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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....


घरसाफ रखने के लिए एक नौकर था। वह घर के आदमी की तरह रहता था और उसके काममें बालक पूरा हाथ बँटाते थे। पाखाना साफ करने के लिए तो म्युनिसिपैलिटीका नौकर आता था, पर पाखाने के कमरे को साफ करने का काम नौकर को नहीं सौपाजाता था। उससे वैसी आशा भी नहीं रखी जाती थी। यह काम हम स्वयं करते थे औरबालकों को तालीम मिलती थी। परिणाम यह हुआ कि शुरू से ही मेरे एक भी लड़केको पाखाना साफ करने की घिन न रही और आरोग्य के साधारण नियम भी वेस्वाभाविक रूप से सीख गये। जोहानिस्बर्ग में कोई बीमार तो शायद ही कभीपड़ता था। पर बीमारी का प्रसंग आने पर सेवा के काम में बालक अवश्य रहते थेऔर इस काम को खूशी से करते थे।

मैं यह तो नहीं कहूँगा कि बालकों के अक्षर ज्ञान के प्रति मैं लापरवाह रहा। पर यह ठीक है कि मैंने उसकीकुरबानी करने में संकोच नहीं किया। और इस कमी के लिए मेरे लड़को को मेरे विरुद्ध शिकायत करने का कारण रह गया है। उन्होंने कभी कभी अपना असंतोष भीप्रकट किया है। मैं मानता हूँ कि इसमे किसी हद तक मुझे अपना दोष स्वीकार करना चाहिये। उन्हें अक्षर ज्ञान कराने की मेरी इच्छा बहुत थी, मैंप्रयत्न भी करता था, किन्तु इस काम में हमेशा कोई न कोई विध्न आ जाता था। उनके लिए घर पर दूसरी शिक्षा की सुविधा नहीं की गई थी, इसलिए मैं उन्हेंअपने साथ पैदल दफ्तर तक ले जाता था। दफ्तर ढाई मील दूर था, इससे सुबह शाममिलाकर कम से कम पाँच मील की कसरत उन्हे औऱ मुझे हो जाती थी। रास्ता चलतेहुए मैं उन्हे कुछ न कुछ सिखाने का प्रयत्न करता था, पर यह भी तभी होताथा, जब मेरे साथ दूसरा कोई चलने वाला न होता। दफ्तर में वे मुवक्किलो वमुहर्रिरो के सम्पर्क में आते थे। कुछ पढ़ने को देता तो वे पढते थे। इधरउधर घूम फिर लेते थे और बाजार से मामूली सामान खरीदना हो तो खरीद लाते थे।

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