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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी की आत्मकथा ....
खेड़ा की जनता नेदेख लिया है कि जब उसमें सत्य के लिए दुःख सहने की शक्ति होती है, तब वास्तविक सत्ता राजसत्ता नहीं, बल्कि लोकसत्ता होती है, और फलतः जनता जिसशासन को शाप देती है, उसके प्रति उसकी कटुता कम हुई है और जिस हुकूमत ने सविनय कानून-भंग को सहन कर लिया वह लोकमत की पूरी उपेक्षा करनेवाली नहींहो सकती, इसका उसे विश्वास हो गया है। अतएव मैं यह मानता हूँ कि चम्पारन और खेड़ा में मैंने जो काम किया है, वह इस लडाई में मेरी सेवा है। यदि आपमुझे इस प्रकार का अपना काम बन्द कर देने को कहेंगे तो मैं यह मानूँगा कि आपने मुझे मेरी साँस बन्द करने के लिए कहा है। यदि आत्मबल को अर्थातप्रेमबल को शस्त्र-बल के बदले लोकप्रिय बनाने मैं सफल हो जाऊँ, तो मैं मानता हूँ कि हिन्दुस्तान सारे संसार की टेढी नजर का भी सामना कर सकता है।अतएव हर बार मैं दुःख सहन करने की इस सनातन नीति को अपने जीवन में बुन लेने के लिए अपनी आत्मा को कसता रहूँगा और इस नीति को स्वीकार करने के लिएदूसरो को निमंत्रण देता रहूँगा, और यदि मैं किसी अन्य कार्य में योग देताहूँ तो उसका हेतु भी केवल इसी नीति की अद्वितीय उत्तमता सिद्ध करना है।
'अन्त में मैं आपसे बिनती करता हूँ कि आप मुसलमानी राज्यो के बारे में स्पष्टआश्वासन देने के लिए ब्रिटिश मंत्री-मंडल को लिखिये। आप जानते है कि इसकेबारे में हरएक मुसलमान को चिन्ता बनी रहती है। स्वयं हिन्दू होने के कारणउनकी भावना के प्रति मैं उपेक्षा का भाव नहीं रख सकता। उनका दुःख हमारी ही दुःख है। इन मुसलमानी राज्यो के अधिकारो की रक्षा में उनके धर्मस्थानो केबारे में उनकी भावना का आदर करने में और हिन्दुस्तान क होमरूल-विषयक माँग को स्वीकार करने में साम्राज्य की सुरक्षा समायी हुई है। चूंकि मैंअग्रेजो से प्रेम करता हूँ, इसलिए मैंने यह पत्र लिखा है और मैं चाहता हूँ कि जो वफादारी एक अंग्रेज में है वही वफादारी हरएक हिन्दुस्तानी मेंजागे।'
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