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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....


पर इस परिवर्तनसे कब्ज की शिकायत दूर न हुई। कूने के कटिस्नान का उपचार करने से थोड़ा आराम हुआ। पर अपेक्षित परिवर्तन तो नहीं ही हुआ। इस बीच उसी जर्मनहोटलवाले ने या दूसरे किसी मित्र ने मुझे जुस्ट की 'रिटर्न टु नेचर' ( प्रकृति की ओर लौटो ) नामक पुस्तक दी। उसमें मैंने मिट्टी के उपचार केबारे में पढ़ा। सूखे औप हरे फल ही मनुष्य का प्राकृतिक आहार हैं, इस बात का भी इस लेखक ने बहुत समर्थन किया हैं। इस बार मैंने केवल फलाहार काप्रयोग तो शुरू नहीं किया, पर मिट्टी के उपचार तुरन्त शुरू कर दिया। मुझ पर उसका आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ा। उपचार इस प्रकार था, खेत की साफ लाल याकाली मिट्टी लेकर उसमें प्रमाण से पानी डाल कर साफ, पतले, गीले कपड़े में उसे लपेटा और पेट पर रखकर उस पर पट्टी बाँध दी। यह पुलटिस रात को सोते समयबाँधता था और सबेरे अथवा रात में जब जाग जाता तब खोल दिया करता था। इससे मेरा कब्ज जाता रहा। उसके बाद मिट्टी के ये उपचार मैंने अपने पर और अपनेअनेक साथियों पर किये और मुझे याद है कि वे शायद ही किसी पर निष्फल रहे हो।

देश में आने के बाद मैं ऐसे उपचारो के विषय में आत्म-विश्वास खो बैठा हूँ। मुझे प्रयोग करने का, एक जगह स्थिर होकर बैठने का अवसर भीनहीं मिल सका। फिर भी मिट्टी और पानी के उपचारों के बारे में मेरी श्रद्धा बहुत कुछ वैसी ही है जैसी आरम्भ में थी। आज भी मैं मर्यादा के अन्दर रहकरमिट्टी का उपचार स्वयं अपने ऊपर तो करता ही हूँ और प्रसंग पड़ने पर अपनेसाथियों को भी उसकी सलाह देता हूँ। जीवन में दो गम्भीर बीमारियाँ मैं भोगचुका हूँ, फिर भी मेरा यह विश्वास है कि मनुष्य को दवा लेने की शायद हीआवश्यकता रहती हैं। पथ्य तथा पानी, मिट्टी इत्यादि के घरेलू उपचारों से एकहजार में से 999 रोगी स्वस्थ हो सकते हैं। क्षण-क्षण में बैद्य, हकीम औरडॉक्टर के घर दौड़ने से और शरीर में अनेक प्रकार के पाक और रसायन ठूँसनेसे मनुष्य न सिर्फ अपने जीवन को छोटा कर लेता हैं, बल्कि अपने मन पर काबूभी खो बैठता है। फलतः वह मनुष्यत्व गँवा देता है और शरीर का स्वामी रहनेके बदले उसका गुलाम बन जाता हैं।

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