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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....


इसलिएजब बोआर ब्रिटिश युद्ध शुरू हुआ, तब अपना घर भरा होते हुए भी मैंनेजोहानिस्बर्ग से आये हुए दो अंग्रेजो को अपने यहाँ टिका लिया। दोनोंथियॉसॉफिस्ट थे। उनमें से एक का नाम किचन था। इनक चर्चा हमे आगे भी करनी होगी। इन मित्रों के सहवास ने भी धर्मपत्नी को रुलाया ही था। मेरे कारणउसके हिस्से में रोने के अनेक अवसर आये है। बिना किसी परदे के इतने निकट संबंध में अंग्रेजो को घर में रखने का यह मेरा पहला अनुभव था। इंग्लैंडमें मैं उनके घरो में अवश्य रहा था। पर उस समय मैं उनकी रहन-सहन की मर्यादा में रहा था और वह रहना लगभग होटल में रहने जैसा था। यहाँ बात उससेउल्टी थी। ये मित्र कुटुम्ब के व्यक्ति बन गये थे। उन्होंने बहुत-कुछ भारतीय रहन-सहन का अनुकरण किया था।

यद्यपि घर के अन्दर बाहर का साज-सामान अंग्रेजी ढंग का था, तथापि अन्दर की रहन-सहन और खान-पान आदिमुख्यतः भारतीय थे। मुझे याद हैं कि इन मित्रों को रखने में कई कठिनाइयाँखड़ी हुई थी, लेकिन मैं यह अवश्य कह सकता हूँ कि दोनों व्यक्ति घर केदूसरे लोगों के साथ पूरी तरह हिलमिल गये थे। जोहानिस्बर्ग में ये संबंध डरबन सेभी अधिक आगे बढ़े।

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