्तु अधरलाल द्वारा मन-ही-मन अपने घर को अत्यन्त बड़ा घर समझ लेने के कारण वेणु के भाग्य में मिलने-जुलने योग्य लड़के नहीं जुटे। इस कारण हरलाल उसका एकमात्र संगी हो गया। अनुकूल परिस्थितियों में वेणु की जो सारी शैतानी दस जनों मे बंटकर एक ओर सहन योग्य हो सकती थी वह सब अकेले हरलालको सहन करनी पड़ती। यह सारा उपद्रव प्रतिदिन सहन करते करते हरलाल का स्नेह और भी दृढ़ होने लगा रतिकान्त कहना लगा, ‘‘हमारे सोना बाबू को मास्टर साहब चौपट करने पर तुले हैं।’’ अधरलाल को भी बीच बीच में लगने लगता, मानो मास्टर के साथ छात्र का सम्बन्ध शायद यथोचित न हो। किन्तु हरलाल को वेणु से अलग कर सके, ऐसी सामर्थ्य अब किसमें थी ?

वेणु की अवस्था अब ग्यारह की थी। हरलाल एफ.ए. पास करके छात्रवृत्ति पाकर तृतीय वर्ष में पढ़ रहा था। इस बीच में कॉलेज में उसको एक दो मित्र ने जुटे हों ऐसी बात न थी, किन्तु वह ग्यारह साल का लड़का उसके सब मित्रों से बढ़कर था। कॉलेज से लौटकर वेणु को लेकर वह गोलदीघी और किसी किसी दिन ईडन गार्डन घूमने जाता। उसको ग्रीक इतिहास के वीर पुरुषों की कहानी सुनाता, थोड़ी थोड़ी करके बंगला मेंस्कॉट और विक्टर ह्यूगो की कहानियां-सुनाता-उच्च स्वर में अंग्रेजी कविता की आवृत्ति करके सुनाता और अनुवाद करके उसकी व्याख्या करता, माने बता-बताकर शेक्सपियर का ‘जूलियास सीजर’ पढ़-पढ़कर उसमें से उसे एण्टनी की वक्तृता कण्ठस्थ कराने का प्रयत्न करता। वह नन्हा-सा बालक हरलाल के मन में उद्बोधन के लिए मानोसोने की छड़ी1 बन गया था।जब वह अकेला बैठकर पाठ याद करता था तब अंग्रेजी साहित्य में उसका इतना मन नहीं लगता था। अब इतिहास, विज्ञान साहित्य जोकुछ भी वह पढ़ता उसमें
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1.    एक लोक-प्रचलित कथा, जिसमें राजकुमार ने सोने की छड़ी छुआकर सोती हुई राजकुमारी को जगा लिया था। सोने की छड़ी प्रेम तथा जगृतावस्था की प्रतीक है।

थोड़ा-सा रस पाते ही वह उसे पहले वेणु को देने के लिए आग्रह अनुभव करता और वेणु के मन में उस आनन्द का संचार करने के प्रयत्न में ही उसकी अपनी समझाने की शक्ति और आनन्द का अधाकार मानो बढ़कर दुगुना हो जात।
वेणु स्कूल से आते ही किसी प्रकार झटपट जलपान समाप्त करके हरलाल के पास जाने के लिए एकदम अधीर हो जाता, उसकी मां उसे किसी भी बहाने से, किसी भी प्रलोभन से घर में नहीं रोक पाती थी। ननीबला को यह अच्छा नहीं लगता था। उसेलगता कि हरलाल अपनी नौकरी बनाए रखने के लिए लड़के को इस प्रकार वश में रखने का प्रयत्न कर रहा है। उसने एक दिन हरलाल को बुलाकर पर्दे की ओट में से कहा, ‘‘तुम मास्टर हो, लड़के को बस एक घंटा सवेरे और एक घंटा शाम को पढ़ाओ-दिन रात उसकेसाथ क्यों लगे रहते हो। आजकल तो वह मां-बाप किसी कोभी नहीं मानता। वह कैसी शिक्षा पा रहा है ! पहले जो लड़का मां का नाम सुनते ही नाच उठता था, आजवह बुलाने पर भी हाथ नहीं आता। वेणु अपने बड़े घर का लड़का है, उसके साथतुम्हारा इतना मेल-जोल किसलिए ?’’

उस दिन रतिकान्त अधर बाबू के साथ बातें कर रहा था कि उसकी जान-पहचान के ऐसे तीन-चार आदमी हैं, जिन्होंने बड़े आदमियों के लड़कों की मास्टरी करते हुए लड़कों कामन इस तरह वश में कर लिया था कि लड़कों की जायदाद का अधिकारी बनने पर उन्होंने सर्वेसर्वा बनकर लड़कों को अपनी इच्छानुसार चलाया था। हरलाल को ही इशारा करके ये सब बातें कही जा रही थीं, यह समझने में हरलाल को देर न लगी। तो भी उसने चुप रहकर सब सह लिया। किन्तु, आज वेणु की मां की बात सुनकर उसकी छाती फट गई। वह समझ गया कि बड़े आदमियों के घरों में मास्टर की क्या इज्जत है। गोशाला में लड़के के दूध के लिए जैसे गाय रखी जाती है उसी प्रकार उसको विधा प्राप्त कराने के लिए एकमास्टर भी रखा जाता है-विद्यार्थी के साथ स्नेहपूर्ण आत्मीयता का सम्बन्ध स्थापित करना इतना बड़ा दुस्साहस है कि घर के नौकरों से लेकर मालकिन तक कोई भी इसे सहन नहीं कर सकता; और सभी उसे स्वार्थ-साधन कीचातुरी समझते हैं।

हरलाल ने कम्पित स्वर से कहा, ‘‘मां, वेणु को मैं केवल पढ़ाऊंगा ही, उसके साथ मेरा और कोई सम्पर्क न रहेगा।’’
उसदिन शान को वेणु के साथ खेलने के समय हरलाल कॉलेज से ही नहीं लौटा। किस प्रकार सड़कों पर घूम-घूमकर उसने समय काटा, यह वही जानता था।सन्ध्या होने पर जब वह पढ़ाने आया तो वेणु मुंह फुलाए रहा। हरलाल अपनी अनुपस्थिति की कोई सफाई दिए बिना पढ़ा गया-उस दिन पढ़ाई अच्छी तरह नहीं हुई।

हरलाल प्रतिदिन रात रहते उठकर अपने कमरे में बैठकर पढ़ता। वेणु सवेरे उठकर मुंह धोकर दौड़कर उसके पास जाता। बगीचे में पक्के हौज में मछलियां थीं। उनको लाई खिलाना इनका एक काम था। बगीचे के एककोने में बहुत से पत्थर सजाकर छोटे-छोटे रास्ते और छोटा गेट और अहाता बनाकर बेणु ने बालखिल्य ऋषि के आश्रम के उपयुक्त एक बहुत छोटा-सा बाग बना लिया था। उस बगीचे पर माली का कोई अधिकार न था। सवेरे इस बगीचे की देखभाल करना इनका दूसरा काम था। उसके बाद धूप चढ़ने पर घर लौटकर वेणु हरलालट के साथ पढ़ने बैठता। कल शाम को कहानी का अंश सुने बिना रह गया था, उसको सुनने के लिए आज वेणु यथासंभव तड़के उठकर दौड़कर बाहर आया था। उसने सोचा था, सवेरे उठने में आज उसने मास्टर साहब को जीत लिया है। कमरे में आकर देखा, मास्टर साहब नहीं हैं। दरबान से पूछने परपता लगा, मास्टर साहब बाहर निकल गए हैं।

उस दिन भी सवेरे पढ़ते समय वेणु नन्हें हृदय की वेदना लिये मुंह गम्भीर बनाए बैठा रहा। सवेरे हरलाल क्यों बाहर निकल गया था, यह भी नहीं पूछा। वेणु के मुंह की ओर देखे बिना हरलाल किताब के पन्नों पर आंखें गड़ाए पढ़ता गया। वेणु घर के भीतर अपनी मां के पास जब खाने बैठा तब उसकी मां ने पूछा,‘‘कल शाम से तुझे क्या हो गया है-बता तो सही। मुंह हांड़ी-सा क्यों कर लिया है-अच्छी तरह खाता भी नहीं-बात क्या है !’’

वेणु ने कोई उत्तर नहीं दिया। खाने केबाद मां ने उसे पास खींचकर उसकी देह पर हाथ फेरकर खूब स्नेह दिखाते हुए जब बार बार उससे पूछना शुरू किया, तब वह और नहीं रह सका, फफक-फफककर रो पड़ा। बोला,‘‘मास्टर-साहब-’’
मां ने कहा, ‘‘मास्टर साहब ने क्या किया है। अभियोग क्या था, उसे भाषा में व्यक्तकरना कठिन था।
ननीबाला ने कहा, ‘‘मालूम होता है, मास्टर साहब ने तेरी मां के सम्बन्ध में तुझसे कुछ लगाया है।’’
इस बात का कोई अर्थ न समझ सकने केकारण वेणु बिना उत्तर दिए चला गया। इस बीच अधर बाबू के घर से कुछ कपड़े-लत्ते चोरीहो गए। पुलिस को खबर दी गई। पुलिस ने खाना-तलाशी में हरलाल के बक्स की भी तलाशी करना नहीं छोड़ा। रतिकान्त ने अत्यन्त निरीह भाव से कहा, ‘‘जिस व्यक्ति ने चोरी की है वह क्या माल बक्स में रखेगा।’’
सामान का कोई पता न लगा। इस प्रकार का नुसान अधरलाल के लिए असह्य था। वे दुनिया के सभी लोगों पर नाराज हो गए। रतिकान्त ने कहा, ‘‘घर में अनेक आदमी हैं, किसको दोषी ठहराएं, किस पर सन्देह प्रकट करें। जिसको जब खुशी होती है, आता-जाता है।’’

अधरलाल ने मास्टर को बुलवाकर कहा, ‘‘देखो,हरलाल अब किसी को भी घर में रखना हमारे लिए सुविधाजनक न होगा। आज से तुम अलग घर में रहकर वेणु को निश्चित समय पर पढ़ा जाया करो, यही करना ठीक होगा-न हो तो मैं तुम्हारे लिए दो रुपये महीना बढ़ाने को राजी हूं।’’

रतिकान्त हुक्का पीते हुए बोला, ‘‘यहतो बड़ी अच्छा बात है-दोनों ही के लिए अच्छा है।’’
हरलाल सिर झुकाए सुनता रहा। उस समय वह कुछ न कह सका। घर आकर बाबूको चिट्ठी लिख भेजी, ‘‘कई कारणों से वेणु को पढ़ना उसके लिए सम्भव नहीं होगा, अतएव आजही वह विदा लेने के लिए तैयार है।’’



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