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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....
इनलोगों ने अपने खास दुःखो को मिटाने के लिए स्वतंत्र हिन्दुस्तानी व्यापारी वर्ग के मंड़ल से भिन्न एक मंड़ल की रचना की थी। उनमें कुछ बहुत शुद्धहृदयके उदार भावनावाले चरित्रवान हिन्दुस्तानी भी थे।
उनके मुखिया का नाम श्री जयरामसिंह था। और मुखिया न होते हुए भी मुखिया जैसे ही दूसरे भाईका नाम श्री बदरी था। दोनों का देहान्त हो चुका हैं। दोनों की तरफ से मुझेबहुत अधिक सहायता मिली थी। श्री बदरी से मेरा परिचय हो गया था और उन्होंनेसत्याग्रह में सबसे आगे रहकर हिस्सा लिया था। इन और ऐसे अन्य भाईयों के द्वारा मैं उत्तर दक्षिण के बहुसंख्यक हिन्दुस्तानियों के निकट परिचय मेंआया था और उनका वकील ही नहीं, बल्कि भाई बनकर रहा था तथा तीनों प्रकार केदुःखों में उनका साक्षी बना था। सेठ अब्दुल्ला ने मुझे 'गाँधी' नाम सेपहचानने से इनकार कर दिया। 'साहब' तो मुझे कहता और मानता ही कौन? उन्होंने एक अतिशय प्रिय नाम खोज लिया। वे मुझे 'भाई' कहकर पुकारने लगे। दक्षिणअफ्रीका में अन्त तक मेरा यही नाम रहा। लेकिन जब ये गिरमिट मुक्त हिन्दुस्तानी मुझे 'भाई' कहकर पुकारते थे, तब मुझे उसमें एक खास मिठास काअनुभव होता था।
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