अंधकार से प्रकाश की ओर - स्वामी अगेह भारती Andhkar Se Prakash Ki Or - Hindi book by - Swami Ageh Bharti
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अंधकार से प्रकाश की ओर

स्वामी अगेह भारती

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :111
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6295
आईएसबीएन :81-7182-859-0

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दुर्भाग्य है, इस देश में जो भी थोड़ा पढ़ा-लिखा है वह स्वयं को बुद्धिजीवी मानता है। केवल डिग्रियां ले लेने से कोई बुद्धिजीवी नहीं हो जाता। बुद्धिजीवी होना कुछ और बात है।

Andhkar Se Prakash Ki or a hindi book by Swami Ageh Bharti - अंधकार से प्रकाश की ओर - स्वामी अगेह भारती

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अपनी बात

यह गरिमा केवल मनुष्य को प्राप्त है कि वह अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा कर सके और जीवन की परम धन्यता को उपलब्ध हो सके। मनुष्य का देह मिलने तक तो वह प्रकृति के अधीन बिना किसी प्रयास के विकसित होता चला जाता है। पर यहां के बाद अब स्वतः विकास नहीं होगा। अब उसे सचेतन विकास करना होता है। यहीं आकर उसे यह स्वतंत्रता मिलती है कि चाहे तो विकास हो, न चाहे तो विकास न हो। यह चुनाव की स्वतंत्रता अपने आप में मनुष्य का परम गौरव है, परम सम्मान है जो परमात्मा ने उसे दिया है। किन्तु यदि वह विकास न करे तो यही उसका दुर्भाग्य भी बन जाता है।
प्रायः तो वह मनुष्य की देह पाकर उसी में भूला रहता है और न केवल कि प्रकाश की यात्रा पर नहीं निकलता वरन् उस अभियान पर चलने का आह्वान करने वाले प्रकाश पुरुषों को ही मिटा देने के उपाय करता है। आखिर हमने जीसस को सूली पर क्यों चढ़ाया ? सुकरात को जहर क्यों दिया ? मंसूर को क्यों काटा ? 20 वीं सदी के महा प्रकाश पुंज ओशो को बिना किसी कसूर के जेल में बंद कर दिया और वहां उन्हें स्लो प्वायजन दिया और रेडिएशन से गुजारा, आखिर क्यों ? क्योंकि ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति एक सतत चुनौती बन जाती है कि मैं भी ऐसा महिमामयी हो सकता हूं पर हो नहीं रहा हूं, ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति अंधकार में पड़े रहने में बाधा और असुविधा बन जाती है, और हम वहीं बने रहना चाहते हैं। यह आदमी की बड़ी निम्न अवस्था है पर यही सुविधाजनक लगती है। किंतु यदि तनिक ही ध्यान दें तो पाएंगे कि विचार करने की क्षमता ही तो है जो मनुष्य को पशु से भिन्न करती है। अगर मैं विचार नहीं करता तो पशु में और मुझमें बुनियादी रूप से कोई अंतर नहीं रह जाता और यदि कोई विचार करता है तो एक दिन वह निर्विचार तक पहुंचता ही है, शू्न्य तक पहुंचता ही है। क्योंकि जल्दी ही वह ऐसी जगह आ जाता है जहां कुछ भी पकड़ में नहीं आता, कुछ भी समझ में नहीं आता। यहां मन ठहर जाता है, बुद्धि चुप हो जाती है। यहीं से प्रकाश का लोक प्रारंभ होता है, यहीं से आध्यात्म की शुरुआत है। रामायण या गीता या कुरान या बाइबिल पढ़ने से आध्यात्मिक जीवन का संस्पर्श भी नहीं होता। पर यह तो बाद की बात है। सर्वप्रथम तो विचार शुरू होना चाहिए न !

मैं कभी-कभी हैरान होता हूं कि आजकल कितने सारे लोग पढ़-लिख लिए हैं। बड़ी-बड़ी डिग्रियां हैं उनकी। पर वे मुझे इसी में सन्तुष्ट दिखते हैं कि कालजे में पढ़ा जाए, वेतन पाए और घर आकर आराम से खाए-सोए। मनुष्य की कोई समस्या, मनुष्य का कोई दर्द उन्हें छूता है, ऐसा नहीं लगता। मैं चाहता हूँ, कि पढ़े-लिखे लोग कम से कम शिक्षा जगत से जुड़े लोग तो सोचें-विचारें। क्या उन्हें नहीं दिखता कि दुनिया के सारे राजनीतिज्ञ पागल हैं, बिना किसी अपवाद के महत्वकांक्षा पागलपन है और दुनिया की सारी शक्ति, इन पागलों के हाथ में है। एक पागल थोड़ा आगे बढ़ जाए पागलपन में और वह सारी पृथ्वी पर से जीवन का विनाश कर सकता है और हम इन पागलों पर भरोसा किए निश्चिंत सोए हुए हैं। नहीं, हमें सोचना होगा, हमें रास्ता निकालना होगा इन मूढ़ राजनीतिज्ञों की साजिश से बाहर होने का और यह हमें ही करना होगा। इसके लिए कोई मंगलग्रह से नहीं आएगा।

दुर्भाग्य है, इस देश में जो भी थोड़ा पढ़ा-लिखा है वह स्वयं को बुद्धिजीवी मानता है। केवल डिग्रियां ले लेने से कोई बुद्धिजीवी नहीं हो जाता। बुद्धिजीवी होना कुछ और बात है। जहर पीने की हिम्मत होनी चाहिए। सत्य को पाने के लिए मूल्य चुकाना होता है। ये बुद्धिजीवी नहीं हैं जो दो कौड़ी पर बिकने को राजी है, जिनका अपना कोई आत्म गौरव नहीं है। जो अपना स्वभाव भूल गए हैं, जो दो कौड़ी के राजनेताओं के सामने पूंछ हिलाते रहते है।
प्रस्तुत डायरी में मैंने जो भी मुद्दा सामने पाया, उसपर विचार किया है। मेरे विचार सही हों यह जरूरी नहीं है। यही यह है कि हर आदमी विचार करे, वह ठहरा हुआ डबरा न बना रहे। यह डायरी विचार करने के लिए एक आमंत्रण भर है। आज विचार करना बहुत जरूरी हो गया है। काश्मीर में हर रोज 5-10-20 लोग मारे जाते हैं। बिहार में लूट-मार-काट सामान्य जीवन बन गया है। सारी दुनिया आतंकवाद की गिरफ्त में होती जा रही है। क्या इन दशाओं को हमने स्वीकार ही कर लिया है ? नहीं, तो क्या सोचते हैं ? क्या कुछ नहीं हो सकता ? आदमी ऐसे मारा जाता रहेगा ?
मैं सुझाव देना चाहता हूं कि भारत पहला देश होना चाहिए जिसकी व्यवस्था वैज्ञानिकों के हाथ में सौंप दी जाए। सत्ता नहीं, व्यवस्था। राजनीतिज्ञ सभय बाह्य हो गया है। कहां विज्ञान की असीमित चरम उपलब्धियां और कहां संसद में कुर्सी उठा-उठाकर एक दूसरे पर फेंकते हुए तथाकथित राजनेता ! आह ! कहां हैं वे लोग जिनके हाथों में दुनिया का भविष्य उज्जवल है और जिनकी सन्निधि में मनुष्य का चित्त शांत है !! हम कब ऐसे लोगों को स्वीकार करेंगे ?


स्वामी अगेह भारती

25 अक्टूबर 1999


दिल्ली के बड़े गलियारे से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर नगर की छोटी गली के कांग्रेस पार्षद तक मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस की पराजय का कारण ढूंढ़ने में लगे हैं और मैं जानता हूं कि ये समूचे कांग्रेसी मिलकर भी कारण ढूंढ नहीं पायेंगे और ढूंढ भी लें तो कह न पायेंगे। सच यह है कि इसमें ढूंढने जैसी कोई बात छुपी ही नहीं है। मामला एकदम साफ है पर राजनीतिज्ञ इतने अंधेपन में जीता है कि वह कभी कुछ देख नहीं पाता है। बस अनुमान के आधार पर निर्णय लेता चला जाता है और सारे देश को उसका दुष्परिणाम भोगना पड़ता है। जैसे अभी सोनिया गांधी ने अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार गिरायी और चुटकी बजाते ही बहुमत सिद्ध करने का दावा करती रहीं, पर वह दावा शत प्रतिशत खोखला साबित हुआ, वह बहुमत सिद्ध न कर सकीं। और उनके इस गलत व बचकाने आकलन ने देश को मध्यवधि चुनाव में ढकेल दिया और उसमें भी वह बुरी तरह हार गयीं।

संविधान में दो संशोधन तो तत्काल होने चाहिए। कोई एक पार्टी इस तरह सरकार गिराकर बहुमत न सिद्ध न कर पाए और उसके बाद मध्यावधि चुनाव से भी न जीत पाए और वही पहले वाली सरकार पुनः सत्ता में आए तो सरकार गिराने वाली पार्टी को कुछ दण्ड मिलना चाहिए। मसलन सात साल चुनाव लड़ने से बहिष्कृत किया जा सकता है या मध्यावधि चुनाव के खर्च वह पार्टी भरे। जो भी हो, कुछ दण्ड अवश्य निर्धारित होना चाहिए। दूसरी बात, दो स्थानों से चुनाव लड़ने का नियम समाप्त किया जाना चाहिए। खैर तो बात हो रही थी, कांग्रेस की पराजय के कारण खोजने की तो कांग्रेस की पराजय के मुख्य दो कारण है और कांग्रेस इन नतीजों पर नहीं पहुंचेगी या नहीं पहुंचना चाहेगी। वह है पहला तो सोनिया गांधी जैसी अनुभवहीन महिला की प्रधानमंत्री पद की अतिशय भूख, जो देश ने पंसद नहीं किया और दूसरा कारण है कि अब तक में कांग्रेस भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी है। दिल्ली से लेकर छोटे नगर तक कांग्रेसी केवल पैसे बनाते रहे हैं, यह जनता ने साफ देख-जान लिया है। अब केवल भाषण से काम नहीं चलेगा। सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री पद का ख्वाब छोड़कर जनसेवा में जुटना होगा और भ्रष्टाचारी नेताओं को विदा करना होगा। यह बात और है कि फिर बचेगा कौन ? यह विचार करना होगा उनको। मुझे तो लगता है सोनिया गांधी कांग्रेस को मटिया मेट करके ही दम लेंगी। ऐसा कांग्रेसियों को भी लगता है पर वे कह नहीं सकते। दुर्भाग्य से कांग्रेस की एक यह परम्परा रही है, हां हजूरी या कहे चाटुकारिता वाली। कांग्रेस लालू व जय ललिता जैसे लोगों का साथ देने के कारण भी जनता की नजरों से नीचे गिरी।

जहां कांग्रेस के उपर्युक्त अतिशय नकरात्मक बिन्दु थे वहीं तेरह माह में अटल बिहारी बाजपेयी कुछ ठोस कार्य कर रहे हैं। जैसे देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि मई 99 में पोखरण में परमाणु परीक्षण से देश को व्यक्तित्व मिला है, विश्व में उसकी हैसियत बढ़ी है और उसके बाद लाहौर बस यात्रा ने सारी दुनिया को स्पष्ट कर दिया कि भारत पाकिस्तान से सच ही मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का इच्छुक है। जहां दुनिया को यह संदेश गया वहीं भारत का जनमानस सोनिया के इस वक्तव्य से भी बुरी तरह आहत हुआ कि लाहौर बस यात्रा महज़ एक दिखावा था। यह वक्तव्य मूर्खतापूर्ण था, ऐसे तो किसी को भी, किसी भी चीज को दिखावा कहा जा सकता है। काश, भविष्य में कुछ ऐसी व्यवस्था होती कि केवल दूसरी पार्टी का विरोध करने के लिए अनाप-शनाप, अतर्क्य बातें करना लोग बन्द करें। कुछ तो जिम्मेदार लोगों जैसी बातें करें। कुछ तो जिम्मेदार बने।
तीसरी बात तो अटल जी के पक्ष में गयी वह थी कारगिल की सैनिक व कूटनीतिक विजय। इसपर भी सोनिया के वक्तव्य न केवल बचकाने होते थे, बल्कि देश द्रोही कोटि के होते थे। यह सब जनता को दिखाई पड़ता है। इन सब बातों ने कांग्रेस को हराया। सच्चाई यह है कि जनमानस कांग्रेस के इतना खिलाफ था कि 112 सीटें मिल गयीं उन्हें, यही चमत्कार है। हां, लगता था कांग्रेस को कोई सीट न मिलेगी। तो अब समीक्षा का दौर चलेगा कुछ दिन। सभी झूठ बोलेंगे क्योंकि सत्य सोनिया गांधी के खिलाफ पड़ेगा। और उन्हें कोई नाखुश नहीं करना चाहता। कोई कहेगा यहां दूसरा प्रत्याशी होता तो जीतता। कोई कुछ कहेगा। एक बात और मैंने हवा में देखी है। लोग परिवारवाद से भी थक-ऊब चुके हैं। इसलिए चाहते हैं कोई अन्य आए सत्ता में, उस परिवार का नहीं।


28 अक्टूबर 1999



आज दोपहर एक दूसरे नगर से एक परिचित युवक का फोन आया कि रेलवे में उच्चलिपिक का पद कैसा होता है ? क्योंकि एक लाख रुपए देने पर उच्चलिपिक की नौकरी मिल जाएगी। पचास हजार पहले देना है, पचास हजार नौकरी लगने के बाद। मैंने कहा, भाई इस तरह के सलाह-मशविरों के लिए मैं सही आदमी नहीं हूं। क्योंकि मैंने नौकरी प्राप्त करने के लिए भी घूंस कभी नहीं दी थी। तत्पश्चात् 37 वर्ष नौकरी की, न कभी किसी से घूंस ली, न कभी किसी को घूंस दी। यह सच है कि इस तरह की बातें सुनकर मैं हृदय पर भारी आघात व दबाब अनुभव करता हूं और आप जानते है मैं हार्ट पेशेन्ट हूं। मित्र ने कहा : ‘आप रेलवे में थे इसलिये पूछा कि यह काम कैसा होता है ? सुना है ऊपर से भी कुछ मिलता है वेतन के अतिरिक्त तो आपकी क्या राय है ? पैसों का प्रबन्ध मैं कर लूंगा, उसकी कोई चिंता नहीं। मैंने उसे कहा : ‘मेरी राय में तो ऐसे लोगों को गोली मार देनी चाहिए। ये असली अपराधी हैं। अभी चन्द दिनों पूर्व गाइसाल में हुई रेल दुर्घटना के समय अनेक नेता मांग कर रहे थे कि दुर्घटना में जिम्मेदार व्यक्ति को मृत्युदण्ड मिलना चाहिए। मेरे ख्याल से काम करते-करते गलती सभी से हो जाती है। यह बात दूसरी है कि किसी किसी का काम ऐसा होता है कि उसकी गलती भारी धन-जन हानि का कारण बन जाती है, पर गलती से ही दुर्घटना होती है।

और यह तो जान बूझकर घूंस मांगा व लिया जा रहा है, यह वास्तव में अक्षम्य अपराध है। मृत्युदण्ड का केस यह है। चाहे कांग्रेस सरकार हो सत्ता में, चाहे भाजपा, क्या फर्क पड़ता है इन बदमाशों को ? रेलमंत्री राम विलास पासवान हों या नीतिश कुमार या ममता बनर्जी, क्या फर्क पड़ता है इन लुटेरों को ? कोई इस भ्रष्टाचार को रोक सके तो उसका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा। और भ्रष्टाचार रोका जा सकता है। मैं नहीं जानता चौधरी चरण सिंह किस पार्टी के थे, मुझे राजनीति का ज्ञान बिल्कुल नहीं है, पर इतना अच्छी तरह मालूम है कि जब यह व्यक्ति मुख्यमंत्री था उत्तर प्रदेश का तो उत्तर प्रदेश में राज्य व केन्द्रीय दोनों के सभी कार्यालयों में भ्रष्टाचार पूर्णतः बन्द हो गया था। क्योंकि कोई नहीं जानता था कि रेलवे स्टेशनों पर टिकट की खिड़की पर यह आरक्षण की खिड़की पर खड़ा व्यक्ति साधारण जन है या भेष बदलकर चौधरी चरन सिंह अथवा उनका भेजा हुआ कोई उनका विश्वस्त अधिकारी ? और यह हालत हर कार्यालय में थी, कचहरी, रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन। बीच रास्ते में कहीं मैदान में, चौधरी चरन सिंह स्वयं खड़े होते और बसों को रोककर चेक करते। कहीं भेष बदलकर गरीब किसान बनकर थाने में रिपोर्ट लिखवाने पहुंच जाते। उत्तर प्रदेश में उन दिनों घूंस लेने वाला खोजने पर भी न मिलता। ऐसी हालत सारे देश की क्यों नहीं हो सकती ? अटल जी के एजण्डे में भ्रष्टाचार निवारण मुख्य मुद्दा है। अगर भ्रष्टाचार नहीं बन्द कर सकते तो अटल जी को भी त्याग पत्र दे देना चाहिए। मैं किसी भी ऐसे आदमी की प्रशंसा नहीं कर सकता जो देश के सर्वोच्य पदों पर बैठा हो और भ्रष्टाचार जारी हो।
उस मित्र को फोन पर मैंने बताया कि मेरे एक भी बेटे की नौकरी रेलवे में नहीं लगी क्योंकि न मैं घूंस दे सकता था, न मेरे बेटे ही वह पसंद करते। हमें प्रतीक्षा है ऐसे नेता की जो भ्रष्टाचार का सफाया युद्ध स्तर पर करवा दे। लोग सचमुच दुआ करेंगे। इस देश की आत्मा को भ्रष्टाचार खाए जा रहा है।
मैं इस सब को लेकर एक देशव्यापी युवा आन्दोलन चलाना चाहता हूं। जिन्हें भी देश के नवनिर्माण में रूचि हो जो स्वयं को युवा समझते हों, वे संपर्क कर सकते हैं।


30 अक्टूबर 1999


आज एक परिचित अधिकारी के यहाँ एक धार्मिक कार्यक्रम में आमंत्रित था। मैं वह सम्बोधि जी दोनों गए। एक पंडित कुर्ता धोती पहने, दूसरा कुर्ता पायजामा व तीसरा सफारी पहने, तीनों पंडित किताब देखते हुए पढ़ पढ़कर संस्कृत के श्लोक पढ़ रहे थे। वे उसका अर्थ हिन्दी में नहीं बता रहे थे। न श्लोक पढ़ने वालों में प्रार्थना या भक्ति को कोई भाव दिख रहा था। न आयोजकों, में, न आमंत्रित अतिथियों में। केवल वे पढ़ रहे थे व सभी सुनते हुये लग रहे थे। प्रार्थना या भक्ति का कहीं कोई आभास तक न था, सब कुछ एक औपचारिकता। क्या सभी धार्मिक आयोजनों का यही हाल नहीं हो गया है ? आज आदमी के भीतर से प्रार्थना फूटे तो क्या वह किसी पंडित पुरोहित की मोहताज होगी ? और यदि प्रार्थना नहीं फूटे तो पंडित पुरोहित क्या करेगा ? जब कि वह स्वयं उधार है। न उसका प्रार्थना से कोई परिचय है न उसे भक्ति का कोई स्वाद मिला है वह तो स्वयं दरिद्र है। उसे प्रार्थना की प्यास तक नहीं है क्योंकि दूसरों के श्लोक पढ़-पढ़ के वह सोचता है कि वह तो सब जानता ही है। ऐसे पांडित्य से मुक्त हुए बिना किसी प्रार्थना की कोई संभावना नहीं होती।


31 अक्टूबर 1999



आप अनूप पाण्डेय नामक एक युवक मिलने आए थे। कहने लगे उनका किसी भी चीज में मन नहीं लगता। सोचते है यह करके क्या होगा, खाने भर को तो है। रहने को घर है, अब और मंजिलें बढ़ाकर क्या होगा ?
मैंने उन्हें कहा कि यह सोचने विचारने की क्षमता ही मनुष्य को पशु से अलग करती है। अगर मनुष्य न सोचे तो वह दो पैर पर चलने वाला पशु ही है। अतः आपके मन में जो सवाल उठ रहे हैं, वह शुभ व सार्थक हैं। ये प्रश्न ही आत्म खोज के कारण बनेंगे और एक दिन आत्म बोध को उपलब्ध कराएंगे। जीवन की धन्यता उसी में है, जीवन का अर्थ वही है। बिना स्वयं को जाने कहीं, कोई कृतार्थता नहीं। आप की प्यास स्वयं से परिचित होने की है। यह बंगलों-कारों से नहीं बुझेगी। उन्होंने सहमति में सिर हिलाया। मार्ग है ध्यान, मैंने कहा। ध्यान से परिचित होने व उस पर प्रयोग करने के लिये उन्हें समय बताया और वह विदा किए।
मनुष्य प्यासा है, उसे ध्यान चाहिए। उस तक ध्यान पहुंचना चाहिए।


1 नवम्बर 1999



आज दिन में तीन फोन आए कि क्या ओशो टाइम्स अभी नहीं आया ? मुझे कहना पड़ा कि अभी नहीं आया। इन टेलिफोंनों से यह पता चल रहा है कि लोग कशिश के साथ ओशो को पढ़ रहे हैं, ओशो टाइम्स की राह देखते रहते हैं। पूना में भी कहीं कुछ अव्यवस्था अवश्य है क्योंकि जबलपुर में गोबिन्द जी के यहां ओशो टाइम्स आए चार-पांच दिन हो रहे हैं, जबकि पालिसी यह होनी चाहिये कि जो बिक्रय हेतु अधिक प्रतियां मंगवाते हैं, उन्हें पहले भेजना चाहिए जो ग्राहक हैं उन्हें बाद में भेजना चाहिए। कभी-कभी तो 21, 22 को ही आ गया है और कभी-कभी अगले माह की चार या पांच तारीख को। तब तक लोग दर्जन भर चक्कर लगा चुकते हैं, हो सकता है, ओशो कम्यून पूना भविष्य में इस तरफ ध्यान दे।


1 नवम्बर 1999 ( संध्या )


नगर में चौराहों पर मूर्तियों की स्थापना होने वाली है। सभी नगरों में ऐसी मूर्तियाँ स्थापित होती हैं। मेरी दृष्टि में जब एक भी आदमी भूखा सोता है या दवा के अभाव में मर जाता है, तब तक किसी की मूर्ति स्थापित करने के लिए लाखों-करोड़ों व्यय करना अन्याय है। और फिर खड़ी भी करना हो तो किसी पार्टी के नेता की मूर्ति नहीं खड़ी की जानी चाहिए। मूर्ति उनकी खड़ी करें जो निर्विवाद रूप से बलिदानी रहे हैं। गांधी, सुभाष, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, अब्बदुल हमीद, रजिन्द्र सेन, जैसे शहीदों की मूर्तियाँ। जवाहरलाल तक भी चल सकते हैं। स्वतंत्र राष्ट्र के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में। इंदिरागांधी की मूर्ति चौराहों पर खड़ी करने की क्या जरूरत है ? राजीव गांधी से कोई क्या प्रेरणा लेगा ? वह तो अभी तक में सबसे बचकाना प्रधानमंत्री थे।
यह मूर्तियां खड़ी करने का चलन बंद होना चाहिए। वर्ना दूसरी पार्टी सत्ता में आएगी तो इनको उखाड़ फेंकेगी व अपने नेताओं की मूर्तियां स्थापित करेगी। अतः यह नौबत न आए इसके लिए जरूरी है कि ऐसे लोगों की मूर्तियां खड़ी की जाए जो सभी पार्टियों के लिए मान्य व प्रेरणादायी हों। वही न्याय युक्त भी होगा। ऐसा न करके मूर्तियां खड़ी करने वाले राष्ट्र का करोड़ों, रुपया व्यर्थ व्यय तो कर ही रहे हैं, दूर तक चारित्रिक नुकसान भी कर रहे हैं जो आज नहीं दिखाई पड़ रहा है, उन्हें क्योंकि वे जरा भी आगे नहीं देख पाते। या शायद सोचते है कि मूर्तियां खड़ी करवा देना बहुत बड़ा काम है। जिंदा लोगों को रहने को जगह नहीं है, मर गए लोगों के लिए हर नगर में इतनी जगह फंसाना अनुचित है !


2 नवम्बर 1999



आल आउट लेने गया था। उस पर कीमत प्रिंट है रुपए 67.50, दिया 55.00 में, स्वयं बिना मेरे कुछ कहे। कीमत 67.50 क्यों प्रिंट है कोई देखने पूछने वाला नहीं है। इसका मतलब कोई दूसरी दुकान वाला हो सकता है 50.00 में ही देता हो। मैं नहीं जानता मार्किटंग इन्सपेक्टर व सेल्स इन्सपेक्टर आदि का क्या कार्य होता है ? मैं यही नहीं जानता कि मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री वगैरह का क्या काम होता है ? हो सकता है वह दूसरे ज्यादा बड़े काम देखते हों, इस छोटे काम को देखने की फुरसत किसी को न हो। ऐसे चेतक नामक टार्च लाया हूं 140 रुपए में उसपर दाम छपा है 350 रुपए।

3 नवम्बर 1999



आज दैनिक भास्कर में छपे एक लेख पर नज़र पड़ी-अमेरिका में बसा लघु भारत, लेखक हैं डॉ. संजय माहेश्वरी, सतना। मुख्य रूप से सिलीकॉन वैली, कोलिर्फोनिया का जिक्र है पर छोटे-छोटे शहरों का भी नाम लिया गया है जैसे सनहोजे, सांताक्लारा, पालो आलटो, सेन मेटयो। सेन फ्रांसिस्को एयरपोर्ट का नाम पढ़कर, हृदय भावुक हो उठा। यही एयरपोर्ट है जहां 24 अक्टूबर 1985 को स्वामी देव सुधा सदन, उनकी जीवन संगिनी संध्या, पुत्र आशीष एवं पुत्रियां सीमा एवं वीणा तथा मेरी मित्र मा जीवन मदा मुझे विदा देने आए थे। गोल्डन गेट ब्रिज (पुल) सेन फ्रांस्सिको प्रवेश करते समय बहुत विशाल पुल है। इस पुल पर से चार बार मैं भी गुजरा हूं, दो बार कार से हेवर्ड से सेन फ्रांसिस्को जाते समय और दो बार वापस लौटते समय।
इस लेख ने ढ़ेरो स्मृतियां जगा दी हैं और मेरी आंखों में प्रेमपूर्ण आंसू भर आये हैं। 1985 में रजनीशपुरम गया चौथे विश्व महोत्सव में सम्मिलित होने। कैसे गया, कैसे वहां जब तक वीजा है तब तक रहने का आमंत्रण स्वयं ओशो ने दिया। यह बहुत बड़ा आशीर्वाद था। बावजूद इसके कैसे किस अतः प्रेरणा के वशीभूत वहां से पौने तीन माह पूर्व ही अपनी मित्र मा जीवन मदा के साथ कैलिफोर्निया के लिए चल दिया, इस सब का सविस्तार वर्णन ‘मेरी रजनीशपुरम यात्रा’ नामक पुस्तक में है। मैं यह जो थोड़ी सी बातें 4 अक्टूबर 1985 से 24 अक्टूबर के बीच चौदह वर्ष बीत जाने के बाद भी याद हैं, उन्हें ही पाठकों से शेयर करना चाहता हूं।

मदा ने फोन पर बताया था कि वह 4 अक्टूबर को कार द्वारा शाम तक रजनीशपुरम पहुंचेगी। उसने यह भी कहा कि मैं 4 को अपने नार्मल रुटीन के अनुसार रहूं यानी उसे रिसीव करने मिरदाद रिसेप्शन पर न आऊं व 4 को उसे न मिलूं क्योंकि वह लम्बी यात्रा से थकी रहेगी। वह 5 अक्टूबर को दिन में मेरे टेम्पल (कार्य स्थल) पर स्वयं आकर मिलेगी। मैंने उससे कहा कि यह मेरे लिए कठिन होगा कि महीने भर बाद वह रजनीशपुरम और मैं उसे लेने न पहुंचू। फिर भी उसका आग्रह यही था कि मैं 4 को रिसेप्शन पर पर न जाऊं क्योंकि वह कब पहुंचेगी, इसका भी कोई अनुमान नहीं है। आज एकदम तो याद नहीं है पर वह 11 से 12 घण्टे की लगातार कार ड्राइव थी। मेरा ख्याल है कि 500 से 600 मील की दूरी कार से तय करनी थी उसे।

परन्तु मैं स्वयं को जानता था कि मेरी मित्र इतनी दूरी से महीने भर बाद आएगी तो मैं उसे रिसीव करने जाऊंगा ही रिसेप्शन पर। उन दिनों शीला के आवास (जीसस ग्रोव) पर नित्य संध्या ओशो प्रेस से बात कर रहे थे। वहां सभी न जा सकते थे। अन्दर बैठने के लिए लगभग 10 से 15 संन्यासी आमंत्रित होते 40-50 संन्यासी हाल के बाहर बरामदा था, उसके बाहर पतली सी सड़क थी जिसके दोनों ओर सुन्दर लान थे, ऊपर छाया थी। यह सब जीसस ग्रोव के अंदर था। मुख्य द्वार वहां से तीन-चार सौ फीट की दूरी पर था। तो 40-50- संन्यासी उस रोड पर दोनों किनारों पर मौजूद रहने को आमंत्रित किए जाते जो कि नृत्य करते हुए ओशो को रिसीव करते, ओशो कार से बाहर निकलते हाथ जोड़े, पर पल भर बाद ही मधुर वाद्य के साथ जो उनके स्वागत के लिए बजता होता, ओशो भी नृत्य करते हुए ही धीमे दोनों ओर खड़े संन्यासियों के प्रेम को स्वीकार करते या कहें दोनों ओर खड़े संन्यासियों पर अपना असीम प्रेम बरसाते हुए भीतर प्रवेश करते। वह मधुर व अलौकिक था। वह बड़ा प्रसादपूर्ण था। वह महारस था। महा आशीष था जो निरंतर बरस रहा था। जिन संन्यासी संन्यासिनियों को वहां होना होता, उन्हें एक दिन पूर्व उनके टेम्पल में बाकायदा प्रिंन्टेड आमंत्रण पत्र मिल जाता कि आपको कल अमुक दिनांक को जीसस ग्रोव में होने वाली ओशो की प्रेस वार्ता में उपस्थित रहने को (अथवा रिसीव करने को) सप्रेम आमंत्रित किया जाता है। आप आधा घण्टा पूर्व यानी 6.30 बजे तक अवश्य वहां पहुंच जाएं। यह बहुत बड़ी घटना होती। जिन्हें भी यह आमंत्रण मिलता उनके लिए यह बड़ा आशीर्वाद होता। इस हेतु एक या दो बार मैं पहले भी आमंत्रित हो चुका था। संयोग की बात कि मैं इस सौभाग्य से 4 अक्टूबर को भी नवाजा गया।




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