लोगों की राय

जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

57 पाठक हैं

प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....


मैंपूना पहुँचा। वहाँ के सब संस्मरण देने में मैं असमर्थ हूँ। गोखले ने और(भारत सेवक समाज) सोसायटी के सदस्यों ने मुझे अपने प्रेम से नहला दिया।जहाँ तक मुझे याद हैं, उन्होंने सब सदस्यों को पूना बुलाया था। सबके साथकई विषयों पर मैंने दिल खोल कर बातचीत की। गोखले की तीव्र इच्छा थी कि मैंभी सोसायटी में सम्मिलित हो जाऊँ। मेरी इच्छा तो थी ही। किन्तु सोसाइटी के सदस्यों को ऐसा लगा कि सोसाइटी के आदर्श और काम करने की रीति मुझसे भिन्नहैं, इसलिए मुझे सदस्य बनना चाहिये या नहीं इस बारे में उनके मन में शंकाथी। गोखले का विश्वास था कि मुझमें अपने आदर्शों पर ढृढ़ रहने का जितनाआग्रह हैं उतना ही दूसरों के आदर्शों को निबाह लेने का और उनके साथ घुलमिल जाने का मेरा स्वभाव हैं। उन्होंने कहा: 'हमारे सदस्य अभी आपके इस निबाहलेने वाले स्वभाव को पहचान नहीं पाये हैं। वे अपने आदर्शों पर ढृढ़ रहनेवाले स्वतंत्र और ढृढ़ विचार के लोग हैं। मैं आशा तो करता हूँ कि वे आपकोस्वीकार कर लेंगे। पर स्वीकार न भी करें तो आप यह न समझना कि उन्हें आप के प्रति कम आदर या कम प्रेम हैं। इस प्रेम को अखंडित रखने के लिए वे कोईजोखिम उठाते हूए डरते हैं। पर आप सोसाइटी के सदस्य बने या न बने मैं तो आपको सदस्य ही मानूँगा।'

मैंने अपने विचार गोखले को बता दिये थे: ' मैं सोसाइटी का सदस्य चाहे न बनूँ तो भी मुझे एक आश्रम खोलकर उसमेंफीनिक्स के साथियों को रखना और खुद वहाँ बैठ जाना हैं। इस विश्वास के कारणकि गुजराती होने से मेरे पास गुजरात की सेवा के जरिये देश की सेवा करने कीपूँजी अधिक होनी चाहिये, मैं गुजरात में कही स्थिर होना चाहता हूँ।'

गोखले को ये विचार पसन्द पड़े थे, इसलिए उन्होंने कहा: 'आप ऐसा अवश्य करे।सदस्यों के साथ आपकी बातचीत का जो भी परिणाम आये, पर यह निश्चित हैं कि आपको आश्रम के लिए पैसा मुझी से लेना हैं। उसे मैं अपना ही आश्रमसमझूँगा।'

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book