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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....

कसौटी


जहाज धक्के पर लगा। यात्री उतरे। पर मेरे बारे में मि. एस्कम्ब ने कप्तान सेकहलाया था : 'गाँधी को और उसके परिवार को शाम को उतारियेगा। उसके विरुद्ध गोरे बहुत उत्तेजित हो गये हैं और उनके प्राण संकट में हैं। पोर्टसुपरिटेण्डेण्ट मि. टेटम उन्हे शामको अपने साथ ले जायेंगे।'

कप्तान में मुझे इस संदेश की खबर दी। मैंने तदनुसार चलना स्वीकर किया। लेकिन इससंदेश को मिले आधा घंटा भी न हुआ कि इतने में मि. लाटन आये और कप्तान से मिलकर बोले, 'यदि मि. गाँधी मेरे साथ चले, तो मैं उन्हें अपनी जिम्मेदारीपर ले जाना चाहता हूँ। स्टीमर के एजेण्ट के वकील के नाते मैं आपसे कहता हूँ कि मि. गाँधी के बारे में जो संदेख आपको मिला है उसके बन्धन से आपमुक्त हैं।' इस प्रकार कप्तान से बातचीत करके वे मेरे पास आये और मुझ से कुछ इस मतलब की बातें कहीँ : 'आपको जीवन का डर न हो तो मैं चाहता हूँ किश्रीमती गाँधी और बच्चे गाड़ी में रुस्तमजी सेठ के घर जाये और आप तथा मैं आम रास्ते से पैदल चले। मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि आप अंधेराहोने पर चुपचाप शहर दाखिल हो। मेरा ख्याल हैं कि आपका बाल भी बाँका न होगा। अब तो सब कुध शान्त हैं। गोरे सब तितर-बितर हो गये हैं। पर कुछ भीक्यों न हो, मेरी राय हैं कि आपको छिपे तौर पर शहर में कभी न जाना चाहिये।'

मैं सहमत हो गया। मेरी धर्मपत्नी और बच्चे गाड़ी में बैठकर रुस्तमजी सेठ के घर सही - सलामत पहुँच गये। कप्तान की अनुमति लेकर मैं मि.लाटन के साथ उतरा। रुस्तमजी सेठ का घर वहाँ से लगभग दो मील दूर था।

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