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जब आये पहिए

अनूप राय

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :14
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6208
आईएसबीएन :81-237-4754-3

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अनूप राय द्वारा प्रस्तुत कहानी जब आये पहिए...

Jab Aaye Pahiye -A Hindi Book by Anoop Ray

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जब आये पहिए

‘‘हे ईश्वर ! ढोने को इतना भारी सामान! क्या काम है!’’ चीटियां अपने सामान को ढोकर ले जाते हुए आपस में बातें कर रही थीं।
‘‘क्या इसका कभी अंत भी होगा !’’ एक थकी हुई चींटी ने शिकायत की।
‘‘क्यों नहीं ? हम अपने बोझ को ढोने के लिए छड़ियों को काम में ला सकती हैं,’’ एक समझदार चींटी ने कहा।
‘‘यह भी थकाने वाला है ! बल्कि यह तो भार को और भी बढ़ाने वाला है। इसे खींचने के लिए ताकत लगानी पड़ती है,’’ दूसरी चींटी ने विरोध जताया।
एक और विचार आया। ‘‘हम सब एक साथ मिलकर वजन को ढोएं,’’ मुखियां चींटी ने कहा। लेकिन वजन की समस्या अब भी बनी हुई थी।
तब उन्होंने एक जोड़ा गोल लट्ठों को एक और जोड़े के साथ मिलाने का निर्णय लिया।
इससे कुछ राहत मिली। अब वे वजन को ढो नहीं रही थीं, बल्कि उसे ठेलने में ताकत लगा रही थीं।
कुछ समय बाद ठेलना भी थकाने वाला लगने लगा।
‘‘लकड़ी के तख्तों को गोल लट्ठों पर रखना कैसा रहेगा!’’ एक चींटी ने सुझाव दिया।

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