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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....


प्रातः दातुन औरस्नान के समय का उपयोग गीता के श्लोक कंठ करने में किया। दातुन में पन्द्गह और स्नान में बीस मिनट लगते थे। दातुन अंग्रेजी ढंग से मैंखड़े-ख्ड़े करता था। सामने की दीवार पर गीता के श्लोक लिखकर चिपका देता थाऔर आवश्यकतानुसार उन्हें देखता तथा घोखता जाता था। ये घोखे हुए श्लोकस्नान करने तक पक्के हो जाते थे। इस बीच पिछले कंठ किये हुए श्लोको को भीमैं एक बार दोहरा जाता था। इसप्रकार तेरह अध्याय तक कंठ करने की बात मुझेयाद हैं। बाद में काम बढ़ गया। सत्याग्रह का जन्म होने पर उस बालक केलालन-पालन में मेरा विचार करने का समय भी बीतने लगा और कहना चाहिये कि आजभी बीत रहा हैं।

इस गीतापाठ का प्रभाव मेरे सहाध्यायियो पर क्या पड़ा उसे वे जाने, परन्तु मेरे लिए तो वह पुस्तक आचार की एक प्रौढमार्गदर्शिका बन गयी। वह मेरे लिए धार्मिक कोश का काम देने लगी। जिस प्रकार नये अंग्रेजी शब्दों के हिज्जो यो उनके अर्थ के लिए मैं अंग्रेजीशब्दकोश देखता था, उसी प्रकार आचार-सम्बन्धी कठिनाइयों और उनकी अटपटीसमस्याओ को मैं गीता से हल करता था।

उसके अपरिग्रह, समभाव आदि शब्दों ने मुझे पकड़ लिया। समभाव का विकास कैसे हो, उसकी रक्षा कैसे कीजाय? अपमान करनेवाले अधिकारी,रिश्वत लेनेवाले अधिकारी, व्यर्थ विरोध करने वाले कल के साथी इत्यादि और जिन्होने बड़े-बड़े उपकार किये हैं ऐसेसज्जनोंके बीच भेद न करने का क्या अर्श हैं? अपरिग्रह किस प्रकार पाला जाता होता?देह का होना ही कौन कम परिग्रह हैं? स्त्री-पुत्रादि परिग्रह नहीं तो और क्या हैं? ढेरो पुस्तकों से भरी इन आलमारियो को क्या जला डालूँ? घर जलाकरतीर्थ करने जाऊँ? तुरन्त ही उत्तर मिला कि घर जलाये बिना तीर्थ किया हीनहीं जा सकता। यहाँ अंग्रेजी कानून में मेरी मदद की। स्नेल की कानूनीसिद्धान्तों की चर्चा याद आयी। गीता के अध्ययन के फलस्वरुप 'ट्रस्टी' शब्द का अर्थ विशेष रुप से समझ में आया। कानून शास्त्र के प्रति मेरा आदर बढ़ा।मुझे उसमें भी धर्म के दर्शन हुए। ट्रस्टी के पास करोड़ो रुपयो के रहतेहुए भी उनमें से एक भी पाई उसकी नहीं होती। मुमुक्षु को ऐसा ही बरताव करनाचाहिये, यह बात मैंने गीताजी से समझी। मुझे यह दीपक की तरह स्पष्ट दिखायी दिया कि अपरिग्रह बनने में, समभावी होने में हेतु का, हृदय का परिवर्तनआवश्यक हैं। मैंने रेवाशंकरभाई को इस आशय का पत्र लिख भेजा कि बीमे कीपॉलिसी बन्द कर दें। कुछ रकम वापस मिले तो ले लें, नहीं तो भरे हुए पैसोंको गया समझ लें। बच्चों की और स्त्री के रक्षा उन्हें और हमें करने वालाईश्वर करेंगा। पितृतुल्य भाई को लिखा, 'आज तक तो मेरे पास जो बचा मैंने आपको अर्पण किया। अब मेरी आशा आप छोड़ दीजिये। अब जो बचेगा सो यहींहिन्दुस्तान समाज के हित में खर्च होगा।'

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