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कविता संग्रह >> यहाँ कुछ हुआ तो था

यहाँ कुछ हुआ तो था

इन्दु जैन

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1994
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 568
आईएसबीएन :00000

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इन्दु जैन की उत्कृष्ट कविताओं का संग्रह...

Yahan Kuch Hua to Tha - A hindi Book by - Indu jain यहाँ कुछ हुआ तो था - इन्दु जैन

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कविता जब अन्तर्दृश्य और बहिर्दृश्य को साथ लिये चलती है तब इन दोनों का संगुम्फन उसे किसी एक व्यक्ति का स्वर न बनाकर सबकी प्रतिध्वनि बना देता है। बाहर जो घट रहा है,वह बाहर ही नहीं है और कवि के अन्दर जो घटित हो रहा है वह भी न मात्र बाहर के प्रति प्रतिक्रिया है , न व्याख्या और न ही केवल आलोचना। वह उसका एकान्त संलाप तो कतई नहीं। ‘यहाँ कुछ हुआ तो था’ संग्रह में यहाँ केवल कवि ही नहीं है और था भी सिर्फ बीता हुआ न होकर निरन्तर आगे की ओर स्पन्दित होता है।इन्दु जैन के इस संग्रह की कविताएँ एक नया मोड़ मुड़ने लगेंगी-कथ्य और शैली दोनों दृष्टियों से। ये कविताएँ उस सर्जनात्मक ऊर्जा की परिचायक हैं जो विराम या विश्राम नहीं, विरल रास्तों पर चलने की आग्रही हैं। इनमें ताजगी और तीखापन तो है ही,परिवेश की बहु-आयामी समग्रता को उलट-पलट कर देखने-समझने की आतुरता भी है। कहा जा सकता है कि इन्दु जैन के इस सातवें संग्रह की कविताओं को पढ़ना नयी हिन्दी कविता के सुधी पाठकों के लिए एक प्रीतिकर अनुभव होगा।



बच्चा


औरत के सिर पर गठरी है
कमर पर बच्चा
मर्द हाथ में बक्सा
लटकाये है
बच्चा रो रहा है लगातार
हाथ-पाँव पटक रहा
बार-बार
औरत के समझाने
मर्द के झुँझलाने के बावजूद
वह पैर-पैर चलना
चाहता है
और
गठरी अपने सिर पर
उठाना चाहता है।


पीठ पर घर



गाँव पर उगा है सूरज
गाँव उससे पहले
जाग चुका
ओस चमक रही है पीली धूप में
कुएँ की जगत पीली है
धोतियाँ भीगे झण्ड़ों-सी
सूखने को तैयार
धुँआ उठता है
सूरज की तरफ़
सदासुहागिन और केसू
पिघलने लगे
खेत चहकने लगे हैं,
बच्चों के पेट में
गुदगुदी मुट्ठी खोलती है
सागवान के पखवाड़े भील पत्ते
सँभाले हैं
कुर्सी की जून तक
पेड़ का वजूद
आदमी घर से निकलता है परेशान
और आश्वस्त
अपनी शाम की तरफ
उसकी पीठ पर
घर खड़ा है।


जन



मैं उस दुनिया में हूँ जो
सहस्त्रों चाँद से पटी है
किसी सूरज की नहीं
दिल की आग से चमकते हैं
ठण्डे पत्थर
घने से घने जंगल के पैर
धुल रहे हैं उजाले से

कुछ छोटा नहीं, लघु नहीं
हर इनसान के पीछे परेशानियों का
जुलूस
अगुवा है फिर भी
मेरा दोस्त
मेरा पड़ोसी
और हर थकान से निचुड़ कर
निकलती हैं गोल हँसियाकार
तीन-चौथाई लेकिन ताज़ा आवाज़
मेरे घुटे गले में भी
फड़फड़ाती गाती रहती है कविता।


बाढ़ में बाँस



बाढ़ डूबी झोंपड़ियों
के आसमान पर
हेलिकॉटर उड़ान भरता है
दया के क़तरे टपकाता हुआ
बाढ़ बढ़ाता हुआ

बाँस लेकर जूझ रही है
झोपड़ी
फिर खड़ी होने को
टीन की चद्दर खड़खड़ाती है
छप्पर के धुएं से
आसमान में
आग लग जाती है

हस्पताल

सूनी इमारत
कहीं कोई नज़र नहीं आता
आती हैं दो आवाज़ें
दर्द को बखानती एक
सहलाती दूसरी
कभी-कभी उड़ने वाले कबूतर
फ़र्श पर घिसे जमें
बींट के निशान

आदमी डाक्टर की तरह
राहत दे
तो
दुनिया में हस्पताल
कम हो जाएं
मरहम में लिपट
घाव भर जाएँ
लोग घरों में सोएँ
छज्जों पर मंजन करते हुए
दाना डालें
जीवन भरे छाती फुला
डैने पसार काम पर उड़ जाएँ

इमारतें गुज़रे ज़माने का
निशाना बन खण्डहर खड़ी रहें

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