तुम हाँ बिलकुल तुम - बाइ जूई Tum Haan Bilkul Tum - Hindi book by - Bai Juyi
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तुम हाँ बिलकुल तुम

बाइ जूई

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1991
पृष्ठ :125
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 584
आईएसबीएन :00000

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बाइ जूई की उत्कृष्ट कविताओं का संग्रह...

Tum Haan Bilkul Tum

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बाइ जूई को राजकीय सेवा के दौरान अपनी स्पष्टवादिता के कारण अक्सर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। किन्तु नवीं शताब्दी चीन के घोर सामन्तवादी वातावरण में भी वह आम आदमी और गरीबों का पक्षधर रहा और अपने युग का लोक कवि कहलाया।

प्रस्तुति

भारतीय भाषाओं की उत्कृष्ट कृतियों को उनके भाषायी क्षेत्र से बाहर एक व्यापक धरातल पर लाने में भारतीय ज्ञानपीठ की विशिष्ट भूमिका रही है। जब इन कृतियों को विभिन्न श्रृंखलाओं में प्रकाशित करने की योजना बनी थी उसी समय यह विचार था कि यथाशीघ्र अन्य देशों की भाषाओं के अच्छे साहित्य को भी हिन्दी पाठकों को उपलब्ध कराया जाये। इसके लिए ज्ञानपीठ ने लोकोदय ग्रन्थमाला के अन्तर्गत एक नयी श्रृंखला ‘‘विश्वभारती’ आरम्भ की है। हाल ही में इसके अन्तर्गत नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सुविख्यात नाइजीरियाई कवि वोले शोयिंका की कविताओं का संग्रह प्रकाशित किया गया है। इसी श्रंखला में अब चीन के नवीं शताब्दी के प्रख्यात कवि-प्रशासक बाई-जूई की कविताओं का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया जा रहा है। कविताओं का यह अनुवाद किया है प्रियदर्शी ठाकुर ‘ख़याल’ ने जो स्वयं भी उर्दू के प्रसिद्ध कवि हैं।
हमें आशा है कि शीघ्र ही हमारे इस कार्यक्रम की गति तेज होगी और हम विभिन्न विदेशी भाषाओं की उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाएँ सुधी पाठकों को उपलब्ध करा सकेंगे। इस कार्य में ज्ञानपीठ के सभी अधिकारियों से समय-समय पर मुझे जो परामर्श और सहयोग मिलता रहा है उसके लिए मैं अत्यन्त आभारी हूँ। विशेष रूप से प्रकाशन की पूरी व्यवस्था के लिए नेमिचन्द्र जैन, चक्रेश जैन व सुधा पाण्डेय ने बहुत परिश्रम किया है। अपने इन सहयोगियों का मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। इस पुस्तक की इतनी सुरिचिपूर्ण साज-सज्जा के लिए कलाकार पुष्पकणा मुखर्जी व सुन्दर छपाई के लिए प्रिंट-ऐड के के. के. पौलोस का आभारी हूं।

प्राक्कथन

चीन के लोक-कवि के रूप में प्रसिद्ध कवि बाइ जूई की कविताएँ अवश्य ही विश्व साहित्य की अमर कृतियों में गिनी जाने योग्य हैं। जब लिखने-पढ़ने वाले सौ-दो सौ साल तक संदर्भयुक्त और जीवित रह जाने वाली कृतियों को भी ‘क्लास्सिक्स’ मानते हैं, फिर तो जूई की कविताएँ जो बारह सौ वर्षों के बाद भी बासी नहीं पड़ीं निस्सन्देह ही उस श्रेणी में हैं। जैसा कि अनुवादक ने अपनी भूमिका में लिखा है, बाइ-जूई की रचनाएँ इस कारण भी विशिष्ट हैं और हृदय को छूती हैं, कि जूई आम आदमी का पक्षधर और प्रकृति और पर्यावरण का प्रेमी है। चीन और भारत विश्व की दो प्राचीनतम सभ्यताएँ हैं जिनकी संस्कृतियों और जनजीवन में कई ऐसे साम्य हैं जिनके कारण भी ये कविताएँ भारत में एक बड़े पाठक वर्ग को आकर्षित करेंगी। प्रियदर्शी ठाकुर ‘ख़याल’ का अनुवाद सरल, प्रवाहमय और प्रभावशाली है। ‘तुम ! हाँ, बिल्कुल तुम’ निश्चय ही एक अत्यन्त सराहनीय प्रयास है। मेरी शुभकामनाएँ।

दो शब्द

चीन के लोक-कवि के रूप में प्रसिद्ध बाई जूई की चुनी हुई पचास कविताओं के हिन्दी अनुवाद के इस संकलन का पूरा श्रेय मेरे अन्तरंग मित्र एवं सेवा-सहकर्मी श्री आदर्श किशोर को है। यहाँ तक कि इस संकलन को मेरी ओर से दिया गया शीर्षक ‘‘तुम ! हाँ, बिल्कुल तुम’’ भी दरअस्ल उन्हीं की देन है। रेवी ऐली द्वारा अंग्रेजी में अनूदित जूई कविताओं के संकलन में इस शीर्षक वाली कविता ‘समथिंग लाइक ए फ्लावर’ को पढ़कर उसके हाशिए में आदर्श किशोर ने पेंसिल से दर्ज किया था-‘‘यू ! येस, इनडीड यू’’ उनकी यह तात्कालिक टिप्पणी मुझे इतनी भाई और हिन्दी अनुवाद के साथ इतनी सटीक लगी कि मैंने इसे न सिर्फ कविता के हिन्दी अनुवाद के लिए अपना लिया बल्कि इस संकलन के शीर्षक का दर्जा भी दे रहा हूँ।
बाइ जूई से मेरा परिचय भी आदर्श किशोर ने ही करवाया था। पाठकों में से जो जूई का समय जानते होंगे वे शायद हँसें कि करीब साढ़े ग्यारह सौ वर्ष पहले इस दुनिया से गुज़र चुके शख़्श से आदर्श किशोर मुझे किस तरह मिला सकते हैं भला ! यह सच है (एक दिलचस्प संयोग) कि आदर्श और मैं जिस साल पैदा हुए उसके ठीक ग्यारह सौ वर्ष पहले 846 ई. में बाइ जूई की मृत्यु हुई थी। लेकिन इसे भी आप हक़ीक़त मानें कि जूई की कविताओं का संकलन मुझे पढ़ने के लिए दिया जाना उससे मेरा परिचय कराने से कुछ कम न था। जूई की कविताओं में उसकी शख्सियत, उसकी सोच, उसकी और उसके ज़माने की ज़िन्दगी, उसके संघर्षों, उसकी उपलब्धियों, उसकी कामनाओं, उसकी विफलताओं और उसके मानसिक ऊहापोह की जो जीवन्त तस्वीरें उभरती हैं, जो सच्चा ख़ाक़ा खिंचता हैं, वह अपने-आप में उसका मुकम्मल परिचय है।
करीब पाँच साल पहले एक दिन ख़ासी विविधताओं से भरे अपने निजी पुस्तकालय से आदर्श किशोर ने रेवी ऐली द्वारा रूपान्तरित जूई की कविताओं का संकलन मुझे देते हुए कहा-‘‘भाई, इसे पढ़ो। बाइ जूई तुम्हें ज़रूर अच्छा लगेगा। वह न सिर्फ़ हम लोगों की तरह लिखित परीक्षा के आधार पर चुना हुआ प्रशासक था, बल्कि तुम्हारी तरह कविताएँ भी लिखता था. . . . सच, यह कविता (अलविदा, हैंग-जू) पढ़कर तो बाड़मेर के अकाल राहत कार्यों की याद ताजा हो आयी . . . .
मैंने कविताएँ पढ़ीं तो इतनी अच्छी लगीं कि कई बार फिर-फिर पढ़ीं औऱ उनमें डूबता चला गया। इन कविताओं का जादू कुछ ऐसा चला मुझ पर कि बाइ जूई मानों हज़ार साल पहले किसी देश का कवि-प्रशासक न हो, अपना कोई परिचित मित्र या बंधु हो जिसके हर्ष-विषाद सब अपने हों। जैसे सदियों के पार से कोई मुझे मेरी कहानी सुना रहा हो। कई कविताएँ पढ़कर तो बिल्कुल ऐसा लगा कि मामूली फ़र्क़ के साथ मैंने भी बिल्कुल वैसा ही सोचा है, बिल्कुल वैसा ही क्षण मैंने भी जिया है।

एक कवि और साहित्यकार के रूप में बाइ जूई की प्रतिभा विलक्षण थी। मैं ऐसा इसलिए नहीं कह रहा कि वह मेरी तरह सरकारी मुलाज़मत की बिरादरी का था और उसके जीवन और अनुभवों में मुझे अपनेपन की झलक दिखाई दी है। दरअस्ल उसकी रचनाओं में ऐसे शाश्वत गुण हैं जो साहित्य को समय से मुक्त कर देते हैं। बाई जूई का कथ्य और उसकी शैली, उसके शब्दों का चयन, उसका बेबाकपन और उसकी सहजता उसके कृतित्व को ऐसा अमरत्व प्रदान करते हैं कि उसकी बात समझने में किसी भी युग या किसी भी देश या पाठक को कोई कठिनाई होने की संभावना नहीं। न कोई प्रतीकों की दुरुहता आड़े आती है न कथ्य की अस्पष्टता। न समाज की बुराइयों और खामियों की समझ में कमी है न कवि का अपना अहम् और ओहदा उसकी आँखें मूँदे है। बाइ जूई की इस स्वीकरोक्ति के बावजूद कि वह शोषक-वर्ग में शामिल हो, उसके द्वारा शब्दों में बाँधी गयी, सामाजिक और आर्थिक शोषण की एक-एक तस्वीर एक-एक नगीने से कम नहीं।
जूई का चिन्तन उसके युग से सदियों आगे था। जब जूई एक पेड़ के कटकर ईधन के गट्ठर में तब्दील हो जाने की संभावना को लेकर चिन्तित होता है या मर्दों की दुनिया में औरतों के शोषण की बात करता है, तो उसकी ये बातें नवीं शताब्दी की न होकर बीसवीं सदी के किसी आधुनिक कवि-सी लगती हैं। जब वह अपना नया चोगा खींच कर दस हज़ार फीट लम्बा कर लेने और दुनिया के तमाम निर्वसन तन ढँकने की चिन्ता में चहलक़दमी करता है तो लगता है कि मार्क्स से हज़ार साल पहले ही भावनात्मक स्तर पर मार्क्सवाद को जूई ने परिभाषित कर लिया था। जब वह ‘‘काली झील का दैत्य’’ और ‘‘भूत बंगला’ जैसी कविताओं मे अन्धविश्वास का मज़ाक उड़ाता है तो सहज विश्वास ही नहीं होता कि उनका कवि नवीं शताब्दी का है। जूई की महानता यह है कि उसकी अधिकांश कविताएँ आज भी उतनी ही संदर्भयुक्त लगती हैं जितनी वे अपने लिखे जीने के वक़्त रही होंगी।
बाइ जूई के लेखन का यह पहलू भी विस्मयकारी और महत्वपूर्ण है कि पूर्व-मध्य युग के घोर निरंकुश राजतंत्र की सामन्तवादी व्यवस्था से जुड़े होने के बावजूद अपने कवि में वह निर्विवाद रुप से शोषित वर्गों और गऱीबों का पक्षधर बनकर उभरता है, अपने वर्ग द्वारा उपभोग के अतिरेक और दलित वर्गों के शोषण पर खिन्न होता है और सामाजिक अन्याय का प्रतिवाद करता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि अपने वर्ण और वर्ग की वजह से उसकी कथनी और करनी में जो अन्तर है उसके बारे में वह चाहे कुछ और कर पाये या न कर पाये कम से कम वह उससे अनभिज्ञ नहीं, उसे नकारता नहीं बल्कि अपने स्वार्थीपन तथा मानव-सुलभ कमज़ोरियों को एक निहत्था कर देने वाली सरलता के साथ स्वीकार करता है। ऐसी सच्चाई और अभिव्यक्ति की ईमानदारी जो ‘‘साल के आख़री दिन’’ जैसी कविताओं में उभरकर सामने आती हैं, बाइ जूई के कवि को उसके व्यक्ति से बड़ा कर जाती हैं। दरअसल यह हृदय को छू लेने वाली मानवीयता और ईमानदारी ही उसकी बहुत सी कविताओं को उपदेशात्मक सपाटबयानी की कगार से बचा ले जाती हैं।

बाइ जूई जैसे दो-टूक बात करने वाले खरे कवि की कविताओं का अनुवाद दरअस्ल उतना ही कठिन है जितना कि वह आसान दिखता है। बात कहने का वैसा ही खुला अन्दाज़, वही रोज़मर्रा की ज़बान, वही लहजा बनाये रख सकना कठिन था। इसीलिए मैंने कविताओं के ‘मूड’ को देखते हुए शब्दों का चयन किया है और इन्हें आम बोल-चाल की हिन्दोस्तानी भाषा में अनूदित करने की कोशिश की है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी समझता हूँ कि मैंने इन कविताओं का अनुवाद मूल चीनी से नहीं, बल्कि रेवी ऐली के अधिकारिक अंग्रेज़ी रूपान्तरण से किया है।
इससे पहले कि मैं अपनी बात ख़त्म करूँ मैं धन्यवाद देना चाहता हूँ आदर्श किशोर को, क्योंकि उनके बग़ैर तो जूई से मुलाक़ात ही न हुई होती। इस अनुवाद कार्य में आरम्भ से ही मेरे बड़े भाई प्रो. मुरारी मधुसूदन ठाकुर, मेरी पत्नी रेखा तथा बहन लीला, और मेरे मित्र सैयद फ़ज़्लुल मतीन साहब ने मेरा उत्साह बढ़ाये रखा जिसके बग़ैर यह संकलन आपके सामने शायद न आ पाता। उन सबका आभारी तो मैं हूँ ही, इस संकन की पांडुलिपि तैयार करने में सर्व श्री नरेन्द्र कुमार जोशी, रवि कुमार पारीक और राधा गोपाल शर्मा ने जो मेरी सहायता की है, उसके लिए भी मेरी कृतज्ञता कम नहीं।
आशा करता हूँ कि हिन्दी-हिन्दोस्तानी साहित्य के प्रांगण में बाइ जूई जैसे युगद्रष्टा कवि की इन रचनाओं का व्यापक स्वागत होगा।

शर्म

एक कमबख़्त साल के ये आख़िरी दिन !
पिछले दस दिनों से
आसमानों पर एक गहरा गंदुमी रंग
तारी है
तुंद, बर्फ़ीली हवा लोगों के चेहरों पर
जैसे छुर्रियाँ चला रही है,
गाड़ियों के पहिए बर्फ़ में
धँस कर टूट जाते हैं;
लेकिन ऐसे वक्त में भी
मुझे कोई तरद्दुद नहीं-
दिन का खाना कोई समस्या नहीं
कि मेरे गोदाम अनाज से भरे हैं,
शाम की ठण्ड के लिए ईधन बहुतेरा है,
रुई-भरी टोपी मेरे कान तक ढँके है
और बदन पर रोयेंदार खाल की
दो तहों का घेरा है,
और मैं आराम से बैठा
मदिरा का प्याला पी रहा हूँ

लेकिन लू-यांग के ज़ियादातर बाशिन्दे
आम लेग
ग़रीब और भूखे हैं-
एक घर दूसरे से अटा हुआ,
चूल्हों से धुआँ तक नहीं उठता
आये दिन घर के बर्तनों में
महज़ धूल की मोटी तह होती है
मुझ जैसे लोग
जिन्हें भर पेट खाने को,
अच्छा पहनने को मयस्सर है-
एक फ़ी-सदी भी नहीं !
इस बात पर मुझे शर्म
कैसे न आये ?
मैं यह ऩज्म लिख रहा हूँ
कि बात दो-टूक कह दी जाये !

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