लोगों की राय

जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

57 पाठक हैं

प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....

निरामिषाहार के लिए बलिदान


मेरे जीवन में जैसे-जैसे त्याग और सादगी बढ़ी और धर्म जाग्रति का विकास हुआ,वैसे-वैसे निरामिषाहार का और उसके प्रचार का शौक बढ़ता गया। प्रचार कार्यकी एक ही रीति मैंने जानी हैं। वह हैं, आचार की, और आचार के साथजिज्ञासुओं से वार्तालाप की।

जोहानिस्बर्ग में एक निरामिषाहार गृह था। एक जर्मन, जो कूने की जल-चिकित्सा में विश्वास रखता था, उसे चलाताथा। मैंने वहाँ जाना शुरू किया और जितने अंग्रेज मित्रों को वहाँ ले जासकता था उतनों को उसके यहाँ ले जाता था। पर मैंने देखा कि वह भोजनालयलम्बे समय तक चल नहीं सकता। उसे पैसे की तंगी तो बनी ही रहती थी। मुझेजितनी उचित मालूम हुई उतनी मैंने मदद की। कुछ पैसे खोये भी। आखिर वह बन्दहो गया। थियॉसॉफिस्टों में अधिकतर निरामिषाहारी होते हैं, कुछ पूरे कुछअधूरे। इस मंडल में एक साहसी महिला भी थी। उसने बड़े पैमाने पर एकनिरामिषाहारी भोजनालय खोला। यह महिला कला की शौकीन थी। वह खुले हाथों खर्च करती थी और हिसाब-किताब का उसे बहुत ज्ञान नहीं था। उसकी खासी बड़ीमित्र-मंडली थी। पहले तो उसका काम छोटे पैमाने पर शुरू हुआ, पर उसने उसेबढ़ाने और बड़ी जगह लेने का निश्चय किया। इसमे उसने मेरी मदद माँगी। उससमय मुझे उसके हिसाब आदि की कोई जानकारी नहीं थी। मैंने यह मान लिया था किउसका अन्दाज ठीक ही होगा। मेरे पास पैसे की सुविधा थी। कई मुवक्किलो केरुपये मेरे पास जमा रहते थे। उनमें से एक से पूछ कर उसकी रकम में से लगभगएक हजार पौंड उस महिला को मैंने दे दिये। वह मुवक्किल विशाल हृदय औरविश्वासी था। वह पहले गिरमिट में आया था। उसने (हिन्दी में) कहा, 'भाई,आपका दिल चाहे तो पैसा दे दो। मैं कुछ ना जानूँ। मैं तो आप ही को जानताहूँ।' उसका नाम बदरी था। उसने सत्याग्रह में बहुत बड़ा हिस्सा लिया था। वह जेल भी भुगत आया था। इतनी संमति के सहारे मैंने उसके पैसे उधार दे दिये।दो-तीन महीने में ही मुझे पता चल गया कि यह रकम वापस नहीं मिलेगी। इतनीबड़ी रकम खो देने की शक्ति मुझ में नहीं थी। मेरे पास इस बड़ी रकम कादूसरा उपयोग था। रकम वापस मिली ही नहीं। पर विश्वासी बदरी की रकम कैसे डूबसकती थी? वह तो मुझी को जानता था? यह रकम मैंने भर दी।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book