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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....

लक्षमण झूला


जब मैं पहाड़ से दीखने वाले महात्मा मुंशीराम जी के दर्शन करने और उनका गुरुकुल देखने गया, तो मुझे वहाँ बड़ीशांति मिली। हरिद्वार के कोलाहल और गुरुकुल की शांति के बीच का भेद स्पष्टदिखायी देता था। महात्मा ने मुझे अपने प्रेम से नहला दिया। ब्रह्मचारीमेरे पास से हटते ही न थे। रामदेवजी से भी उसी समय मुलाकात हुई और उनकीशक्ति का परिचय मैं तुरन्त पा गया। यद्यपि हमे अपने बीच कुछ मतभेद काअनुभव हुआ, फिर भी हम परस्पर स्नेह की गाँठ से बँध गये। गुरुकुल मेंऔद्योगिक शिक्षा शुरू करने की आवश्यकता के बारे मैं रामदेव और दूसरेशिक्षकों के साथ मैंने काफी चर्चा की। मुझे गुरुकुल छोड़ते हुए दुःख हुआ।

मैंने लछमन झूले की तारीफ बहुत सुनी थी। बहुतो ने मुझे सलाह दी कि ऋषिकेशगयेबिना मैं हरिद्वार न छोडूँ। मुझे वहाँ पैदल जाना था। इसलिए एक मंजिल ऋषिकेश की ओर दूसरी लछमन झूले की थी।

ऋषिकेश में अनेक संन्यासी मुझ से मिलने आये थे। उनमें से एक को मेरे जीवन में बड़ी दिलचस्पी पैदाहुई। फीनिक्स मंडल मेरे साथ था। उन सबको देखकर उन्होंने अनेक प्रश्न पूछे। हमारे बीच धर्म की चर्चा हुई। उन्होंने देखा कि मुझमे धर्म की तीव्र भावनाहै। मैं गंगा स्नान करके आया था, इसलिए शरीर खुला था। मेरे सिर पर न शिखाऔर जनेऊ न देखकर उन्हें दुःख हुआ और उन्होंने मुझ से कहा, 'आप आस्तिक होतेहुए भी जनेऊ और शिखा नहीं रखते है, इससे हमारे समान लोगों को दुःख होताहै। ये दो हिन्दू धर्म की बाह्य संज्ञाये है और प्रत्येक हिन्दू को इन्हेंधारण करना चाहिये।'

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