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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....

साथी


ब्रजकिशोरबाबू और राजेन्द्रबाबू की तो एक अद्वितीय जोडी थी। उन्होंने अपने प्रेम से मुझेइतना पंगु बना दिया था कि उनके बिना मैं एक कदम भी आगे नहीं जा सकता था। उनके शिष्य कहिये अथवा साथी, शंभूबाबू, अनुग्रहबाबू, धरणीबाबू औररामनवमीबाबू -- ये वकील लगभग निरन्तर मेरे साथ रहते थे। विन्ध्याबाबू और जनकधारीबाबू भी समय समय पर साथ रहते थे। यह तो बिहारियो का संघ हुआ। उनकामुख्य काम था लोगों का बयान लेना।

अध्यापक कृपालानी इसमे सम्मिलित हुए बिना कैसे रह सकते थे? स्वयं सिन्धी होते हुए भी वे बिहारीसे भी बढ़कर बिहारी थे। मैंने ऐसे सेवक कम देखे है, जिनमे वे जिस प्रान्त में जाये उसमें पूरी तरह घुलमिल जाने की शक्ति हो और जो किसा को यह मालूमन होने दे कि वे दूसरे प्रान्त के है। इनमे कृपालानी एक है। उनका मुख्य काम द्वारपाल का था। दर्शन करनेवालो से मुझे बचा लेने में उन्होंने जीवनकी सार्थकता समझ ली थी। किसी को वे विनोद करके मेरे पास आने से रोकते थे, तो किसी को अहिंसक धमकी से। रात होने पर अध्यापक का धन्धा शुरू करते और सबसाथियो को हँसाते थे और कोई डरपोल पहुँच जाय तो उसे हिम्मत बँधाते थे।

मौलाना मजहरुल हक ने मेरे सहायक के रूप में अपना हक दर्ज करा रखा था और वे महीनेमें एक-दो बार दर्शन दे जाते थे। उस समय के उनके ठाटबाट और दबदबे में औरआज की उनकी सादगी में जमीन-आसमान का अन्तर है। हमारे बीच आकर वे हमसे हृदयकी एकता साध जाते थे, पर अपनी साहबी के कारण बाहर के आदमी को वे हमसे अलग जैसे जान पड़ते थे।

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