भाग्य रेखा - रामस्वरूप दुबे Bhagya Rekha - Hindi book by - Ramswaroop Dube
लोगों की राय

नाटक एवं कविताएं >> भाग्य रेखा

भाग्य रेखा

रामस्वरूप दुबे

प्रकाशक : बुक वर्ल्ड प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :16
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6178
आईएसबीएन :00000

Like this Hindi book 3 पाठकों को प्रिय

436 पाठक हैं

बाल साहित्य श्री एवं बाल साहित्य भूषण से विभूषित तथा बाल कविता के लिए विशिष्ट सम्मान से पुरस्कृत कविताएँ .....

Bhagya Rekha -A Hindi Book by Ramswaroop Dube - भाग्य रेखा - रामस्वरूप दुबे

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भाग्य-रेखा


पढ़-लिख कर बाबू बनने का
सपना था सोहन का।
रोज शहर दौड़ा था लेकिन
काम न बनता उसका।।
एक दिवस सोहन बैठा था,
मुख नीचे लटकाये।
सिर के ऊपर हाथ धरा था,
आँसू थे टपकाये।।
उसकी यह हालत देखी तो
पिता बहुत चकराये।
बेटे को दुख हुआ सोचकर
मन ही मन घबराये।।
रहे देखते कुछ क्षण उसको,
फिर धीरे से बोले-
‘‘बेबस-से कब से बैठे हो,
अधर न अब तक खोले’’।।
‘‘मेरी तो किस्मत खोटी है-’’
सोहन लगा सुबकने।
और नयन से उसके फिर से
आँसू लगे टपकने।।
भटक रहा हूँ जगह-जगह पर,
काम न कोई मिलता।
पहिले ही यदि जाना होता,
कभी न लिखता-पढ़ता।।
आज सबेरे ही था मैंने
अपना हाथ दिखाया,
जिसे देखकर ज्योतिषी ने
मुझको यह बतलाया-
‘‘रेखाएँ हैं साफ बतातीं,
किस्मत तेरी खोटी।
कितना भी दौड़े-धूपे तू,
मिले न तुझको रोटी।।’’
‘‘नहीं-नहीं यह बात नहीं है’’-
कहा पिता ने उससे-
‘‘किस्मत की कुंजी उपाय है,
काम बनेगा जिससे।
रेखाएँ बदला करती हैं,
केवल अपने श्रम से।
काम बिगड़ जाते हैं सब ही,
केवल अपने भ्रम से।।
किस्मत को खोटेपन का भ्रम
मन से दूर भगाओ।
निर्धन ही धनवान बने हैं,
सोच-समझ मुस्काओ।।

प्रथम पृष्ठ

विनामूल्य पूर्वावलोकन

Prev
Next
Prev
Next

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book