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विभिन्न रामायण एवं गीता >> भगवती गीता

भगवती गीता

कृष्ण अवतार वाजपेयी

प्रकाशक : भगवती पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :125
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6276
आईएसबीएन :81-7775-072-0

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गीता का अर्थ है अध्यात्म का ज्ञान ईश्वर। ईश्वर शक्ति द्वारा भक्त को कल्याण हेतु सुनाया जाय। श्रीकृष्ण ने गीता युद्ध भूमि में अर्जुन को सुनाई थी। भगवती गीता को स्वयं पार्वती ने प्रसूत गृह में सद्य: जन्मना होकर पिता हिमालय को सुनाई है।

संक्षेप में पूजन विधि

 

साधक को प्रतिपदा की पूर्व संध्या को भगवती के दर्शन कर उनको प्रातः आकर पूजन स्वीकार करने का निमन्त्रण देकर ध्यान करता हुआ शयन करना चाहिए। प्रातः उन्हीं का ध्यान कर शैया त्याग करे। नित्य नैमित्तक कार्य सम्पादन करके स्नान किया जाय, धुले हुए वस्त्र धारण करें, अच्छा हो अधोवस्त्र लाल रंग का रेशमी वस्त्र रहे। पूजा स्थल पर पहुँच, स्थल को शुद्ध करे, ऊन या कुश का आसन बिछाकर बैठे। भगवती के लिये एक चौकी, रक्त वस्त्र बिछाने के लिये हो। प्रतिमा को चौकी पर रखे ईशान कोण में कलश की स्थापना की जाय। यदि सम्भव हो तो कलश के नीचे यव (जौ) मिट्टी में बो देना चाहिए। धूप जला दें। जल पात्र हो जिसमें शुद्ध जल तथा गंगाजल हो। ईशान कोण में ही नवग्रह को रखे, ईशान कोण में यव बोकर कलश रखे, उसका पूजन करे। वहीं एक लकड़ी के पाटा पर नवग्रह बनाकर उसका पूजन करें। सर्वप्रथम गणपति का पूजन किया जाय तदनन्तर पहले स्वयं आचमन करे तथा श्रीसूक्त से अपने शरीर में अंग न्यास करना चाहिए। चौकी पर स्थापित दुर्गा मूर्ति या चित्र के सम्मुख हाथ जोड़कर पुष्प लेकर प्रार्थना करे। पुष्प लाल हों-

एहि दुर्गे मह्यभागे। रक्षाधं मम सर्वदा।
आवाहयाम्यहं देवि। सर्व कामार्थ सिद्धये।।

चित्र पर पुष्प छोड़ देना चाहिए।

आवाहन करें-
ध्यायामि मनसा दुर्गा नाभि मध्ये व्यवस्थिताम्।
आगच्छ वर दे! देवि। दैत्य दर्प निपातिनि।।
पूजां गृहाण सुमुखि! नमस्ते शंकरप्रिये।
सर्वतीर्थमय वारि सर्व देव समन्यितम्।।
ॐआगच्छेह महादेवि! सर्वसम्पदप्रादायिनि।
यावत्तद व्रतं समाप्येत तावत्त्वं सन्निधा भव।।

आसन-हाथ में रक्त पुष्प लेकर-

अनेक रत्नसंयुक्तं नानामणि गणान्यितम्।
कार्तस्यरमयं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम्।।

पाद्य-भगवती के पैर धुलाने हेतु जल में श्यामक, विष्णुकान्ता, कमल पुष्प तथा दूर्बा मिला दें। एक पात्र में जल गिराते चलें-

गंगादि सर्व तीर्थेभ्यो मया प्रार्थनयाहतम्।
तोयमेतत्सुखः स्पर्श पाद्यार्थ प्रतिगृह्यताम्।।

अर्ध्य-दूर्बा, तिल, दर्भाग्र, सर्षप, यव, पुष्प, अक्षत तथा चन्दन जल में मिलाकर अपर्ण करें-

निधीनां सर्वरत्नानां त्यमनर्ध्य गुणाह्यसि।
सिंहोपरिस्थते देवि! गृहाणाघ्र्य नमोस्तुते।।
गन्धपुष्याक्षतैयुक्तं अर्घ्य सम्पादित मया।
गृहाण त्वं महादेवि। प्रसन्ना भव सर्वदा।।

आचमन-शीतल जल, कर्पूर और सुगन्ध मिलाकर-

कर्पूरेण सुगंधेन सुरभिस्यादु शीतलम्।
तोयमाचमनीयार्थ देवि। त्वं प्रति गृह्यताम्।।
आचम्यतां त्वया देवि। भक्तिं मे ह्मचलां कुरु।
ईप्सित मे फलं देहि! परत्र च परां गतिम्।।

स्नान-

मन्दाकिन्याः समानीतैर्हेभांभोरुहवासितैः।
स्नान कुरुष्यदेवेशि। सलिलैश्च सुगन्धिभिः।।

पंचामृत स्नान-

पयो दधि घृतं चैव मुध च शर्करान्धितम्।
पंचामृत मयानीतं स्वानार्थ प्रतिगृह्यताम्।।

शुद्ध जल तथा चन्दन से स्नान-

मलयाचल सभूतं चन्दागरु सम्भवम्।
चन्दनं देवि! देवेशि! स्वानार्थ प्रतिगृह्यताम्।।

शुद्धोदक स्नान-

परमानन्द बोधाब्बि निमग्न निजमूर्त्तये।
सांगोपाग इदं स्नानं कल्पयाम्यहं ईशि ते।।

वस्त्र दो-

पट्टकूल युगं देवि! कञ्चुकेन समन्यितम्।
परिधोहि कृपां कृत्त्वा हो! दुर्गतिनाशिनि।।

उपबीतम्

स्वर्णसूत्र मयं दिव्यं ब्रह्मणा निर्मित पुरा।
उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वरि।।

चन्दन (गन्ध) चढ़ाना-

गन्धद्वारां दुराधर्षा नित्य पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरी सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
श्री खण्डं चन्दन दिव्यं गन्धाद्यं सुमनोहरम्।
विलेपन च देवेशि! चन्दन प्रति गुह्यताम्।।

सौभाग्य सूत्र-

ॐ सौभाग्य सूत्रं वरदे! सुवर्ण मणि संयुते।
कण्ठे वध्नामि देवेशि! सौभाग्यं देहिमे सदा।।

अक्षत चढ़ाना-

अक्षतान्निर्मलां शुद्धा मुक्तमणि समन्त्रितान्।
गृहाणेमान्महादेवि! देहि मे निर्मला धियमू।।

हरिद्र चूर्ण-

हरिद्रा रञ्चिते देवि। सुख सौभाग्य दायिनि।
तस्मात्त्वां पूजयाम्यत्र दुःख शान्ति प्रयच्छ मे।।

गुलाल, सिंदुर तथा काजल चढ़ाना-

कुकुम कान्तिदं दिव्यं कामिनी काम सम्भवम्।
अमेनार्चिते देवि। प्रसीद परमेश्वरि।।
सिंदूरमरुणाभासं जपाकुसुम सन्निभम्।
पूजितासि मया देवि! प्रसीद परमेश्वरि।।
चक्षुर्भ्यां कज्जल रम्यं सुभगे! शान्तिकारके।
कर्पूरज्योतिरुत्पत्र गृह्मण परमेश्वरि।।

पुष्प माला चढ़ाना-

पद्यशंखजपा पुष्यादिशतपत्रैर्विचित्रताम्।
पुष्पमाला प्रयच्छामि गृहाण त्वं सुरेश्वरि।।

पुष्प चढ़ाना-

पुष्पैर्नानाविथैद्रिव्यैः कुमुदैरथ चम्पकैः।।
पूजार्थं नीयते तुभ्यं पुष्पाणि प्रतिगृह्यताम्।।

दूर्वाङ्कर देना-

दूर्वादलेश्यामले त्वं महीरूपे हरि प्रिये।
अतोदूर्वाभिर्भवतीं पूजयामि सदा शिवे।।

बिल्व पत्र चढ़ाना-

अमृतोद्धवः श्रीवृक्षो महादेवि! प्रियः सदा।
विल्वपत्रं प्रयच्छामि पवित्रं ते सुरेश्वरि।।
रत्न माला (अभाव में कलावा सूत्र या अक्षत)-
मुक्ता फल युतां मालांरलवैडूर्य सुप्रभावम्।
माणिक्य स्वर्ण ग्रथितां गृह्यतां वरदे! नमः।।

अलंकार समर्पित करना-

हार कंकण केयूर मेखला कुंडलादिभिः।
रत्नाढ्यं कृण्डलोपेतं भूषणं प्रतिगृह्यताम्।। 

(परिमल द्रव्य) इत्र लगाना-

चन्दनागरु कर्पूर कुंकुंम रोचन तथा।
कस्तुर्यादि सुगन्धांश्च सर्वाङ्गेषु विलेपयेत्।।

अंग पूजन करना-

ॐ दुर्गायै नमः पादौ पूजयामि नमः।
ॐ महाकाल्यै नमः गुक्फौ पूजयामि नमः।
ॐ मंगलायै नमः जानुद्वयं पूजयामि नमः। 
ॐ भद्रकाल्यै नमः कटि पूजयामि नमः।
ॐ कमलवासिन्यै नमः नाभि पूजयामि नमः।
ॐ शिवायै नमः उदर पूजयामि नमः।
ॐ क्षमायै नमः हृदयं पूजयामि नमः। 
ॐ कौमायँ नमः स्तनी पूजयामि नमः।
ॐ उमायै नमः हस्तौ पूजयामि नमः।
ॐ मह्यगौयैं नमः दक्षिण बाहुंपूजयामि नमः।
ॐ वैष्णव्यै नमः वाम बाहुं पूजयामि नमः। 
ॐ रमायै नमः स्कन्धौ पूजयामि नमः।
ॐ स्कन्दमात्रे नमः कण्ठं पूजयामि नमः।
ॐ महिषमद्रिन्यै नमः नेत्रे पूजयामि नमः।
ॐ सिंह वाहिन्यै नमः मुखं पूजयामि नमः।
ॐ महेश्वर्ये नमः शिरः पूजयामि नमः।
ॐ कात्यायिन्यै नमः सर्वाग पूजयामि नमः।
धूपार्पण करना या अक्षत छोड़ना-
दशांगगुग्गुलं धूप चन्दनं अगरु संयुतात्।
समर्पितं मया भक्त्या महादेवि। प्रति ग्रह्यताम्।।
 

दीप प्रज्ज्वलित करना अथवा अक्षत छोड़ना-

घृतवर्ति समायुक्तं महतेजो महोज्वलम्।
दीप दास्यामि देवेशि। सुप्रीता भव सर्वदा।।

नैवेद्य अर्पण-

अन्नं चतुर्विधं स्वादु रसैः षड्भिः समन्यितम्।
नैवैद्य गुह्यता देवि! भक्तिं मे झचलां कुरु।।

हस्त प्रक्षालन हेतु जल-

गंधतोय समानीतं सुवर्ण कलशे स्थितम्।
हस्त प्रक्षालनार्थाय पानीयं ते निवेदये।।

ऋतुफल अर्पण करना-

द्राक्षा खर्जूर कदली पनस्त्राम कपित्थकम्।
नारिकेलेक्षु जस्बादि फलानि प्रतिगृह्यताम्।।
इदं फलं मया देवि। स्थापितं पुरतस्तव।
तेन मे सफलावाप्तिः भवेज्जन्मनि जमनि।।

ताम्बूल पुंगीफलादि-

एला लवंग कस्तूरी कर्पूर्रः पुष्प वासितां।
बीटिका मुख वासार्थमर्पयामि सुरेश्वरि।।

दक्षिणार्पण करना-

पूजा फल समृध्यर्थ तवाग्रे स्वर्णमीश्वरि।
स्थापितं सेन मे प्रीता पूर्णान्कुरु मनोरथान्।।

कर्पूर नीराजन्-

नीराजन सुमांगल्यं कर्पूरेण समन्यितम्।
चन्द्रार्कवहिन सदृशं दुर्गे देवि! नमोऽस्तुते।।

ध्यान एवं पुध्याञ्जलि अर्पण-

दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्य दुखभयहारिणि का त्वदन्या,
सर्वोपकार करणाय सदाऽऽर्द्र चित्ता।।
प्रदक्षिणा करें (स्थान पर ही घूमकर)-
नमस्ते देवि। देवेशि नमस्ते ईप्सित प्रदे।
नमस्ते जगता धात्रि। नमस्ते भक्त वत्सले।
यानि कानि च पापानि ज्ञाताज्ञात कृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे।।

साष्टांग प्रणाम करें-

नमः सर्व हितार्थाय जगदाथार हेतवे।
साष्टांगोऽयं प्रमाणस्तु प्रयत्नेन मया कृतः।।

क्षमा-याचना करें-

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजाभागं न जानामि त्वं गतिः परमेश्वरि।।
मंत्रहीनं क्रियाहीन भक्तिहीन सुरेश्वरि।
यभूजितं मया देवि। परिपूर्ण तदस्तु मे।।
यदक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं च यदभवेत्।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि। प्रसीद परमेश्वरि।।
गतं पापं गतं दुःखं मतं दारिद्रय्मेव च।
आगता सुख सम्पत्तिः पुण्या च तव दर्शानात्।।

विसर्जन-

ॐ गच्छ गच्छ परस्थाने स्वस्थाने परमेश्वरी।
पूजाराधन काले च पुनरागमनाय च।।
(विसर्जन पाठान्तर होना चाहिए।)

दैनिक पूजन में जल, रक्त चन्दन या सिन्दूर, अक्षत, धूप, दीपक तथा किसमिस का नैवेद्य पर्याप्त है। भगवती स्तोत्र से प्रार्थना करें।


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    अनुक्रम

  1. अपनी बात
  2. कामना
  3. गीता साहित्य
  4. भगवती चरित्र कथा
  5. शिवजी द्वारा काली के सहस्रनाम
  6. शिव-पार्वती विवाह
  7. राम की सहायता कर दुष्टों की संहारिका
  8. देवी की सर्वव्यापकता, देवी लोक और स्वरूप
  9. शारदीय पूजाविधान, माहात्म्य तथा फल
  10. भगवती का भूभार हरण हेतु कृष्णावतार
  11. कालीदर्शन से इन्द्र का ब्रह्महत्या से छूटना-
  12. माहात्म्य देवी पुराण
  13. कामाख्या कवच का माहात्म्य
  14. कामाख्या कवच
  15. प्रथमोऽध्यायः : भगवती गीता
  16. द्वितीयोऽध्याय : शरीर की नश्वरता एवं अनासक्तयोग का वर्णन
  17. तृतीयोऽध्यायः - देवी भक्ति की महिमा
  18. चतुर्थोऽध्यायः - अनन्य शरणागति की महिमा
  19. पञ्चमोऽध्यायः - श्री भगवती गीता (पार्वती गीता) माहात्म्य
  20. श्री भगवती स्तोत्रम्
  21. लघु दुर्गा सप्तशती
  22. रुद्रचण्डी
  23. देवी-पुष्पाञ्जलि-स्तोत्रम्
  24. संक्षेप में पूजन विधि

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