Pratinidhi Bal Kahaniyan - Hindi book by - Dinesh Chamola - प्रतिनिधि बाल कहानियाँ - दिनेश चमोला
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प्रतिनिधि बाल कहानियाँ

दिनेश चमोला

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6882
आईएसबीएन :81-7043-358-4

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इन कहानियों में मनोरंजकता के साथ-साथ सार्थक सन्देश निहित करने का भी प्रयास रहा है। ...

Pratinidhi Bal Kahaniyan - A Hindi Book - by Dinesh Chamola

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बचपन में दादी व माँ से कहानियाँ सुना करते थे। वे कहानियाँ बालमन में कई-कई रसों को एक साथ जन्म देती थीं। माँ की कहानी कला के कथ्यों के अनुरूप ही मन व भावनाओं की भावभंगिमा भी अपना रूप बदल देती है। कभी कहानी का कथ्य बाल मन को झकझोर देता था। यहाँ तक कि मार्मिकता में डूब भावुक मन कराह भी उठता व करुणा आँसुओं के रूप में उमड़ पड़ती। कभी वीर रस की कहानियों से तथाकथित डर फुर्र हो जाता तो कभी हास्य रस की अनुगूँज दिनों तक मन के भीतर हँसी-खुशी की अठखेलियाँ करती रहती। कभी कोरे मन पर लदी कहानियाँ भीतर तक इतना डर भी पैदा कर देती कि दिन में भी घर के दूसरे कमरों में अकेले जाने का साहस न जुटा पाता। फिर दूसरी ओर कभी वे अबोध बचपन की सशक्त कहानियाँ इतना भी बालमनों में वीरता का संचार कर देती की बीहड़ बांज-बुरांश के जंगलों नैतिकता की छत से प्रेरणा की फुलझड़ी बन अवतरित होती तो कभी माँ की ममता-भरी हिमालयी प्रकृति से देवत्व की आस्था बन। नि:संदेह भटकते व डगमगाते बचपन की जीवट होती ये कहानियाँ।

माँ के कोमल कण्ठ से कहानियाँ आती नहीं थीं, बल्कि झरती थीं निर्झर झरनों की तरह। रोज नए रूप, नए रंग, नई सज्जा व नई प्रेरणा भूमि लेकर। बालमन को सदैव लगता था कि प्रकृति के अन्य अवयवों की ही तरह ये कहानियाँ भी नानियों, दादियों से होकर माँओं के कोमल कंठ तक अपनी यात्रा-पथ तय कर डालती थीं। ये कहानियाँ प्रेरणा, कर्म, उत्साह, स्फूर्ति, चेतना उमंग, विश्वास, आस्था, मर्यादा, नैतिकता व मूल्यों की रीढ़ होती थीं। जिस प्रकार भौतिकता की भूख आहार से पूर्ण तुष्टि पाती थी, उसी प्रकार कल्पना की प्यास कहानियों का सुखद आँचल प्राप्त कर संतृप्ति की अनुभूति देती थी। ये कहानियाँ झिज्ञासा, ज्ञान, पिपासा की प्राथमिक सीढ़ियाँ थीं। ये कहानियाँ शून्य जीव जगत् में क्या, क्यों और कैसे के दार्शनिक प्रश्न ही नहीं उछालतीं बल्कि शून्य क्षितिज के उस पार तक भावना की मधुर यान भी बनती थीं। ये कहानियाँ बाल-मन को भविष्य के प्रति दी गई अद्भुत उपहार थीं, वे चाहे लोक-साहित्य की थाती से निस्सृत हुई हों या फिर अनुभवों की कोख से।

दिन-भर की थकी-हारी माँ जब सायं को अपने शयन कक्ष में पहुँचती तो अबोध अवचेतन मन को चतन चितेरा फिर से नई कहानी की नई भावभूमि की संरचना की तैयारी में रहता। सचमुच परिवार मानवीय गुणों की प्राखमिक पाठशाला है व माँ सर्वप्रथम व मूलभूत शिक्षिका। शिक्षा की सूत्रों की ही तरह कहानी के अंकुर बाल-मन के स्वप्निल संसार में उमड़ते-घुमड़ते रहते। मानो एक बँधे-बधाए पाठ्यक्रम की ही तरह कहानियों का सिलसिला भी चल निकला था। माँ तो महज कहानियाँ सुना देती थीं किन्तु वे सन्दर्भों व सरोकारों से परे असीमित परिवेश की कहानियाँ थी। वे पाताल की कोख से उगती, धरती के आँचल में लहरातीं, व्यापक ब्राह्मण तक को अपने सौरभ से आप्लावित करती थीं। उनका क्षेत्र, कथ्य व संवेदन का तत्व पाठ्यक्रमीय कहानियों के फलक से कहीं विस्तृत, शाश्वत व अमिट होता था। माँ के पास कहानियाँ रटन्तु कागजों से होकर नहीं आई थीं, वरन भावनाओं के सुकोमल स्वप्न लिये जब अनुभवों, अनुभूतियों एवं संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से उभर-उभर कर फूटी थीं।

हर कहानी अपने में गहरे मूल्यों को समाए रहती, तभी तो निपट अवकाश के क्षणों में कहानी के मध्य उभरे कई नैतिक प्रश्नों के उत्तर का मंथन बार-बार बाल-मन को उद्वेलित करता। संभवत: जीवन की वर्णमाला के अक्षरों से आत्मविश्लेषण की पहली साक्षात्कार थी वे कहानियाँ। पात्रों, संवादों, मनोरंजकता के साथ-साथ मूल्यों की जीवन्तता बार-बार बाल-मन को प्रसुप्त अवस्था से जगाती व भावों, विचारों के तीर-तरकश कस भावना के अदृष्ट संसार से दो-चार होने को प्रेरित करतीं। ‘ऐसा क्यों हुआ- ऐसा होना चाहिए था’ का विवेकपूर्ण विश्लेषण मानो मन-ही-मन बाल-मन की चेतना को झंकृत ही नहीं करता बल्कि आत्मनिर्मित मस्तिष्क की कटुता को सुकोमल कर संवेदना के मलहम से स्फूर्ति व नित नवीनता का पोषण भी करता जो आत्मविश्लेषण व कोमल चिन्तन की प्रक्रिया से होता हुआ आत्ममंथन व आत्मविश्वास की हद तक ही विराम लेता। तभी कभी-कभी बीच-बीच में पूछे गए दार्शनिक पुटों से माँ चौंक ही न जाती बल्कि दिनों तक उनके समाधानों के भँवर में उलझी भी रहतीं। ये कहानियाँ वस्तुत: सीमित परिवेश की असीमित संवेदना लिये होतीं।
 
बाल कहानियाँ न केवल मनोरंजन व समययापन का सीधा साधन होती है। बल्कि निरंक मन की अक्षुण्ण निधि का एक जीता-जागता साक्षात्कार भी होती है। ये जीवन रूपी कोरे कागजों के ढेर से इतर गठ्ठी हुई बहुरंगी रंगों का अम्बार भी हैं जो प्रेरित कर न केवल कोरे कागजों पर रंगों को उकेरना सिखाती हैं बल्कि अद्भुत, अनोखी व विलक्षण कलाकृतियों का रूप धारण कर मन के भीतरी विश्लेषण से नई-नई भावभंगिमाओं, कल्पनासृष्टियों व भाव सम्पदाओं में ज्ञान बीज संस्कृति को रोपित करती हुई ज्ञान-विज्ञान की हरी-भरी खेती को लहराकर इसकी अनुपम सुरभि से भौतिकता को आध्यात्मिकता, चिरन्तनता, नवीनता व मूल्यों से अलंकृत भी करती हैं।

जीवन के कटु, काल्पनिक व यथार्थपरक उद्बोंधनों के साक्षात्कार की उत्प्रेरक होती हैं ये कहानियाँ। ये प्रकृति की कोख से पनपी, बढ़ी व सम्पोषित हुई कहानियाँ होती हैं। इसलिए इन्हें काल का कोई भी फलक या अवयव डुबो नहीं सकता, समाप्त नहीं कर सकता। ये सूर्य, चन्द्रमा या सागर की ही कालातीत हैं। प्रकृति की सुन्दरता की ही तरह सुन्दर, सुरभित व आकर्षक। फल-फूल व जैव-सम्पदा की ही तरह सम्पूर्ण सृष्टि से अपनी-अपनी रूप संरचना लेकर फैली हुई। इन काहानियों में  जीवन यथार्थ की कहानियों का जीवन से कही अधिक शाश्वत व चिरन्तन होता है। क्योंकि यथार्थ के परिवेश की कहानियाँ नश्वर जीवन के आठ-नौ दशकों को अधूरे अनुभवों की कहानियाँ होती हैं जो इसी के अनुरूप डूबती, मरती व जाती रहती हैं। लेकिन ये बाल कहानियाँ सागर की गोदी में धरती की थपकियाँ पा आकाश की लोरियों के संसर्ग से युग-युगों तक जीती है।...ये पहले तो जन्म नहीं लेती यदि जन्मती है तो युगों तक न मरने का संकल्प लेकर भी उपस्थित होती हैं........अपने में अनूठा रहस्य, अध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान व दर्शन समाए रहती हैं ये कहानियाँ। ये सीमित मस्तिष्क में वायुमंडलीय ब्रह्मांड की-सी विस्तृतता व सृष्टि ती ऋतुओं, नदी, झरनों वे जीव सम्पदा की-सी रोचकता, विविधता व रहस्यात्मकता समेटे समाए रहती हैं। बाल कहानियाँ अधूरे ज्ञान की नर्सरी में विकसित हुई कहानियों की पौध नहीं बल्कि युगों से लहलहाते अरण्यों के बीच प्रचुरता से आकाश छूती संपुष्ट, बलिष्ठ व असीमित जैव वनस्पति की संवर्द्धक, पोषक व वंशज है....जिसका कोश अक्षुण्ण है......।

बाल साहित्य का स्फुरण संस्कारों की कोख से होता है जो मूल्यों की गोदी में संरक्षण पा नैतिकता व मौलिकता की याद तरंगायित होता हुआ भूत, भविष्य व वर्तमान के बीच ज्ञान के सेतु का कार्य करता है। संस्कार मन की अच्छी आदतों का सुधरा हुआ व मर्यादित रूप है। इसलिए संस्कार देने से पूर्व गहराई से संस्कारित होना भी अनिवार्य है। संस्कार उपदेश के आधार पर नहीं बल्कि आचरण व व्यवहार की कसौटी पर कसे व प्रासंगिक होने चाहिए। बाल साहित्य के लिए बाल मनोविज्ञान की गहरी पकड़ ही इसके अपने क्षेत्र मौलिकता का एहसास करा सकती है। कृत्रिमता की पृष्ठभूमि से उभरी कहानियाँ अपना कृत्रिम ही प्रभाव छोड़ जाने को विवश होती है, जबकि यथार्थ, गहरी संवेदना व मूल्यों के धरातल पर केंद्रित कहानियाँ न केवल प्रेरणाबिन्दु का मूल स्वर बनती हैं बल्कि मन व मस्तिष्क के भीतर तक जा आत्मीयता व मित्रता का-सा अहसास कराकर जीवन-मूल्यों में निखार लाने में भी सक्षम होती हैं। बच्चा, बाल-मन या बाल पाठक जब कहानी के भीतर अपनी चारित्रिक, भौतिक व मानसिक उपस्थिति पाता है तो रोचकता के साथ-साथ कहानी की आत्मीयता का तत्त्व उसे भीतर तक अपनत्व बोध कराता है। इन कहानियों की सफलता भी सच्चों संबंधो की ही तरह है। जिस प्रकार सच्चे संबंध जैसे-माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी आदि कृत्रिमता व संशय की परिधि से सदैव दूर रहते हैं जबकि इसके विपरीत अजनबी सम्बन्ध अथवा संबंधी वर्षों तक भी विश्वास को भीतर तक जीतने में सदैव असमर्थ रहते हैं। इनके साथ कृत्रिमता का जामा बराबर बना रहता है। लेखक व पाठक के बीच रचनात्मक की सीधा व भौतिक संबंध स्थापित होना ही रचना की उर्वरता, सहजता, स्वीकार्यता व प्रामाणिकता की प्राथमिक सीढ़ी है। बाल मनोविज्ञान को गहराई से समझ कर ही हम सच्चे अर्थों में बाल साहित्य की सफल रचना कर सकते हैं।

मेरा मानना यह रहा है जिस प्रकार जीवन जीने के लिए हर प्रकार के पुदार्थों, अवयवों हवा-पानी, भोजन, मित्रता, कपड़े, मनोरंजन, खेल, नहाना धोना, खाना-पीना आदि सभी कुछ अनिवार्य व अपेक्षित है, ठीक उसी प्रकार बाल साहित्य की हर विधा हर कथ्य भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में बाल जीवन को मौलिका विकास में अनिवार्य है, बशर्ते उसमें सक्रियता व प्रेरणा का गुण निहित हो। कई विद्वानों का मानना रहता है कि बालकों को अधिक उपदेश देना भी अच्छा नहीं जबकि यहाँ मेरा दृष्टिकोण भिन्न है। मैं सुकोमल बालमन को जीवन रूपी अजनबी प्रदेश का राहगीर मानता हूँ जिसे अपने मूल्यों की मंजिल तक पहुँचने के लिए उपदेशों की सीख अवश्य मिलनी चाहिए ताकि वह लक्ष्यों के अनुरूप सीधे-सीधे गंतव्य तक अवश्य पहुँच जाए। अन्यथा मंजिल के अलावा संशय के अरण्य में कहीं भी खो जाने का भय भी निहित रहता है। यदि उपदेश, अनुभव, प्रेरणा की पृष्ठभूमि से उभर कर आते हैं तो वे बाल राहगीर को न केवल जीवन पथ पर सुचारु रूप से चलने को प्रेरित करते हैं बल्कि अच्छे-बुरे, सत्य-असत्य, लौकिक-अलौकिक, उचित-अनुचित का आत्म-विश्लेषण करने को भी प्रेरित करते हैं। जीवन में जिस प्रकार रात-दिन, हवा-पानी प्रकृति व अन्य वस्तुओं की अनिवार्यता है, इसी प्रकार बालक-बालिकाओं की उचित समय पर उचित वस्तु की माँग व आवश्यकता के साथ-साथ इनकी पूर्ति भी आवश्यक है। यदि जीवन-पथ की मौलिक, सही व अच्छी जानकारी व ज्ञान प्राप्त हो तो निस्संदेह ही उद्देश्य-प्राप्ति व मंजिल तक पहुँचने में सुगमता ही नहीं बल्कि रोचकता के साथ-साथ उत्साह का भी संचार होता है। उत्साह से किए कार्य में सफलता के साथ-साथ नवीन चेतना का भी विकास होता है। यदि बालक व बालिका किसी कार्य को रो-धोकर सम्पन्न करते हैं तो उसमें आत्म-सन्तुष्टि दोनों में से (जो कार्य करता है अथवा जिसके लिए कार्य करता है)
 किसी को भी आन्तरिक रूप से प्राप्त नहीं होती। अनमने भाव से किए कार्य में अन्यमनस्कता का भाव बराबर बना रहता है। अत: उत्साह जानकारी के साथ-साथ उचित समय पर उचित उपदेश प्रदान करना भी जीवन के अनुशासन में निर्देशों की-सी भूमिका निभाते हैं।

अकादमिक दृष्टि से बाल-मन भले ज्ञान-विज्ञान की वर्णमाला से अपरिचित रहता हो लेकिन अनुभवी, पारखी दृष्टि के रूप में मन के भीतर का बाल रचनाकार सदैव जाग्रत, चौकन्ना व गीत संगीत की दुनिया पर गहरी परख व पकड़ रखने वाला होता है। हम देखते हैं कि यदि कोई माँ रूखे अथवा क्रोधित स्वर में बच्चे को सुलाने का प्रयास करती है तो भरसक प्रयासों के बावजूद भी सफलता पाने में असमर्थ ही रहती है। इसके विपरीत जब माँ भावविभोर हो मीठे स्वर में गाना अर्थात् लोरियाँ गाती है तो बालक न केवल रोना बन्द करता है बल्कि भीतर ही भीतर गहरे अपनत्व व आनन्द रस की अनुभूति कर झूमने लगता है......अर्थात् मंत्रमुग्ध हो उठता है। यह मंत्रमुग्ध अवस्था ही उसकी मौन स्वीकार्यता है। कहा जा सकता है कि बाल-मन किसी भी दिशा में पदार्पण करने के लिए सदैव स्वतंत्र होता है। इस पर विजय वरवशता, मजबूरी अथवा दबाव से नहीं बल्कि आत्मीयता, वास्तविकता व गहरे अपनेपन से ही सम्भव होती है। इससे स्पष्ट है कि अबोध मन में भले-बुरे का एक अच्छा विश्लेषक उपस्थित रहता है जो अच्छाई की उपस्थिति में ही अपनी सहमति प्रदान करता है। बाल-मन को कृत्रिमता व वास्तविकता के बीच भली भाँति अन्तर करने की परख विद्यमान होती है। भरी भीड़ में ही वह अपने संबंधों को पहचानने की पूर्ण सामर्थ्य रखता है। यह प्रवृत्ति मनुष्यों में ही नहीं बल्कि जीव-जंतुओं तक में भी भली भाँति उपस्थित रहती है।

बाल साहित्य को बल-मनों की किसी रूप में कोई-न-कोई भूख अवश्य शान्त करनी चाहिए। जो साहित्य बाल-मन में अपनत्व की पहचान निर्मित कर सकता, वह सच्चे अर्थों में बाल साहित्य नहीं कहला सकता। बाल साहित्य प्राकृतिक प्रतीकों के माध्यम से भी अपनी अभिव्यक्ति देता है। इस पर भी वह कहीं-न-कहीं बाल-मन की प्यास को अवश्य संतृप्त करता है। पेड़, चिड़िया, नदी, झरने, बादल, कोहरा, बर्फ, घास, फल, फूल जैसे विषय मौलिकता के साथ-साथ रसानुभूति भी कराते हैं। आत्मीयता, मनोरंजन व मूल्य का तत्त्व, चाहे कविता में हो अथवा कहानी में, बाल-मन को तत्काल अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता रखता है। यह तो माना जा सकता है कि कविता गेय गीतों में कहानियों की तुलना में सरसता व मोहकता का तत्त्व अवश्य अधिक होता है। किन्तु अपने-अपने स्तर पर अपने-अपने पाठकों के अन्दर तक पहुँचने का तत्त्व दोनों में उपस्थित रहता है। जैसे कोई विद्यार्थी स्कूल कार से जाता है, कोई स्कूटर से, कोई रिक्शा से, कोई साइकिल से तो कोई पैदल भी। सभी का उद्देश्य महज स्कूल ही पहुँचना है। किन्तु इस बीच भौतिक व मानसिक आनंद व रसों की अनुभूति सभी को अपनी-अपनी पृष्ठभूमि के आधार पर ही होती है।


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