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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....


लोगबहुत घबराये। लेकिन चूंकि मैं उनके साथ था, इसलिएउन्हें तसल्ली थी। उनमें से बहुतेरे गरीब अपने पैसे घरों में गाड़कर रखतेथा। अब पैसे वहाँ से हटाना जरूरी हो गया। उनका कोई बैंक न था। बैंक का तो वे नाम भी न जानते थे। मैं उनका बैक बना। मेरे यहाँ पैसों को ढेर लग गया।ऐसे समय मैं कोई मेंहनताना तो ले ही नहीं सकता था। जैसे तैसे मैंने इस कामको पूरा किया। हमारे बैक के मैनेजर से मेरी अच्छी जान पहचान थी। मैंनेउनसे कहा कि मुझे उनके बैक में बहुत बडी रकम जमा करनी होगी। बैंक तांबे औरचादी के सिक्के लेने को तैयार नहीं होते। इसके सिवा, महामारी के क्षेत्रसे आने वाले पैसों को छूने में मुहर्रिर लोग आनाकानी करे, इसकी भी संभावनाथा। मैनेजर ने मेरे लिए सब प्रकार की सुविधा कर दी। तय हुआ कि जंतु नाशकपानी से धो कर पैसे बैक में भेज दिये जाये। मुझे याद है कि इस तरह लगभगसाठ हजार पौंड बैक में जमा किये गये थे। जिनके पास अधिक रकमे थी उनमुवक्किलो को एक निश्चित अवधि के लिए अपनी रकम ब्याज पर रखने की सलाहमैंने दी। इस प्रकार अलग अलग मुवक्किलो के नाम कुछ रकमें जमा की गयी। इसकापरिणाम यह हुआ कि उनसे से कुछ लोग बैंक में पैसे रखने के आदी हो गये।लोकेशन में रहने वालो को एक स्पेशल ट्रेन में जाहानिस्बर्ग के पासक्लिपस्प्रूट फार्म पर ले जाया गया। वहाँ उनके खाने पीने की व्यवस्थाम्युनिसिपैलिटी ने अपने खर्च से की। तंबुओ में बसे इस गाँव का दृश्यसिपाहियों की छावनी जैसा था। लोगों को इस तरह रहने की आदत नहीं थी। इससे उन्हें मानसिक दुःख हुआ, नया नया सा लगा। किन्तु कोई खास तकलीफ नहीं उठानीपड़ी। मैं हर रोज एक बार साइकल पर वहाँ जाता थी। इस तरह तीन हफ्ते खुलीहवा में रहने से लोगों के स्वास्थय में अवश्य ही सुधार हुआ और मानसिक दुःखको तो वे पहले चौबीस घंटो के अन्दर ही भूल गये। अतएव बाद में वे आनन्द से रहने लगे। मैं जब भी वहाँ जाता, उन्हें भजन कीर्तन और खेल कूद में ही लगापाता।

जैसा कि मुझे याद है जिस दिन लोकेशन खाली किया गया उसके दूसरे दिन उसकी होली की गयी। म्युनिसिपैलिटी ने उसकी एक भी चीज बचाने कालोभ नहीं किया। इन्हीं दिनों और इसी निमित्त से म्युनिसिपैलिटी ने अपने मार्केट की सारी इमारती लकड़ी भी जला डाली और लगभग दस हजार पौंड का नुकसानसहन किया। मार्केट में मरे हुए चूहे मिले थे, इस कारण यह कठोर कार्यवाहीकी गयी थी, पर परिणाम यह हुआ कि महामारी आगे बिल्कुल न बढ़ सकी। शहरनिर्भय बना।

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