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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....
सबेरे मुगलसराय स्टेशन आया। मगनलाल ने तीसरेदर्जे में जगह कर ली थी। मुगलसराय में मैं तीसरे दर्जे में गया। टिकट कलेक्टर को मैंने वस्तुस्थिति की जानकारी दी औऱ उससे इस बात का प्रमाणपत्र माँगा कि मैं तीसरे दर्ज में चला आया हूँ। उसने देने से इनकार किया। मैंने अधिक किराया वापस प्राप्त करने के लिए रेलवे के उच्च अधिकारी कोपत्र लिखा।
उनकी ओर से इस आश्य का उत्तर मिला, 'प्रमाणपत्र के बिना अतिरिक्त किराया लौटाने का हमारे यहाँ रिवाज नहीं है। पर आपके मामलेमें हम लौटाये दे रहे है। बर्दवान से मुगलसराय तक का डयोढ़ा किराया वापसनहीं किया जा सकता।'
इसके बाद के तीसरे दर्जे की यात्रा के मेरेअनुभव तो इतने है कि उनकी एक पुस्तक बन जाय। पर उनमें से कुछ की प्रांसगिक चर्चा करने के सिवा इन प्रकरणों में उनका समावेश नहीं हो सकता। शारीरिकअसमर्थता के कारण तीसरे दर्जे की मेरी यात्रा बन्द हो गयी। यह बात मुझेसदा खटकी है और आगे भी खटकती रहेगी। तीसरे दर्जे की यात्रा में अधिकारियोंकी मनमानी से उत्पन्न होने वाली विडम्बना तो रहती ही है। पर तीसरे दर्जे में बैठने वाले कई यात्रियो का उजड्पन, उनकी स्वार्थबुद्धि और उनका अज्ञानभी कुछ कम नहीं होता। दुःख तो यह है कि अकसर यात्री यह जानते ही नहीं किवे अशिष्टता कर रहे है, अथवा गंदगी फैला रहे है अथवा अपना ही मतलब खोज रहेहै। वे जो करते है, वह उन्हे स्वाभाविक मालूम होता है। हम सभ्य और पढ़ेलिखे लोगों ने उनकी कभी चिन्ता ही नहीं की।
थके मांदे हम कल्याण जंकशन पहुँचे। नहाने की तैयारी की। मगनलाल और मैंने स्टेशन के नल से पानीलेकर स्नान किया। पत्नी के लिए कुछ तजवीज कर रहा था कि इतने में भारत समाजके भाई कौल ने हमे पहचान लिया। वे भी पूना जा रहे थे। उन्होंने पत्नी कोदूसरे दर्जे के स्नानग्रह में स्नान कराने के लिए ले जाने की बात कही। इससौजन्य को स्वीकार करने में मुझे संकोच हुआ। पत्नी को दूसरे दर्जे केस्नानघर का उपयोग करने का अधिकार नहीं था, इसे मैं जानता था। पर मैंने उसे इस स्नानघर में नहाने देने के अनौचित्य के प्रति आँखे मूँद ली। सत्य केपुजारी को यह भी शोभा नहीं देता। पत्नी का वहाँ जाने का कोई आग्रह नहीं था, पर पति के मोहरूपी सुवर्णपात्र ने सत्य को ढांक लिया।
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