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विभिन्न रामायण एवं गीता >> भगवती गीता

भगवती गीता

कृष्ण अवतार वाजपेयी

प्रकाशक : भगवती पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :125
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6276
आईएसबीएन :81-7775-072-0

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गीता का अर्थ है अध्यात्म का ज्ञान ईश्वर। ईश्वर शक्ति द्वारा भक्त को कल्याण हेतु सुनाया जाय। श्रीकृष्ण ने गीता युद्ध भूमि में अर्जुन को सुनाई थी। भगवती गीता को स्वयं पार्वती ने प्रसूत गृह में सद्य: जन्मना होकर पिता हिमालय को सुनाई है।

भगवती चरित्र कथा

 

आपने अभी पढ़ा कि सभी गीताओ में दार्शनिक आध्यात्मिक विचार भरे पड़े हैं। जब तक आध्यात्मिक जल से भौतिक भाव-भावना प्रक्षालित नहीं होगी तब तक भक्ति और ज्ञान का प्रकाश उदित नहीं होता है। भगवती गीता के पूर्वापर भगवती कथा विद्यमान है जो त्रिदेव (ब्रह्म, विष्णु और शिव) वन्दित है। भगवती में श्रद्धा और भक्ति जागति करती है। भगवती के अनेक नाम रूप हैं। यही दुर्गा, काली, लक्ष्मी और सरस्वती हैं। यह त्रिगुणात्मक, निर्गुण और सगुण भी हैं। यह अचिन्य ऐश्वर्य वाली और आद्याशक्ति हैं। परात्पर प्रकृति हैं। यह नित्य, स्वमाया से तिरोहित भूता हैं। भगवती का अर्थ है-

यथा नित्योहि भगवान् नित्याभगवती तथा। आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं सर्व मिथ्यैवकृत्रिमम्। दुर्गासत्यस्वरूपा सा प्रकृतिर्भगवान् यथा सिद्ध्वैश्वर्यादिकं सर्वं यस्यामस्तियुगेयुगे। सिदध्यादिके भगोज्ञेयस्तेन भगवती स्मृता।

जैसे भगवान नित्य ऐश्वर्यवान है वैसे ही भगवती नित्यस्वरूपा, पराप्रकृति, ऐश्वर्यादि से पूर्ण है। यही अपने अंश से लक्ष्मी-सरस्वती आदि हैं। यह सृष्टिकर्त्ता भी हैं। यह सत्त्व की अंश से जगत का पालन करने वाली, तमो रूप में संहार करने वाली हैं, निर्गुणा, परमाशक्ति तथा सर्वकाम फलप्रदा हैं। यह निर्गुणा योगियों द्वारा भी सर्वथा जानने में असमर्थ हैं। इनकी कथा को तीन भागों में विभक्त कर समझिये-

1. शिव के साथ भवानी को सदा देखें (शिवप्रिया)
2. राम की सहायता कर दुष्टों की संहारिका
3. श्री कृष्णस्वरूपा अवतरित। 

1. शिवप्रिया

भगवती की इस पावन कथा को मुनिश्रेष्ठ नारद ने भक्ति और श्रद्धा से एक बार देवाधिदेव महादेव से पूछा था कि प्रभु आप भगवती की कथा बताइये। महादेव जी कहते गये और नारद जिज्ञासावश अनेक प्रश्न करते गये।

यह प्रसंग दो जन्मों का व दो रूपों का है। भगवती ने स्वेच्छ से स्वमाया से त्रिदेवों की एक बार सृष्टि की। निर्गुण पराप्रकृति ने उन पुरुषों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश नाम दिया। उस समय भगवती ने स्वयं को जीवात्मा और परमात्मा दो रूपों में विभक्त कर दिया। स्वयं अपने को माया, विद्या और परमा तीन रूपों में बांट दिया। प्राणियों को विमोहित करने वाली शक्ति माया, जगत् संचालित करने वाली शक्ति परमा है। तीसरी शक्ति विद्या-गंगा, दुर्गा, सावित्री, लक्ष्मी और सरस्वती पाँच भागों में विभक्त हुई। सृष्टि कार्य में ब्रह्मा को, विष्णु को पालन में तथा तमोगुण से विनाश हेतु शिव को नियुक्त कर दिया। पाँच देवियों को उनकी अलग-अलग पत्नियाँ बनाकर स्वयं प्रकृति स्वरूपणी परात्पर महाविद्या अन्तर्धान हो गयीं। शिव समाधि लीन हो गये। भीषण रूप वाली प्रकृति देवी पूर्णा शिव को प्राप्त हुई। पूर्णा प्रकृति प्रजापति दक्ष के घर में सुन्दर कन्या रूप में उत्पन्न हुई हैं वहाँ उनका नाम सती रखा गया। जब वह विवाह योग्य हुईं तब उन के विवाह हेतु दक्ष ने स्वयंवर रचा, किन्तु शिव को उस में निमंत्रण नहीं दिया। शिव रहित उस स्वयंवर में सभी देव, असुर, ऋषि, मुनि पधारे। सती ने सभा स्थल पर पहुँचकर ''शिवाय नमः'' कहकर स्वयं वरमाला भूमि को समर्पित कर दी, उसी क्षण शिव वहाँ प्रकट हुए, वरमाला को स्वीकार किया। शिव का उस समय मनोहर रूप था। दिव्य गन्ध से युक्त, कमल सदृश सुन्दर नेत्र थे। वह सती को साथ लेकर अन्तर्धन हो गये। दक्ष सती को मन ही मन कोसते रहे। उनका दिव्य ज्ञान भी विलुप्त हो गया। दक्ष को दधीचि ने बहुत समझाया कि शिव विरोध, ईर्ष्या त्याग दें किन्तु दक्ष नहीं माने। जब सती सहित शिव हिमालय पर रहे थे तभी दक्ष के नगर को त्यागकर नन्दी शिव के समीप गये। शिव की स्तुति कर उनका कृपा प्राप्त कर, प्रिय बने तथा समीप ही रहने लगे और गणों के अधिपति हो गये।

नन्दी द्वारा की गई शिव स्तुति-
त्वमादिलर्कोनां परपुरुषः सर्वजगतां
विद्याता सम्पाता शिव प्रलयकर्ता त्वमपि च।
त्वमैश्वर्योपेतस्लमपि युवको वृद्ध इति च
त्वमेकं ब्रह्म त्वं कवर भवानीश वरद।
अचिन्त्य ते रूपं जितशशिसभूहं हिमरुचिं
शशाङ्कार्धभ्राजद्विमलमुखपब्जेडरुचिरम्।
स्फुरन्मौलौ सर्पामलमणिभूजङ्गाभरणकं
नमामि ब्रह्माद्यैर्नमितपदण्ङ्कोठुहयुगम्।।
त्वां नित्यं परिपूजयन्ति भुवि ये गायन्ति नामानि ते
मंत्र सम्पति सज्जपन्ति सततं भक्काष्यभक्लाथ वा।
तेऽपि त्वत्यदवीमुपेत्य सततं स्वर्गे रमन्ते प्रभो
को दीनेधु दयापरः पशुपते त्वां देवदेव विना।।

शिव जी ने नन्दी को वर दिया कि इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक पृथ्वी पर जो मेरी स्तुति करेगा उसका तीनों लोकों में कभी अमंगल या अशुभ नर्ही होगा।

शिव जी सती के साथ आनन्द पूर्व कैलाश पर्वत पर विहार करते हुए रहने लगे। दक्ष मूर्खतावश अज्ञानवश शिवनिन्दा करते रहते थे। मेनका हिमालयराज पत्नी नित्य सती के समीप जाकर भक्तिपूर्वक उन्हें पुत्री रूप में पाने हेतु प्रार्थना करती थी। एक बार सती ने प्रसन्न होकर उनकी प्रार्थना स्वीकार करे कहा कि 'मैं आपके घर पुत्री रूप में अवतरित होऊँगी।' यह सुनकर मेनका प्रसन्नचित्त हो गई तथा सदा सती का ध्यान करती रहीं। दक्ष ने मंत्रियों से परामर्श करके शिव रहित एक विशाल यज्ञ का एक वार आयोजन किया जिस में भगवान विष्णु यज्ञ की रक्षा करने हेतु दक्ष के पुर में पहुँच गये। सभी ऋषि आदि भी पधारे। दक्ष की अन्य पुत्रियाँ भी पहुँचीं। सब का स्वागत किया गया, पुष्कल वस्त्र तथा आभूषण देकर सबको सन्तुष्ट किया गया। अन्न इतना एकत्र किया गया कि पर्वत खड़े गये, रस सामग्रियों के सागर इकट्ठे हो गये। यज्ञ वेदी बर्नी, वेदपाठी नियुक्त हो गये। यज्ञ कुण्ड में ऊर्ध्व तथा निर्मल शिखावाले धूम रहित अग्नि देव स्वयं प्रञ्वलित हो गये। यज्ञ स्वरूप स्वयं नारायण यज्ञवेदी पर प्रतिष्ठित हो गये। वहाँ एकमात्र शिव को न देख दधीचि ने दक्ष को बहुत समझाया किन्तु दक्ष न माने। दधीचि ने कहा कि शिवविहीन यज्ञ निष्फल होता है-

यथाकाङ्क्षा निर्धनाना तथा यज्ञः शिव विना।
दर्भहीना यथा संध्या तिलहीनं च तर्पणम्।।

दक्ष शिवजी को भला-बुरा कहते रहे, दधीचि उनको ऐसा करने से रोकते रहे। इस पर क्रोधित दक्ष ने उनको अपमानित करके यज्ञ स्थल से हटा दिया, तत्पश्चात् शिव तत्त्व को जानने वाले दुर्वासा, वामदेव, व्यवन, गौतम आदि ऋषिगण भी चले गये। शेष ब्राह्मणो को दूनी दक्षिणा देकर यज्ञ आरम्भ किया गया।

महामाया स्वरूपिणी जगदम्बा ने दक्ष को ठग लिया। वह जान गई। उन्होंने सोचा-मैंने पहले ही कह दिया था कि जब मेरा अपमान होगा तब तुम्हारा पुण्य क्षीण हो जायगा, उस समय अपनी माया से आप को मोहित कर मैं निश्चित आपका त्याग कर दूँगी, अतः समय आ गया है, दक्ष का पुण्य नष्ट हो गया है। अपनी लीला से उनका परित्याग कर मैं अपने स्थान को चली जाऊँगी। पुनः हिमालय के घर जन्म लेकर एकमात्र प्राणवल्लभ देवेश महेश्वर शिव को पतिरूप में पुनः प्राप्त करूँगी।

शिवप्रिया सती ने यज्ञ में जाने का निश्चय कर लिया। सती ने महेश्वर से दक्ष के यज्ञ में साथ चलने का बहुत आग्रह किया किन्तु शिव ने यह कह कर मना कर दिया कि बुलाये बिना जाना और मरना बराबर है। वहाँ जाने पर तुम्हारे पिता हम दोनों का तिरस्कार करेंगे। श्वसुर के घर यदि प्रतिष्ठ हो तभी जाना चाहिए। यदि वहाँ अपमान होता हो तब वहाँ जाना मरने से भी बढ़कर है। शिव जी ने कहा कि श्वसुर को भी चाहिए वह उस दामाद को आदर से भवन में ले जाय। दामाद के प्रति अनादर का भाव नर्ही रखना चाहिए अन्यथा धर्म की हानि होती है, द्वेष भावना से घोर पाप उत्पन्न होता है। दामाद को भी अपने श्वसुर का किसी प्रकार का अप्रिय नहीं करना चाहिए। ऐसा करने वाला नरक में जाता है। सती ने पुनः प्रयास किया कि किसी प्रकार महेश्वर मान जाय शिव ने सती को भी जाने से रोका तथा कुछ रूखा कह दिया कि मेरी निन्दा सुनने में यदि तुम्हें सुख न मिलता तो मेरे निन्दक के घर जाने की इच्छ तुम क्यी कर रही हो। जब सती ने जाने का निर्णय कर ही लिया तब शिव ने कहा कि मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा क्यों कर रही हो।

महेश्वर का ऐसा उत्तर सुनकर क्रोधवश लाल नेत्रों वाली सती ने विचार किया कि 'इन शिव ने पहले तो मुझे पत्नी रूप में प्राप्त करने हेतु प्रार्थना की थी, मुझे पा लेने के बाद अब मेरा अपमान कर रहे है। इनको अब मैं अपना प्रभाव दिखाती हूँ'। शिव ने क्रोधित, ओठ फड़काने वाली काल सदृशा भगवती सती को देखकर आँखें बन्द कर लीं। भगवती ने अचानक अट्टहास किया जिसे सुन शंकर भयभीत हो गये। किसी तरह औंखें खोलकर भगवती का भयानक रूप देखा। भगवती ने स्वर्णिम वस्त्रों को त्याग दिया, वृद्धावस्था जैसी कान्ति हो गई, दिगम्बरा थीं, चार भुजाएँ, केशपाश से सुशोभित, पसीने से लथपथ, भयानक रूपवाली, भयंकर शब्द करने वाली मुण्डमाला धारण किये थीं, सूर्य के समान तेजोमयी, मस्तक पर चन्द्ररेखा धारण किये, मुकुट धारण किये थीं, वह देवी शम्भू के समक्ष अट्टहास करती खड़ी हों गई। इस रूप को देखकर शिव धैर्य त्यागकर भय के मारे विमूढ़ हो सभी दिशाओं में भागने लगे। सती ने पहले रोका। जब वह नहीं रुके तब दयालु भगवती सती अपने दस श्रेष्ठ विग्रह धारण करके दसों दिशाओं में उनके सामने खड़ी हो गई। शिव को चारों ओर भयानक भगवती ही दिखती थीं। किसी भी दिशा को भयमुक्त न पाकर शिव आँखें बन्द कर खड़े हो गये, क्षणभर बाद आँखें खोलीं तब देखा सामने श्यामा भगवती काली खड़ी है। शिव ने उनसे परिचय पूछा। तब सती ने कहा कि आप सती को नहीं देख रहे हैं। काली, तारा, लोकेशी, कमला, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, षोडशी, त्रिपुरसुन्दरी, बगलामुखी, धूमावती और मातङ्गी नाम की ये दस देवियाँ हैं। भगवती के रूप अन्य सब रूपों से श्रेष्ठ हैं। आप डरें नहीं। ये सभी अपने भक्तों को वाञ्चित फल प्रदान करती हैं। इन देवियों के मंत्र-यंत्र-पूजन-हवन विधि स्तोत्र, कवच, आचार, नियम आदि का वर्णन आप ही करेंगे। आपसे श्रेष्ठ वक्ता कोई दूसरा नहीं है। आगम और वेद मेरी दो भुजाएँ हैं। महाविधाओं के साधक वैष्णव हैं। मुझ में समर्पित अन्तःकरण वाले प्रशान्तात्मा हो जाते हैं। मैं आपकी प्रियतमा हूँ और आप मेरे अत्यन्त प्रिय पति हैं। अब मैं दक्ष के यज्ञ विध्वंस को जाऊँगी। शिव जी ने कहा-मैं आपको पूर्णा, परमेशानी, पराप्रकृति रूप में जान गया हूं। अज्ञानवश जो कुछ कहा है उसे क्षमा करें। आपको कौन-सी शक्ति रोक सकती है। पतिरूप में जो अप्रिय वचन कहा है उसे क्षमा करें। शिवजी ने प्रमथगणों को दस हजार सिंहों से युक्त रत्न जालों से मण्डित रथ लाने का आदेश दिया। नन्दी सुन्दर पताकाओं से शोभित रथ ले आये जिसमें भीम रूपिणी काली आरूढ़ होकर वायुवेग से चल पड़ी। आधे क्षण में सती दक्ष के यहां पहुँच गयी।

प्रसूती जो सती की मां थीं, माँ ने बेटी को देखकर प्रसन्नता प्रकट की। बताया कि मैं जानती हूँ कि आप साक्षात् भगवती हैं। दुर्बुद्धि पिता ने शिव को नहीं बुलाया और न तुमको। रात में देखा स्वप्न सुनाया कि कोई महेश्वरी आई है। उनका वर्ण श्याम था। खुले केश, दिगम्बरा, चार भुजाएँ, अट्टहास करती तथा जलते हुए नेत्र थे। उन्होंने यज्ञकुण्ड में प्रवेश कर दिया, यज्ञ विध्वंस हो गया, दक्ष मारे गये हैं। ब्रह्मा ने शिव जी को बुलाया और दक्ष को जीवित कर दिया। माँ से सम्मान पाकर सती यज्ञ स्थल पर गयी। वहाँ पिता से विवाद हुआ और अपनी छाया सती बना दी। उसे आदेश दिया कि पिता से शिव के प्रति अपमान जनक शब्द सुनकर यज्ञ की अग्नि में प्रवेश कर जाना, जिसे सुनकर शिव आकर विष्णु को पराजित कर यज्ञ नष्ट कर देंगे। दक्ष मारे जायेंगे। वैसा ही हुआ। शिव जी को ब्रह्मा ने आहूत किया। उन्होंने आकर दक्ष को पुनर्जीवित किया। बकरे का सिर जोड़ दिया और यज्ञ पूर्ण किया।

सती के वियोग से दुखी शिव सामान्य मनुष्यों की भाति रुदन करने लगे। उस समय ब्रह्मा विष्णु ने समझाया कि आप अज्ञानी की भाति मोहग्रस्त हो क्यों रो रहे हैं? वे देवी जगदम्बा तो सनातन पूर्ण ब्रह्मस्वरूपा हैं, जिनकी कृपा से आप मृत्युज्जय है। उनकी मृत्यु तो वास्तविक नहीं है केवल प्रममात्र है। आप शोक का त्याग कर दें, क्योंकि अग्नि में तो सती की छाया ने प्रवेश किया है। ब्रह्मा-विष्णु और शिव तीनों निश्चय करके साक्षात् ब्रह्मस्वरूपिणी महादेवी का स्तुति करने लगे।

आप नित्या, परमा विद्या, संसार में चैतन्यरूप से व्याप्त और पूर्णा ब्रह्मरूपा देवी हैं। आप सभी देवताओं में प्रधान हैं। शिवे! आप स्वयं स्वेच्छ से हमारी सृष्टि और संहार करती हैं। आप हमारी चेतना, बुद्धि और शक्ति हैं। आपके बिना हम सब शव की भांति है। जगत को धारण करने वाली आप महेश्वरी को न देखकर हम कान्तिहीन हो गये हैं।

स्तुति से प्रसन्न हो शिव की विकलता देखकर गगनमण्डल में स्थित हो भगवती ने दर्शन दिया। उस मूल प्रकृति को उन्होंने अपलक दृष्टि से देखा। महादेवी ने शिवजी से कहा कि आप स्थिरचित्त हों। मैं हिमालय पुत्री बनकर आपको पुनः प्राप्त करूँगी। मैंने आपका परित्याग कभी नहीं किया, आप ही मुझ महाकाली के हृदयस्थान और परम आश्रय हैं। इसीलिये आप जगत्संहारक महाकाल कहे जाते हैं। शिव आप शान्तचित्त हो जायँ। मैं एक उपाय बताती हूँ उसे करें, तब निश्चय ही आप मुझे पहले से भी अधिक सुन्दर स्वरूप में पुन : मुझे प्राप्त करेंगे। मेरे कया शरीर को सिर पूर लेकर मेरी प्रार्थना करें तथा पृथ्वी पर भ्रमण करें, उस छाया शरीर के अनेक खण्ड होकर पृथ्वी पर जहाँ गिरेंगे वहाँ वहाँ पापनाशक शक्तिपीठ होंगे। जहाँ योनि भाग गिरेगा वह सर्वोत्तम शक्तिपीठ होगा। आप वहाँ तप करके पुनः मुझे प्राप्त करेंगे। दक्ष नगर में आकर शिव ने सती का द्यया शरीर सिर पर उठा लिया तथा प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वी पर नाचने लगे। यह देखकर देवगण पुष्पवर्षा करने लगे। शिव के साथ प्रमथगण मुखवाद्य बजाने और नाचने लगे। सती तुम मेरी पत्नी हो इसलिये मैं लोकलाज त्यागकर तुम्हारी छाया को सिर पर लिये हूँ, यह मेरा अहोभाग्य है। इस तरह भाग्य की सराहना करते हुए आनन्द से नाचने लगे। पृथ्वी उनके पदप्रहार से क्षुब्ध होने लगी, सृष्टि पर विपत्ति आ गई। सृष्टि की रक्षा के लिये विष्णु ने छाया शरीर के खण्ड करने का निश्चय कर लिया। देवी ने भी सहमति दे दी।

विष्णु ने सुदर्शन चक्र से छाया शरीर के खण्ड कर दिये। वे जहां गिरे वही तत्क्षण प्राणियों के कल्याण हेतु पाषाण हो गये और वे क्षेत्र मुक्तिक्षेत्र तथा स्थान सिद्धपीठ हो गये। देवगण वहाँ प्रार्थना करने लगे। विष्णु की आज्ञा से नारद शिव को शान्त करने का प्रयत्न करने लगे। शिव जी शान्त तो हुए किन्तु विष्णु को शाप दे दिया। विष्णु को त्रेतायुग में सूर्यवंश में मनुष्य रूप से पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ेगा। वहाँ उनकी प्रिय पत्नी सती के समान अपनी छाया छोड़कर अन्तर्धान हो जायेंगी। मोहित हुए वे आनन्द से दूर चले जायेंगे। राक्षस की भांति विष्णु ने मुझे छाया पत्नी का वियोगी बना दिया है, वैसे ही राक्षसराज विष्णु की छाया पत्नी का हरण करके उन्हें वियोगी बना देगा। तब वे भी मेरे समान शोक से व्याकुल होंगे। सती के छाया शरीर का योनि भाग कामरूप में गिरा वह स्थान पृथ्वी को फोड़ता हुआ पाताल की ओर चल पड़ा। तब शिव ने अपने अंश से पर्वत रूप हगरण करके भाग्य की सराहना करते हुए प्रसन्नता से उसे धारण कर लिया। भगवान शिव पाषाण लिंग रूप हो स्वयं स्थिर हो गये।

ब्रह्मा विष्णु के साथ शिव से मिलने कामरूप गये तो शिव सामान्य जन की भाति जोर-जोर से रोने लगे। ब्रह्मा विष्णु ने उनको समझाया कि यहाँ आप तपस्या करें। यह महापीठ है। परमेश्वरी साक्षात यहाँ विराजमान हैं। साधकों को प्रत्यक्ष फल देती है। आप सर्वज्ञ हैं। शिव जी परमेश्वरी जगदम्बा का ध्यान करके समाहित चित्त से वहाँ कठोर परम तप करने लगे। भगवती प्रसन्न हुईं। शिव को दर्शन देकर कहा-''महेश्वर! मैं हिमालय की पुत्री बनकर स्वयं शीघ्र दो रूप में अवतार लूँगी। आपने सती के शरीर को सिर पर रखकर हर्षपूर्वक नृत्य किया, उनके अंश से मंर जलमयी गंगा रूप में आप को ही पति रूप में प्राप्त कर आपके सिर पर विराजमान रहूँगी, दूसरे रूप में पार्वती होकर आपके घर मैं पत्नीभाव में रहूँगी। यह मेरा पूर्णावतार होगा।'' ब्रह्मा और विष्णु को भी अभिलषित वर प्रदान कर भगवती स्वयं अन्तर्धान हो गई। महादेवी दुर्गा ने मेनका के गर्भ से दो रूपों में में अवतार लिया- 1. ज्येष्ठ रूप में गंगा और 2. कनिष्ठ रूप में पार्वती।

इक्यावन शक्तिपीठ हैं। उनमें कामरूप श्रेष्कम शक्ति पीठ है। ब्रह्मपुत्र नदी भगवान विष्णु का साक्षात् जलरूप है। यहाँ स्नान कर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। सिद्धपीठ में भगवती की आराधना से मनवाञ्चित फल प्राप्त होता है। साधकों को भगवती कामेश्वरी को इस मंत्र से नमस्कार करना चाहिए-

कामेश्वरीं च कामाख्यां कामरूपनिवासिनीम्।
तप्तकाञ्चनसङ्काशां तां नमामि सुरेश्वरीम्।।

मैं कामरूप में निवास करने वाली उन भगवती कामाख्या कामेश्वरी को नमस्कार करता हूँ जिन सुरेश्वरी का स्वरूप तपे हुए स्वर्ण की कान्ति के समान सुशोभित है।

सिद्धपीठ कामाख्या के दर्शन कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है। महापातकों का विनाश करने वाले जगदम्बा के इस चरित्र को जो परम भक्ति से सुनता है, वह शिवत्व को प्राप्त करता है। जन्म-जन्मों के भी पाप नष्ट हो जाते हैं। जगत रोग के लिये देवी का यह चरित्र परम औषधि है।

भगवती के दूसरे जन्म की कथा-सती ने एक अंश से धवलकान्ति रूप में शिव के सिर पर स्थान पाने के लिये जल रूप रखा और दूसरे पूर्णांश से गौरी रूप में वे शङ्कर प्रिया पूर्णावतार लेकर अत्यधिक प्रेम के कारण शिवजी के शरीरार्द्ध स्थित होकर अर्धात्रिनी बनी तथा वाम भाग में स्थित हुईं। गंगा भी शिव जटाओ के वाम भाग से ही जल रूप में पृथ्वी पर प्रवाहित हो रही है। मेनका के गर्भ से वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया (अक्षय तृतीया) को मध्याह्न में गौरवर्णा सुमुखी सर्वांगसुन्दरी कमलवदनी गंगा कन्या रूप में प्रकट हुईं। उनके तीन नेत्र, चार भुजाएँ थीं। कन्या जन्म पर पिता ने दान आदि किया। एक दिन मुनि नारद उन के दर्शन को पधारे, हिमालय ने स्वागत-सम्मान किया। गोद में गंगा को देखकर नारद ने कहा कि आप धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, परम सौभाग्यशाली हैं जो यह देवदुर्लभ कन्या प्राप्त हुई है। कन्या को गोद में लेकर रोमाज्जित होकर नारद ने कहा 'आज मैं धन्य हूँ।' हिमालय के पूछने पर कन्या की भूतकाल की कथा बताकर भविष्य बताया कि इनका गंगा नाम होगा। शिव को पति रूप में पुनः प्राप्त करेंगी। इनका विवाह स्वर्ग में होगा। शिव इनके पति बनेंगे। ब्रह्मा जी इसे आपसे माँग ले जायेंगे। ऐसा हिमालय को बताकर स्वयं ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक कहा-सती ने एक अंश से हिमालय के घर जन्म ले लिया है। अपने पूर्णरूप से भी वे जगदम्बा 'उमा' नाम से वही जन्म लेंगी। ब्रह्मा जी शिव को प्रसन्न करने को व्याकुल हो गये। नारद ने उपाय बताया कि पिताजी धर्मज्ञ, उदार हिमालय से गंगा को माँग लें, स्वर्ग में गंगा को लाकर बड़े उत्सव का आयोजन करके शिव को आग्रहपूर्वक गंगा प्रदान कर दें। छाया सती वैसे भी उनके सिर पर रही। ये जल रूप में उनके सिर पर सुशोभित रहेंगी। शंकर भगवान भी प्रसन्न हो जायेंगे। ब्रह्मा को वह उपाय रुचिकर लगा। ब्रह्मा के आदेश से नारद जी सभी देवों को बुला लाये और सभी देवों के साथ ब्रह्मा जी हिमालय से कन्या माँगने पहुँच गये। इधर एक रात्रि पूर्व ही गंगा ने स्वप्न में सारी बात पिता को बता दी। धवलवर्णा, त्रिनयना मकरवाहना एक देवी ने कहा-''पिताजी मैं आपकी पुत्री एकमात्र आद्या प्रकृति हूँ मैंने दक्ष यज्ञ में शरीर त्याग दिया था जिससे शिव वियोग हो गया। वे मुझे पत्नी रूप में पाने को तप कर रहे हैं। ब्रह्मा जी मुझे लेने आ रहे हैं मैं स्वर्ग चली जाऊँगी। आप मोहग्रस्त न हों।'' दूसरे दिन ब्रह्मा जी आ गये। हिमालय ने प्रसन्न हो उनका स्वागत किया तथा आने का कारण पूछा। ब्रह्मा जी ने कहा-आपके यहाँ सती ने कन्या रूप में जन्म लिया है। उन्होंने भगवान शंकर का वरण किया है। इसके बाद पूर्व जन्म का सारा वृत्तान्त कह सुनाया और कहा कि जगदम्बा अपने पूर्णांश से आपकी दूसरी पुत्री होंगी। उन्हें आप सदाशिव को समर्पित करेंगे। यह कन्या हमको दे दें। गोद में बैठी गंगा ने पुनः स्वर्ग जाने की इच्छा प्रकट की तथा शिव को पतिरूप में प्राप्त करने हेतु ब्रह्मा के पास चली गई।

ब्रह्मा जी गंगा को अपने कमण्डल में लेकर स्वर्ग आ गये। उधर मेना ने आकर पति हिमालय से गंगा के विषय में पूछा कि वह कहाँ है? हिमालय ने अश्रुपूरित नेत्रों से सम्पूर्ण वृत्तान्त कह दिया। मेना ने कुपित होकर पुत्री को शाप दे दिया-''मुझ माता से बिना बात किये तुम स्वर्ग चली गई, इससे तुम्हें जल रूप में पुनः पृथ्वी पर आना होगा"-

मातरं मामसम्भाष्य गता यस्मात्त्रिविष्टपम्।
ततो द्रवमयीं भूत्वा पुनरेहि धरातलम्।।

इधर ब्रह्मा ने नारद को आदरपूर्वक शिवजी को बुलाने हेतु कामरूप महापीठ भेज दिया, जहाँ शिव ध्यानमग्न थे। मन में सती प्रसंग सोचते हुए नारद शिव समीप पहुँचे और कहा ''महादेव! आप मुझ पर प्रसन्न हों, मैं नमस्कार करता हूँ। प्रभो! आपकी प्रिया सती पुनः आपको पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा से जन्म ले चुकी है। उन्हें प्राप्त करने हेतु मेरे साथ आप चलें।'' शिव नारद से समस्त वृत्तान्त सुनकर वहाँ आये जहाँ ब्रह्मा कमण्डल स्थित त्रिलोक पावनी शिवप्रिया की देखभाल कर रहे थे। शिवजी उनको लेकर कैलाश चले आये। कमण्डल वास करने वाली जगदम्बा शिव को प्राप्त कर कालान्तर में जलरूप में अवतीर्ण होकर पृथ्वी पर पधारी। भगवती सती ने दूसरे रूप में पूर्णावतार में पार्वती रूप में जन्म लेकर शिव को पति रूप में प्राप्त किया।

नारद जी के पूछने पर महादेवी जी पूर्णावतार पार्वती की कथा कह रहे हैं कि गिरिराज और मेना ने त्रैलोक्य माँ, सनातनी ब्रह्मरूपा दुर्गा-देवी की उग्र तपस्या करके पुत्री रूप में पाया था। शुभदिन कमलवदनी, सुन्दर प्रभावली जगन्माता ने जन्म लिया। सर्वत्र प्रकाश फैल गया, सुगन्धित वायु चलने लगी। पिता ने समाचार सुनकर ब्राह्मणों को अन्न-वस्त्र, गायें धन दान में दिया तथा पुत्री को देखने गये। पुत्री को देख प्रणाम कर परिचय पूछा। देवी ने कहा, ''मुझे शिव की आश्रिता पराशक्ति जानो, मैं सृष्टि संचालिका, शाश्वत ज्ञान और ऐश्वर्य की मूर्ति हूँ। मैं त्रिदेवों की जननी, सृष्टि, स्थित और विनाश कर्त्ती, मुक्तिदायिनी जगदम्बा हूँ। सबके अन्तःस्थल में रहने वाली, नित्यानन्दमयी ब्रह्मरूपा नित्या महेश्वरी हूँ। तुम भाग्यशाली हो जो तुम्हारे घर जन्म लिया है।''

गिरिराज ने प्रार्थना की-''भगवती अपना दिव्य शिवप्रिया रूप दिखाइए।'' देवी ने पिता को पहले दिव्य चक्षु दिये, तत्पश्चात् अपना अलौकिक रूप दिखाया। ज्योतिर्मय रूप कोटि-कोटि चन्द्रमाओं की प्रभा से युक्त था। मस्तक पर अर्द्ध चन्द्ररेखा, हाथ में त्रिशूल, कालाग्नि के समान भयानक और उग्र रूप था। पाँच मुख, तीन नेत्र, सर्प का यज्ञोपवीत, व्याघ्रचर्म धारण किये सर्पों के आभूषण देख हिमवान चकित हो गये। मेना के कहने पर माहेश्वर रूप हटा दिया। दूसरे रूप में सनातनी विश्वरूपा जगदम्बा की आभा शरत्काल के चन्द्रमा के समान थी। मस्तक पर सुन्दर किरीट, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्य लिये, तीन नेत्र, दिव्य वस्त्र, माला तथा गन्धानुलेप था। योगियों से वन्दनीय थी चरण कमल अति सुन्दर, अपने दिव्य विग्रह से दिशाओं को व्याप्त किये थीं। हिमालय ने प्रणाम करके अन्य रूप देखने की इच्छा प्रकट की। परमेश्वरी! आप जिसकी आश्रय हैं वह अवश्य ही अशोव्य और धन्य है। पार्वती ने पुनः दिव्य रूप धारण किया। नील सरोज सदृश श्यामवर्ण, वनमाला से विभूषित, चारों भुजाओं में शंख, चक्र, गदा एवं पद्य सुशोभित थे। इस रूप को देखकर गिरिराज ने आदिशक्ति जगदम्बा का स्तवन किया। हिमालय द्वारा किया गया स्तोत्र-

मातः सर्वमयि प्रसीद परमे विश्वेशि विश्वाश्रये
त्वं सर्वं नहि किंचिदस्ति भुवने तत्त्वं त्वदन्यच्छिवे।
त्वं विष्णुर्गिरिशस्लमेव नितरां धातासि शक्तिः परा
किं वर्ण्यं चरित त्वचिज्यचरिते ब्रह्माद्यगर्म्य मया।।1।।
त्वं स्वाहाखिलदेवतृप्तिजननी विश्वेशि त्वं वै स्वधा
पितृणामपि तृप्तिकारणमसि त्वं देवदेवात्मिका।
हव्यं कव्यमपि त्वमेव नियमो यज्ञस्तपो दक्षिणा
त्वं स्वर्गादि फलं समस्तफलदे देवेशि तुभ्यं नमः।।2।।
रूपं सूक्ष्मतमं परात्परतरं यद्योगिनो विद्यया
शुद्धं ब्रह्ममय वदन्ति परमं मातः सुदृप्तं तव।
वाचा दुर्विषयं मनोऽतिगमपि त्रैलोक्यबीजं शिवे
भक्लाहं प्रणमामि देवि वरदे विश्वेश्वरि त्राहि माम्।।3।।
उद्यत्सुर्यसहस्रभां मम गृहे जातां स्वयं लीलया
देवीमष्टभुजां विशालनयना बालेडमौलिं शिवाम्।
उद्यत्कोटिशशाङ्ककान्तिनयना बालां त्रिनेत्रां परां
भक्त्या त्वां प्रणमामि विश्वजननीं देवि प्रसीदाम्बिके।।4।।
रूपं ते रजताद्रिकान्तिविमलं नागेन्द्रभूबो-लं
घोरं पज्जमुखाश्जत्रिनयनै भीमै: समुद्धासितम्।
चन्द्रार्धाङ्कितमस्तकं धृतजटाजूटं शरण्ये शिवे
भक्त्याहं प्रणमामि विश्वजननि त्वां त्वं प्रसीदाम्बिके।।5।।
रूपं शारदचन्द्रकोटिसदृशं दिव्याम्बरं शोभनं
दिव्यैराभरणैर्विराजितमलं कान्त्या जगन्मोहनम्।
दिव्यैर्बाहुचतुष्टयैर्युतमहं वन्दे शिवे भक्तितः
पादाब्जं जननि प्रसीद निखिलखलादि देव स्तुते।।6।।
रूप ते नवनीरदद्युतिरुचिफुल्लाब्नेत्रोज्जवलं
कान्त्या विश्वविमोहनं स्मितमुखं रत्नाक्दैर्भूषितम्।
विभ्राजद्वनमालयाविलसितोरस्कं जगत्तारिणि
भक्त्याहं प्रणतोऽस्मि देवि कृपया हों प्रसीदाम्बिके।।7।।
मातः कः परिवर्णितु तव गुण रूपं च विश्वात्मक
शक्तो देवि जगस्वये बहुगुणैर्देवोदुथवा मानुषः।
तत् किं स्वल्पमतिर्द्धवीमि करुणा कृत्या स्यकीयैर्गुणै -
नों मां मोहय मायया परमया विश्वेशि तुभ्यं नमः।।8।।

गिरिराज द्वारा देवी का आभार प्रकट करने के बाद पार्वती पूर्व के समान सुन्दर रूप हो गईं। यह देख मेना ने कहा-'जगदम्बा! मुझे न तो स्तुति आती है, न भक्ति। आप अपने करुणामय स्वभाव से कृपा करती रहें।'' पिता हिमालय ने कहा, ''आप योगियों को भी अगम्य और दुर्लभ हैं, महेश्वरी! मैं आप की शरण हूँ आप काल की भी काल हैं, अतः आपको लोग महाकाली कहते हैं, आप ब्रह्मविद्या की शिक्षा दें जिससे इस संसार से पार हो जाऊँ। पार्वती ने पिता को बताया कि किसी सद्गुरु से मेरा मंत्र लेकर स्थिर चित्त हो, शरीर, मन एवं वाणी से मेरा आश्रय लो, साधक मुझ में चित्त और प्राण लगाकर मेरे नाम का सतत् जप करे, मेरी लीला और गुण कथाओं को सुनता रहे, मुझ से वार्तालाप करने वाला हो तथा सदा सम्बन्ध बनाये रखे। श्रेष्ठ साधक मेरी भक्ति में परायण होकर अपना चित्त मेरे पूजन में रखे। श्रुति-स्मृति प्रतिपादित विधि-विधान से मेरी पूजा अर्चना, यज्ञादि सम्पन्न करे। ज्ञान से मुक्ति, भक्ति से ज्ञान तथा धर्म से भक्ति भाव उदय होता है। यज्ञादि धर्म के रूप हैं। सभी आकारों में एकमात्र मैं स्थित हूँ। स्वर्ग के देवता मुझ सच्चिदानन्द रूपा के अंश से ही उत्पन्न हैं। साधक आत्मज्ञान की प्राप्ति में लगा रहे। जब इस आत्मा की प्रत्यक्षानुभूति होगी उसी क्षण मुक्ति हो जाती है।

आत्मा और उसका स्वरूप पूछने पर पार्वती ने संक्षेप में कहा-''बुद्धि, प्राण, मन, देह, अहंकार तथा इन्द्रियों से पृथक् शुद्ध एवं अद्वितीय चिल्लरूप आत्मा मैं ही हूँ। ज्ञान से आत्मस्वरूप का बोध होता है, वही विद्या है, उसी को ध्यान कहते हैं। आत्मा निर्विकार, विशुद्ध और जन्म-मरण से रहित है। आत्मा बुद्धि आदि से उपाधिहीन, चिदानन्दस्वरूप, आनन्दमय, परमप्रभायुक्त, पूर्ण, सत्य ज्ञान वाला है, आत्मा एकमात्र अद्वितीय, सर्वश्रेष्ठ स्वप्रकाश से समस्त प्राणियों में सूक्ष्म देहादि को प्रकाशित कर सब में विद्यमान है। मनुष्य समाहित चित्त हो आत्मा का ही नित्य मनन करे। अनात्म पदार्थो को त्याग दे, रागदोषादि से दोष युक्त कार्य होते हैं। इनसे प्राणी जन्म-मरण के बन्धन से बँध जाता है। अतः अनात्म पदार्थो में आत्मबुद्धि त्याग देनी चाहिए। पञ्चभूत निर्मित इस शरीर से जीव स्वयं भिन्न है। शरीर नाश पर यह या तो अग्नि से भस्म होता है या पशु-पक्षी खा जाते हैं या सड़ जाता है किन्तु आत्मा नहीं। आत्मा की यह धर्मशाला है।

ज्ञानी का कौन अपकार कर सकता है। यह आत्मा न जन्म लेता है और न मरता है, ऐसी आत्मा का कोई अपकार नहीं होता है। द्वेष मन के सन्ताप का मूल है। द्वेष जगत सम्बन्धों को भंग करता है तथा मोक्ष प्राप्ति में बाधक है।'' पुनः हिमालय ने पूछा-'दुःख किसे होता है? शरीर में दुःख भोगने वाला दूसरा कौन है?'' पार्वती ने बताया कि आत्मा को दुःख नहीं होता, विशुद्ध आत्मा मेरी माया से मोहित हो अपने में सुख-दुःख मान लेता है। माया अनादि, अविद्या स्वरूपिणी और जगत को मोहित करने वाली है।-आत्मा लिंगरूप मन-जिसमें वासना है-को धारण कर विवश (लाचार) सा हुआ जगत में व्यवहार करता है। स्फटिक धवल होता है किन्तु समीपस्थ जैसा रंग होगा वैसा ही दिखता है। बुद्धि, इन्द्रिय आदि के साथ से आत्मा की भी वही गति होती है। मन, बुद्धि एवं अहंकार जीव के सहयोगी हैं। आत्मा भोग नहीं करता। वह निर्लिप्त है। पूर्वजन्म की वासनाओं से युक्त अन्त करण वाला जीव जन्म लेता है, अतः जीव सन्ताप का कारण है। यही संसार का कारण है। शरीर कर्म से पैदा होता है। पुण्य कर्म से स्वर्ग मिलता है किन्तु पुण्य क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक में आता है, अतः आसक्ति का त्याग, विद्याभ्यास तथा सत्सग में परम सुख की इच्छा होनी चाहिए। हिमालय के द्वारा पूके पर पार्वती ने जीव के पृथ्वी पर आने का गम्भीर और आध्यात्मिक वर्णन करते हुए कहा, ''गर्भावस्था में पूर्व जन्मों के फल कष्ट उलकर खिन्न जीव मन में स्वयं से बात करता है-'मैंने अन्यायपूर्वक धनार्जन कर परिवार का भरण-पोषण किया किन्तु दुर्गतिनाशिनी दुर्गा की आराधना नही की। इस बार गर्भ दुःख से मुक्त होने पर महेश्वरी दुर्गा की पूजा छोड़कर कुछ नहीं करूँगा। व्यर्थ में अनेक जन्म बिता दिये और कष्ट उद्य रहा हूँ। जीव अपने अंगों में मेदा और रक्त लपेटे पैदा होना है। मेरी माया से उन दु खो को भूल जाता है। बड़े कष्ट से बड़ा होकर यौवनोन्माद में काम-क्रोध लोभादि पाप-पुण्य करने लगता है। शरीर के भोग हेतु जीव कर्म करता है जीवात्मा उससे अलग है, आयु प्रतिक्षण बीत रही है वह कम्पित पत्ते पर पड़ी जल बिन्दु की भांति क्षणभंगुर है। आयु पूर्ण होने पर काल जीव को अचानक वैसे ही ग्रस लेता है जैसे सर्प समीप में आये मेढ़क को ग्रस लेता है। पिताजी! अगर आप जगत् के दुःखों से छुटकारा चाहते हैं तब समाहित चित्त होकर भक्तिपूर्वक मुझ ब्रह्मरूपिणी की आराधना करें।''

हिमालय ने प्रश्न किया, ''माँ! मनुष्य किस तरह आप की शरण प्राप्त करे? किस रूप का ध्यान करे? तथा कैसी परम भक्ति करनी चाहिए?''

पार्वती ने उत्तर दिया-''हजारों भक्तों में कोई-कोई ही सिद्धि का प्रयास करता है, उनमें कोई-कोई मुझे जान पाता है। देह बन्धन से मुक्ति हेतु मेरे निष्कल, सूक्ष्म, वाणी से परे, विकल्प रहित, आ श्रयहीन, सच्चिदानन्द विग्रह वोले स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। मैं बुद्धिमानों की सद्बुद्धि हूँ। मैं पृथ्वी में गन्ध, जल में रस, चन्द्रमा की प्रभा, तपस्वियों का तप, सूर्य का तेज हूँ। मैं ही पुण्यात्मक कर्म, स्थ्यों में गायत्री, बीज मंत्रों में प्रवण हूँ। त्रिगुण (सत्त्व, राजस्, तमस्) मुझसे उत्पन हैं तथा मेरे अधीन हैं, मैं उनके आधीन नहीं हूँ। माया से मोहित मनुष्य सर्वव्यापी, अद्वैत, परम और निर्विकार मुझे नहीं पाते। शिव ही प्रधान पुरुष हैं, शिवा परम शक्ति हैं। तत्वदर्शी योगी मुझे शिवशक्ति से युक्त ब्रह्म एवं परात्पर तत्त्व बताते हैं। मैं ब्रह्म रूप में सृष्टि करती, विष्णु रूप में पालन तथा महारुद्र रूप में संहार करती हूँ। काली आदि रूपों को स्थूल जानो, स्थूल रूप का ज्ञान किये बिना सूक्ष्म रूप का ज्ञान नहीं होता है। मोक्षेच्छुक को मेरे स्थूल रूप का आश्रय लेना चाहिए। क्रियायोग द्वारा विधिपूर्वक स्थूल रूपों की उपासना करके शनैः-शनैः शाश्वत परम सूक्ष्म का दर्शन करे।

पार्वती जी ने हिमालय से कहा-''मुक्ति प्रदाता मेरी देवी मूर्ति सर्वाधिक आराधनीया है। देवी भी मुक्तिदायिनी दस महाविद्या है-महाकाली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला, छिन्नमस्ता, महात्रिपुरसुन्दरी, धूमावती एवं मातङ्गी। क्रियायोग द्वारा किसी एक-का आश्रय ले लेना चाहिऐ। एकाग्रचित्त से नित्य स्मरण श्रेयसकर है। मै मोक्ष प्रदायिनी हूँ। सत्यनिष्ठा से जो मेरी आराधना करता है, वह मुझमें और मैं उसमें स्थित हूँ। मुझ में भक्ति रखने वाले प्राणी को मुक्ति सुलभ है।''

इस प्रकार माहेश्वरी पार्वती गिरिराज को योग की शिक्षा देकर स्वयं लीलापूर्वक सामान्य कन्या बन गईं और माँ का दुग्धपान करने लगीं। पिता ने जातकर्म संस्कार करके दसवें दिन 'पार्वती' नाम रखा। नारद मुनि! जो मनुष्य पार्वती द्वारा हिमालय को दिये योग का पाठ करता है, उसे मुक्ति सुलभ हो जाती है, शर्वाणी उस पर सदा प्रसन्न रहती हैं, उसके मन में दृढ़ भक्ति उत्पन्न हो जाती है। अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी को पाठ करने वाला जीवन्तुक्त हो जाता है। अमावस्या को पाक्कर्ता सब पापों से मुक्त हो दुर्गा तुल्य हो जाता है। विल्व (बेलपत्र को पेड़) वृक्ष के पास बैठकर पाठ करने वाला एक वर्ष में ही दुर्गा दर्शन पा लेता है। पृथ्वी पर तप, दानादि का फल सीमित है किन्तु श्री पार्वती गीता (भगवती गीता) के पाठ के क्ल की कोई सीमा नहीं है, वह असीम है।

नारद ने पुनः जिज्ञासा प्रकट की कि पार्वती ने योगी शंकर के अर्धांग को किस प्रकार प्राप्त क्रिया? श्री महादेव ने बताया कि सृष्टिकर्त्ता महामाया दुर्गा हिमालय के घर रहकर वर्षा ऋतु में बढ़ने वाली गंगा की भांति प्रतिदिन बड़ी होने लगी। देवताओं को भी जिन जगदम्बा के दर्शन दुर्लभ है, वे गिरिराज की गोद र्मे खेलती थीं। एक बार नारद जी उनके दर्शन हेतु पधारे। गिरीन्द्र ने उनको प्रणाम किया। नारद ने कहा-''पर्वतराज! मैंने कहा था कल्याणी भगवती आपकी पुत्र होंगी और वह प्रेमवश शम्भु के अर्धांग को प्राप्त कर उनकी भार्या बनेगी, अर्धनारीश्वर कहे जायेंगे। इन दोनों जैसा प्रेम न हुआ है न होगा ही। महाकालेश्वर स्थिर चित्त से समाधि में अन्तर्यामिनी प्रिया महाकाली का दर्शन सदा करते हैं। वह आपके शिखर पर तप करने हेतु आयेंगे।''

एक दिन गन्धर्व तथा किन्नरों से हिमाल्य ने जाना कि शङ्कर उनके शिखर पर तप कर रहे हैं। साथ में अनेक प्रमथगण हैं। यह सुनकर हिमालय उस स्थान पर गये शिव का पूजन किया। पूजन स्वीकार शिव जी ने कहा कि आप ऐसी व्यवस्था करें कि यहों कोई न आये, क्योंकि संसर्ग से तपस्या की हानि होती है। आप धर्मज्ञ हैं। देव, मुनियों, यक्षों आदि के आश्रय हैं। हिमालय ने कहा महाराज आप यहाँ एकान्त में तप करें। हिमालय के घर में बढ़ते हुए पार्वती विवाह योग्य हो गई। एक दिन जगन्माता पार्वती ने पिता से शिव के समीप जाकर तपस्या करने की इच्छा प्रकट की। जब ब्रह्मा ने काममोहित अपनी कन्या सञ्जा को धर्षित करने का प्रयास किया तब शिव ने उनकी निन्दा की जिससे वह दुखी होकर शिवा की तपस्या करने लगे। प्रसन्न हुई जगदम्बा ने ब्रह्मा से वर माँगने को कहा। ब्रह्मा ने कहा-''आप माता, जगत से विमुख शिव को मोहित कीजिये। आप अवतार लें। स्त्री प्राप्ति की इच्छा पर उन्होंने मेरी निन्दा की है। अस्तु, आप उनको मोहित कीजिये।'' ब्रह्मा को दिये वचन को याद कर, शिव के उग्र तप को देखकर तथा पूर्व में दिये गये आश्वासन और वचन को याद कर पति रूप में शिव को प्राप्त करने के लिये मैं वही जाऊंगी जहाँ चन्द्रशेखर हैं। उन्हें मोहित करूँगी जिससे वह पत्नी रूप में मुझे स्वीकार करें। हिमालय ने पुत्री को शिव के समीप ले जाने का मन बना लिया। मेना इसे जानकर रोने लगी। पार्वती ने उन को समझाया कि मेरे लिये आप चिन्ता न करें। मैं नित्य आनन्दमयी साक्षात् आद्या प्रकृति हूँ। मुझे कहीं कष्ट नहीं है। मैं श्मशान निवासिनी महाकाली शवासना हूँ। शम्भु को पति रूप में प्राप्त कर शंकर के पास चली जाऊँगी। मेना यह सुनकर आश्चर्यचकित होकर 'उमा' बोलीं, इसी से पार्वती का दूसरा नाम 'क्या' हो गया। मेना के कहने से पार्वती के साथ उनकी जया और विजया दोनों सखियाँ भी हिमालय के साथ गर्यी। यह देखकर देवगण शंकर के एकान्त स्थान वन में पुष्पवृष्टि करने लगे।

हिमालय ने शिव को प्रणाम किया और कहा कि यह मेरी पुत्री सखियों के साथ आपके पास रहकर पुष्प, फल आदि चयन कर आप की सेवा करेगी। प्रसन्नचित्त भगवान शिव ने ज्ञान चक्षु से उनको तत्वतः जानकर कल्याण वचन कहा। गिरिराज लौट आये। शिवजी जिन देवी की तपस्या कर रहे थे वे अब उसी वन में स्थित हो गईं। इधर तारकासुर से पीड़ित देवता ब्रह्मा के पास उपाय पूके गये। ब्रह्मा ने देवों को शिव के ध्यान भंग करने का उपाय बताया। इन्द्र ने गुरु वृहस्पति जी से उपाय पूछ। वृहस्पति जी ने इस कार्य र्मे कामदेव को नियुक्त करने को कहा। इन्द्र ने काम को बुलाया और जगत कल्याण हेतु कार्य करने को कहा। कामदेव को ब्रह्मा का शाप याद आ गया किन्तु इन्दु से प्राण रक्षा का आश्वासन पाकर कामदेव शिव पर अपने वाण चलाने चल दिया। शम्भु को सम्मोहित करने में विफल उस कामदेव को देखकर जगन्माता महेश्वरी मुस्कराकर स्वयं अपनी सखियों के साथ रुद्र के सम्मुख जाकर जब स्थित हो गईं। तब शिव ध्यान छोड़कर सुन्दर नेत्र खोलकर उन पार्वती के मुखकमल को अपलक दृष्टि से देखने लगे। अवसर पाकर कामदेव ने अपना सम्मोहन नाम का पुष्प वाण वक्षःस्थल पर चला दिया। देवता गण आकाश में स्थित थे, मनमोहक पवन चल रहा था, बसन्त ऋतु थी। शिव जी के हृदय में विकार उत्पन्न हुआ। शिव ने इसका कारण कामदेव को मानकर क्रोध से दहकते हुए तीसरे नेत्र से भीषण अग्नि प्रकट हुई। तभी सभी देव और रति एक साथ चिल्लाने लगे-''रक्षा करो, रक्षा करो, हे महादेव आप प्रसन्न हों।'' किन्तु कामदेव भस्म हो चुका था।

शिवजी के तीसरे नेत्र की अग्नि वापस नहीं गई। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर उस वडवारूपिणी अग्नि को समुद्र ने अपने जल में स्थापित कर लिया। पार्वती ने रोती हुई रति को आश्वासन दिया कि तुम्हारा पति पुनः जीवित होगा। तदन्तर श्री देवी जी ने शिव से कहा-'देव! मुझ आदिशक्ति को पत्नी रूप में पाने हेतु इतने दिनों तक कठोर तपस्या की फिर कामदेव को क्यों नष्ट किया? काम के नष्ट हो जाने पर आप को पत्नी से क्या प्रयोजन है?''

पार्वती का वाणी सुनकर शम्भु चकित हो गये तथा ध्यान करके उनको आद्या प्रकृति जाना। हर्षित होकर उन्होंने अपने नेत्र बन्द कर लिये तथा पार्वती से कहा-''अपनी माया (लीला) से अवतीर्ण आपको मैं पूर्णा प्रकृति जानता हूँ आपके लिये ही मैं तपस्यारत हूँ आज मैं कृतकृत्य हुआ जो प्रिया सती को सामने देख रहा हूँ।'' देवी ने उत्तर दिया-''हिमालय के घर जन्म लेकर आपको पति रूप में प्राप्त करने को समीप आई हूँ जो जिस भाव से मेरी भक्ति करता है मैं भी उसी भाव से उसका मनोरथ पूर्ण करती हूँ। मैं वही सती हूँ जो दक्ष यज्ञ में आपको छोड़कर चली गयी थी। मैं ही काली, भीमा तथा त्रैलोक्य मोहिनी हूँ।'' शिवजी ने पुनः आग्रह किया कि यदि आप सच में मेरी प्राणप्रिया सती है तब दक्ष यज्ञ विनाश हेतु जाते समय जो मेघसदृश कान्तिमती भयंकर रूपिणी, दिगम्बरा काली रूप दिखाया था, वही पुनः दिखाइये।

शम्भु भगवान के इतना कहते ही गिरिराज पुत्री क्षण मात्र में पहले की तरह चिकने काजल के समान कान्तिवाली साक्षात् काली रूप में प्रकट हुई। वह दिगम्बरा थीं, शरीर से रक्त टपक रहा था, नेत्र भयानक और फैले हुए, वक्षःस्थल पुष्ट, उन्नत उरोज शोभा पा रहे थे, पैरों तक लटकते हुए लम्बे केशपाशों से स्वरूप भयानक लगता था, लपलपाती जीभ, चमकते दाँत एवं नखों से ऐसी शोभा पा रही थी, जैसे गगनमण्डल में सहस्रों चन्द्रमाओं से मेघमाला शोभित हो। घुटनों तक लम्बी मुण्डमाला शोभा दे रही थी, चार लम्बी भुजाओं से ज्योतिर्मयी नानावर्णी रत्नों से जटित किरीट (मुकुट) धारण करने से उनका मस्तक शोभायमान था।

रोमाञ्चित अंग-प्रति-अंग प्रसन्नात्मा शिव भक्तिपूर्वक गद्गद् वाणी में इस प्रकार बोले-'बहुत दिनों से मेरा हृदय विरह से दग्ध हो रहा है, आप महेश्वरी मेरे हृदय में निवासिनी अन्तर्यामिनी शक्ति हैं। मैं आप के चरणकमलों को अपने हृदय कमल में धारण कर एवं उनकी आराधना करके आपके वियोग से सन्तप्त हृदय को पुनः शीतल करूँगा।'' परम योग में स्थित हुए शम्प्र इस प्रकार कहकर भूमि पर लेट गये तथा उनके चरणकमल को हृदय पर धारण किया। ध्यानमग्न शिव चेष्टाशून्य शव रूप में स्थित हो परमादर से अपलक उनको निहारने लगे। अपने एक अंश से पञ्चमुख रूप में सम्मुख खड़े होकर करबद्ध सहस्रनाम द्वारा परमेश्वरी काली की स्तुति करने लगे-

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    अनुक्रम

  1. अपनी बात
  2. कामना
  3. गीता साहित्य
  4. भगवती चरित्र कथा
  5. शिवजी द्वारा काली के सहस्रनाम
  6. शिव-पार्वती विवाह
  7. राम की सहायता कर दुष्टों की संहारिका
  8. देवी की सर्वव्यापकता, देवी लोक और स्वरूप
  9. शारदीय पूजाविधान, माहात्म्य तथा फल
  10. भगवती का भूभार हरण हेतु कृष्णावतार
  11. कालीदर्शन से इन्द्र का ब्रह्महत्या से छूटना-
  12. माहात्म्य देवी पुराण
  13. कामाख्या कवच का माहात्म्य
  14. कामाख्या कवच
  15. प्रथमोऽध्यायः : भगवती गीता
  16. द्वितीयोऽध्याय : शरीर की नश्वरता एवं अनासक्तयोग का वर्णन
  17. तृतीयोऽध्यायः - देवी भक्ति की महिमा
  18. चतुर्थोऽध्यायः - अनन्य शरणागति की महिमा
  19. पञ्चमोऽध्यायः - श्री भगवती गीता (पार्वती गीता) माहात्म्य
  20. श्री भगवती स्तोत्रम्
  21. लघु दुर्गा सप्तशती
  22. रुद्रचण्डी
  23. देवी-पुष्पाञ्जलि-स्तोत्रम्
  24. संक्षेप में पूजन विधि

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