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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....


मोतीलाल पर मेरी आँख चिक गयी। उनकेदूसरे साथियों ने उनकी स्तुति करते हुए कहा, 'ये भाई दर्जी हैं। अपने धंधे में कुशल हैं, इसलिए रोज एक घंटा काम करके हर महीने लगभग पन्द्रह रुपयेअपने खर्च के लिए कमा लेते हैं और बाकी का समय सार्वजनिक सेवा में बिताते हैं। ये हम सब पढे-लिखों का मार्गदर्शन करते हैं और हमे लज्जित करते हैं।'

बाद में मैं भाई मोतीलाल के सम्पर्क में काफी आया था औऱ मैंने अनुभव किया था कि उनकी उपर्युक्त स्तुति में लेशमात्र भी अतिशयोक्ति नहींथी। जब सत्याग्रहाश्रम स्थापति हुआ, तो वे हर महीने वहाँ कुछ दिन अपनी हाजिरी दर्ज करा ही जाते थे। बालकों को सीना सीखाते और आश्रम का सिलाई काकाम भी कर जाते थे। वीरमगाम की बात तो वे मुझे रोज सुनाते थे। वहाँ यात्रियों को जिन मुसीबतों का सामना करना पड़ता था, वे उनके लिए असह्य थी।इन मोतीलाल को भरी जवानी में बीमारी उठा ले गयी और वढवाण उनके बिना सुना हो गया।

राजकोट पहुँचने पर दूसरे दिन सबेरे मैं उपर्युक्त आज्ञा के अनुसार अस्पताल में हाजिर हुआ। वहाँ तो मैं अपरिचित नहीं था। डॉक्टरशरमाये और उक्त जाँच करने वाले अधिकारी पर गुस्सा होने लगे। मुझे गुस्सेका कोई कारण न दिखाई पड़ा। अधिकारी ने अपने धर्म का पालन ही किया था। वहमुझे पहचानता नहीं था और पहचानता होता तो भी उसने जो हुक्म दिया वह देनाउसका धर्म था। पर चूंकि मैं सुपरिचित था, इसलिए राजकोट में मैं जाँच करानेजाउँ उसके बदले लोग घर आकार मेरी जाँच करने लगे।

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