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विवेकानन्द साहित्य >> ध्यान तथा इसकी पद्धतियाँ ध्यान तथा इसकी पद्धतियाँस्वामी विवेकानन्द
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प्रस्तुत है पुस्तक ध्यान तथा इसकी पद्धतियाँ।
आध्यात्मिक निर्भीकता
सन् १८५७ ई. के स्वतन्त्रता-संग्राम की क्रान्ति के समय एक मुसलमान सिपाही ने एक संन्यासी महात्मा को बुरी तरह घायल कर दिया। हिन्दू क्रान्तिकारियों ने उस मुसलमान को पकड़ लिया और उसे संन्यासी के पास लाकर कहा, “आप कहें, तो इसका वध कर दें।” संन्यासी ने उसकी ओर प्रशान्तिपूर्वक देखा और कहा, “भाई, तुम्हीं वह हो, तुम्हीं वह हो - तत्त्वमसि।" और यह कहते कहते उन्होंने शरीर छोड़ दिया। (२.१७)
हे नर-नारियो! उठो, यही भावना करके उठ खड़े होओ, सत्य में विश्वास कुछ करने का साहस करो, सत्य के अभ्यास का साहस करो! संसार को सैकड़े साहसी नर-नारियों की आवश्यकता है। अपने में वह साहस लाओ, जो सत्य को जान सके, जो जीवन में निहित सत्य को दिखा सके, जो मृत्यु से न डरे, प्रत्युत उसका स्वागत करे, जो मनुष्य को यह ज्ञान करा दे कि वह आत्मा है और सारे जगत् में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जो उसका विनाश कर सके। तब तुम मुक्त हो जाओगे। तब तुम अपनी वास्तविक आत्मा को जान लोगे। 'इस आत्मा के सम्बन्ध में पहले श्रवण करना चाहिए, फिर मनन और तत्पश्चात् निदिध्यासन।' (२.१८)
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