गुड़िया का घर - जीलानी बानो Gudiya ka Ghar - Hindi book by - Zeelani bano
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गुड़िया का घर

जीलानी बानो

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :132
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 688
आईएसबीएन :9788126318414

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उर्दू की प्रतिष्ठित उपन्यासकार जीलानी बानो के चार लघु उपन्यासों का संग्रह...

Gudiya Ka Ghar

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

उर्दू की प्रतिष्ठित उपन्यासकार जीलानी बानो के चार लघु उपन्यासों (जीलानी बानो ने इन्हें लघु उपन्यास ही कहा है) का संग्रह है, ‘गुड़िया का घर’। इनमें अपने समय और आसपास के मुस्लिम समाज और जीवन को देखने-दिखाने की कोशिश है। दरअसल इन उपन्यासों में अतीत के स्मृति-चित्रों के आइने में वर्तमान की पड़ताल और भविष्य के सपने हैं। जीलानी बानो की आस्था मानवीयतापरक है। वे शायद यह मानती हैं कि मानवीय पीड़ा, दायित्व-चेतना और मुक्ति की भावना की उस आन्तरिकता को उभार सकती है जिसमें आज के व्यक्ति और समाज की सही तस्वीर उजागर होती है।–और उनकी यह सोच उनके इन लघु उपन्यासों में भी मुखर है।

कह सकते हैं कि उनके लेखन में सब से बड़ी चिन्ता भी जीवन के श्रेष्ठ मूल्यों की रक्षा और अपसंस्कृति के संकट से मनुष्य को बचाये रखने की है। इन उपन्यासों का सरोकार उन सभी चीजों से है जो तमाम विकृतियों के पार-ख़ूबसूरत मुलम्मों से परे दिखाई पड़ते हैं और जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती हैं। जीलानी बानो इन उपन्यासों के जरिये अँधेरी भूल-भुलैया में हवा, धूप, खुशबू और खुले आकाश की तलाश करती हैं।...

गुड़िया का घर

बादल धीरे-धीरे बढ़ते आ रहे थे दिल में घुस आने वाले यक़ीन की तरह शाम की भीगी-भीगी हवाएँ बुशारत (खुशख़बरी) दे रही थीं कि अब मेह़ बरसने वाला है। दिल्ली में जून की उस तपती हुई शाम को कोई यकी़न नहीं कर सकता कि उस वक्त उस्मानिया युनिवर्सिटी में ऐसे बादल छाये होंगे और फिज़ा में ऐसी खुनकी होगी, जो आदमी को आप-ही-आप कँपकँपा देती है। मैं बस-स्टाप पर तनहा खड़ा था।

मगर बिल्कुल तन्हा भी नहीं, मेरे आस-पास घरों को वापस जाने वाले लड़के, लड़कियाँ और कॉलेज के टीचरों का हुजूम था, जो बसों का इन्तज़ार कर रहे थे। कुछ लड़कियाँ इन्तज़ार से बोर होकर फ़ुटपाथ के पत्थरों पर जा बैठी थीं। लड़के भी किसी-न-किसी बहाने उसी तरफ़ ढुल गये थे और लड़कियों के हाथों से किताबें और मैगज़ीन छीन-छीनकर क़हक़हे लगा रहे थे।

मैंने युनिवर्सिटी की तरफ़ देखा। अभी कुछ और प्रोफ़ेसरनुमा सूखे मारे, थकन से चूर, अपने वज़न से ज्या़दा  बोझिल ब्रीफ़केस सँभाले हुए लोग बस स्टॉप की तरफ़ आ रहे थे। बहुत आहिस्ता- आहिस्ता, थके-थके क़दमों के साथ जब सड़क पर कोई कार गुज़रती, तो यह लोग बड़ी रश्क-भरी नज़रों से कार का तआकुब (पीछा) करते थे। यह मुल्क को दानिशवर (विद्वान्), लीडर, डॉक्टर और इंजीनियर ढालकर देनेवाले लोग थे, जिन्हें शाम को अपने घर पहुँचने के लिए किसी बस में सीट नहीं मिलती थी। पहले मैंने कारों के ख्वा़ब देखे। फिर स्कूटर के और आखि़र में मैं सिर्फ़ उस तरफ देखने लगा जिस तरफ़ से बस आती है, मगर नहीं, मैं भूल गया... यह बस-स्टॉप दिल्ली युनिवर्सिटी का नहीं है। मैं तो सिर्फ़ दो दिन के लिए एक ‘वायवा’ लेने के लिए हैदराबाद आया था। आनेवाली बारिश की खुनकी से बोझिल हवाओं से मुझे नींद आ रहीं थी। जी चाह रहा था, जल्दी से गेस्ट-हाउस जाकर सो जाऊँ, मगर कैम्पस से दूर झिलमिलाने वाली रोशनियाँ जैसे मुझे आँख मारकर इशारे कर रही थीं कि इधर आओ न ...

न जाने क्यों उस सुर्ख़ धरती और स्याह पत्थरों से घिरे, ऊँची ड्योढ़ियों वाले हैदराबाद में, क़दम रखते ही मुझे ऐसा लगता है, जैसे यहाँ अब आवारा हवाओं जैसे ऐशपसन्द शहज़ादे और विरह की मारी कोयल-जैसी किसी ग़म-नशीब शहज़ादी की कहानी ज़रूर मिलेगी, मगर ऊँची-ऊँची ड्योढ़ियों की आरास्ता (सुसज्जित) ख़्वाबगाहों (शयनकक्षों) में सोने चाँदी के पायोंवाले छपरखट पर, चाँद-सितारे की मच्छरदानी तले सोनेवाली नाज़ुक-अन्दाम (कोमलकान्त) शहज़ादियाँ, बेल-बॉटम और कोटी पहने, सड़क के फुटपाथ पर बैठी मार्क्स के ‘सरमाया’ की वर्क-गरदानी (पन्ने उलटते) कर रही थीं और उनके लिए हीरों के तौक़ पहनने वाले हाथी पर सवार होकर, ज़रे-बफ्त की शेरवानियों पर सुच्चे मोतियों का सेहरा बाँधे, दोनों हाथों से अशर्फ़ियाँ लुटाते आने वाले बन्ने, अपनी कार्टून-छपी हुई रंग-बिरंगी बुश्शर्टों की ख़ाली जेबों को टटोल-टटोलकर देख रहे थे कि वह अपनी गर्ल-फ्रेण्ड का टिकट ले सकते हैं या नहीं ?

पता नहीं क्यों, जब भी मैं हैदराबाद आता हूँ, मेरा दिल एक तजस्सुसआमेज़ (उत्सुकतापूर्ण) ख़ुशी से भर जाता है। इस आलिफ़-लैला की दास्तानों जैसे शहर में, रंगारंग कहानियों और अदब व तहजी़ब की महफ़िलों और गुलाब की तरह खिले हुए लोगों से मिलकर बेपनाह ख़ुशी का एहसास होता है। यों लगता, जैसे अब एक रूई के बालों-जैसा, स्याह फ़र्गुल पहने बूढ़ा लाठी टेकता हुआ उठेगा और कहना शुरु करेगा-
‘‘तो प्यारे हाज़रीन बातमकी़न...बहुत दिन हुए, जब दक्कन की एक साँवली एक खू़बसूरत तरहदार पाशाज़ाके दामे-उलफ़त में गिरफ्तार हुई, जीने से बेज़ार हुई, रात-दिन ग़म खाना और आँसुओं से मुँह धोना उसका शियार (आचरण)...’’
‘‘अबे यूसुफ़, बे-कारवाँ कहाँ आ निकला यार, तू...!’’ अचानक भीड़ को चीरता हुआ सुरेन्द्र आया और हेस्बे-आदत (स्वभावानुसार) मेरी बाँहों में झूल गया।

 ‘‘दिल्ली से कब आये ? किधर भागने की सोच रहे थे ? मेरे डिपार्टमेण्ट क्यों नहीं आये ?’’ उसके तमाम सवालों के जवाब में मैंने कहा ‘‘क़सम खुदा की, यार ‘वायवा’ देनेवालों ने दिमाग़ निचोड़ लिया। अब मैं तुम्हारी तलाश की फिक्र कर रहा था।’’
सुरेन्द्र के पीछे एक लड़की और एक मर्द भी था, ‘‘यह मेरे दोस्त डॉक्टर प्रकाश राव हैं, बॉटनी पढ़ाते हैं और यह हैं मिस विनीता गौड़...साइक्लॉजी की लेक्चरर...’’लेकिन उन दोनों पर एक नज़र डालकर ही मैं समझ गया कि सुरेन्द्र को बीच में और लगाने की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि वे दोनों बहुत पास-पास थे या पास-पास होना चाहते थे।
और भई, यह हमारे महात्मा, दानिशवर, जीनियस शायर और हिन्दुस्तान के बहुत अहम नक्काद (समालोचक) यूसुफ़ अली...प्रकाश ! यार इनसे ज़रा बचकर रहना, वरना यह अपना तमाम फ़लसफा़ तुम्हारे दिमाग़ में उँडेल कर छोड़ेंगे।’’ हम सबने क़हक़हों के साथ एक-दूसरे से हाथ मिलाये। प्रकाश बड़ा सेहतमन्द, ऊँचा, पूरा, ख़ुश-शक़्ल नौजवान था।

विनीता को देखकर यों लगा, जैसे दुनिया की हर खुशी को वह अपना हक़ समझती हो, जैसे उसके हँसने, क़हक़हे लगाने के लिए ही आज मौसम इतना सलोना हो रहा था। हवाएँ गुनगुना रही थीं। बादल झूमते हुए नीचे झुके चले आ रहे थे। दो मुहब्बत करने वालों के बीच जो एक कशिश-सी होती है, एक अनजाना-सा बन्धन-वह मुझे प्रकाश और विनीता के दरम्यान न जाने कैसे महसूस हो रहा था। शायद इसलिए कि मैं कभी-कभार शायरी भी करता था। मैंने रिसर्च तो की थी-‘उर्दू शायरी के आशिक़ाना मिजा़ज’ पर, मगर जब मैं शायरों के आशिकाना मूड पर ग़ौर करने बैठा तो मुझे उर्दू शायरी में इन्सानी फ़ितरत के बड़े नाजुक गोशों पर भी ग़ौर करना पड़ा, मगर मीर और ग़ालिब को ऐसी महबूबा नहीं मिली, जो  विनीता की तरह प्रकाश से बिल्कुल लगकर ही खड़ी होना चाहती थी, किसी बेअख़्तियार ज़ज्बे के साथ उसकी जानिब (तरफ़) खिंची चली जाती थी।

बातें करते में, चलते में, हँसते में, बार-बार विनीता प्रकाश की तरफ़ देखे जाती थी। कभी उसका हाथ पकड़ लेती। कभी उसके कंधे के पास सिर ले जाकर ग़ैर-महसूस धूल झटकने लगती थी और कभी बस यों ही क़हक़हे लगाये जाती थी। बस में सवार होने के बाद प्रकाश ने मुड़कर सुरेन्द्र से कहा, ‘‘सुरेन्द्र, यूसुफ़ साहब तुम्हारे दोस्त हैं, तो आज से हमारे भी दोस्त हो गये। अब इन्हें किसी होटल ले जाकर हैदराबादी बिरयानी खिलाएँगे !’’
‘‘होटल क्यों ?’’विनीता ने बुरा-सा मुँह बनाया- ‘‘प्रकाश, इन्हें अपने घर ले चलो न ! मम्मी और मैं दोनों मिलकर झटपट खूब मज़ेदार खाना बना देंगी !’’विनीता ने बेहद खुश होकर कहा।

‘‘अरे नहीं, ’’ प्रकाश ने नागवारी से मुँह फेर लिया। ‘‘शाम के वक़्त घर में बड़ी बोरियत होगी !’’
‘‘हाँ, भई, यूसुफ़ ! मैं तुमसे यह कहना तो भूल ही गया कि यह जो हमारे प्रकाश बाबू हैं न, यह बड़े मनमौजी हैं। बस हर वक्त पिकनिक के मूड में रहते हैं। उन्हें घर में बैठने से बड़ी नफ़रत है !’’
‘‘वाह ! वाह ! तो फिर मिलाओ यार हाथ,’’ मैंने बढ़कर गर्मजोशी से हाथ बढ़ाया, तो प्रकाश बड़ी मुहब्बत से गले लग गया।

‘‘मेरी उम्र चालीस बरस है, इसमें से बीस बरस मैंने घर से दूर सफ़र में गुजा़रे हैं,’’ मैंने झुककर कहा।
‘‘अरे, हां, यार ! यूसुफ़ मियाँ तो यूरोप की गली-गली छान आये हैं। बकौ़ल शख़्से, घाट-घाट का पानी पी चुके हैं !’’हम तीनों फिर जोर से हँस पड़े। सबसे जानदार और ऊँचा क़हक़हा विनीता का था।
‘‘यू ऑर वैरी लकी-मैन !’’ प्रकाश बड़ी देर तक मेरा हाथ थामे रहा। बस आबिद-शॉप के स्टॉप पर रुकी तो प्रकाश ने सबसे कहा, ‘‘बस, यहाँ उतर जाते हैं। क्वालिटी चलेंगे  !’’
‘‘मगर वहां अँधेरा बहुत होता है,’’ विनीता ने बड़ी शोख़ नज़रों से प्रकाश को देखा।
‘‘यह तुम दोनों के लिए अच्छा है,’’ सुरेन्द्र ने मुस्कराकर विनीत से कहा,
‘‘अलबत्ता हम-जैसे अकेलों को बोरियत होगी ! क्यों यूसुफ़ भाई ?’’ इस बात पर फिर सबसे ऊँचा क़हक़हा विनीता का था। एक कोने की मेज़ के आस-पास सब बैठ गये, तो प्रकाश ने मुझसे पूछा, ‘‘बियर चलेगी यूसुफ़ साहब ?’’
‘‘यस...’’

मैंने गर्दन हिलायी, ‘‘आप तीनों से मुलाकात की इस यादगार शाम को रंगीन तो बनाना ही पड़ेगा !’’
विनीता के लिए ऑरेंज जूस आ गया। प्रकाश के चेहरे का हर रिऐक्शन विनीता के चेहरे पर उभरता, डूबता और झिलमिलाकर रह जाता था। दो बरस के बाद सुरेन्द्र से मुलाकात हुई थी। इसलिए बातों का एक बोझ मेरे दिमाग़ में रखा था, मगर प्रकाश और विनीता के क़हक़हे किसी को संजीदा नहीं होने दे रहे थे। बार में बैठे हुए लोग मुड़-मुड़कर हमें देख रहे थे, बल्कि सिर्फ़ विनीता को। उसके चारों तरफ़ रंगों और खुशियों का हाला (वृत्त)-सा खिंचा हुआ था। क्वालिटी के धुँधलके में उसकी आँखें चमक-चमक जातीं। होठों के गुलाब खिल-खिल उठते। विनीता के चेहरे पर सबसे अच्छे उसके होठ थे- तीखे, उभरनेवाले  और बार-बार अपनी बनावट बदलकर जज़्बात का इज़हार करनेवाले।

उसकी आँखें छोटी-छोटी-सी थीं। बातें करते वक़्त जोर से हँसते वक़्त वह अपनी छोटी-सी नाक के साथ आँखों को भी और सिकोड़ लेती थी-नन्ही बच्चियों की तरह, मगर फिर भी उसके गन्दुमी रंग, कटे हुए बेतरतीब बालों और सेहतमन्द बदन में बड़ी कशिश थी। स्याह बेल-बॉटम और सुर्ख़ छोटी-सी शर्ट में भी वह अच्छी लग रही थी-यों ही जैसे आप हर रोज बस-स्टॉप, सिनेमा-हाउस या कॉलेज के सामने बहुत-सी खुश-शक़्ल लड़कियों को देखते हैं, जो खूबसूरत नहीं होतीं, मगर फिर भी आपकी नज़रें दूर तक उनका पीछा करती हैं। नज़रों से छिप जाने पर कैसे दुख का अहसास-सा हर तरफ़ छा जाता है। मगर विनीता तो मेरे सामने बैठी थी और आज बियर में बड़ा मजा़ आ रहा था। विनीता जूस का गिलास सामने रखे माचिस की तीलियों से एक घर बनाने में मसरूफ़ थी, जो बार-बार ढह जाता था। फिर भी वह हँसे जाती। न जाने किस बात पर ! कई बार कोई मजे़दार चीज़ उसने अपने हाथ से प्रकाश को खिलायी। मुझे सुरेन्द्र की इस बात पर यकीन नहीं आ रहा था, जो उसने विनीता के बारे में बतायी थी। बी.ए. की स्टूडेण्ट मालूम हो रही थी। बीस-बाइस बरस की, मगर जब वह चलते-चलते सबसे आगे निकल जाती, सड़क सबसे पहले पार कर लेती, आगे बढ़कर टैक्सी को बुला लेती थी, तो मुझे यक़ीन हो गया कि वह लेक्चरर भी हो सकती है। प्रकाश उम्र में उससे छह-सात बरस बड़ा लगता था, मगर वह एक बच्चे की तरह उसकी देखभाल कर रही थी। आज प्रकाश को ज़ुकाम था और वह प्रकाश की हर छींक पर घबराकर कहती, ‘‘प्रकाश ! प्लीज़, डॉक्टर के पास आज चले जाओ न ! कहीं फ्लू न हो जाए !’’

‘‘उफ़्फो़ह !’’ प्रकाश ने झुँझलाकर कहा, ‘‘वन्ती, ज़रा मजे़ की बातें हो रही हैं यूसुफ़ साहब से इस वक़्त, डॉक्टर का नाम लेकर बोर मत करो-यार !’’ और फिर दिल्ली की सियासत के अन्दरूनी हका़इक़ (सत्यों) पर क़हक़हे लगाते रहे। बाज़ (कई) औरतें सिर्फ़ माँ होती हैं। वे अपने बाप, भाई बेटे और महबूब सबके लिए ममता का ज़ज्बा जगाए रखती हैं। मगर मुझे ऐसा लगा-जैसे पल-पल की ख़बरगीरी (देखभाल) से प्रकाश बोर हो रहा था, लेकिन विनीता को मुँह फुलाये माचिस की तीलियों से खेलते देखकर वह उसकी तरफ़ मुड़ गया।
‘‘हाँ, तो भई, वन्ती अब तुम भी तो यूसुफ़ से कुछ बातें करो न ! वह जो शादी के बाद हमारा घर बनेगा, उसकी कहानी सुनाओ। एक बात सुन लीजिए, यूसुफ़ साहब...’’ –उसने वन्ती की तरफ़ बड़ी प्यार भरी नज़रों से देखकर कहा, ‘‘हमारे दरवाजे पर कॉलबेल नहीं लगेगी। यह हमारी वन्ती को पसन्द नहीं है। आप आएँ, तो वन्ती का नाम लेकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना पड़ेगा !’’
‘‘मेरा क्यों ? वन्ती छोटी बच्चियों की तरह तुनुककर कहा,  ‘‘आपका नाम लेकर पुकारेंगे लोग ! वह मकान तो आपका होगा !’’

‘‘हटाओ  झगड़ा क्या है ? क्यों न हम तुम दोनों को इकट्ठे पुकारें-प्रकाश विनीता !’’ सुरेन्द्र जो़र से चिल्लाया, तो विनीता भी हँस पड़ी और कुर्सी के तकिये पर सिर रखकर छत देखने लगी।
‘‘कितनी खूबसूरत सीलिंग है न ! हम भी अपने घर में ऐसी ही छत लगवाएँगे !’’
‘‘अच्छा...ओहो...’’-हम सब फिर हँसने लगे और प्रकाश ने दोनों हाथ अपने सिर पर रख कर कहा, ‘‘यारो ! मेरे सिर पर छत गिर रही है। मुझे बचाओ !’’ एक बार फिर बियर के सरूर में डूबे हुए क़हक़हों से सारा बार गूँज उठा।
‘‘इस लड़की को दुनिया की हर खू़बसूरती चुराकर अपने घर में भर लेने का ख़ब्त है,’’ प्रकाश ने हँसते-हँसते विनीता के सिर पर धप मारते हुए कहा।
‘‘हाँ, जिस तरह इसने दुनिया की हर ख़ूबसूरती छीनकर अपने चेहरे पर जमा कर रखी है !’’अब की बार सुरेन्द्र की बात पर सबका हँसना लाज़िमी  था।

‘‘चलो, हटो ! सुरेन्द्र  भैया को हँसना बहुत आता है,’’ विनीता ने मुँह बना लिया और फिर कुछ संजीदा-सी होकर मुझसे बोली-‘‘यूसुफ़ साहब मुझे घर सजाने का बहुत शौक़ है। जब मैं बहुत छोटी-सी थी न-मद्रास के हॉस्टल में पढ़ती थी, तो दिन भर कार्ड-बोर्ड से नन्हें-नन्हें घर बनाया करती थी। मुझे गुड़ियों का घर बनाने का बहुत शौक़ था। फिर कपड़े की छोटी-सी गुड़ियाँ बनाकर उसमें बिठा देती। मुझे रात को सोते वक़्त ऐसा लगता था, जैसे वह गुड़ियाँ अब चुपके से उठकर घर में चल-फिर रही होंगी, मगर सुबह मुझे देखकर फिर सोती बन जाएँगी।’’ वह दोनों हाथों में चेहरा थामे मेज़ पर  झुकी बहुत आहिस्ता-अहिस्ता कह रही थी, जैसे अभी तक वह किसी गुड़िया के बजाय अपने-आपको एक नन्हे-से घर में बैठा देख रही हो।

‘‘तो मियाँ प्रकाश ! अब तुम भी काठ के उल्लू बनाए जाओगे ! बस चुपचाप बैठे रहना किसी ताक में !’’ सुरेन्द्र की बात पर हम तीनों का हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया।
‘‘सच कहते हो यार ! न जाने यह लड़की मुझे कितने नाच नचाने वाली है,’’ प्रकाश ने नशे से बोझिल हाथों से विनीता को अपनी ओर खींचा, तो वह दूर हट गयी।
‘‘अच्छा, आपको एक मजे़ की बात सुनाऊँगी !’’ विनीता ने मुँह पर से बाल झटककर बड़ी सरखुशी (मस्ती) के साथ कहा, ‘‘प्रकाश को घर मैं बैठना अच्छा नहीं लगता है न, इसलिए यह अपने घर का नाम पिंजरा रखेंगे !’’ अपनी बात पर विनीता खुद ही बड़े ज़ोर से हँस पड़ी।
‘‘हाँ, और मैं किसी जानदार को पिंजरे में बंद नहीं देख सकता,’’ प्रकाश ने सिगरेट सुलगाया और दूसरा सिगरेट मुझे ऑफर किया।

‘‘यारो ! यहाँ सब हमें पागल समझ रहे हैं। इससे पहले कि मैनेजर खुद आकर गेट-आउट कर दे, हमें खुद अब सिर पैर रखकर भागना चाहिए यहाँ से !’’ प्रकाश ने बिल की प्लेट में सौ का नोट रखा और उठ खड़ा हुआ। बाहर सड़क पर आए, तो ठण्डी हवाएँ हमारे इस्तिक़बाल (स्वागत) को खड़ी थीं। बारिश होकर थम चुकी थी। इक्का-दुक्का बूँद बर्फ़ की डलियों की तरह गर्म बदन पर लग रही थी।
‘‘बाहर तो खूब सर्दी है,’’विनीता ने अपने दोनों हाथ दोनों बाज़ुओं पर लपेटकर कहा।
‘‘मुझे तो यों लग रहा है यार सुरेन्द्र, कि यूसुफ़ साहब से हमारी बहुत पुरानी मुलाका़त है,’’ प्रकाश ने सुरेन्द्र से कहा।
‘‘हाँ, इनमें एक यह भी ख़ासियत है कि यह दोस्ती को मिनटों में पुराना कर देते हैं,’’ सुरेन्द्र मेरी तरफ़ बढ़ा।
‘‘तो फिर कब आओगे हैदराबाद ?’’
‘‘मेरा ख़याल है प्रकाश और विनीता की शादी पर आना पड़ेगा। ज़रा मुझे यह बताइए कि आप दोनों की शादी कब और कहाँ होगी ?’’

‘‘हमारी शादी ?’’प्रकाश ने सिर खुजाकर सोचते हुए कहा, ‘‘मेरा ख़याल है कि हमारी शादी तो हो चुकी है। क्यों वन्ती ?’’ विनीता ने इस बात पर ख़ालिस लड़कियों वाले अन्दाज़ में शरमाकर सिर झुका लिया।। मैं और सुरेन्द्र फिर हँस पड़े।
‘‘अच्छा तो इसका मतलब यह है कि अभी नहीं हुई है,’’ वह फिर मेरी तरफ़ मुड़ गया, ‘‘कब होगी और कहाँ होगी,  इस बात का यक़ीन नहीं है, अलबत्ता अब की छुट्टियों में हम एक टूर पर निकलेंगे। पहले बंगलोर, फिर कोडी कनाल, फिर शिमला, फिर दिल्ली...बस इस सफ़र में कहीं-न-कहीं शादी भी कर लेंगे... क्यों वन्ती ठीक है न ?’’
‘‘बस करो !’’ वन्ती ने झूठ-मूठ के गुस्से से प्रकाश के मुँह पर हाथ रख दिया, ‘‘मुझे अभी से थकान हो रही है इतने पहाड़ों पर चढ़ने से... तुम्हारा बस चले, तो हर वक़्त हवाओं में उड़ते फिरो। न जाने क्या मिलता है इस आवाराग़र्दी में !’’
‘‘बहुत-कुछ मिलता है। क्यों यूसुफ़ साहब ?’’ उसने हँसकर मेरी तरफ़ देखा।
‘‘क्या...क्या...?’’विनीता ने चिढ़कर पूछा।
‘‘दूसरी रंगीन चिड़ियों का साथ...’’ प्रकाश ने पहले ही से विनीता की चपत से बचने के लिए सिर पर दोनों हाथ रखकर कहा। विनीता उसे पकड़ने लपकी और फिर चारों तरफ़ बेफ़िक्रे तमाशाइयों को अपनी तरफ़ मुखा़तिब पाकर उसकी कलाई पर काटने लगी।

‘‘हाय, मर गया !’’ प्रकाश झूठ-मूठ के गुस्से से चिल्लाया।
‘‘मुझे इस साइक्लॉजी की उस्तादनी माँ से बचाओ, यारो ! आइ ऐम वेरी सॉरी ! कहो, तो हॉस्टल जाने के बाद मुर्ग़ा भी बन जाऊँ !’’ वह छोटे बच्चों की तरह कान पकड़कर कह रहा था।
‘‘बनने की क्या ज़रूरत है ?’’ विनीता की इस बात पर एक बार फिर सब हँस पड़े।
‘‘अच्छा तो अब इजाज़त दीजिए। यह खु़शगवार शाम जो आप लोगों के साथ गुज़ारी, मैं कभी नहीं भूलूँगा !’’ मैंने प्रकाश से हाथ मिलाया और फिर विनीता की तरफ़ देखा।

‘‘तो फिर अगली बार जब हैदराबाद आऊँगा, तो आपसे आपके घर पर मुलाक़ात होगी ?’’
‘‘लेकिन आपको प्रकाश से एक बार मिलने के लिए हमारे घर दस बार आना पड़ेगा।’’ विनीता ने मुँह फुलाकर कहा।
‘‘अच्छा, वह क्यों ? क्या आप इनसे हर वक़्त नहीं मिलने देंगी ?’’
‘‘जी नहीं। जनाब ! यह मिस्टर सैर-सपाटे के बड़े शौक़ीन हैं। मुझे मालूम है कि कभी वक़्त पर घर नहीं आया करेंगे। मुझे तो डर है कि यह मुझे बिलकुल ही अपनी धर्मपत्नी न बना दें कि रात के बारह-बारह बजे तक मेज़ पर खाना लिये जागती रहूँ-पतिदेव के इन्तज़ार में !’’

‘‘यह तो हुआ करेगा !’’ प्रकाश ने चाबियों का गुच्छा हवा में उछालते हुए कहा, ‘‘अपन रमी तो छोड़नेवाले नहीं हैं !’’
‘‘तो फिर क्या छोड़नेवाले हैं ?’’ विनीता एकदम संजीदा हो गयी।
‘‘फ़िलहाल तो इस सड़क को छोड़नेवाले हैं, वरना होटल का मैनेजर अब हमें नाश्ता करने फिर अन्दर बुला लेगा !’’ प्रकाश ने आगे बढ़कर एक टैक्सी बुलायी।
‘‘तो फिर कल मिलेंगे यूसुफ़ भाई ! आप सुबह आठ बजे तक विनीता के हॉस्टल आ जाइए ! कल उसमान सागर ले चलेंगे आपको। ज़रा खुले आसमान तले गपशप होगी !’’
मगर एक बात सुनो, प्रकाश। जब तुम अपना घर बनाओगे न, तो उस पर छत मत डलवाना, ताकि खुले आसमान तले रह सको,’’ सुरेन्द्र ने टैक्सी में बैठने से पहले कहा।

‘‘मगर घर की क्या ज़रूरत है यार ! हम घूम-फिर कर भी ज़िन्दगी गुजा़र सकते हैं,’’ उसने विनीता के थप्पड़ की उम्मीद में दोनों हाथ सिर पर रख लिये।
‘‘बहुत हो चुकी बकवास ! मुझे जल्दी हॉस्टल पहुँचा दो, वरना वार्डन मुझे मारेगी,’’ विनीता ने सचमुच घबराकर कहा।
‘‘आप हॉस्टल में क्यों रहती हैं ?’’ मैंने विनीता के कमरे में आने के बाद पूछा।
‘‘अभी आप से बात करती हूँ।’’ विनीता अपने भीगे बालों को झटकती हुई अन्दर चली गयी। विनीता ने आज बड़ी खूबसूरती से मेकअप किया था और स्याह प्रिण्टेड मैक्सी पहनी थी और कोई भीनी खुशबू लगायी थी, जो कमरे के अन्दर आते ही एक खुशगवार मूड के साथ इस्तिक़बाल (स्वागत) करती थी। उसका कमरा लकड़ी की पार्टीशन से दो हिस्सों में बँटा हुआ था। एक तरफ़ बेड-रूम। दूसरी तरफ़ जहाँ मैं बैठा था, उसमें विनीता ने किचन, स्टोर, ड्राइंग-रूम और डाइनिंग-रूम सब कुछ बना रखा था। हर चीज बड़ी नफा़सत और सलीके से अपनी जगह रखी हुई थी, जैसे उसने उस छोटे-से कमरे में हर चीज़ रखने के बारे में काफ़ी सोच-विचार किया हो।

कोने की एक मेज़ पर स्टोर और उसके ऊपर शेल्फ में किचन का सामान रखा था। छोटे साइज़ के फ्रिज़ के ऊपर सूर्यमुखी के ताजा फूलों का बड़ा-सा गुलदस्ता था। रेडियो के ऊपर मनीप्लाण्ट की बेल का वाज़ था। सोफे़ पर ख़ूबसूरती से बनाये हुए कुसन सजे थे। शो-केस में हर क़िस्म की गुड़ियाँ मुस्करा रही थीं। नाचती-गाती बनजारों का लिबास पहने, पंजाबी सू़ट में मुस्कराती दूल्हा-दुल्हन बनी, छोटे बच्चों की तरह देखनेवालों की तरफ़ हुमकती हुई। इन गुड़ियों की वजह से यों लगता, जैसे कमरे में बहुत-से लोगों की चहल-पहल हो। विनीता तौलिए से बाल लपेटकर अन्दर आयी। उसने फ्रिज़ से फल और मिठाई निकाली और मेरे सामने रख दी।
‘‘यह गुलाब-जामुन मैंने खुद बनाये हैं। प्रकाश बड़े शौक़ से खाता है !’’ इन गुलाब-जामुनों का ज़ायका मुझे विनीता के सारे चेहरे पर खिला हुआ लग रहा था।

‘‘आप हॉस्टल में क्यों रहती हैं ?’’ मैंने गुलाब-जामुन खाते-खाते फिर पूछा। विनीता ने गर्म पानी टी-पॉट में डालते हुए मेरी तरफ देखा और कुछ रूककर बोली-‘‘मेरा घर कहां है अभी ? छह महीने पहले जॉब मिली है,’’ फिर वह मेरे सामने वाले सोफ़े पर आ बैठी और अपने हाथों को नैपकिन से साफ़ करने लगी।
‘‘इससे पहले मैं एक मकान में पेइंग-गेस्ट थी !’’

‘‘तो क्या आप हैदराबाद की रहने वाली नहीं हैं ?’’ विनीता ने काँटा उठाकर प्लेट में पड़ी हुई गुलाब-जामुन के दो टुकड़े किये। फिर तीन और फिर इन टुकड़ों को अलग-अलग करते हुए धीरे-धीरे कहने लगी -‘‘मेरा घर कहीं भी नहीं है यूसुफ़ साहब ! मैं तीन बरस की थी, जब मम्मी के मरने के बाद पापा ने दूसरी शादी की, तो मुझे बोर्डिग में दाख़िल कर दिया। छुट्टियों में घर जाती थी, तो मेरी सौतेली बहनें कहती थीं, तुम हमारे घर क्यों आती हो ? तब मैं सोचती थी, फिर मेरा घर कहाँ है ? मेरे ऐसे सवालों से घबराकर पापा मुझे छुट्टियों में आण्टी के घर भेज देते थे। कभी चाचा के यहाँ। इसी तरह मैं इतनी बड़ी हो गयी...’’उसने छत की तरफ़ नज़रें उठाकर देखा। उसकी आँखें छलक रही थीं, जिन्हें वह रोकने की कोशिश कर रही थी।

‘‘खै़र अब प्रकाश आपके लिए बहुत ख़ूबसूरत घर बना देंगे,’’ मैंने उसे खुश करने के लिए कहा।
‘‘हाँ मुझे भी ऐसा ही लगता है !’’ वह एकदम बच्चों की तरह खुश हो गयी, ‘‘मैंने सोच लिया है, मैं अपना घर खुद बनाऊँगी। खुद ही उसे सजाऊँगी। वैसे प्रकाश का बड़ा ख़ूबसूरत मकान है। उसके डैडी बहुत बड़ा बिज़नेसमैन है। वह अपनी माँ का इकलौता बेटा है न ! इसलिए मम्मी ने उसे बचपन में हर वक़्त अपने सीने से लगाये रखा। बस घर में रहते-रहते प्रकाश बोर हो गया है अब !’’
‘‘आप जाती हैं प्रकाश की मम्मी से मिलने  ?’’ मैंने चाय की प्याली उठाकर पूछा। ‘‘हाँ बड़ी प्यारी-सी हैं प्रकाश की मम्मी  ! वह हमारी एंगेजमेण्ट पर बहुत खुश हैं। वह भी यही चाहती हैं कि प्रकाश अब किसी एक जगह ठिकाने से बैठना सीखे...आप चाय और लेंगे ?’’
‘‘जी बस सुक्रिया...सिगरेट सुलगा सकता हूँ ?’’ मैंने झुककर कहा और विनीता के गरदन हिलाने पर शुक्रिया अदा किया।

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