हिन्दू धर्म - स्वामी विवेकानन्द Hindu Dharm - Hindi book by - Swami Vivekanand
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हिन्दू धर्म

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : रामकृष्ण मठ प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :113
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5926
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है पुस्तक हिन्दू धर्म...

Hindu Dharm

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वक्तव्य

(प्रथम संस्करण)

प्रस्तुत पुस्तक में स्वामी विवेकानन्द द्वारा भारत तथा विदेश में हिन्दू धर्म पर दिये गये भाषाणों का संकलन है। उन्होंने अपने इन भाषाणों में हिन्दू धर्म के भिन्न भिन्न अंगों पर प्रकाश डाला है तथा उनका सूक्ष्म रूप से विश्लेषण किया है जिससे इस महान प्राचीन धर्म की पूर्ण रूप में प्राप्त हो जाती है। जो हिन्दू-धर्म प्रेमी हैं तथा जो इस धर्म में मूलभूत सिद्धान्तों को जानने के इच्छुक हैं। उन्हें इस पुस्तक से बहुत ही लाभ होगा।

यह अनुवाद हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक पं. द्वारकानाथ जी तिवारी, बी.ए., एल.एल., बी, दुर्ग, सी.पी. ने करके दिया है। इस बहुमूल्य कार्य के लिए हम श्री द्वाराकानाथ के परम कृतज्ञ हैं। उनका यह अनुवाद भाषा तथा भाव दोनों ही की दृष्टि से सच्चा रहा है।

हम पं. शुकदेव प्रसाद जी तिवारी (श्री विनय मोहन शर्मा), एम. ए. एल. एल-एल. बी., प्रोफ्रेसर, नागपुर महाविद्यालय, के भी बड़े आभारी हैं। जिन्होंने इस पुस्तक के कार्य में हमें बहुत ही उपयुक्त एवं मौलिक सूचनाएं दी हैं।
साहित्यशास्त्री, डॉ. पं. विद्याभास्करजी शुक्ल, एम्. एस-सी., पीएच. डी, प्रोफेसर, कालेज ऑफ साइन्स नागपुर को भी हम हार्दिक धन्यवाद देते हैं जिन्होंने इस पुस्तक के प्रूफ-संशोधन आदि कार्य में हमें बड़ी सहायता दी है।

हमें विश्वास है कि स्वामीजी के इन स्फूर्तिदायक भाषणों से हिन्दी जनता का विशेष हित होगा।

प्रकाशक

हिन्दू धर्म
हिन्दू धर्म की सार्वभौमिकता


ऐतिहासिक युग के पूर्व के केवल तीन ही धर्म आज संसार में विद्यामान हैं- हिन्दू धर्म, पारसी धर्म और यहूदी धर्म। ये तीन धर्म अनेकानेक प्रचण्ड आघातों के पश्चात् भी लुप्त न होकर आज भी जीवित हैं, यह उनकी आन्तरिक शक्ति का प्रमाण है। पर जहाँ हम यह देखते हैं कि यहूदी धर्म ईसाई धर्म को नहीं पचा सका, वरन अपनी सर्वविजयी सन्तान-ईसाई धर्म-द्वारा अपने जन्म स्थान से निर्वासित कर दिया गया, और यह है कि केवल मुट्ठी-भर पारसी ही अपने महान् धर्म की गाथा गाने के लिये अब अवशेष हैं- वहाँ भारत में एक के बाद एक अनेकों धर्म-पन्थों का उद्भव हुआ और वे पन्थ वेदप्रणीत धर्म को जड़ से हिलाते- से प्रतीत हुये; पर भयंकर भूकम्प के समय समुद्री किनारे की जलतरंगों के समान यह धर्म कुछ समय के लिये इसीलिए पीछे हट गया कि तत्पश्चात हजार गुना अधिक बलशाली होकर सम्मुखस्थ सब को डुबानेवाली बाढ़ के रूप में लौट आये; और जब यह सारा कोलाहल शान्त हो गया, तब सारे धर्म-सम्प्रदाय अपनी जन्मदात्री मूल हिन्दू धर्म की विराट काया द्वारा आत्मसात् कर लिये गये, पचा लिये गये।

आधुनिक विज्ञान के मानवीय आविष्कार जिसकी केवल प्रतिध्वनि मात्र हैं, ऐसे वेदान्तों के अत्युच्च आध्यात्मिक भाव से लेकर सामान्य मूर्तिपूजा एवं तदानुषंगिक अनेक पौराणिक दन्त-कथाओं, और इतना ही नहीं बल्कि बौद्धों के अज्ञेयवाद तथा जैनों के निरीश्वरवाद-इनमें से प्रत्येक के लिए हिन्दू धर्म में स्थान है।

तब, प्रश्न यह उठता है कि वह कौन सा एक साधारण बिंदु है, जहां पर इतनी विभिन्न दिशाओं में जानेवाली त्रिज्यारेखाएं केन्द्रस्थ होती हैं ? वह कौन सा एक सामान्य आधार है। जिस पर इतने परस्पर-विरोधी भासनेवाले ये सब भाव आश्रित हैं ? इसी प्रश्न का उत्तर देने का अब मैं प्रयत्न करूँगा।

हिन्दू जाति ने अपना धर्म अपौरुषेय वेदों से प्राप्त किया है। उनकी धारणा है कि वेद अनादि और अनन्त हैं। श्रोताओं को सम्भव है, यह हास्यास्पद मालूम हो और वे सोचें कि कोई पुस्तक अनादि और अनन्त कैसे हो सकती है। परन्तु वेद का अर्थ है भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक तत्त्वों का संचित कोष जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त मनुष्यों के पता लगने के पूर्व से ही अपना काम चला आया था और आज यदि मनुष्य-जाति भूल भी जाय तो भी वह नियम अपना काम करता ही रहेगा, ठीक वही बात आध्यात्मिक जगत् को चलानेवाले नियमों के सम्बन्ध में भी है। एक आत्मा का दूसरी आत्मा के साथ और प्रत्येक आत्मा का परमपिता परमात्मा के साथ जो नैतिक तथा दिव्य आध्यात्मिक सम्बन्ध है, वे हमारे पता लगाने के पूर्व भी थे, और हम यदि उन्हें भूल भी जाएँ तो भी बने रहेंगे।

इन नियमों या सत्यों का अविष्कार करनेवाले ‘ऋषि’ कहलाते हैं और हम उनको पूर्णत्व को पहुंची हुई विभूति जानकार सम्मान देते हैं। श्रोताओं को यह बतलाते हुए मुझे हर्ष होता है कि इन अतिशय उन्नत ऋषियों में कुछ स्त्रियाँ भी थीं।

यहाँ पर कोई यह तर्क भी कर सकता है कि ये आध्यात्मिक नियम, नियम के रूप में अन्नत भले ही हों, पर इसका आदि तो अवश्य ही होना चाहिए। वेद हमें यह सिखाते हैं कि सृष्टि का (अतएव सृष्टि के इन नियमों का भी) न आदि है, न अन्त। विज्ञान ने हमें सिद्ध कर दिखाया है कि सम्रग विश्व की सार शक्ति-समष्टि का परिमाण सदा एकसा रहता है। तो फिर, यदि ऐसा कोई समय था जब कि किसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं था, उस समय यह सम्पूर्ण व्यक्त शक्ति कहाँ थी ? कोई कोई कहते हैं कि ईश्वर में ही वह सब अक्रिय रूप से निहित थी। तब तो कोई ईश्वर कभी निष्क्रिय और कभी सक्रिय हैं; इससे तो यह विकासशील हो जायगा। प्रत्येक विकासशील पदार्थ मिश्रित होता है और हर एक मिश्रित पदार्थ में वह परिवर्तन अवश्यम्भावी है, जिसे हम विनाश कहते हैं। इस तरह तो ईश्वर की मृत्यु हो जायगी, जो कि सर्वथा असम्भव एवं हास्यास्पद कल्पना है। अतः ऐसा समय कभी नहीं था, जब यह सृष्टि नहीं थी। अतएव यह सृष्टि अनादि है।

मैं एक उपमा दूँ- स्रष्टा और सृष्टि मानो दो रेखाएं हैं जिनका न आदि है न अन्त, और जो सामान्तर हैं। ईश्वर नित्य क्रियाशील महा-शक्तिस्वरूप है, सर्व-विधाता है, जिसकी प्रेरणा से प्रलय-पयोधि में से नित्यशः एक के बाद एक ब्रह्माण्ड का सृजन होता है, उनका कुछ काल तक पालन होता है और तत्पश्चात् पुनः विनष्टि कर दिये जाते हैं। ‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् अर्थात् इस सूर्य और चन्द्रमा को विधाता ने पूर्व कल्पों के सूर्य और चन्द्रमा के समान निर्मित किया है- इस वाक्य का नित्य पाठ प्रत्येक हिन्दू बालक प्रतिदिन अपने गुरु के साथ किया करता है। और यह सिद्धान्त आधुनिक विज्ञान के साथ मेल खाता है।

यहाँ पर मैं खड़ा हूँ। अपनी आँखें बन्द करके यदि मैं अपने अस्तित्व को समझने का प्रयत्न करूं कि मैं क्या हूँ- ‘मैं’ मैं’ ‘मैं’, तो मुझमें किस भाव का उदय होता है ? यह कि मैं शरीर हूँ। तो क्या मैं भौतिक पदार्थों के समूह के सिवाय और भी कुछ भी नहीं हूँ ? वेदों की घोषणा है – नहीं मैं शरीर में रहने वाली आत्मा हूँ। शरीर मर जाएगा, पर मैं नहीं मरूँगा। मैं इस शरीर में विद्यमान हूँ और जब इस शरीर का पतन होगा, तब भी मैं विद्यमान रहूँगा ही। इस शरीर-ग्रहण के पूर्व भी मैं विद्यामान था। आत्मा किसी पदार्थ से सृष्टि नहीं हुई है, क्योंकि सृष्टि का अर्थ होता है भिन्न-भिन्न द्रवों का संयोग। वियोग। अतएव यदि आत्मा का सृजन हुआ, तो उसकी मृत्यु भी होनी चाहिए। इससे सिद्ध हो गया है कि आत्मा का सृजन नहीं हुआ था, वह कोई सृष्टि पदार्थ नहीं है।

पुनश्च, कुछ लोग जन्म से ही सुखी होते हैं। पूर्ण स्वास्थ्य का आनंद भोगते हैं, उन्हें सुन्दर शरीर उत्साह पूर्ण मन और सभी आवश्यक सामग्रियाँ प्राप्त रहती हैं। दूसरे कुछ लोग जन्म से ही दुःखी होते हैं, किसी के हाथ या पाँव नहीं होते, तो कोई मूर्ख होते हैं, और येन-केन-प्रकारेण अपने दुःखमय जीवन के दिन काटते हैं ऐसा क्यों ? यदि ये सभी एक ही न्याय और दयालु ईश्वर ने उत्पन्न किये हों, तो ऐसा फिर उसने एक को सुखी और दूसरे को दुखी क्यों बनाया ? भगवान् ऐसा पक्षपाती क्यों है ? फिर ऐसा मानने से भी बात नहीं सुधर सकती कि जो वर्तमान जीवन में दुखी है, वे भावी जीवन में पूर्ण सुखी रहेंगे। न्यायी और दयालु भगवान् के राज्य में मनुष्य इस जीवन में भी दुखी क्यों रहे ? दूसरी बात यह है कि सृष्टि-उत्पादक ईश्वर को मान्यता देनेवाला यह सिद्धान्त सृष्टि में इस वैषम्य के लिये कोई कारण बताने का प्रयत्न तक नहीं करता बल्कि वह तो केवल एक सर्व-शक्तिमान् स्वेच्छाचारी पुरुष का निष्ठुर व्यवहार ही प्रकट करता है।

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