|
जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
|
57 पाठक हैं |
||||||
प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....
सत्याग्रह की उत्पत्ति
यों एक प्रकार की जो आत्मशुद्धि मैंने की वह मानो सत्याग्रह के लिए ही हुए हो,ऐसी एक घटना जोहानिस्बर्ग में मेरे लिए तैयार हो रही थी। आज मैं देख रहा हूँ कि ब्रह्मचर्य का व्रत लेने तक की मेरे जीवन की सभी मुख्य घटनाये मुझेछिपे तौर पर उसी के लिए तैयार कर रही थी।
'सत्याग्रह' शब्द कीउत्पत्ति के पहले उस वस्तु की उत्पत्ति हुई। उत्पत्ति के समय तो मैं स्वयं भी उसके स्वरूप को पहचान न सका था। सब कोई उसे गुजराती में 'पैसिवरेजिस्टेन्स' ते अंग्रेजी नाम से पहचानने लगे। जब गोरो की एक सभा में मैंने देखा कि 'पैसिव रेजिस्टेन्स' संकुचित अर्थ किया जाता है, उसे कमजोरोका ही हथियार माना जाता है, उसमें द्वेष हो सकता है और उसका अन्तिम सवरुपहिंसा में प्रकट हो सकता है, तब मुझे उसका विरोध करना पडा औरहिन्दुस्तानियो को लड़ाई का सच्चा स्वरुप समझाना पड़ा। और तबहिन्दुस्तानियो के लिए अपनी लड़ाई का परिचय देने के लिए नये शब्द की योजनाकरना आवश्यक हो गया।
पर मुझे वैसा स्वतंत्र शब्द किसी तरह सूझ नहीं रहा था। अतएव उसके लिए नाममात्र का इनाम रखकर मैंने 'इंडियन ओपीयियन'के पाठको में प्रतियोगिता करवायी। इस प्रतियोगिता के परिणाम स्वरुप मगललालगाँधी ने सत् + आग्रह की संधि करके 'सदाग्रह' शब्द बनाकर भेजा। इनाम उन्हेही मिला। पर 'सदाग्रह' शब्द को अधिक स्पष्ट करने के विचार से मैंने बीच में 'य' अक्षर और बढाकर 'सत्याग्रह' शब्द बनाया और गुजराती में यह लड़ाईइस नाम से पहचानी जाने लगी।
|
|||||










