मेरी दीवार पर - अय्यप्प पणिक्कर Meri Deewar par - Hindi book by - Ayyappa Paniker
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मेरी दीवार पर

अय्यप्प पणिक्कर

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 563
आईएसबीएन :81-263-0885-0

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इस पुस्तक में मलयालम कवि अय्यप्प पणिक्कर की संकलित कविताओं का अनुवाद इस तरह से प्रस्तुत किया गया है कि ये मूल कविता का सा आनन्द देती है..

Meri Deewar par - A hindi book by ayyappa paniker

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अय्यप्प पणिक्कर मलयालम में आधुनिक कविता के प्रवर्तक माने जाते हैं। वे पहले कवि हैं जिन्होंने मलयालम में पूर्ण यथार्थवादी समसामयिक एवं रोजमर्रा की बोलचाल में कविता लिखने का साहस किया। छन्द रहित कविता रचना के साथ-साथ वे नये छन्दविधान और नयी शैली के जन्मदाता भी हैं। दूसरे शब्दों में पणिक्कर ने परम्परा को तोड़ते हुए परम्परा का इस तरह अनुमोदन किया कि मलयालम कविता को नयी राह मिली। उनकी बहुचर्चित लम्बी कविता कुरूक्षेत्र मलयालम साहित्य में आधुनिक कविता का प्रवेशद्वार कहा जा सकता है। अय्यप्प पणिक्कर की कविताएँ जिन्दगी के प्रत्येक रूप का स्पर्श करती दिखाई देती हैं। यथार्थ के कटु सत्य को उकेरने में उनकी कलम हिचकती नहीं। उनकी छोटी कविताएँ तो और भी प्रभावी ढंग से सत्य की अभिव्यक्ति करती है। पणिक्कर की कतिपय कविताओं में क्षेत्रीय लोक शैली की झलक भी मिल जाती है। ऐसी कविताएँ मलयालम काव्यमंच पर काफी धूम मचा चुकी है। वैसे तो पणिक्कर की कविताओं का अनुवाद करना एक चुनौतीभरा कार्य है,किन्तु अनुवादक ने इस पुस्तक में संकलित कविताओं का अनुवाद इस तरह से प्रस्तुत किया है कि ये मूल कविता का सा आनन्द देती है। इस संकलन को प्रस्तुत कर भारतीय ज्ञानपीठ गौरव का अनुभव करता है।

कवि और कविता

अय्यप्प पणिक्कर मलयालम कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उन्हें आधुनिक मलयालम कविता के प्रवर्तक और प्रयोक्ता के रूप में जाना जाता है। उन्होंने जब कविता लिखना शुरू किया उस वक्त मलयालम कविता कवित्रय (आशान, उल्लूर और वळळत्तोळ) से अत्यन्त प्रभावित थी। चंगपुष़ा की अतिवेदनामयी कविताओं ने भी युवा कवियों को अतिभावुकता का शिकार बना दिया था। शंकर कुरूप और बालमणिअम्मा की कविताओं में यथार्थ के समीप पहुँचने की ईमानदार कोशिश थी, किन्तु उनका अनुकरण अधिक नहीं हुआ। तत्कालीन कवि अति तरलता को कविता का पर्याय मानने लगे थे। वस्तुत: कड़वे यथार्थ को उसी कड़वाहट के साथ प्रस्तुत करने का साहस किसी में दिखाई नहीं दे रहा था। अय्यप्प पणिक्कर ने इस प्रभाव से मुक्त हो कर पूर्ण यथार्थवादी, समसामयिक, रोजमर्रा की बोलचाल में कविताएँ लिखने का साहस किया। उन्होंने न केवल छन्दरहित कविताएँ रचने का साहस किया बल्कि नये छन्दविधान और नयी शैली को भी जन्म दिया। उन्होंने परम्परा को तोड़ते हुए परम्परा का इस तरह से अनुमोदन किया कि मलयालम कविता को नयी राह मिल गयी। अय्यप्प से पहले लिखी गयी वेदनामय कविताएँ आत्म दुख को मण्डित करती हुई पाठक को कवि के लोक में ले जाती थीं, वहीं पणिक्कर की कविताओं में पाठक ही वक्ता का स्थान ले लेता है। कविता आत्म से अलग हो आम जन से जुड़ाव कर लेती है। वाग्विलास के स्थान पर वस्तुस्थिति को इस तरह से रखा जाता है कि सब कुछ पाठक के निर्णय पर निर्भर करने लगता है। वह वक्ता और पाठक के बीच में स्वत्व को छिपाये रखते हुए विभिन्न दृश्यों की अवतारणा करते हैं। वह छन्दों को तोड़मरोड़ कर नये रूप में रखते हैं, पुराणों की पुनर्व्याख्या करते हैं और बोलचाल की भाषा को साहित्य में लाते हैं।

पणिक्कर की बहुचर्चित लम्बी कविता ‘कुरुक्षेत्र’ मलयालम साहित्य में मील का पत्थर मानी जाती है। इसे मलयालम साहित्य में आधुनिकता का प्रवेश-द्वार माना जा सकता है। इस कविता की रचना में छह वर्ष (1952 से 1958) लगे, प्रकाशित होने में पुन: समय लग गया (1960), क्योंकि सम्पादक को सन्देह था कि इस तरह की गम्भीर कविता के लिए पाठक तैयार नहीं हैं। इस कविता का देश-विदेश की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। कुरुक्षेत्र कविता में पाँच भाग हैं, कविता का आरम्भ अवश्य ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ श्लोक से हुआ है किन्तु बाद में पूरी कविता पारम्परिक कुरुक्षेत्र का उल्लेख तक नहीं करती। पाठक जिन्दगी के युद्धों से अपने-आप साक्षात्कार करता है। कविता के साथ वक्ता और पाठक की विभ्रान्तियों, वेदनाओं और मानसिक हलचलों में इस तरह से तादात्म्य बैठ जाता है कि कविता किसी सूत्र का रूप न लेकर जिन्दगी के साथ बहती रहती है और एक खुली राह की ओर ले जाती है। इस कविता की विशेषता है कि यह आज भी समकालीन प्रतीत होती है, क्योंकि इसमे संकेतित समस्याएँ आज भी रूप बदले खड़ी हैं। यही कारण है कि यह आज भी आलोचकों को प्रेरित करती है। चालीस से भी ज्यादा वर्ष पहले लिखी गयी इस कविता में वर्ल्ड बैंक का आधिपत्य, राजनीतिक दाँवपेंच के जो संकेत दिखाई देते हैं, वे आज भी जीवन्त हैं। इसका विषय व्यापक है, धर्मान्धता के सभी रूपों, दार्शनिकता के थोथेपन, पौराणिकता के रीतेपन को कविता जितनी तीव्रता से उजागर करती है उतने ही सामर्थ्य से उनका समाधान भी दर्शाती है- ‘इस लम्बे सन्नाटे में जब हम/नाड़ियों की धड़कन जानने को रुके/तब रुकना नहीं है बोधिवृक्ष की छाया में/बस दिल में बोध जगाना है/कालवरी की पहाड़ियों की कथाओं को गाना नहीं/यदि मनुष्य बने रहना है थोड़ी देर को/...हम फिर से आलिंगन करेंगे सपनों की दिव्य नाभि में/यदि हमें फिर से जगना है तो।’(कुरुक्षेत्र) यह समाधान समस्या से जूझने को प्रेरित करते हुए हल को किसी कोष्ठक में बन्द नहीं करना चाहता है। इस कविता को आज भी भिन्न अर्थों में पढ़ा जा सकता है। आलोचकों के सामने यह आज भी नये-नये सवाल-जवाब रखती है। शैली की दृष्टि से भी यह कविता महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें पारम्परिक शैली को नकार कर ऐसा खुरदरापन लाया गया है जो मलयालम कविता के लिए नया जरूर है किन्तु यथार्थ के कसैलेपन को बनाए रखने में समर्थ है।

अय्यप्प पणिक्कर की कविताएँ जिन्दगी के प्रत्येक रूप का स्पर्श करती दिखाई देती हैं। अतियथार्थ पर कटु सत्य को उकेरने में कवि की कलम हिचकती नहीं है। विशेष रूप से छोटी कविताएँ तीखेपन से सत्य को दिखाती हैं कि एक बार पाठक हतप्रभ रह जाता है। उदाहरण के लिए ‘प्रलय’ कविता। वह जिसे ‘आम आदमी’ की संज्ञा दी जा सकती है अपनी क्षणिक कामुकता को मिटाने के लिए वेश्या से मोल भाव करता है, कविता का दूसरा अंश पाठक को उस विचित्र कामुक लोक में ले जाता है, जिसकी ओर आम आदमी बार-बार उन्मुख होता है, किन्तु अन्त तक स्वरूप बदल जाता है, स्त्री का चेहरा वेश्या से माँ के रूप में बदल जाता है। यह पाठक पर निर्भर करता है कि वह किस चेहरे को देखे...करुणा, व्यंग्य या फिर असलियत के कड़वेपन से भरे ? 1952 में लिखी ‘मेरी दीवार पर’ कविता अत्याधुनिकता के लिए चुनौती-सी प्रतीत होती है। इसमें उस शब्दावली का प्रयोग धड़ल्ले से किया गया है जो कविता के लिए वर्जित मानी जाती रही है। किन्तु कविता का मध्य भाग-‘नाभि से, नैनों से/खिंचती नाड़ियाँ/खोपड़ी में प्यास से तड़कती हैं/सुलगती हैं/मरे हुए ज्वालामुखी खिल उठते हैं/ताम्र स्वप्न जल-जल कर बहते हैं/चारों ओर/जमें हुए आँसुओं के बिना/कान बन्द किये बिना/चमक रही हैं रक्तवाहिनियाँ/यह सृष्टि है संसार ?’-कवि की परवर्ती कविताओं के लिए एक कोरी स्लेट तैयार करता है, तो पाठक को संवेदना के असली अर्थ से साक्षात्कार कराता है। इसे ‘कुरुक्षेत्र’ के पूर्व कथन के रूप में भी देखा जा सकता है। इसी तरह ‘हिमालय’ कविता जो कुछ प्रत्यक्ष रूप में कहती है, उसी का विरोध करना उसका उद्देश्य है। जब वक्ता कहता है कि मुझे हिमालय पसन्द नहीं है तो यहाँ सूक्ष्म भाव हिमालय की विशालता स्थापित करते हुए वक्ता की आत्महीनता को हिमालय जितना विशाल बना देता है। यह हिमालय कुछ भी हो सकता है, अर्थ खोजना पाठक के हक में है।

इसी तरह ‘वीडियो मौत’, ‘रेडीमेड चिताभस्म’ और ‘वृद्धजन’ संवाद या चिट्ठी के माध्यम से पाठक को उस संसार की ओर ले जाती हैं जहाँ सारे नाते-रिश्ते झूठे साबित हो जाते हैं। आदमी और जानवर के बीच भेदभाव करना मुश्किल हो जाता है। कवि पाठक और वक्ता के बीच में आये बिना इस तरह संवाद को रखता है कि कविता के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते वक्ता और पाठक में इतनी एकता स्थापित हो जाती है कि माँ की मृत्यु की वीडियो फिल्म बनवाकर मित्रों को दिखलाने वाला, पिता को ओल्ड एज होम में रखने वाली पुत्री और बिजली के शमशानगृह को एयर कण्डीशन बनवाने की सिफारिश करने वाला तथा माँ की मौत का इन्तजार करने वाला पुत्र पाठक के परिवार का अंग बन जाता है। यही कारण है कि इन कविताओं को पढ़ने पर जहाँ मुस्कराना चाहिए वहाँ आँसुओं की धारा बहने लगती है।

कुछ कविताएँ प्रहेलिकाओं के समान पाठक को मनचाहा अर्थ, तो कभी बिन चाहा अर्थ देने में समर्थ हैं। उदाहरण के लिए ‘घोड़ा नृत्य’ और ‘र’ आदि कविताएँ। चार घोड़ों के नृत्य में चार टाँग, तीन टाँग और दो टाँग वाले घोड़े गिर जाते हैं, किन्तु एक टाँग वाला बिना रुके नाचता रहता है, कौन है यह एक टाँग वाला घोड़ा ? राजनीति ? समाज ? यह पाठक पर निर्भर करता है कि वह किस अर्थ में इसे समझता है, ऐसा नहीं कि कवि ने अर्थ खोजा नहीं, उन्होंने बस उसे खुला छोड़ दिया है। ‘र’ कविता तो अनुवादक के लिए भी चुनौती है, यह उस वर्णाक्षर पर केन्द्रित है, जो तमिल को छोड़कर अन्य भारतीय भाषाओं में नहीं है, मलयालम की इस विचित्र ध्वनि को कवि ने विचित्र क्रीड़ा भाव से देखा है। लगता है कि कवि शब्दों को दोनों हथेलियों से उछालते हुए बाजीगरी दिखा रहा है। ये कविताएँ मात्र शाब्दिक चमत्कार ही नहीं हैं, बल्कि कविता में शब्द और अर्थ के सम्बन्धों की व्याख्या भी करती हैं। अनुवादक के रूप में मुझे यह कविता पसन्द आयी। इसमें कवि के शब्द विलास का अनुकरण ही सम्भव हो सका, पूरी कविता का नहीं। यह लघु कविता अनुवादकों को प्रयोगों से जूझने को उकसाती रहेगी। ऐसा नहीं कि पणिक्कर जी यथार्थ, वेदना और व्यंग्य से ही सरोकार रखते हैं। आपकी प्रेम कविताएँ भी अनेक दृष्टियों से सुन्दर हैं। ‘प्रेम’,‘मालूम नहीं था कि प्यार क्या है’, ‘पूजा’ आदि कविताओं में प्यार के पारम्परिक रूप के साथ-साथ नये अर्थ भी खोजे गये हैं। ‘क्या हुआ प्रिया, तू कहाँ पहुँची ?’ और ‘कुछ बातें अवकाश के दिनों की’ कविताओं में प्रेम में परावर्तन के साथ स्मृतियों से जुड़ाव है। स्मृतियों के चलते हुए कवि जिस प्यार से साक्षात्कार करवाता है, वह अलौकिकता को लौकिक भाव दे देता है। यहाँ प्यार मृत्यु के पार ले जाने में सक्षम हो जाता है। कुछ कविताएँ प्रान्तीय लोक शैली के वैशिष्ट्य को समाहित किए हुए हैं। इस तरह की कविताओं का अनुवाद कठिन और जोखिम भरा काम है अत: इनमें से केवल एक ‘गधा’ ही इस संकलन में है, क्योंकि लोक शैली में रची कविताएँ गेयता के कारण पाठकीयता की जगह श्रोत्रियता की अपेक्षा रखती हैं। श्रोताओं में इस तरह की कविताएँ विशेष रूप से पसन्द की जाती हैं। अय्यप्प पणिक्कर की लोक गायकी का अनुकरण करने वाली कविताएँ मलयालम काव्य मंच पर काफी धूम मचा चुकी हैं ।

अय्यप्प पणिक्कर की लम्बी कविताएँ हिन्दी पाठकों के लिए भी पठनीय हैं। लम्बी कविताओं में कवि किसी विशिष्ट कथन या विषय की सृष्टि करते हुए दृश्यों की अवतारणा करता है। ‘पुनर्जन्म’, ‘पुनराख्यान’ आदि कविताओं में पौराणिक कथाओं की लोक कथा के आधार पर पुनर्व्याख्या करते हुए कवि मानो परम्परा में नये अर्थ खोजता है। शबरी मातृत्व में मोक्ष खोजती है तो कवि परोक्ष रूप में बच्चे को दूध न पिलाने वाली माँओं, प्रसव को भार समझने वाली युवतियों के सामने एक प्रश्नचिन्ह रखता जाता है। राधा का आत्म-समर्पण रुक्मिणी से किस तरह श्रेष्ठ है, इस तथ्य को समझने के लिए रुक्मिणी को किसी तर्क का सहारा नहीं लेना पड़ता, कृष्ण किस तरह एक छोटे से परीक्षण द्वारा प्रेम की गहनता को समझाने में सफल होते हैं, और राधा भी रुक्मिणी के आमन्त्रण को ठुकराकर कृष्ण की यादों को किस तरह पवित्र स्नेह से जोड़ती है...इन सभी गाथाओं के आधार पर रची लम्बी कविता ‘पुनर्जन्म’ मलयालम कविता की सभी विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करती है। ‘पुरुष ही हो तुम’ कविता में पत्नी की दृष्टि में पति की कमजोरियों को इस तरह से रखा गया है कि यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कविता स्त्री ने लिखी है या पुरुष ने। दाम्पत्य प्रेम, स्नेह, मोह, डाह, कामुकता के साथ-साथ पुरुष के दम्भ को समझाती हुई कविता हर अर्थ में स्त्री के पत्नी रूप का अनुमोदन करती है। पणिक्कर जी की लम्बी कविताएँ वाचिक परम्परा के अनुकूल हैं, क्योंकि मलयालम कविता की प्रवृत्ति के अनुरूप इन्हें गाया जा सकता है। हिन्दी में जहाँ वाचिक परम्परा का ह्रास कविता की उपादेयता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है, वहीं मलयालम कविता वाचिक परम्परा का आदर करती है। अय्यप्प पणिक्कर की कविताओं की खूबी यह है कि उन्हें न केवल गाया जा सकता है, बल्कि उन पर अभिनय भी किया जा सकता है। स्वयं कवि इन कविताओं का पारायण इतने वैविध्य के साथ करता है कि श्रोता कविता के भाव और अर्थ के साथ पूर्णतया जुड़ जाते हैं।

अय्यप्प पणिक्कर ने कविता में नाटकीय तत्वों का अन्वेषण भी किया है। ‘तथागत का पुनर्चिन्तन’ नाट्य कविता में तथागत होने से पहले और बाद की स्थितियों में इस तरह से भ्रमण करते हैं कि उनका भूत पाठक का वर्तमान बनकर तथागत के बहिर्गमन पर चिन्तन करने लगता है। महलों को त्याग कर जाना तथागत की नियति थी, उस नियति में साथ देते हैं वे सभी पात्र जिन्होंने उनके बहिर्गमन में सहायता दी थी। घोड़ा, कुत्ता, नक्षत्र और धरती सभी पात्र बनकर जीवन्त हो जाते हैं। जहाँ कुत्ता जनना, खाना, सोना और मरना फिर जनना में जिन्दगी के अर्थ को समझ लेता है वहीं अश्व अपने कर्म में तत्त्व खोजता है। नक्षत्रों के अपने विचार हैं। तथागत अपने भविष्य में हमारे वर्तमान को साफ-साफ देख लेते हैं-‘कहाँ है तथागत ? जब मुझे पुकार कर पूछना पड़ रहा है तो/उस महानिर्वाण की शून्यता में कैसे रह सकता हूँ ? बिन आँखों के दर्शक/बिन कानों के श्रोता/बिन हाथों के कार सेवक/बिन पाँवों के यात्री/बिन आत्मा के अनुयायी...अन्तत: यह पुनर्चिन्तन मात्र तथागत का न होकर हम सबका हो जाता है, विशेष रूप से पाठक ही उसका मूल केन्द्र बन जाता है। हमेशा की तरह यहाँ भी कवि कोष्ठक खुला छोड़ देता है।

यह कहना निर्विवाद है कि अय्यप्प पणिक्कर अनुवादक के लिए हमेशा चुनौती रहे हैं। शब्द और अर्थों के विचित्र खेल में वे अनुवादक को कहीं पीछे छोड़कर आगे निकल जाते हैं। उनकी कविताओं के स्तर को मूल में जितना परखा जा सकता है, उतना अनुवाद में नहीं, फिर भी अनुवादक के रूप में मेरा कर्तव्य है कि उनके कृत्तित्व से हिन्दी पाठकों को परिचित करवाया जाए। इस संग्रह में अय्यप्प पणिक्कर की पुरानी रचनाओं को इस उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है जिससे कवि की समय से आगे सोचने की प्रवृत्ति का परिचय पाठकों को मिले। आपके दूसरे संग्रह का हिन्दी अनुवाद साहित्य अकादेमी द्वारा हो चुका है। उसे छोड़ कर अन्य सभी संग्रहों से कुछ कविताएँ ली गयी हैं। अनुवाद के दौरान मैंने हमेशा अपने को कोष्ठक में बन्द होते पाया, क्योंकि पणिक्कर जी के वाचिक चातुर्य और ध्वनि प्रयोगों को चाह कर भी अनूदित करना कठिन है। मलयालम कविता की गीतात्मकता व लयात्मकता अनुवादक के लिए चुनौती है। यदि लय व गति को बाँधा जाय तो भाव व अर्थ छूटते से लगते हैं और यदि अर्थ के प्रति सजगता बरती जाय तो लय की डोर हाँथ से छूट जाती है। हिन्दी में गत्यात्मकता के लिए जिस शब्दावली का प्रयोग अपेक्षित है पणिक्कर जी उससे परहेज रखते हैं, लेकिन बोलचाल के खरखराते शब्दों को वे किस तरह से कविता में ढाल देते हैं, इसका आनन्द तो मूल में ही सम्भव है। फिर भी आशा है कि पाठक मलयालम कविता के इस स्वरूप को एक हद तक पसन्द करेंगे।

रति सक्सेना

मेरी दीवार पर


इन तस्वीरों को देख, जो मैंने अपनी दीवार पर
अपने हाथों खींची हैं
घूर क्यों रहा है ?
मूर्ख ! ध्यान दे,
नाभि से, नैनों से
खिंचती नाड़ियाँ
खोपड़ी में प्यास से तड़कती हैं
सुलगती हैं
मरे हुए ज्वालामुखी खिल उठते हैं
ताम्रस्वप्न जल-जल कर बहते हैं

चारों ओर
जमे हुए आँसुओं के बिना
कान बन्द किये बिना
चमक रही हैं रक्तवाहिनियाँ
यह सृष्टि है या संहार ?
इन तस्वीरों को देख, जो मैंने अपनी दीवार पर
अपने हाथों खींची हैं
घूर क्यों रहा है ?
मूर्ख ! ध्यान दे।

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