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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :188
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6042
आईएसबीएन :9788170287285

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....

उजला पहलू


एक ओर समाज सेवा का वह काम हो रहा था, जिसका वर्णन मैंने पिछले प्रकरणों में किया है और दूसरीओऱ लोगों के दुःखो की कहानियाँ लिखने का काम उत्तरोत्तर बढ़ते पैमाने परहो रहा था। हजारों लोगों की कहानियाँ लिखी गयी। उनका कोई असर न हो, यहकैसी संभव था? जैसे जैसे मेरे पड़ाव पर लोगों की आमद रफ्त बढ़ती गयी वैसेवैसे निलहों का क्रोध बढ़ता गया, उनकी ओर सो मेरी जाँच को बन्द कराने केप्रयत्न बढ़ते गये।

एक दिन मुझे बिहार सरकार का पत्र मिला। उसका आशय इस प्रकार था, 'आपकी जाँच काफी लम्बे समय तक चल चुकी है और अब आपकोउसे बन्द करके बिहार छोड देना चाहिये।' पत्र विनय पूर्वक लिखा गया था, पर उसका अर्थ स्पष्ट था। मैंने लिखा कि जाँच का काम तो अभी देर तक चलेगा औरसमाप्त होने पर भी जब तक लोगों के दुःख दूर न होगे, मेरा इरादा बिहार छोडने का जाने का नहीं है। मेरी जाँच बन्द कराने के लिए सरकार के पास एकसमुचित उपाय यही था कि वह लोगों की शिकायतो को सच मान कर उन्हे दूर करे, अथवा शिकायतो को ध्यान में लेकर अपनी जाँच समिति नियुक्त करे। गवर्नर सरएडवर्ड गेट में मुझे बुलाया और कहा कि वे स्वयं जाँच समिति नियुक्त करना चाहते है। उन्होंने मुझे उसका सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया। समिति केदूसरे नाम देखने के बाद मैंने साथियो से सलाह की और इस शर्त के साथ सदस्य बनना कबूल किया कि मुझे अपने साथियो से सलाहमशविरा करने की स्वतंत्रतारहनी चाहिये और सरकार को समझ लेना चाहिये कि सदस्य बन जाने से मैं हिमायत करना छोड़ न दूँगा, तथा जाँच पूरी हो जाने पर यदि मुझे संतोष न हुआ तोकिसानो का मार्गदर्शन करने की अपनी स्वतंत्रता को मैं हाथ से जाने न दूँगा।

सर एडवर्ड गेट ने इस शर्तो को उचित मानकर इन्हे मंजूर किया। स्व. सर फ्रेंक स्लाई समिति के अध्यक्ष नियुक्त किये गये थे। जाँचसमिति ने किसानो की सारी शिकायतो को सही ठहराया और निलहे गोरो ने उनसे जोरकम अनुचित रीति से वसूल की थी, उसका कुछ अंश लौटाने और 'तीन कठिया' केकानून को रद्द करने की सिफारीश की।

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