कवि ने कहा - ज्ञानेन्द्रपति Kavi Ne Kaha - Hindi book by - Gyanendrapati
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कविता संग्रह >> कवि ने कहा

कवि ने कहा

ज्ञानेन्द्रपति

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5718
आईएसबीएन :81-89859-18-8

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प्रस्तुत है कविता संग्रह...

Kavi ne kaha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है। कवि-कर्म को ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों की सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं, बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और ‘अभिव्यक्ति के ख़तरे’ उठाकर अर्जित किया है।
वे उन थोड़े से कवियों में हैं, जिनके बल पर कविता की तरफ़ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक की विश्वसनीयता बरक़रार है।

ज्ञानेन्द्रपति की अप्रतिमता के कारकों में अवश्य ही यह तथ्य है कि उसकी जड़ें लोक की मन-माटी में गहरे धँसी हैं और उसकी दृष्टि विश्व-चेतस् है। जीवन-राग उनकी कविता में लयात्मकता में ढल जाता है। वे गद्य कविता के नहीं उस मुक्तछन्द के कवि हैं निराला ने जिनकी प्रस्तावना की थी।

उनकी कविता आद्यन्त छान्दिक आवेग से ओतप्रोत है, बल्कि उसकी संरचना उसी से निर्धारित होती है। बेशक, यह हर बार एक नए छन्द का अन्वेषण है जो कविता के कथ्य के अनुसार जीवन-दृव्य के साथ कवि-चित्त की एकात्मा से सम्भव होता है। हिन्दी की विशाल भाषिक सम्पदा का सार्थक संदोहन भी उनके यहाँ खूब बन पड़ा है। तद्भव-सीमित रहना उनकी कविता की मजबूरी नहीं, उसके लिए न तो तत्सम अछूत है, न देशज अस्पृश्यः, अवसरानुकूल नये शब्दों के निर्माण की उसकी साहसिकता तो कुख्यात होने की हद तक विख्यात है। ज्ञानेन्द्रपति की कविता एक ओर तो छोटी-से-छोटी सचाई को, हल्की-से-हल्की अनुभूति को, सहेजने का जतन करती है, प्राणी-मात्र के हर्ष-विषाद को धारण करती है; दूसरी ओर जन-मन-भूमि पर दृढ़ता से पाव रोपे सत्ता-चालित इतिहास के झूठे सच के मुकाबिल होती है। धार्मिक सत्ता हो या राजनीतिक सत्ता वह किसी को नहीं बख्शती। उसकी दीठ में संतप्त भूगोल है। साम्राज्यवाद के नये पैतरों को वह पहचानती है। अभय में पगी हुई करुणा उसे विरासत में मिली है। वह एक महान् परम्परा की परिणति है।

स्वयं ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताओं में इस संकलन में उनके तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो हैं ही, अगामी संग्रहों से भी कविताएँ शामिल हैं, बल्कि अनेक तो पहली बार यहीं प्रकाशित हो रही है। बिला शक, अपने समाज-समय को कविता की आँख से देखना-समझना चाहने वालों के लिए एक अनिवार्य-किताब नहीं-सहचर !


प्रिय पाठक !



प्रतिनिधि कविताओं की प्रस्तुति नये पाठकों से परिचय का ही नहीं, पाठकों से नये परिचय का भी होता है। अगर पाँच दशकों से अधिक की जीवन-यात्रा का संक्षिप्त पर्याय ‘कवि-कर्म’ जैसा एक शब्द-युग्म हो सकता है, तो तीन दशकों से अधिक की रचना-यात्रा का सारांश-निवेदन भी 144 सफ़्हों में किया जा सकता है, भरसक। बल्कि सम्भव है, ऐसी कोशिश रचनाकार के आयास की मौलिक प्रकृति को पाठक की दीठ में उजागर कर दे, कि उसके बुनियादी सरोकारों को आँकना और रचना-परिसर के क्षेत्र-विस्तार को मापना सह्ल हो जाये; साथ ही जीवन-जगत् से उसके रिश्ते के रेशे ही नहीं, अपने पूर्ववर्तियों से उसके जुड़ाव के तंतु भी झलक उठें। और तब, हो सकता है, हथेलियों के बीच खुली किताब वह विरल क्षण बन जाये जब युगबोध के आईने में आत्मबोध हासिल होता है।

पाठक पायेंगे कि रचना-काल के क्रमानुसार न दी जाकर कविताएँ पारस्परिक संगति से सूत्रित हैं; क्योंकि कविता बेशक अपने समय से जूझकर हासिल की जाती है, लेकिन वह उस काल-खण्ड से कीलित नहीं होती, उसकी भविष्योन्मुखता ही उसकी न मुरझाने वाली नवीनता का बाइस होती है। इसमें मेरे तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो कविताएँ चयनित हैं ही, आगामी संग्रहों से भी हैं, बल्कि अनेक तो पहली बार यहीं प्रकाशित हो रही हैं।

कविताओं के बारे में विशेष कुछ कहना ग़ैरज़रूरी लग रहा है। हिन्दी कविता के सावधान पाठकों की मति पर मुझे पूरा भरोसा है; उन्होंने ही मुझे सम्बल दिया है, मैं उन्हीं से मुखातिब हूँ। साहित्य के समकालीन शास्ताओं की आँखों में मैं किरकिरी की तरह गड़ता हूँ, यही ठीक है। कलावादी और यान्त्रिक मार्क्सवादी मेरे प्रति कोप से कुप्पा हुए रहें, कोई हरज नहीं। यदि कविता की जड़ें जन-संस्कृति में हैं और उसकी आँखों में असीम आकाश है, तो सनदों की पर्वा उसके अंतस के किसी कोने में भी नहीं पल सकती। हाँ, बेशक ये ‘निष्पक्ष’ कविताएँ नहीं हैं, पक्षधरता इनका आत्मिक गुण है। यहाँ, मुक्तिबोध को दुहराना ही उचित लगता है :
धरती के विकासी द्वन्द्व-क्रम में, एक मेरा पक्ष निःसन्देह।

सच पूछिए तो मेरा पक्ष आपके पक्ष में विलीन हो चुका है, जीवन-संघर्ष के बीच इस किताब को हाथों में उठाने वाले मेरे पाठक !

बनारस,1-1-07

ज्ञानेन्द्रपति


एक गर्भवती औरत के प्रति दो कविताएँ


1


यह तुम्हारा उदर ब्रह्माण्ड हो गया है।
इसमें क्या है ? एक बन रहा शिशु-भर ?
झिल्ली में लिपटी मांस पहनती चेतना। बस ?

कितनी फैलती जा रही है परिधि तुम्हारे उदर की
तुम क्या जानो
कि अंतरिक्ष तक चली गयी है यह विरूप गोलाई और ये
पेड़-पौधे, मकान, सड़कें, मैं, यह पोल, वह कुत्ता, उछलता वह मेढक
रँभाती गाय, बाड़ कतरता माली, क्षितिज पर का सूरज
सब उसके अंदर चले गये हैं
और तुम भी


2



निरन्तर निर्माण में रत है तुम्हारा उदर
तुम्हारा रक्त, तुम्हारी मज्जा, तुम्हारा जीवन-रस
सब मिल कर जो रच रहे हैं
वह क्या है ? एक
कनखजूरा
जो अकस्मात किसी बूट के नीचे आ जायेगा।
या किसी आदमजाद को डँसने के प्रयास के अपराध में
थुरकुच कर
सफ़ाई के खयाल से सड़क पर से किनारे हटा दिया जायेगा
-वही एक
कनखजूरा ? घेर कर जिसके लिथड़े शव को
खड़े होंगे गाँव के सारे सम्भ्रान्त लोग ईश्वर को धन्यवाद देते
और यदि कोई विद्रोही कवि हुआ वहाँ ईश्वर और सफ़ाई
और स्वयं
पर थूक कर लिख देगा जिस पर एक कविता और
आकर ओढ़ चादर सो जायेगा। वही
एक कनखजूरा रच रही हो तुम ?

किसी अबोध की तरह ताकती हो मेरा प्रश्न। तुम्हें
पता नहीं अपने फूले हुए पेट में सहेजते हुए जिसको
पिला रही हो अपना रक्त, श्रम, चौकसी
वह क्या है ? मुझे है
पता
यह न हो वही कनखजूरा
पर हो जायेगा।


(आँख हाथ बनते हुए में संकलित)


ट्राम में एक याद



चेतना पारीक, कैसी हो ?
पहले जैसी हो ?
कुछ-कुछ खुश
कुछ-कुछ उदास
कभी देखती तारे
कभी देखती घास
चेतना पारीक, कैसी दिखती हो ?
अब भी कविता लिखती हो ?

तुम्हें मेरी याद न होगी
लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो
चलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली हो
तुम्हारी कद-काठी की एक
नन्ही-सी, नेक
सामने आ खड़ी है
तुम्हारी याद उमड़ी है
चेतना पारीक, कैसी हो ?
पहले जैसी हो ?
आँखों में उतरती है किताब की आग ?
नाटक में अब भी लेती हो भाग ?
छूटे नहीं हैं लाइब्रेरी के चक्कर ?
मुझ-से घुमन्तू कवि से होती है कभी टक्कर ?
अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र ?
अब भी तुम्हारे है बहुत-बहुत मित्र ?
अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो ?
अब भी जिससे करती हो प्रेम उसे दाढ़ी रखाती हो ?
चेतना पारीक, अब भी तुम नन्ही गेंद-सी उल्लास से भरी हो ?
उतनी ही हरी हो ?

उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम है
भीड़-भाड़ धक्का-मुक्की ठेल-पेल ताम-झाम है
ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है
विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है

इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली है
एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है
महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम है
विराट् धक्-धक् में एक धड़कन कम है कोरस में एक कण्ठ कम है
तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ाली है
वहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है

फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ देखता हूँ
आदमियों को किताब को निरखता लेखता हूँ
रंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग-बिरंगे लोग
रोग-शोक हँसी-खुशी योग और वियोग
देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है
देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है
चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो ?
बोलो, बोलो, पहले जैसी हो !


(शब्द लिखने के लिए ही...में संकलित)


बनानी बनर्जी



वह सो गयी है बनानी बनर्जी !
लम्बी रात के इस ठहरे हुए निशीथ-क्षण में
डूबी हुई अपने अस्तित्व के सघन अरण्य में एक भटकी हुई
मुस्कान खोजने
कमरे के एक कोने में टेबुल पर रखे उसके बैग में
छोटे गोल आईने कंघी और लिपिस्टिक से
लिपट कर सोयी है उसकी हँसी दिन-भर हँस कर थकी हुई

उसकी सैंडिल अपने टूटे हुए फीते को
चादर की तरह ओढ़ कर
दरवाजे के पास लम्बी पड़ी है
वह अभी कहाँ है क्यों है उसकी माँ नहीं जानती
इसके सिवा कि वह अभी सोयी है कमरे के सबसे अच्छे कोने में
वह अभी कहाँ है कैसी है उसकी चिन्तित दादी नहीं जानती
उसके सयाने हो रहे भाई नहीं जानते
उसकी नींद में वे नहीं झाँकते
अपने स्वप्न में सहमें वे देखते हैं उसे अपने स्वप्न में टहलते पशुओं को खदेड़ते
लेकिन अपने दुःस्वप्न को दुःस्वप्न की तरह झेल जाते हैं वे
उसकी नींद से अपनी नींद को बचा कर सोते हुए
उसके और उनके बीच की हाथ-भर दूरी में
रोटी, रजाई, ठण्ड और उमस है
उसकी नींद में सारी लोकल ट्रेनें स्थगित हो गयी हैं
लोहे की पटरियों पर बर्फ गिर रही है
घर के भीतर उल्लास की तरह अँगीठी जल रही है
कुहरे में डूबी-लम्बी-खाली बस को ड्राइवर गीत से भर रहा है
शरत बाबू से प्रार्थना करती है एक साँवली लड़की मुझ पर लिखो कहानी
कविता पढ़ती आँखें कहती हैं मुझ में हाँ मुझ में
सजल मेघ और उज्ज्वल रौद्र मिलते हैं

ट्राम में जगह मिल जाती है बैठने की
दो युवक खड़े हो जाते हैं
ठीक तभी दस्ताने में ढँका एक हाथ उठता है बटन दबाने को
सफेद दस्ताने में ढँका एक हाथ
वह देखती है उसे चीखती है नहीं-नहीं
आज दाँतों से वह भँभोड़ देगी उस हाथ को
आज अपने मन की करेगी

अपने स्वप्न से दबी उसकी छाती धड़कती है थोड़ी देर
उसकी छत के ऊपर चले आए हैं सप्तर्षि
उसकी लम्बी साँस रात की लय में मिल जाती है
जिन बेटों को वह जन्म देगी वे उसकी नींद में मचलते हैं।

(शब्द लिखने के लिए ही...में संकलित)

वे दो दाँत-तनिक बड़े



वे दो दाँत-तनिक बड़े
जुड़वाँ सहोदरों-से
अन्दर-नहीं, सुन्दर
पूर्णचन्द्र-से सम्पूर्ण
होंठों के बादली कपाट
जिन्हें हमेशा मूँदना चाहते
और कभी पूरा नहीं मूँद पाते
हास्य को देते उज्ज्वल आभा
मुस्कान को देते गुलाबी लज्जा
लज्जा को देते अभिनव सौन्दर्य
वह कालिदास की शिखरिदशना श्यामा नहीं-
अलकापुरीवासिनी
लेकिन हाँ, साँवली गाढ़ी
गली पिपलानी कटरा की मंजू श्रीवास्तव
हेड क्लर्क वाई. एन. श्रीवास्तव की मँझली कन्या
जिसकी एक मात्र पहचान-नहीं, मैट्रिकुलेशन का प्रमाणपत्र-नहीं
न होमसाइंस का डिप्लोमा
न सीना-पिरोना, न काढ़ना-उकेरना
न तो जिसका गाना ग़ज़लें, पढ़ना उपन्यास-
वह सब कुछ नहीं
बस, वे दो दाँत-तनिक बड़े
सदैव दुनिया को निहारते एक उजली उत्सुकता से
दृष्टि-वृष्टियों से धुँधले ससंकोच
दृष्टियाँ जो हों दुष्ट तो भी पास पहुँचकर
कौतुल में निर्मल हो आती हैं

वे दो दाँत-तनिक बड़े
डेंटिस्ट की नहीं, एक चिन्ता की रेतियों से रेते जाते हैं
एकान्त में खुद को आईने में निरखते हैं चोर नज़रों से
विचारते हैं कि वे एक साँवले चेहरे पर जड़े हैं
कि छुटकी बहन के ब्याह के रास्ते में खड़े हैं
वे काँटे हैं गोखुरू हैं, कीलें हैं
वे चाहते हैं दूध बनकर बह जायें
शिशुओं की कण्ठनलिकाओं में
वे चाहते हैं पिघल जायें,
रात छत पर सोये, तारों के चुम्बनों में

रात के डुबाँव जल में डूबे हुए
वे दो दाँत-तनिक बड़े-दो बाँहों की तरह बढ़े हुए
धरती की तरह प्रेम से और पीड़ा से
फटती छातीवाले-
जिस दृढ़-दन्त वराहावतार की प्रतीक्षा में हैं
वह कब आयेगा उबारनहार
गली पिपलानी कटरा के मकान नम्बर इकहत्तर में
शहर के बोर्डों-होर्डिंगों पोस्टरों-विज्ञापनों से पटे
भूलभुलैया पथों
और व्यस्त चौराहों और सौन्दर्य के चालू मानदण्डों को
लाँघता
आयेगा न ?
कभी तो !

(गंगातट में संकलित)

इंतज़ार



(कलकत्ता/कर्जन पार्क/दिन के चार)


घुटने मोड़ पर बैठी हुई यह लड़की
शाम के इंतज़ार में है
धुँधलके के इंतज़ार में

दिन उतर आया है उसके घुटनों तक
घुटने मोड़ कर बैठी हुई यह लड़की
दिन के अपने पैरों तले आ जाने के इंतज़ार में है
अँधेरे के इंतज़ार में

तब अपने केशों पर फिरायेगी वह हाथ
और बदल जाएगा उसका भेस
उसके सपाट चेहरे पर जल उठेंगी उसकी आँखें
आ जाएगी उनमें वह चमक जो केवल
बुरी स्त्रियों की आँखों में होती है
लालसा और घृणा से भर देने वाली चमक

आहिस्ता चलती हुई
अपने शिकार की तलाश में निकलेगी इस मैदान में
और एक बार फिर
शिकार की तलाश में घूमते
किसी लोलुप व्याघ्र का शिकार होगी
अपने विलाप को मुस्कराहट में बदलती हुई।

(शब्द लिखने के लिए ही...में संकलित)


विज्ञान-शिक्षक से छोटी लड़की का एक सवाल


एक बहुत छोटा-सा सवाल पूछा था विज्ञान-कक्षा की सबसे छोटी लड़की ने
पूछा था कि सारे आदमी जब
एक से ही आदमी हैं
जल और स्थल पर एक साथ चलकर ही
बने हैं इतने आदमी
तो एक आदमी अमीर
एक आदमी ग़रीब क्यों है
एक आदमी तो आदमी है
दूसरा जैसे आदमी ही नहीं है...

सारी कक्षा भौंचक रह गयी थी
खटाखट उड़ने लगे थे फ्यूज़
किवाड़ों में का लोहा बजने लगा था
विज्ञान-शिक्षक की आत्मा हाथ में लपलपाती छड़ी की तरह
दुबली हो गयी थी
उनका मुँह खुल गया था गुस्से में दुःख में
एक पल को उन्होंने अपने भीतर शून्य देखा था
उम्र बीत गयी आदमी की हड्डी-हड्डी को नस-नस को
उनके नाम से जानते
आदमी के दिल के दिमाग़ के जोड़-जोड़ को
भरी कक्षा में टुकड़े-टुकड़े खोलते
आदमी के रोम-रोम में झाँकते
उम्र बीत गयी इस सवाल को कण्ठ में तेज़ प्यास की तरह
अचानक महसूस करते
पर दबा जाते घुड़क कर घुटक लेते
किसी आदमी से अकेले में भी कभी पूछ नहीं पाते

अपने भीतर के जिस सवाल को देखने से वे डर रहे थे
अपने निर्भीक हाथों से
उसी सवाल को उनके रक्त से खींचकर




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